अध्याय १६

कलियुग

यह अध्याय किसी कथा का नहीं, एक समय का वर्णन है — और वह समय पहचाना हुआ लगता है

चार युग

पुराणों में समय चार हिस्सों में बाँटा जाता है — सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि।

हर युग पिछले से छोटा है, और हर युग में कुछ न कुछ घटता जाता है।

आख़िरी सबसे छोटा है, और उसी में हम हैं — ग्रंथों के हिसाब से।

जो घटता जाता है

विष्णु पुराण का वर्णन किसी आग या बाढ़ का नहीं है।

वह रोज़मर्रा का है, और इसीलिए असहज करता है:

धन ही योग्यता मान लिया जाएगा। जिसके पास ज़्यादा होगा, उसकी बात ज़्यादा सही मानी जाएगी।

बात कम होगी और दिखावा ज़्यादा।

वचन का मोल नहीं रहेगा।

पढ़ा-लिखा होना और समझदार होना एक मान लिया जाएगा।

एक और बात, जो कम कही जाती है

पर इसी वर्णन में एक और बात है, जो अक्सर छोड़ दी जाती है।

ग्रंथ कहते हैं कि इसी युग में सबसे कम मेहनत से सबसे ज़्यादा मिल सकता है।

पिछले युगों में जो तप, यज्ञ और वर्षों की साधना से मिलता था, वह अब सिर्फ़ नाम लेने से मिल सकता है।

यानी वर्णन जितना कठोर है, उतनी ही बड़ी छूट भी उसी में रखी है।

और फिर

और फिर वही होता है जो दसवें अध्याय में लिखा है — एक गाँव, एक सफ़ेद घोड़ा, और एक युग का अंत।

उसके बाद सत्ययुग लौटता है, और गिनती फिर पहले पायदान से शुरू होती है।

यह वही ढाँचा है जिससे यह गाथा शुरू हुई थी — कुछ ख़त्म होना, और उसके बाद दोबारा शुरुआत। घटना वही नहीं है; ढाँचा वही है।

टिप्पणी: कलियुग का वर्णन विष्णु पुराण (छठा अंश) और भागवत पुराण (बारहवाँ स्कंध) में मिलता है, और दोनों का सुर एक जैसा होते हुए भी गिनाई गई बातें पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं। ध्यान देने लायक़ बात यह है कि वर्णन में सिर्फ़ कठोरता नहीं है — इसी युग के बारे में यह भी कहा गया है कि इसमें सबसे कम से सबसे ज़्यादा मिल सकता है, और यह हिस्सा सुनाते समय अक्सर छूट जाता है। यह वर्णन बहुत पुराना है और हर सदी में लोगों को अपने ही समय का लगता रहा — इसे पढ़ते हुए यही सबसे ज़रूरी बात याद रखने की है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, कलियुग

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

पुराणों में समय कितने युगों में बाँटा गया है?

  • चार
  • दो
  • सात
  • दस
पूरी कथा पढ़िए — चार, और घटते हुए

चारों युग बराबर नहीं हैं — हर अगला पिछले से छोटा बताया जाता है, और उसमें कुछ न कुछ कम होता जाता है।

इसी वजह से इस बँटवारे को अक्सर उतार की तरह पढ़ा जाता है, चक्र की तरह कम।

पर ग्रंथ इसे चक्र ही कहते हैं — अंत के बाद फिर से शुरुआत, और यही इस गाथा के पहले और आख़िरी अध्याय को जोड़ता है।

क्या हुआ?

विष्णु पुराण कलियुग के बारे में क्या कहता है?

  • कि तब पृथ्वी आग में जल जाएगी
  • कि तब धन को ही योग्यता मान लिया जाएगा, और वचन का कोई मोल नहीं रहेगा
  • कि तब कोई ग्रंथ नहीं बचेगा
  • कि तब सब बराबर हो जाएँगे
पूरी कथा पढ़िए — वर्णन, जो रोज़मर्रा का है

इस वर्णन में कोई प्रलय नहीं है, कोई राक्षस नहीं, कोई युद्ध नहीं।

जो गिनाया जाता है वह बहुत सामान्य है — पैसे से इज़्ज़त तय होना, दिखावे का बढ़ जाना, वादों का हल्का पड़ जाना।

शायद इसीलिए यह वर्णन हर सदी में लोगों को अपने ही समय का लगता रहा, और यह याद रखना काम का है कि यह किसी एक सदी के लिए नहीं लिखा गया था।

ऐसा क्यों?

इस वर्णन को पढ़ते हुए किस बात का ध्यान रखना ज़रूरी है?

  • कि यह आज के बारे में लिखा गया था
  • कि यह वर्णन किसी ग्रंथ में नहीं है
  • कि यह सिर्फ़ मज़ाक़ है
  • कि यह वर्णन बहुत पुराना है, और हर सदी में लोगों को अपने ही समय का लगता रहा
पूरी कथा पढ़िए — पुराना वर्णन, नई लगती बात

यह वर्णन सैकड़ों साल पुराना है, और उसमें गिनाई गई बातें ऐसी हैं जो लगभग किसी भी समय पर चस्पाँ हो जाती हैं।

इसीलिए हर पीढ़ी ने इसे पढ़कर यही सोचा कि यह उसी के समय की बात है।

इस साइट का तरीक़ा यही है कि वर्णन जैसा है वैसा रखा जाए, और साथ में यह भी बता दिया जाए कि वह कब का है — ताकि पाठक ख़ुद तय कर सके।

तथ्य

कलियुग के वर्णन में वह कौन-सी बात है जो अक्सर छोड़ दी जाती है?

  • कि यह युग सबसे लंबा है
  • कि इसमें कोई अवतार नहीं होगा
  • कि इसी युग में सबसे कम मेहनत से सबसे ज़्यादा मिल सकता है
  • कि इसमें कोई ग्रंथ नहीं पढ़ा जाएगा
पूरी कथा पढ़िए — छूट, जो कठोरता के साथ ही रखी है

यह हिस्सा वर्णन में साथ ही चलता है, पर सुनाते समय अक्सर छूट जाता है।

ग्रंथ कहते हैं कि पिछले युगों में जो लंबे तप और यज्ञ से मिलता था, वह इस युग में बहुत कम से मिल सकता है।

यानी वर्णन सिर्फ़ शिकायत नहीं है। जितना वह समय को कठोर बताता है, उतनी ही बड़ी रियायत भी उसी में दर्ज है।

पहेली

मैं चारों में सबसे छोटा हूँ, और सबसे आख़िरी। मेरे ख़त्म होने पर गिनती दोबारा शुरू होती है। मैं क्या हूँ?

  • कलियुग
  • सत्ययुग
  • त्रेता
  • द्वापर
पूरी कथा पढ़िए — आख़िरी, और सबसे छोटा

चारों युगों में कलि सबसे छोटा बताया जाता है, और यह ब्योरा अपने आप में एक बात कहता है।

जो सबसे ज़्यादा टूटा हुआ है, वह सबसे कम चलेगा।

और उसके ख़त्म होने के बाद जो होता है वह अंत नहीं है — वह दोबारा शुरुआत है, और यही इस गाथा का आख़िरी वाक्य भी है।

कौन हूँ मैं?

मैं इस युग के अंत में आऊँगा। मेरी कोई कथा नहीं है, सिर्फ़ एक वर्णन है। मैं कौन हूँ?

  • परशुराम
  • बुद्ध
  • कल्कि
  • ध्रुव
पूरी कथा पढ़िए — दसवाँ, और यह अध्याय

यह अध्याय और दसवाँ अध्याय एक-दूसरे के आमने-सामने रखे गए हैं।

दसवाँ बताता है कि कौन आएगा। यह बताता है कि किस समय में आएगा।

दोनों में कोई घटना नहीं है, क्योंकि दोनों भविष्य के बारे में हैं — और यही उन्हें बाक़ी चौदह अध्यायों से अलग करता है।

सही क्रम

चारों युगों का सही क्रम क्या है?

  • कलि → द्वापर → त्रेता → सत्य
  • सत्य → त्रेता → द्वापर → कलि
  • त्रेता → सत्य → द्वापर → कलि
  • द्वापर → त्रेता → कलि → सत्य
पूरी कथा पढ़िए — महाकाव्य, और उनके युग

परंपरा में रामायण की कथा त्रेता युग की मानी जाती है, और महाभारत तथा कृष्ण की कथा द्वापर के अंत की।

द्वापर के ख़त्म होने के साथ ही कलियुग शुरू माना जाता है, और परंपरा उसे कृष्ण के जाने से जोड़ती है।

यानी इस साइट के चार महाकाव्य इसी गिनती में बँटे हुए हैं, और यह अध्याय उन सबके बाद वाले समय की बात करता है।

ग्रंथ असहमत

कलियुग का वर्णन कहाँ-कहाँ मिलता है?

  • सिर्फ़ विष्णु पुराण में
  • सिर्फ़ बाद की लोक-परंपरा में
  • किसी ग्रंथ में नहीं
  • विष्णु पुराण और भागवत पुराण, दोनों में, ब्योरों के फ़र्क़ के साथ
पूरी कथा पढ़िए — दो वर्णन, एक जैसा सुर

विष्णु पुराण के छठे अंश में कलियुग का वर्णन है, और भागवत पुराण के बारहवें स्कंध में भी।

दोनों का सुर एक जैसा है, पर गिनाई गई बातें बिलकुल एक जैसी नहीं — कहीं कोई बात ज़्यादा है, कहीं कोई कम।

यही इस साइट पर बार-बार दिखा है: ढाँचा एक जैसा, ब्योरे अलग — और दोनों दर्ज कर देना ही ईमानदार तरीक़ा है।

ऐसा क्यों?

यह गाथा इस अध्याय पर क्यों ख़त्म होती है?

  • क्योंकि इसके बाद कोई कथा बची ही नहीं
  • क्योंकि यह सबसे लंबा अध्याय है
  • क्योंकि यह सबसे नया अध्याय है
  • क्योंकि यहाँ आकर वही ढाँचा दोहराता है जिससे पहला अध्याय शुरू हुआ था
पूरी कथा पढ़िए — गोल घूमकर वहीं

पहला अध्याय एक प्रलय का है — पानी, एक नाव, कुछ बीज, और उसके बाद दोबारा शुरुआत।

आख़िरी अध्याय एक युग के अंत का है, और उसके बाद सत्ययुग की वापसी है। घटना अलग है; ढाँचा एक ही है।

इसीलिए यह गाथा एक क़तार की तरह नहीं, एक चक्र की तरह बनाई गई है — और उसका आख़िरी अध्याय पहले अध्याय की तरफ़ इशारा करके ख़त्म होता है, बिना दोनों को एक ही घटना बताए।

ऐसा क्यों?

इस गाथा की धुरी शुरू में क्या बताई गई थी?

  • कि विष्णु लौटकर आते रहते हैं
  • कि विष्णु सबसे बड़े देवता हैं
  • कि हर कथा एक ही ग्रंथ से आती है
  • कि सारी कथाएँ एक ही युग की हैं
पूरी कथा पढ़िए — दस उतरना, छह टिके रहना

यही इस गाथा का आकार था, और सोलह अध्याय उसी पर बने हैं।

पहले दस उनके हैं जो आए — मछली से लेकर उस सफ़ेद घोड़े तक जो अभी नहीं आया।

बाक़ी छह उनके हैं जो यहीं थे: एक बच्चा जो जंगल में अड़ा रहा, एक राजा जो नदी उतार लाया, एक आदमी जो हिरण से हार गया, और एक जिसने हज़ार साल बाद जवानी लौटा दी।