
अध्याय २
कूर्म
देवता और असुर एक ही रस्सी के दो सिरों पर खड़े थे, और नीचे पहाड़ डूब रहा था
जो हारने लगे थे
देवता कमज़ोर पड़ चुके थे। हर लड़ाई में पीछे हटते, हर बार थोड़ा और खोते।
एक ही चीज़ बची थी — अमृत, जो समुद्र के भीतर कहीं था।
पर समुद्र मथना अकेले का काम नहीं था। और मदद माँगने के लिए सिर्फ़ एक ही जगह बची थी: वही असुर, जिनसे वे हार रहे थे।
सौदा हुआ। मिलकर मथेंगे, जो निकलेगा बाँट लेंगे।
किसी को भरोसा नहीं था कि यह सौदा आख़िर तक चलेगा।
मथानी और रस्सी
मंदराचल पर्वत उखाड़ा गया — वही मथानी बना।
और रस्सी के लिए वासुकि आए।
असुरों ने कहा कि हम पूँछ नहीं पकड़ेंगे, सिर वाला सिरा हमारा। देवताओं ने कोई बहस नहीं की और पूँछ पकड़ ली।
खींचना शुरू हुआ। सिर की तरफ़ से धुआँ और चिंगारियाँ उठीं, और असुरों के चेहरे झुलसने लगे।
पहाड़ जो नीचे जाने लगा
फिर वही हुआ जिसका डर था। मंदराचल के नीचे कुछ था ही नहीं — समुद्र का तल नरम था, और पहाड़ धँसने लगा।
रस्सी ढीली पड़ी। दोनों तरफ़ के हाथ रुक गए।
तभी पानी के नीचे कुछ आया और पहाड़ के ठीक नीचे बैठ गया — एक विशाल कछुआ, जिसकी पीठ पर मंदराचल टिक गया।
पहाड़ फिर घूमने लगा। ऊपर खड़े किसी ने नीचे देखा नहीं।
जो सबसे पहले निकला
समुद्र ने पहले अमृत नहीं दिया।
सबसे पहले जो ऊपर आया वह हलाहल था — इतना ज़हरीला कि उसका धुआँ ही दोनों तरफ़ की क़तारों को पीछे धकेल गया।
किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया। फिर शिव आगे आए और वह विष पी लिया। उसका असर उनके कंठ पर हुआ, और गला नीला पड़ गया — इसी से नीलकंठ नाम जुड़ा।
मथना फिर शुरू हुआ।
और फिर सब कुछ
इसके बाद समुद्र देने लगा — कामधेनु, ऐरावत, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभ मणि, पारिजात, अप्सराएँ, और लक्ष्मी, जो निकलीं और विष्णु के पास जा खड़ी हुईं।
आख़िर में धन्वंतरि आए, हाथ में अमृत का कलश लिए।
और उसी क्षण सौदा ख़त्म हो गया। कलश असुरों ने छीन लिया।
टिप्पणी: समुद्र मंथन उन प्रसंगों में है जो कई बड़े ग्रंथों में मिलते हैं — विष्णु पुराण (पहला अंश), भागवत पुराण (आठवाँ स्कंध) और महाभारत के आदि पर्व में। मूल ढाँचा सब जगह एक है: संधि, मंदराचल, वासुकि, डूबता पर्वत, कछुआ, हलाहल, रत्न और अमृत। पर निकलने वाली चीज़ों की सूची मेल नहीं खाती — गिनती चौदह मानी जाती है, फिर भी नाम ग्रंथ-दर-ग्रंथ बदलते हैं, और यहाँ वही लिए गए हैं जो लगभग हर सूची में हैं। मोहिनी और राहु वाला प्रसंग भागवत और महाभारत में है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, कूर्म