
अध्याय १
मत्स्य
एक राजा की अंजुली में इतनी छोटी मछली आई कि वह उसे देख भी मुश्किल से पा रहा था
अंजुली में कुछ हिला
नदी के किनारे राजा तर्पण कर रहे थे — दोनों हथेलियाँ जोड़कर पानी भरा, ऊपर उठाया, और छोड़ने ही वाले थे कि हथेली में कुछ हिला।
एक मछली थी। इतनी छोटी कि उँगली के पोर से बड़ी नहीं।
"मुझे वापस मत डालिए," उसने कहा। "वहाँ बड़ी मछलियाँ हैं। वे मुझे खा जाएँगी।"
राजा ने उसे पानी के घड़े में डाल दिया, और अपनी बात भूल गए।
जो बर्तन में नहीं समाई
सुबह घड़ा भरा हुआ था — मछली से।
उन्होंने उसे मटके में डाला। मटका छोटा पड़ गया। कुएँ में डाला, कुआँ छोटा पड़ गया। तालाब में छोड़ा, और शाम तक तालाब का पानी किनारों से बाहर आ रहा था।
आख़िर उन्होंने उसे समुद्र तक पहुँचाया। तब जाकर उसने कहा:
"अब सुनिए। सात दिन बाद समुद्र ऊपर उठेगा और सब कुछ डूब जाएगा।"
नाव, और सात लोग
आदेश साफ़ था — एक नाव तैयार कीजिए। उसमें सात ऋषियों को बिठाइए, हर बीज और हर तरह के जीव रखिए, और पानी चढ़ने का इंतज़ार कीजिए।
राजा ने पूछा नहीं कि क्यों। उन्होंने बस पूछा — नाव बाँधूँगा किससे?
"मेरे सींग से," मछली ने कहा। "रस्सी का इंतज़ाम हो जाएगा।"
जब पानी आया
सातवें दिन आकाश और समुद्र के बीच का फ़र्क़ मिट गया।
नाव उठी। पानी में उस विशाल मछली का एक सींग दिखा, और नाग वासुकि रस्सी बनकर उससे बँधे।
पूरी प्रलय-रात वह मछली नाव खींचती रही। किनारा कहीं नहीं था, दिशा कोई नहीं थी, और खींचने वाले पर भरोसे के सिवा नाव में कुछ नहीं था।
सुबह जब पानी उतरा, दुनिया दोबारा शुरू हुई — एक नाव भर बीजों से।
टिप्पणी: इस कथा का सबसे पुराना ज्ञात रूप शतपथ ब्राह्मण में है, और वहाँ मछली को विष्णु का अवतार नहीं कहा जाता — वह सिर्फ़ एक मछली है जिसकी जान बचाई जाती है। महाभारत के वन पर्व और मत्स्य पुराण में यही कथा विस्तार से आती है, और अवतार वाली पहचान पुराणों की परत है। भागवत पुराण (आठवाँ स्कंध) राजा को सत्यव्रत कहता है और वेद चुराने वाले असुर हयग्रीव का प्रसंग जोड़ता है, जो पुराने रूपों में नहीं है। दस अवतारों की सूची भी एक नहीं — भागवत बाईस गिनाता है, और कुछ सूचियों में बुद्ध की जगह बलराम हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, मत्स्य