
अध्याय ४
नरसिंह
वरदान में कोई छेद नहीं था — इसीलिए वह पूरा का पूरा एक छेद था
जो गिनकर माँगा गया
भाई मारा जा चुका था, और हिरण्यकशिपु ने बदला तुरंत नहीं लिया। वह तप करने चला गया।
बरसों बाद ब्रह्मा सामने आए और वरदान माँगने को कहा।
उसने अमरता नहीं माँगी — वह मिलती ही नहीं। उसने गिन-गिनकर हर रास्ता बंद किया:
"न मनुष्य से मरूँ, न पशु से। न दिन में, न रात में। न घर के भीतर, न बाहर। न ज़मीन पर, न आकाश में। न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से। न देवता से, न असुर से।"
ब्रह्मा ने "तथास्तु" कहा और चले गए।
उस दिन के बाद हिरण्यकशिपु ने अपने राज्य में विष्णु का नाम लेना बंद करवा दिया।
घर के भीतर का दुश्मन
फिर उसके अपने घर में एक बच्चा हुआ, और वह बच्चा दिन भर वही नाम लेता रहा।
प्रह्लाद को समझाया गया, डाँटा गया, गुरुओं के पास भेजा गया। वह लौटकर वही कहता।
फिर समझाना बंद हुआ।
उसे ज़हर दिया गया, हाथी के पैरों के नीचे डाला गया, साँपों के बीच छोड़ा गया, पहाड़ से गिराया गया, और आग में बिठाया गया।
हर बार वह लौट आया — और हर बार उसने वही नाम लिया।
"तो वह इस खंभे में है?"
आख़िर में बाप ने बेटे से पूछा कि तेरा भगवान है कहाँ।
"हर जगह," प्रह्लाद ने कहा।
हिरण्यकशिपु ने दरबार के एक खंभे की तरफ़ उँगली उठाई। "इसमें भी?"
"इसमें भी।"
उसने तलवार उठाई और खंभे पर मारा।
देहरी पर, साँझ के वक़्त
खंभा फटा, और जो निकला वह न आदमी था न शेर।
उसने हिरण्यकशिपु को उठाया और दरबार की देहरी पर ले आया — न भीतर, न बाहर।
समय वह था जब दिन ख़त्म हो चुका था और रात शुरू नहीं हुई थी।
उसने उसे अपनी जाँघों पर रखा — न ज़मीन, न आकाश।
और कोई हथियार नहीं उठाया। नाख़ून थे।
वरदान की हर शर्त पूरी रही, और वरदान काम नहीं आया।
जो बच गया
फिर वह रूप शांत नहीं हो रहा था। दरबार ख़ाली हो गया।
आख़िर में जो सामने गया वह वही बच्चा था, जिसे बचाने यह सब हुआ था।
प्रह्लाद ने हाथ जोड़े, और वह शांत हो गए।
आगे वही प्रह्लाद राजा हुआ — उसी सिंहासन पर, जिस पर बैठा आदमी उसे मारने की कोशिश करता रहा था।
टिप्पणी: नरसिंह की कथा भागवत पुराण (सातवाँ स्कंध) में सबसे विस्तार से मिलती है, और विष्णु पुराण, हरिवंश तथा मत्स्य पुराण में भी है। वरदान की शर्तों का शब्द-क्रम ग्रंथ-दर-ग्रंथ थोड़ा बदलता है, पर ढाँचा हर जगह वही है — जोड़ियों में बनी शर्तें, और उनके बीच बची हुई जगह। होलिका वाला प्रसंग, जिससे होली का त्योहार जोड़ा जाता है, परंपरा में बहुत मज़बूती से चलता है, पर इस जाँच में उसे किसी एक नामित अध्याय से पुष्ट नहीं किया जा सका — इसलिए यहाँ उसे परंपरा कहकर लिखा गया है। जय-विजय वाला ढाँचा, जो हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु को रावण-कुंभकर्ण तथा शिशुपाल-दंतवक्र से जोड़ता है, भागवत का है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, नरसिंह