
अध्याय ६
परशुराम
पिता ने कहा माँ को मार दो, और बेटे ने कुल्हाड़ी उठा ली
एक गाय, और एक राजा
जमदग्नि के आश्रम में कामधेनु थी — वह गाय जो माँगने पर सब कुछ दे देती थी।
राजा कार्तवीर्य अर्जुन शिकार से लौटते हुए वहाँ रुके, और पूरी सेना का भोजन उसी आश्रम से निकल आया।
लौटते समय उन्होंने सोचा कि यह गाय राजा के पास होनी चाहिए, ऋषि के पास नहीं।
गाय ज़बरदस्ती ले ली गई। जमदग्नि ने रोकने की कोशिश की, पर वे बूढ़े ब्राह्मण थे।
जो आदेश दिया गया
एक और दिन, इसी आश्रम में, जमदग्नि को अपनी पत्नी रेणुका पर संदेह हुआ — कुछ नहीं, बस एक क्षण की देरी और एक भटका हुआ मन।
उन्होंने अपने बेटों से कहा कि इसे मार दो।
बड़े बेटे मना करते गए, एक के बाद एक। हर मना करने पर पिता ने उन्हें शाप दे दिया।
फिर सबसे छोटे की बारी आई।
राम — जिन्हें आगे परशुराम कहा गया — ने कुल्हाड़ी उठाई और आदेश पूरा कर दिया।
वरदान, जो माँगा गया
जमदग्नि प्रसन्न हुए और कहा कि जो चाहो माँग लो।
बेटे ने कहा: "माँ जीवित हो जाएँ, और उन्हें यह याद न रहे कि उनके साथ क्या हुआ। और मेरे भाइयों का शाप उतर जाए।"
वरदान दिया गया, और सब कुछ वैसा ही हो गया जैसा माँगा था।
पर वह दृश्य किसी और के लिए नहीं मिटा। जिसने कुल्हाड़ी उठाई थी, उसे याद रहा।
इक्कीस बार
फिर वह दिन आया जब कार्तवीर्य के बेटे आश्रम आए और जमदग्नि को मार गए।
परशुराम लौटे तो पिता का शरीर पड़ा था, और माँ छाती पीट रही थीं — इक्कीस बार।
उन्होंने वही गिनती याद रख ली।
परंपरा कहती है कि उन्होंने इक्कीस बार क्षत्रियों के विरुद्ध अभियान चलाया — महाकाव्यों की अपनी भाषा में, "पृथ्वी को क्षत्रियों से ख़ाली किया"।
जो रुका नहीं, फिर रुक गया
यह कथा वहीं ख़त्म नहीं होती जहाँ बदला पूरा होता है।
परंपरा कहती है कि आख़िर में उन्होंने कुल्हाड़ी रख दी, जीती हुई सारी ज़मीन दान कर दी, और पहाड़ पर चले गए।
और वे गए नहीं — चिरंजीवियों में गिने जाते हैं।
इसीलिए वे आगे की कथाओं में लौटते रहते हैं: राम के सामने, भीष्म के सामने, कर्ण के सामने। हर बार वही आदमी, जो अपने ही किए हुए के साथ जी रहा है।
टिप्पणी: परशुराम की कथा महाभारत (वन पर्व और शांति पर्व) तथा भागवत पुराण समेत कई पुराणों में मिलती है। रेणुका वाला आदेश और उसके बाद माँगा गया वरदान परंपरा में साथ-साथ चलते हैं; ग्रंथ इस प्रसंग पर कोई नैतिक सफ़ाई नहीं देते। "इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से ख़ाली किया" हर जगह दोहराया जाता है, पर उसका अर्थ एक जैसा नहीं लिया गया — और यहाँ उसे वैसे ही दर्ज किया गया है, बिना यह तय किए कि वह कितना शब्दशः है। परशुराम का चिरंजीवी होना और रामायण तथा महाभारत में लौटना दोनों महाकाव्यों में दर्ज है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, परशुराम