अध्याय १३

पुरूरवा और उर्वशी

साथ रहने की तीन शर्तें थीं — एक रात उनमें से दो टूटीं, और इतना ही काफ़ी था

शर्तें

उर्वशी अप्सरा थीं, और पुरूरवा मनुष्य।

वे साथ रहने को राज़ी हुईं, पर तीन शर्तें रखीं।

पहली: मेरे दो मेमने मेरे पास ही रहेंगे, उन्हें कोई ले न जाए।

दूसरी: मुझे वही खाना दिया जाएगा जो मैं कहूँ।

तीसरी: आप मुझे कभी बिना वस्त्र के न दिखें।

पुरूरवा ने तीनों मान लीं, और बरसों तक कुछ नहीं हुआ।

जो रात में हुआ

गंधर्व उर्वशी को वापस चाहते थे, और उन्होंने रास्ता निकाला।

एक रात वे आए और उन दोनों मेमनों को खोल ले गए।

उर्वशी की नींद टूटी और उन्होंने पुकारा — कोई मेरे मेमने ले जा रहा है, और यहाँ कोई मर्द नहीं है क्या।

पुरूरवा उठे और अँधेरे में जैसे थे वैसे ही बाहर भागे।

और तभी गंधर्वों ने बिजली कौंधा दी।

उजाला हुआ, और उर्वशी ने उन्हें देख लिया।

सुबह

शर्त टूट चुकी थी।

कथा में कोई झगड़ा नहीं होता, कोई ताना नहीं। सुबह वे नहीं थीं।

पुरूरवा उन्हें ढूँढ़ते फिरते हैं — एक राजा, जो अब सिर्फ़ एक आदमी है।

एक सरोवर के किनारे

आख़िर वे एक सरोवर के किनारे मिलती हैं, दूसरी अप्सराओं के साथ।

पुरूरवा गिड़गिड़ाते हैं। वे लौटने से मना कर देती हैं।

ऋग्वेद में यही बातचीत एक पूरे सूक्त की तरह दर्ज है, और वहाँ उर्वशी का जवाब बहुत कठोर है — वे कहती हैं कि स्त्रियों से स्थायी मित्रता नहीं होती, और लौट जाइए।

बाद के ग्रंथ इसे नरम करते हैं, और कालिदास तो इसे सुखांत बना देते हैं।

पर सबसे पुराना रूप कठोर ही है।

टिप्पणी: पुरूरवा और उर्वशी की कथा का सबसे पुराना रूप ऋग्वेद के दसवें मंडल के एक संवाद-सूक्त में है, जहाँ दोनों की बातचीत सीधे दर्ज है और उर्वशी लौटने से मना कर देती हैं। शतपथ ब्राह्मण में भी यह कथा आती है, और विष्णु पुराण के चौथे अंश में वंशावली के साथ। कालिदास का नाटक विक्रमोर्वशीयम् इसी कथा पर है और उसका अंत सुखांत है — यानी सबसे पुराना रूप सबसे कठोर है और बाद के रूप उसे नरम करते जाते हैं। पुरूरवा को चंद्रवंश की जड़ में गिना जाता है, जिस वंश से आगे ययाति और फिर कुरुवंश आते हैं।

स्रोत: कई ग्रंथों से, पुरूरवा और उर्वशी

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

उर्वशी ने साथ रहने के लिए क्या शर्तें रखी थीं?

  • कि उनके दो मेमने उनके पास रहें, खाना उनकी मर्ज़ी का हो, और पुरूरवा उन्हें कभी बिना वस्त्र न दिखें
  • कि उन्हें कभी राजधानी न छोड़नी पड़े
  • कि पुरूरवा दूसरा विवाह न करें
  • कोई शर्त नहीं थी
पूरी कथा पढ़िए — शर्तें, जो अजीब लगती हैं

ये तीनों शर्तें पहली बार पढ़ने पर मामूली और अटपटी लगती हैं — दो मेमने, खाना, और एक दृश्य।

पर कथा का पूरा ढाँचा इन्हीं पर टिका है — उस रात दो शर्तें एक-दूसरे से जुड़कर टूटती हैं: मेमने चोरी होते हैं, इसलिए वे उठते हैं, इसलिए वे दिख जाते हैं। तीसरी शर्त (खाना) उस रात छुई तक नहीं जाती।

यही इस कथा को इतना कसा हुआ बनाता है। कोई अलग-अलग ग़लती नहीं होती; एक ही चाल दो शर्तें तोड़ देती है, और एक ही काफ़ी था।

क्या हुआ?

शर्त टूटी कैसे?

  • पुरूरवा ने ख़ुद बात बता दी
  • उर्वशी ने ख़ुद शर्त तोड़ दी
  • गंधर्व मेमने चुरा ले गए, पुरूरवा अँधेरे में उठकर भागे, और गंधर्वों ने बिजली कौंधा दी
  • किसी ने उर्वशी को बता दिया
पूरी कथा पढ़िए — एक चाल, जो पूरी तरह काम कर गई

गंधर्वों ने पुरूरवा पर हमला नहीं किया। उन्होंने सिर्फ़ वह चीज़ छू ली जिसे बचाने के लिए वे तुरंत उठेंगे।

बाक़ी सब अपने आप हुआ — जल्दबाज़ी, अँधेरा, और एक कौंध।

कथा में कोई खलनायक चीख़ता नहीं, कोई युद्ध नहीं होता। सब कुछ कुछ ही पलों में तय हो जाता है।

ग्रंथ असहमत

इस कथा का सबसे पुराना रूप कहाँ मिलता है, और वहाँ क्या अलग है?

  • ऋग्वेद के एक संवाद-सूक्त में, जहाँ उर्वशी लौटने से साफ़ मना कर देती हैं
  • भागवत पुराण में, और वहाँ कोई फ़र्क़ नहीं
  • कालिदास के नाटक में, और वह सबसे पुराना है
  • विष्णु पुराण में, और वही अकेला स्रोत है
पूरी कथा पढ़िए — सबसे पुराना रूप, और सबसे कठोर

ऋग्वेद के दसवें मंडल में एक सूक्त है जो पूरा का पूरा इन दोनों की बातचीत है — कोई कथा नहीं, सिर्फ़ संवाद।

वहाँ पुरूरवा गिड़गिड़ाते हैं और उर्वशी टालती नहीं, सीधे मना करती हैं। उनका जवाब कठोर है और उसमें कोई तसल्ली नहीं।

यह इस गाथा में उन गिनी-चुनी जगहों में है जहाँ सबसे पुराना रूप सबसे कम कोमल है — और बाद के ग्रंथ उसे नरम करते चले जाते हैं।

ऐसा क्यों?

गंधर्वों ने पुरूरवा पर सीधे हमला करने के बजाय मेमने क्यों चुराए?

  • क्योंकि वे लड़ नहीं सकते थे
  • क्योंकि शर्त तुड़वाना ही काफ़ी था, और उसके लिए बस पुरूरवा को जल्दी में उठाना था
  • क्योंकि उन्हें मेमने चाहिए थे
  • क्योंकि उर्वशी ने उनसे यही कहा था
पूरी कथा पढ़िए — लड़ाई नहीं, इंतज़ाम

यह इस गाथा की कुछ सबसे चालाक चालों में है — किसी को हराने के बजाय उस शर्त पर काम करना जिस पर सब कुछ टिका है।

गंधर्वों को पुरूरवा से जीतना नहीं था। उन्हें बस एक क्षण चाहिए था जिसमें वे बिना सोचे उठ खड़े हों।

यही ढंग इस गाथा में पहले भी दिखा है — वामन वाले अध्याय में भी जीत ताक़त से नहीं, शर्त के भीतर से आई थी।

कौन हूँ मैं?

मैं अप्सरा थी, मैंने शर्तों के साथ साथ रहना क़बूल किया, और शर्त टूटते ही चली गई। मैं कौन हूँ?

  • रोहिणी
  • उर्वशी
  • रेणुका
  • सुनीति
पूरी कथा पढ़िए — जाना, जिसमें झगड़ा नहीं है

कथा में उर्वशी के जाने का कोई नाटकीय दृश्य नहीं है। न कोई ताना, न कोई शाप।

शर्त थी, शर्त टूटी, और वे नहीं रहीं। कथा इसे इतने ही ठंडेपन से कहती है।

यही ठंडापन इस कथा को याद रहने लायक़ बनाता है, और यही ऋग्वेद वाले संवाद में सबसे साफ़ मिलता है।

पहेली

मैं एक ही रात में दो शर्तें तोड़ने की वजह बना, और मैंने ख़ुद कुछ नहीं किया। मैं क्या हूँ?

  • वे दो मेमने
  • वह सरोवर
  • वह बिजली
  • वह वस्त्र
पूरी कथा पढ़िए — सबसे छोटी चीज़, सबसे बड़ा नतीजा

इस कथा में सबसे कम अहमियत वाली चीज़ ही उसकी धुरी है — दो मेमने, जिनका और कोई काम नहीं।

वे पहली शर्त में इसीलिए रखे गए थे कि उनसे लगाव है, और वही लगाव बाद में इस्तेमाल कर लिया गया।

कथा-शिल्प के हिसाब से यह बहुत साफ़ है: जो चीज़ शुरू में सबसे मामूली लगती है, अंत में वही सब तय करती है।

किसने कहा?

"यहाँ कोई मर्द नहीं है क्या?" — यह किसने, किस मौक़े पर कहा?

  • गंधर्वों ने, ललकारते हुए
  • पुरूरवा ने, गंधर्वों से
  • उर्वशी ने, नींद टूटने पर, जब मेमने ले जाए जा रहे थे
  • किसी ने नहीं; यह बाद का जोड़ है
पूरी कथा पढ़िए — एक पुकार, जो जाल का हिस्सा थी

उर्वशी को कुछ पता नहीं था। वे सचमुच अपने मेमनों के लिए पुकार रही थीं।

और वही पुकार गंधर्वों की चाल का आख़िरी हिस्सा बन गई — क्योंकि उसी से पुरूरवा बिना सोचे उठे।

कथा किसी को दोषी नहीं ठहराती। तीनों ने वही किया जो कोई भी करता, और शर्त फिर भी टूट गई।

तथ्य

पुरूरवा का इस गाथा और आगे की कथाओं से क्या नाता है?

  • वे सूर्यवंश के पहले राजा हैं
  • उनका आगे की किसी कथा से नाता नहीं
  • वे राम के पूर्वज हैं
  • उन्हें चंद्रवंश की जड़ में गिना जाता है, जिस वंश की कथा आगे महाभारत तक जाती है
पूरी कथा पढ़िए — वंशावली, जो कथाओं को जोड़ती है

विष्णु पुराण का चौथा अंश ज़्यादातर वंशावलियों का है — सूर्यवंश और चंद्रवंश, पीढ़ी-दर-पीढ़ी।

पुरूरवा उसी चंद्रवंश की शुरुआत में आते हैं, और उसी वंश में आगे ययाति आते हैं — अगला ही अध्याय उनका है।

और उसी धारा से आगे कुरुवंश निकलता है, यानी महाभारत। इसीलिए ये कथाएँ अलग-अलग नहीं, एक ही सूची की कड़ियाँ हैं।

सही क्रम

इस अध्याय की घटनाओं का सही क्रम क्या है?

  • मेमनों की चोरी → शर्तें → बिजली → सरोवर
  • शर्तें → बरसों का साथ → मेमनों की चोरी और बिजली → उर्वशी का चला जाना → सरोवर के किनारे भेंट
  • सरोवर के किनारे भेंट → शर्तें → मेमनों की चोरी → बिजली
  • बिजली → मेमनों की चोरी → शर्तें → उर्वशी का जाना
पूरी कथा पढ़िए — बरसों, और फिर कुछ पल

इस क्रम में सबसे बड़ा हिस्सा वह है जिसमें कुछ नहीं होता — बरसों का साथ, जिसे कथा एक वाक्य में निपटा देती है।

फिर सब कुछ कुछ ही पलों में हो जाता है: चोरी, पुकार, दौड़, कौंध।

और उसके बाद कथा फिर धीमी हो जाती है — ढूँढ़ना, और आख़िर में वह बातचीत जो सबसे पुराने रूप में एक पूरे सूक्त की तरह दर्ज है।

ऐसा क्यों?

सबसे पुराने रूप और बाद के रूपों में सबसे बड़ा फ़र्क़ क्या है?

  • सबसे पुराने में शर्तें इतने साफ़ ब्योरे में नहीं हैं
  • सबसे पुराने में पुरूरवा राजा नहीं हैं
  • सबसे पुराने में उर्वशी लौट आती हैं
  • सबसे पुराने रूप में अंत कठोर है, और बाद के रूप उसे नरम करते जाते हैं
पूरी कथा पढ़िए — कथाएँ नरम होती जाती हैं

ऋग्वेद के संवाद में उर्वशी लौटने से साफ़ मना करती हैं, और बात वहीं ख़त्म होती है।

पुराणों में इस कथा के साथ कुछ और जोड़ा जाता है, और कालिदास के नाटक में तो दोनों मिल जाते हैं।

यह इस गाथा में बार-बार दिखने वाले ढाँचे का उल्टा उदाहरण है। बाक़ी जगह कथाएँ समय के साथ और नाटकीय होती गईं; यहाँ वे समय के साथ और दयालु होती गईं।