अध्याय ७

राम

वह अवतार जिसे अपनी पूरी कथा में यह पता ही नहीं था कि वह अवतार है

वरदान, जो फिर से बीच में आया

रावण ने भी वही किया था जो हिरण्यकशिपु ने किया था — गिन-गिनकर हर रास्ता बंद करवाया।

देवता से न मरूँ, असुर से न मरूँ, गंधर्व, यक्ष, नाग — किसी से न मरूँ।

उसने मनुष्य का नाम नहीं लिया। मनुष्य से डरने की कोई वजह नहीं थी।

और बंदर का नाम भी नहीं लिया।

इसीलिए आदमी बनकर

देवता ब्रह्मा के पास गए, और वहाँ से विष्णु के पास।

तय हुआ कि इस बार कोई चौथा रूप नहीं बनेगा — न मछली, न आधा शेर। इस बार पूरा आदमी।

अयोध्या में दशरथ पुत्र के लिए यज्ञ कर रहे थे। वहीं से रास्ता निकला।

चार बेटे हुए। सबसे बड़े का नाम राम रखा गया।

जो उन्होंने ख़ुद नहीं कहा

और यही इस अवतार की सबसे अजीब बात है।

राम ने अपनी पूरी कथा में एक बार भी यह दावा नहीं किया कि वे विष्णु हैं।

वे वनवास पर दुखी होते हैं, सीता के खो जाने पर रोते हैं, पेड़ों से पूछते हैं, गुस्सा करते हैं, और समुद्र के आगे बैठकर तीन दिन इंतज़ार करते हैं।

कथा में जो लोग जानते हैं वे बाहर हैं — देवता, ऋषि, पाठक। भीतर वे एक आदमी हैं।

और आख़िर में

रावण मारा जाता है — उसी आदमी के हाथों, जिसका नाम उसने वरदान में गिना ही नहीं था।

वरदान झूठा नहीं पड़ता। वह पूरा का पूरा निभाया जाता है, और उसी के भीतर से रास्ता निकलता है — ठीक वैसे ही जैसे नरसिंह वाले अध्याय में हुआ था।

पूरी कथा इस गाथा में नहीं है। वह अलग से रामायण में है — सात कांड, शुरू से आख़िर तक।

टिप्पणी: राम को दशावतार में सातवाँ माना जाता है, और उनकी पूरी कथा इस साइट पर अलग से रामायण में है — इसलिए यह अध्याय कथा नहीं दोहराता, सिर्फ़ यह बताता है कि यह अवतार क्यों हुआ। ध्यान देने लायक़ बात यह है कि वाल्मीकि रामायण के बीच के कांडों में राम ज़्यादातर मनुष्य की तरह चलते हैं, और उनके विष्णु होने की घोषणा सबसे मुखर बालकांड तथा उत्तरकांड में है — जिन्हें पाठ-परंपरा में बाद का जोड़ा हुआ माना जाता रहा है। रावण के वरदान में मनुष्य और वानर का छूट जाना रामायण में साफ़ दर्ज है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, राम

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

रावण ने अपने वरदान में किन-किन से मृत्यु न होने की बात कही थी?

  • हर जीव से, बिना कोई छूट छोड़े
  • सिर्फ़ देवताओं से
  • देवता, असुर, गंधर्व, यक्ष और नाग से
  • किसी से नहीं; उसे वरदान मिला ही नहीं था
पूरी कथा पढ़िए — जिसका नाम लेना ज़रूरी नहीं लगा

रावण की गिनती में वही कमी है जो हिरण्यकशिपु की गिनती में थी — उसने वही छोड़ा जिसे वह ख़तरा मानता ही नहीं था।

उसके लिए मनुष्य कोई गिनती की चीज़ नहीं थे, और वानर तो और भी नहीं।

इसीलिए इस अवतार का रूप मामूली है। पिछली बार बीच का रास्ता एक अजीब रूप से निकला था; इस बार वह सबसे साधारण रूप से निकलता है।

ऐसा क्यों?

इस बार विष्णु ने कोई मिला-जुला रूप क्यों नहीं लिया, जैसे नरसिंह या वराह?

  • क्योंकि वैसा रूप बनाना अब संभव नहीं था
  • क्योंकि रावण पशुओं से डरता था
  • क्योंकि देवताओं ने ऐसा माँगा था
  • क्योंकि वरदान में छूट मनुष्य की थी, इसलिए पूरा मनुष्य बनना ही काफ़ी था
पूरी कथा पढ़िए — रूप, जो शर्त से तय होता है

इस गाथा में हर अवतार का रूप उस काम से तय होता है जो उसे करना है — तैरना था तो मछली, टिकना था तो कछुआ, सूँघना था तो सूअर, और जोड़ियों के बीच से निकलना था तो आधा-आधा।

यहाँ शर्त सीधी थी: मनुष्य छूटा हुआ था। इसलिए इस बार कुछ भी असाधारण गढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

और यही आगे चलकर इस अवतार की सबसे बड़ी बात बन जाती है — वह सचमुच आदमी की तरह जीता है, आदमी की तरह हारता है, और आदमी की तरह दुख पाता है।

ग्रंथ असहमत

वाल्मीकि रामायण में राम के भगवान होने की बात कहाँ सबसे साफ़ मिलती है?

  • बालकांड और उत्तरकांड में, जिन्हें पाठ-परंपरा में बाद का जोड़ा हुआ माना जाता है
  • हर कांड में बराबर
  • सिर्फ़ अरण्यकांड में
  • कहीं नहीं; वाल्मीकि उन्हें कभी विष्णु नहीं कहते
पूरी कथा पढ़िए — बीच के कांड, और किनारे के कांड

वाल्मीकि रामायण के बीच के कांडों में — अयोध्या से युद्ध तक — राम ज़्यादातर एक मनुष्य की तरह चलते हैं: दुखी, क्रोधित, बेबस।

जहाँ उनके विष्णु होने की बात सबसे मुखर है, वे हैं बालकांड और उत्तरकांड, और पाठ-परंपरा में इन्हीं दोनों को बाद का जोड़ा हुआ माना जाता रहा है।

यह ठीक वही परत वाली बात है जो इस गाथा में बार-बार मिलती है — मत्स्य, वराह और वामन में भी। कथा पहले होती है, और उसका "अवतार" होना बाद में जुड़ता है।

कौन हूँ मैं?

मैंने वरदान माँगते समय जिन्हें गिनने लायक़ नहीं समझा, उन्हीं दोनों ने मिलकर मुझे ख़त्म किया। मैं कौन हूँ?

  • हिरण्यकशिपु
  • कार्तवीर्य अर्जुन
  • बलि
  • रावण
पूरी कथा पढ़िए — दो नाम, जो छूट गए

रावण की सूची में देवता से लेकर नाग तक सब थे। मनुष्य और वानर नहीं थे।

और आख़िर में उसके सामने ठीक वही दोनों खड़े मिलते हैं — एक आदमी, और एक पूरी वानर सेना।

इस गाथा में यह ढाँचा तीसरी बार लौट रहा है: वरदान तोड़ा नहीं जाता, उसे निभाकर उसी के भीतर से रास्ता निकाला जाता है।

तथ्य

दस अवतारों की प्रचलित सूची में राम का स्थान कौन-सा है?

  • पाँचवाँ
  • छठा
  • सातवाँ
  • आठवाँ
पूरी कथा पढ़िए — दो राम, एक सूची में

इस सूची में "राम" नाम दो बार आता है — परशुराम और राम — और यह भ्रम आम है।

परशुराम का असली नाम भी राम ही था; कुल्हाड़ी की वजह से नाम बदला।

और दोनों एक ही कथा में आमने-सामने भी आते हैं: रामायण में सीता के स्वयंवर के बाद परशुराम राम के सामने पड़ते हैं। यानी छठा और सातवाँ अवतार एक-दूसरे से मिलते हैं।

पहेली

मैं वह अवतार हूँ जिसने अपनी पूरी कथा में एक बार भी यह नहीं कहा कि मैं कौन हूँ। जानने वाले सब बाहर थे। मैं कौन हूँ?

  • राम
  • कृष्ण
  • नरसिंह
  • वामन
पूरी कथा पढ़िए — भीतर आदमी, बाहर अवतार

यही राम और कृष्ण के बीच का सबसे बड़ा फ़र्क़ है, और अगला अध्याय उसी पर टिका है।

राम कथा के भीतर कभी अपने विष्णु होने का दावा नहीं करते। वे इंतज़ार करते हैं, रोते हैं, पूछते हैं।

पाठक और देवता जानते हैं। कथा के भीतर के लोग — और ख़ुद वे — नहीं।

ऐसा क्यों?

इस गाथा में राम को सिर्फ़ एक अध्याय क्यों दिया गया है?

  • क्योंकि उनकी कथा छोटी है
  • क्योंकि वे इस सूची में ज़रूरी नहीं हैं
  • क्योंकि विष्णु पुराण उनके बारे में कुछ नहीं कहता
  • क्योंकि उनकी पूरी कथा इसी साइट पर रामायण में अलग से है, सात कांडों में
पूरी कथा पढ़िए — एक अध्याय, और एक दरवाज़ा

यह अध्याय राम की कथा सुनाने के लिए नहीं है। यह बताने के लिए है कि वे इस सूची में क्यों हैं, और वरदान की कौन-सी दरार उन्हें ले आई।

पूरी कथा — बालकांड से उत्तरकांड तक — इसी साइट पर रामायण में है, सत्तर सवालों के साथ।

यही आगे कृष्ण वाले अध्याय के साथ भी है। दोनों जगह अध्याय का काम दरवाज़ा बनना है, दीवार नहीं।

क्या हुआ?

देवताओं ने रावण की समस्या लेकर सबसे पहले किसके पास जाकर बात रखी?

  • सीधे विष्णु के पास
  • ब्रह्मा के पास, क्योंकि वरदान उन्हीं का दिया हुआ था
  • शिव के पास
  • इंद्र के पास
पूरी कथा पढ़िए — जिसने दिया, उसी से पूछा

इस गाथा में यह ढाँचा दोहराता है — वरदान ब्रह्मा देते हैं, और फिर उसी वरदान से बनी मुसीबत लेकर सब उन्हीं के पास लौटते हैं।

ब्रह्मा वरदान वापस नहीं ले सकते। वे सिर्फ़ यह बता सकते हैं कि उसमें कहाँ जगह बची है।

यही बात हिरण्यकशिपु वाले अध्याय में भी थी, और यहाँ दोबारा है — दोनों बार असली जवाब उसी सूची के भीतर से आता है।

ऐसा क्यों?

राम के मनुष्य की तरह दुख पाने को कथा कमज़ोरी की तरह क्यों नहीं दिखाती?

  • क्योंकि वे असल में दुखी होते ही नहीं, सिर्फ़ दिखावा करते हैं
  • क्योंकि दुख से उनकी शक्ति बढ़ती है
  • क्योंकि पूरा अवतार ही मनुष्य होने पर टिका है
  • क्योंकि वाल्मीकि उन्हें नापसंद करते हैं
पूरी कथा पढ़िए — मनुष्य होना ही शर्त थी

अगर राम कथा के भीतर हर क्षण भगवान की तरह बरतते, तो वरदान की वह दरार बेकार हो जाती जिसके लिए यह अवतार हुआ था।

इसीलिए उनका रोना, थकना और इंतज़ार करना कथा की कमज़ोरी नहीं, उसकी शर्त है।

और यही वजह है कि यह कथा सदियों तक पढ़ी जाती रही — उसमें एक आदमी है, जिससे बात की जा सकती है।

सही क्रम

इस अध्याय की घटनाओं का सही क्रम क्या है?

  • राम का जन्म → रावण का वरदान → देवताओं की प्रार्थना → रावण का वध
  • रावण का वरदान → देवताओं का ब्रह्मा के पास जाना → राम का जन्म → रावण का वध
  • देवताओं की प्रार्थना → रावण का वरदान → राम का जन्म → रावण का वध
  • रावण का वध → राम का जन्म → वरदान → प्रार्थना
पूरी कथा पढ़िए — एक चूक से शुरू, एक चूक पर ख़त्म

इस क्रम की पूरी कहानी एक ही चूक की है — वरदान माँगते समय दो नाम छोड़ देना।

बीच का सब कुछ, जो रामायण में सात कांडों तक फैला है, इसी एक चूक के भीतर घटता है।

और अंत वहीं होता है जहाँ शुरुआत हुई थी: उसी सूची के छूटे हुए हिस्से पर।