
अध्याय ५
वामन
माँगने वाला सबसे छोटा था, और उसने सबसे छोटी चीज़ माँगी
वह असुर, जिससे किसी को शिकायत नहीं थी
बलि प्रह्लाद के ही वंश में थे — उसी प्रह्लाद के पोते, जिसने खंभे वाली रात देखी थी।
और बलि से किसी को शिकायत नहीं थी। उन्होंने तीनों लोक जीत लिए थे, पर प्रजा सुखी थी, यज्ञ चलते थे, और द्वार से कोई ख़ाली नहीं लौटता था।
यही उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी, और यही अकेली दरार भी: जो माँगा जाए, वे मना नहीं करते थे।
इंद्र अपना सब कुछ खोकर बैठे थे, और उनके पास कोई शिकायत भी नहीं बची थी — क्योंकि हारने वाले से बेहतर राज चल रहा था।
यज्ञशाला में एक बच्चा
बलि एक बड़ा यज्ञ कर रहे थे, और दान का द्वार खुला था।
क़तार में एक बटु आया — बहुत छोटा क़द, हाथ में लकड़ी का छाता और कमंडल, और उम्र इतनी कम कि किसी ने उसे गिना नहीं।
बलि ने पूछा कि क्या चाहिए। सोना, गाँव, हाथी, जो कहो।
"तीन पग ज़मीन," उसने कहा। "अपने ही पैरों से नापूँगा।"
बलि हँस पड़े। "इतना छोटा माँगने कोई मेरे द्वार पर नहीं आता।"
गुरु ने रोका
पर शुक्राचार्य ने पहचान लिया।
उन्होंने बलि को अलग ले जाकर कहा — यह बटु नहीं है, और तीन पग तीन पग नहीं हैं। मना कर दीजिए।
"मना करना मेरे यहाँ है ही नहीं," बलि ने कहा। "और अगर सामने ख़ुद विष्णु हैं, तो मैं देने से पीछे क्यों हटूँ?"
संकल्प का जल छोड़ा जाने लगा। शुक्राचार्य ने कमंडल की टोंटी में जाकर जल रोक दिया।
बटु ने एक कुश की सींक उस टोंटी में डाली। जल बहने लगा, और शुक्राचार्य की एक आँख उसी सींक से जाती रही।
तीन पग
जल गिरा, दान पूरा हुआ, और वह बच्चा बढ़ने लगा।
सिर बादलों से ऊपर गया, और पैर इतने बड़े हो गए कि नापने के लिए और कुछ बचा नहीं।
पहला पग — और पूरी धरती नप गई।
दूसरा पग — और सारा आकाश।
फिर वह विशाल रूप रुक गया और नीचे देखा।
"तीसरा कहाँ रखूँ?"
जो देने को बचा था
दरबार चुप था। बलि के पास देने को कुछ नहीं बचा था।
उन्होंने सिर झुकाया और अपनी तरफ़ इशारा किया।
"यहाँ।"
तीसरा पग वहीं पड़ा, और बलि को सुतल लोक भेज दिया गया — पर ख़ाली हाथ नहीं। भागवत के अनुसार सुतल का राज उन्हीं का रहा और विष्णु ने स्वयं उनकी रक्षा का भार लिया।
केरल की ओणम परंपरा में माना जाता है कि महाबलि साल में एक बार अपनी प्रजा से मिलने लौटते हैं।
टिप्पणी: वामन की कथा भागवत पुराण (आठवाँ स्कंध) में सबसे विस्तार से मिलती है, और विष्णु पुराण तथा अन्य पुराणों में भी है। पर "विष्णु के तीन पग" इनसे बहुत पुराने हैं — ऋग्वेद में विष्णु तीन डग भरकर सारा विस्तार नाप लेते हैं, और वहाँ न बौना रूप है, न बलि, न दान। बौने का माँगना और बलि वाली पूरी कथा पुराणों की परत है। शुक्राचार्य की आँख वाला ब्योरा पुराण-परंपरा में मिलता है। ओणम और बलि-प्रतिपदा का इस कथा से जुड़ाव जीवित परंपरा है, ग्रंथ का दावा नहीं — और दोनों त्योहार बलि को हारा हुआ नहीं, लौटने वाला राजा मानते हैं।
स्रोत: कई ग्रंथों से, वामन