अध्याय ३

वराह

धरती को पानी में खींच लिया गया था, और उसे ढूँढ़ने कोई अँगूठे जितना बड़ा गया

जो धरती को ले गया

हिरण्याक्ष को कोई रोक नहीं पा रहा था।

उसने देवताओं को भगाया, यज्ञ बंद करवाए, और फिर वह किया जो किसी ने सोचा नहीं था — धरती को ही उठाकर ले गया, और उसे प्रलय के पानी में कहीं नीचे दबा दिया।

ऊपर कुछ नहीं बचा। न ज़मीन, न दिशा, न कोई जगह जहाँ खड़ा हुआ जा सके।

ब्रह्मा सोचते बैठे रहे कि अब क्या किया जाए।

अँगूठे जितना

तभी उनकी नाक से कुछ निकला।

एक सूअर का बच्चा, अँगूठे के पोर जितना बड़ा। ब्रह्मा ने उसे हथेली पर रखा और देखते रहे।

फिर वह बढ़ने लगा।

हथेली से बड़ा हुआ, फिर आदमी से, फिर हाथी से। जब तक ब्रह्मा कुछ कह पाते, आकाश में एक पर्वत जितना वराह खड़ा था, और उसकी एक गर्जना से दिशाएँ हिल गईं।

पानी के भीतर

वह पानी में उतरा।

नीचे अँधेरा था, और उसमें कोई निशान नहीं। पर सूअर सूँघकर रास्ता निकालता है, और यही उसने किया — गंध के सहारे, परत-दर-परत नीचे, जब तक धरती नहीं मिल गई।

उसने उसे दाँत पर उठाया। कीचड़ में सनी, टूटी नहीं, पूरी की पूरी।

जहाँ उसे रखा गया

वराह ऊपर आए और धरती को पानी की सतह पर रख दिया — जैसे कोई नाव रखता है।

वह डूबी नहीं।

सामने दुश्मन

तभी हिरण्याक्ष सामने आ खड़ा हुआ। उसने ताना मारा — जानवर बनकर छिपने वाले, अब तो लड़।

वराह ने जवाब नहीं दिया। धरती अब सुरक्षित थी; अब सिर्फ़ एक लड़ाई बची थी।

हिरण्याक्ष वहीं मारा गया।

कथा कहती है कि उसी दिन से धरती वहीं टिकी है, और उसे रखने वाले ने उसे रखकर कुछ माँगा नहीं।

टिप्पणी: वराह की कथा विष्णु पुराण (पहला अंश) और भागवत पुराण (तीसरा स्कंध) दोनों में है; हिरण्याक्ष वाली लड़ाई का विस्तृत रूप भागवत में मिलता है, जहाँ अवतार ब्रह्मा की नाक से अँगूठे के आकार में निकलकर बढ़ता है। धरती को पानी से ऊपर उठाने वाले विशाल सूअर की कल्पना इनसे पुरानी है और शुरुआती परंपरा में वह प्रजापति या ब्रह्मा से जोड़ी जाती है — विष्णु का अवतार वह बाद में बनता है, ठीक वैसे ही जैसे मत्स्य के साथ हुआ। जय-विजय के शाप वाला ढाँचा, जो हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु, रावण-कुंभकर्ण और शिशुपाल-दंतवक्र को एक सूत्र में बाँधता है, भागवत का है।

स्रोत: कई ग्रंथों से, वराह

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

हिरण्याक्ष ने ऐसा क्या किया जिसके बाद वराह अवतार लेना पड़ा?

  • उसने धरती को उठाकर प्रलय के पानी में नीचे दबा दिया
  • उसने सूर्य को रोक दिया
  • उसने देवताओं का अमृत छीन लिया
  • उसने ब्रह्मा से वेद चुरा लिए
पूरी कथा पढ़िए — जब खड़े होने की जगह ही न बचे

इस कथा में ख़तरा किसी हार का नहीं है — धरती ही हटा दी गई है, यानी कोई जगह नहीं बची जहाँ कुछ हो सके।

भागवत पुराण के तीसरे स्कंध में यह प्रसंग विस्तार से आता है, और वहाँ हिरण्याक्ष का बल इतना बढ़ा हुआ दिखाया गया है कि उसे लड़ने के लिए कोई मिल ही नहीं रहा।

इसीलिए इस अवतार का काम मारना नहीं, उठाना है। मारना उसमें रास्ते में आ जाता है।

कौन हूँ मैं?

मैं ब्रह्मा की नाक से निकला, अँगूठे जितना बड़ा था, और थोड़ी देर में पर्वत जितना हो गया। मैं कौन हूँ?

  • कूर्म
  • नरसिंह
  • मत्स्य
  • वराह
पूरी कथा पढ़िए — दोबारा वही तरकीब

यह गाथा में दूसरी बार है जब कुछ बहुत छोटा शुरू होता है और बढ़ते-बढ़ते सँभाला नहीं जाता — पहले हथेली की मछली, अब नाक से निकला बच्चा।

दोनों बार देखने वाले को पहले भरोसा होता है कि यह मामूली है, और वही भरोसा टूटता है।

भागवत इसे और आगे ले जाता है: वराह की पहली गर्जना सुनकर देवता समझ जाते हैं कि जो हुआ है वह क्या है।

तथ्य

वराह ने धरती को किस पर उठाया?

  • अपनी पीठ पर
  • अपने हाथों में
  • अपने दाँत पर
  • सिर पर
पूरी कथा पढ़िए — एक दाँत, और पूरी धरती

भारतीय मूर्तिकला में वराह की यही छवि बार-बार मिलती है — विशाल सूअर, ऊपर उठा हुआ मुँह, और दाँत के सिरे पर छोटी-सी धरती।

उदयगिरि की गुफाओं में गुप्तकाल की एक बड़ी वराह-प्रतिमा है, और वहाँ भी धरती दाँत पर ही टिकी है।

ब्योरा छोटा है, पर कथा का पूरा भार उसी पर है: बचाने वाले के पास सिर्फ़ एक जगह थी जहाँ धरती रखी जा सकती थी, और वह लड़ते हुए भी वहीं रही।

ऐसा क्यों?

हिरण्याक्ष ने वराह को "बोझ छोड़" वाला ताना कब मारा?

  • धरती डुबोए जाने से पहले
  • धरती को पानी की सतह पर सुरक्षित रखे जाने के बाद, ठीक लड़ाई शुरू होने से पहले
  • लड़ाई के बीचों-बीच
  • हिरण्याक्ष मरने के बाद
पूरी कथा पढ़िए — ताना, जो बेमतलब निकला

यह ताना सुनने में सीधा लगता है — बोझ छोड़ो, फिर लड़ो। पर तब तक धरती बोझ नहीं रही थी; वह पानी पर टिक चुकी थी।

वराह जवाब नहीं देते, और कथा भी नहीं रुकती इस बात को समझाने में। लड़ाई सीधे होती है, क्योंकि जिस चीज़ के लिए यह सब हुआ था वह पहले ही सुरक्षित हो चुकी थी।

यही इस गाथा का ढंग है: उतरने वाला कुछ ठीक करने आता है, किसी को हराना उसके रास्ते में बाद में आता है, पहले नहीं।

बाद की परंपरा

हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के बारे में भागवत पुराण कौन-सी बात जोड़ता है, जो उन्हें आगे की कई कथाओं से जोड़ देती है?

  • कि वे ब्रह्मा के पुत्र थे
  • कि वे असल में एक ही व्यक्ति थे
  • कि उन्हें कोई मार ही नहीं सकता था
  • कि वे विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे, जिन्हें तीन जन्मों तक विष्णु का शत्रु बनने का शाप मिला था
पूरी कथा पढ़िए — वही दो, बार-बार

भागवत के अनुसार जय और विजय विष्णु के द्वार पर पहरा देते थे। सनक-सनंदन जैसे ऋषियों को रोकने पर उन्हें शाप मिला, और विकल्प दिया गया — सात जन्म भक्त बनकर, या तीन जन्म शत्रु बनकर।

उन्होंने तीन चुने, क्योंकि उतने में वे जल्दी लौट आते। इसीलिए वही जोड़ी तीन बार लौटती है: पहले हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, फिर रावण और कुंभकर्ण, और फिर शिशुपाल और दंतवक्र।

यह ढाँचा इस साइट के तीन महाकाव्यों को आपस में जोड़ देता है — यही जोड़ी विष्णु-पुराण में, रामायण में, और कृष्ण-लीला में मिलती है।

पहेली

मेरे पास आँखें भी थीं, पर नीचे अँधेरे में उनका कोई काम नहीं था। मैंने रास्ता किसी और चीज़ से निकाला। मैं कौन हूँ?

  • मत्स्य
  • कूर्म
  • वासुकि
  • वराह
पूरी कथा पढ़िए — जानवर का अपना हुनर

कथा में यह ब्योरा बहुत सुंदर है — अवतार का रूप सजावट नहीं है, वह काम के हिसाब से चुना गया है।

धरती पानी के नीचे कीचड़ में कहीं दबी थी, जहाँ देखना संभव नहीं था। जो जीव ज़मीन खोदकर और सूँघकर चीज़ें निकालता है, वही वहाँ काम आ सकता था।

यही बात मत्स्य और कूर्म पर भी लागू होती है: तैरना था तो मछली, टिकना था तो कछुआ, खोदना था तो सूअर।

किसने कहा?

"जानवर बनकर छिपने वाले, लड़ना है तो यह बोझ छोड़।" — यह किसने कहा?

  • ब्रह्मा ने
  • हिरण्यकशिपु ने
  • हिरण्याक्ष ने, धरती के पानी की सतह पर रखे जाने के बाद, लड़ाई शुरू होने से ठीक पहले
  • वराह ने
पूरी कथा पढ़िए — लड़ाई से पहले की बात

यह ताना सुनने में सीधा है — हथियार बराबर करो, बोझ छोड़ो, फिर लड़ो। यह पंक्ति कथा की भावना के मुताबिक़ गढ़ी गई है, ग्रंथ का शब्दशः उद्धरण नहीं — जैसे इस गाथा में और भी कई जगह संवाद हैं।

पर असल में धरती तब तक बोझ रही ही नहीं थी — वह पहले ही सुरक्षित रखी जा चुकी थी। ताना अपना असर खो चुका था, फिर भी बोला गया।

कथा इसे पकड़ती है और आगे बढ़ जाती है। वराह न बहस करते हैं, न सफ़ाई देते हैं।

ग्रंथ असहमत

धरती उठाने वाले सूअर के बारे में सबसे पुरानी परंपरा में क्या अलग है?

  • वहाँ वह सूअर विष्णु से नहीं, ब्रह्मा या प्रजापति से जोड़ा जाता है
  • वहाँ धरती उठाई ही नहीं जाती
  • वहाँ सूअर की जगह कछुआ है
  • वहाँ हिरण्याक्ष का नाम अलग है
पूरी कथा पढ़िए — पहले किसी और का रूप

धरती को पानी से ऊपर लाने वाले विशाल सूअर की कल्पना बहुत पुरानी है, और शुरुआती परंपरा में वह प्रजापति या ब्रह्मा से जुड़ी मिलती है।

पुराणों में आते-आते वही सूअर विष्णु का अवतार बन जाता है, और उसके साथ हिरण्याक्ष वाली पूरी कथा जुड़ती है।

यह ठीक वही बात है जो मत्स्य के साथ भी हुई — पुरानी कथा वही रहती है, और उसका मालिक बदल जाता है। इस गाथा में यह दो बार दिखता है, इसलिए इसे संयोग मानना मुश्किल है।

सही क्रम

इस अध्याय की घटनाओं का सही क्रम क्या है?

  • हिरण्याक्ष का वध → धरती का डूबना → वराह का प्रकट होना → धरती का उठाया जाना
  • धरती का डूबना → वराह का प्रकट होना और बढ़ना → पानी में उतरना और धरती उठाना → धरती को पानी की सतह पर सुरक्षित रखना → हिरण्याक्ष से लड़ाई और वध
  • वराह का प्रकट होना → हिरण्याक्ष का वध → धरती का डूबना → धरती का रखा जाना
  • धरती का डूबना → धरती का उठाया जाना → वराह का प्रकट होना → हिरण्याक्ष
पूरी कथा पढ़िए — पहले काम, फिर लड़ाई

इस क्रम में ध्यान देने वाली बात यह है कि लड़ाई सबसे आख़िर में आती है, धरती के सुरक्षित रखे जाने के बाद — भागवत पुराण के तीसरे स्कंध में यही क्रम है।

कथा वध पर ख़त्म नहीं होती। वह तब ख़त्म होती है जब धरती अपनी जगह पर रख दी जाती है, और वह जगह लड़ाई से पहले ही तय हो चुकी होती है।

यह इस पूरी गाथा का ढंग है: उतरने वाला कुछ ठीक करने आता है, किसी को हराने नहीं। हराना रास्ते में पड़ता है।

तथ्य

दस अवतारों की प्रचलित सूची में वराह का स्थान कौन-सा है?

  • दूसरा
  • तीसरा
  • चौथा
  • पाँचवाँ
पूरी कथा पढ़िए — पहले तीन, एक ही जगह

शुरू के तीन अवतार — मत्स्य, कूर्म, वराह — तीनों पानी से जुड़े हैं, और तीनों में काम एक जैसा है: कुछ डूब रहा है, उसे बचाना है।

चौथे से कथा बदल जाती है। नरसिंह के बाद के अवतार पानी से नहीं, लोगों से जूझते हैं — एक राजा, एक वरदान, एक झूठी शर्त।

इसीलिए इस सूची को सिर्फ़ नामों की क़तार की तरह नहीं, एक बढ़ते हुए क्रम की तरह पढ़ा जाता रहा है।