
अध्याय १५
ययाति
उसने अपने बेटे से जवानी माँगी, और हज़ार साल बाद वही लौटाने आया
शाप
ययाति चंद्रवंश के राजा थे, और उनका विवाह शुक्राचार्य की बेटी देवयानी से हुआ था।
देवयानी के साथ उनकी दासी शर्मिष्ठा भी आई थीं — जो असल में असुरों के राजा की बेटी थीं।
ययाति ने शर्मिष्ठा से भी संबंध रखा, और छिपाकर रखा।
जब यह खुला, तो शुक्राचार्य ने शाप दिया: "आज से तुम बूढ़े हो जाओगे।"
और वह उसी क्षण हो गया।
छूट
फिर उन्होंने एक छूट दे दी।
"अगर तुम्हारा कोई बेटा अपनी जवानी तुम्हें देने को राज़ी हो, तो अदला-बदली हो सकती है।"
ययाति के पाँच बेटे थे।
उन्होंने बारी-बारी से चारों से पूछा।
चारों ने मना कर दिया — किसी ने साफ़, किसी ने घुमाकर।
सबसे छोटा
आख़िर में सबसे छोटे, पुरु, से पूछा गया।
उसने हाँ कह दी।
और उसी दिन एक जवान आदमी बूढ़ा हो गया, और एक बूढ़ा आदमी जवान।
हज़ार साल
इसके बाद ययाति ने वह सब किया जिसके लिए उन्होंने यह अदला-बदली की थी।
कथा कहती है — हज़ार साल।
और हज़ार साल बाद वे लौटे, और उन्होंने जो कहा वह इस पूरे अध्याय की सबसे मशहूर बात है:
भोगने से इच्छा कभी शांत नहीं होती। जैसे आग में घी डालने से आग और बढ़ती है, वैसे ही।
लौटाना
उन्होंने पुरु को उसकी जवानी लौटा दी और ख़ुद बुढ़ापा वापस ले लिया।
और राज्य भी उसी को दिया — चारों बड़े भाइयों को छोड़कर।
उसी पुरु से पुरुवंश चला, और उसी से आगे कुरुवंश — यानी महाभारत।
टिप्पणी: ययाति की पूरी कथा महाभारत के आदि पर्व में मिलती है — देवयानी, शर्मिष्ठा, शुक्राचार्य का शाप, पाँच बेटे और पुरु का जवानी देना। विष्णु पुराण के चौथे अंश में यही कथा चंद्रवंश की वंशावली के साथ छोटे रूप में आती है। "भोगने से इच्छा शांत नहीं होती" वाला वाक्य महाभारत के सबसे ज़्यादा उद्धृत हिस्सों में है। पुरु को राज्य मिलने से पुरुवंश चला, और उसी से आगे कुरुवंश — यानी महाभारत की कथा इसी फ़ैसले से आगे बढ़ती है।
स्रोत: कई ग्रंथों से, ययाति