अध्याय ८

धर्म का चेहरा

चिता की आग से ठीक पहले देवता आ पहुँचे — और तब पता चला कि जो चांडाल मालिक बना था, वह स्वयं धर्म था; और एक राजा ने स्वर्ग लेने से इनकार कर दिया

आग से ठीक पहले

आग जल चुकी थी और हरिश्चंद्र उसमें उतरने ही वाले थे, कि आकाश से इंद्र और देवता उतर आए।

चांडाल आगे आया, और उसका रूप बदल गया। "मैं धर्म हूँ," उसने कहा। "तुम्हारे धैर्य, संयम और सत्य से प्रसन्न होकर मैंने ही यह चांडाल का रूप लिया था।"

देवी भागवत में धर्म और आगे बताते हैं कि वे ही चांडाल थे, वे ही वह ब्राह्मण, और वे ही वह साँप, जिसके डसने से रोहिताश्व मरा था। सब कुछ परीक्षा थी।

अमृत

इंद्र ने चिता पर अमृत और फूलों की वर्षा की। और रोहिताश्व उठ बैठा — स्वस्थ, शांत, पहले जैसा।

पति-पत्नी ने बेटे को गले लगा लिया।

प्रजा के बिना नहीं

इंद्र ने कहा: अपनी पत्नी और बेटे के साथ स्वर्ग चलो, राजन्। वह तुमने अपने कर्मों से जीत लिया है।

हरिश्चंद्र ने इनकार कर दिया। "मैं अपनी प्रजा को दुख में छोड़कर स्वर्ग कैसे जा सकता हूँ?" उन्होंने कहा। "ब्राह्मण की हत्या, गुरु की हत्या, गाय की हत्या, स्त्री की हत्या — इनके बराबर पाप कहा गया है अपने आश्रितों को छोड़ देना।" यह सूची मार्कंडेय पुराण की है; देवी भागवत की सूची थोड़ी अलग है — ब्राह्मण-हत्या, स्त्री-हत्या, मदिरापान और गो-हत्या।

फिर उन्होंने माँगा: मेरा पुण्य मेरे साथ इन सबका भी हो।

इंद्र मान गए। मार्कंडेय पुराण में इंद्र एक करोड़ दिव्य रथों के साथ पृथ्वी पर आए और अयोध्या की प्रजा को बुलाया; फिर विश्वामित्र और देवताओं ने रोहिताश्व का राज्याभिषेक किया, और उसके बाद प्रजा — अपने बच्चों, सेवकों और स्त्रियों के साथ — हरिश्चंद्र के साथ स्वर्ग चली गई।

अंत

कथा के अंत को लेकर परंपराएँ पूरी तरह एक नहीं हैं।

दोनों पुराणों में रोहिताश्व को अयोध्या की गद्दी पर बिठाया जाता है और हरिश्चंद्र स्वर्ग जाते हैं। मार्कंडेय पुराण में इंद्र की अनुमति के बाद विश्वामित्र और देवता रोहिताश्व का राज्याभिषेक करते हैं, और फिर प्रजा राजा के साथ स्वर्ग जाती है। देवी भागवत भी रोहिताश्व को राज्य सौंपकर हरिश्चंद्र के स्वर्गारोहण का वर्णन करता है। बाद के कुछ पुनर्कथनों में एक अलग अंत मिलता है, जिसमें हरिश्चंद्र पृथ्वी पर लौटकर फिर राज करते हैं। इस साइट ने इन्हें अलग-अलग रखा है और किसी को निर्णायक नहीं कहा।

झगड़ा

मार्कंडेय पुराण इस कथा को यहीं ख़त्म नहीं करता। इसके बाद वसिष्ठ और विश्वामित्र आपस में झगड़ पड़ते हैं। दोनों एक-दूसरे को शाप देकर विशाल पक्षी बन जाते हैं और लड़ते हैं।

ब्रह्मा बीच में आकर उन्हें रोकते हैं और कहते हैं कि विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र का अहित नहीं किया; उनके कारण राजा स्वर्ग पहुँचा, इसलिए इस अर्थ में वे उसके उपकारी हुए।

आज

गांधी जी ने बचपन में हरिश्चंद्र का एक नाटक देखा था। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा कि वह उनके मन में बस गया, और वे मन-ही-मन न जाने कितनी बार हरिश्चंद्र बने। उन्होंने स्वयं लिखा कि उस नाटक ने उन्हें हरिश्चंद्र की तरह सत्य पर टिके रहने और कठिन परीक्षाएँ सहने का आदर्श दिया।

१९१३ में दादासाहब फाल्के ने "राजा हरिश्चंद्र" बनाई, जिसे भारत की पहली पूरी लंबाई की फ़ीचर फ़िल्म माना जाता है।

और काशी में आज भी एक घाट है, जिसके ऊपर उनका नाम है।

टिप्पणी: अंतिम प्रसंग मार्कंडेय पुराण (अध्याय ८, और उसके बाद अध्याय ९ में वसिष्ठ-विश्वामित्र का झगड़ा) और देवी भागवत (७.२७) में है। मार्कंडेय में धर्म कहते हैं कि वे चांडाल बनकर आए थे; देवी भागवत में वे चांडाल, ब्राह्मण और साँप, तीनों बताए गए हैं। अंत में दोनों पुराण एक ही क्रम रखते हैं: मार्कंडेय में विश्वामित्र और देवता रोहिताश्व का राज्याभिषेक करते हैं और फिर प्रजा राजा के साथ स्वर्ग जाती है, और देवी भागवत भी रोहिताश्व को राज्य सौंपकर स्वर्गारोहण बताता है। बाद के कुछ पुनर्कथनों में हरिश्चंद्र लौटकर फिर राज करते हैं; यह एक अलग परंपरा है, और यहाँ किसी को निर्णायक नहीं कहा गया है। पहली फ़ीचर फ़िल्म का दावा आम तौर पर "राजा हरिश्चंद्र" (१९१३) के बारे में किया जाता है; कभी-कभी १९१२ की "श्री पुंडलीक" की भी चर्चा होती है, जिसकी "पहली" होने की स्थिति विवादित है। गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में एक नाटक की बात की है, किसी एक प्रस्तुति का नाम नहीं दिया। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: ऐतरेय ब्राह्मण, मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत से, धर्म का चेहरा

अब बताइए — कितना याद रहा?

कौन हूँ मैं?

मैं एक चांडाल बनकर काशी में आया। हरिश्चंद्र को मैं ख़रीदता हूँ, बारह महीने श्मशान में काम कराता हूँ, और अंत में अपना असली रूप दिखाता हूँ। मैं कौन हूँ?

  • यम
  • नारद
  • धर्म
  • इंद्र
पूरी कथा पढ़िए — परीक्षा लेने वाला चांडाल

चांडाल के रूप में स्वयं धर्म आए थे।

उन्होंने कहा कि वे हरिश्चंद्र के धैर्य, संयम और सत्य से प्रसन्न होकर आए।

हरिश्चंद्र को यह अंत तक पता नहीं था।

पर ७.२२ में उसी कथा के भीतर उस बूढ़े ब्राह्मण को विश्वामित्र का रूप बताया गया है — पाठ में यह तनाव सुलझाया नहीं गया।

ग्रंथ असहमत

देवी भागवत ७.२७ में धर्म अंत में क्या दावा करते हैं?

  • कि वे चांडाल, ब्राह्मण और साँप
  • कि वे केवल चांडाल के रूप में थे
  • कि वे विश्वामित्र थे
  • कि वे इंद्र के रूप में आए थे
पूरी कथा पढ़िए — धर्म के कई रूप

देवी भागवत के अंतिम अध्याय में धर्म कहते हैं कि सारी परीक्षा उन्हीं की थी।

वे चांडाल, ब्राह्मण और साँप, तीनों बनकर आए थे।

अंतिम अध्याय धर्म को चांडाल, ब्राह्मण और साँप — तीनों से जोड़ता है; लेकिन ७.२२ बूढ़े ब्राह्मण को विश्वामित्र का रूप बताता है, इसलिए पाठ की दोनों परतें साथ दर्ज रहनी चाहिए।

क्या हुआ?

चिता पर रोहिताश्व को कैसे जिलाया गया?

  • धर्म ने वरदान दिया
  • विश्वामित्र ने मंत्र पढ़ा
  • नारद ने संजीवनी दी
  • इंद्र ने चिता पर अमृत और फूल बरसाए
पूरी कथा पढ़िए — अमृत की वर्षा

इंद्र ने रोहिताश्व की चिता पर अमृत और फूलों की वर्षा की।

रोहिताश्व उठ बैठा, स्वस्थ और शांत।

पति-पत्नी ने उसे गले लगा लिया।

ऐसा क्यों?

इंद्र के स्वर्ग बुलाने पर हरिश्चंद्र ने इनकार क्यों किया?

  • क्योंकि उन्हें स्वर्ग पर विश्वास नहीं था
  • क्योंकि वे अपनी प्रजा को दुख में छोड़कर नहीं जाना चाहते थे
  • क्योंकि वे अयोध्या का राज्य चाहते थे
  • क्योंकि विश्वामित्र ने मना किया था
पूरी कथा पढ़िए — प्रजा के बिना नहीं

इंद्र ने कहा कि स्वर्ग तुम्हारे अपने कर्मों की कमाई है।

हरिश्चंद्र ने कहा कि वे अपनी प्रजा को छोड़कर नहीं जा सकते।

उनके शब्दों में अपने आश्रितों को छोड़ना बहुत बड़े पाप जैसा है।

किसने कहा?

"मैं अपनी प्रजा को दुख में छोड़कर स्वर्ग कैसे जा सकता हूँ?" — यह किसने किससे कहा?

  • हरिश्चंद्र ने इंद्र से
  • शैव्या ने हरिश्चंद्र से
  • विश्वामित्र ने इंद्र से
  • धर्म ने हरिश्चंद्र से
पूरी कथा पढ़िए — एक राजा का इनकार

इंद्र ने स्वर्ग का न्योता दिया।

हरिश्चंद्र ने कहा कि वे अपनी प्रजा को दुख में नहीं छोड़ सकते।

फिर उन्होंने अपना पुण्य प्रजा में बाँटने को कहा।

तथ्य

मार्कंडेय पुराण के अनुसार इंद्र कितने दिव्य रथों के साथ पृथ्वी पर आए?

  • एक हज़ार
  • एक लाख
  • सौ
  • एक करोड़
पूरी कथा पढ़िए — एक करोड़ रथ

मार्कंडेय पुराण में हरिश्चंद्र की प्रार्थना स्वीकार होने के बाद इंद्र एक करोड़ दिव्य रथों के साथ पृथ्वी पर आए।

अयोध्या के सब लोग, बच्चों, सेवकों और स्त्रियों सहित, राजा के साथ स्वर्ग चढ़े।

राजा ने अपना पुण्य किसी अकेले के लिए नहीं रखा।

ग्रंथ असहमत

राज्य और स्वर्गारोहण के क्रम को दोनों पुराण कैसे रखते हैं?

  • मार्कंडेय में सब स्वर्ग जाते हैं और राज्य की कोई व्यवस्था नहीं होती; देवी भागवत में राज्य पुत्र को सौंपा जाता है
  • दोनों में रोहिताश्व को अयोध्या की गद्दी पर बिठाया जाता है और हरिश्चंद्र स्वर्ग जाते हैं; लौटकर फिर राज करने वाला अंत बाद की कुछ कथाओं में है
  • दोनों में हरिश्चंद्र अयोध्या लौटकर राज करते रहते हैं
  • किसी में राज्य का कोई प्रबंध नहीं होता
पूरी कथा पढ़िए — राज्य पहले, स्वर्ग बाद में

मार्कंडेय में इंद्र की अनुमति के बाद विश्वामित्र और देवता रोहिताश्व का राज्याभिषेक करते हैं, और फिर प्रजा राजा के साथ स्वर्ग जाती है।

देवी भागवत भी रोहिताश्व को राज्य सौंपकर हरिश्चंद्र के स्वर्गारोहण का वर्णन करता है।

बाद के कुछ पुनर्कथनों में हरिश्चंद्र पृथ्वी पर लौटकर फिर राज करते हैं — इस साइट ने इसे अलग रखा है।

क्या हुआ?

ब्रह्मा ने वसिष्ठ-विश्वामित्र के झगड़े में क्या समझाया?

  • कि विश्वामित्र ग़लत थे
  • कि हरिश्चंद्र ने भूल की थी
  • कि विश्वामित्र ने हरिश्चंद्र का अहित नहीं किया; उनके कारण राजा स्वर्ग पहुँचा, इसलिए वे उसके उपकारी हुए
  • कि दोनों को शाप वापस लेना होगा
पूरी कथा पढ़िए — ब्रह्मा की बात

वसिष्ठ और विश्वामित्र शाप देकर विशाल पक्षी बन गए और लड़े।

ब्रह्मा ने उन्हें रोका और कहा कि विश्वामित्र ने राजा का अहित नहीं किया, क्योंकि उनके कारण हरिश्चंद्र स्वर्ग पहुँचे।

उसी परीक्षा से हरिश्चंद्र को स्वर्ग मिला।

बाद की परंपरा

जिसे भारत की पहली पूरी लंबाई की फ़ीचर फ़िल्म माना जाता है, वह किस कथा पर बनी थी?

  • रामायण
  • कृष्ण-लीला
  • सावित्री
  • राजा हरिश्चंद्र (१९१३, दादासाहब फाल्के)
पूरी कथा पढ़िए — सिनेमा की पहली कथा

दादासाहब फाल्के की "राजा हरिश्चंद्र" (१९१३) भारत की पहली पूरी लंबाई की फ़ीचर फ़िल्म मानी जाती है।

इस तरह हरिश्चंद्र की कथा भारतीय फ़ीचर-सिनेमा के शुरुआती इतिहास के बिलकुल केंद्र में आ गई।

बाद में यह कथा कई भाषाओं की फ़िल्मों में बार-बार बनी।

बाद की परंपरा

गांधी जी ने हरिश्चंद्र की कथा कहाँ से पाई, और उसका उन पर क्या असर हुआ?

  • बचपन में एक नाटक देखकर, और वह उनके मन में बस गया
  • रामायण में पढ़कर
  • स्कूल की किताब से
  • अपने पिता से सुनकर
पूरी कथा पढ़िए — नाटक का असर

गांधी जी ने बचपन में हरिश्चंद्र का एक नाटक देखा था।

अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा कि वे मन-ही-मन अनगिनत बार हरिश्चंद्र बने।

गांधी जी ने स्वयं लिखा कि इस नाटक ने उन्हें हरिश्चंद्र की तरह सत्य का पालन करने और कठिन परीक्षाएँ सहने का आदर्श दिया; इसलिए उनके बाद के सत्य-केंद्रित जीवन से इस बाल्यकालीन प्रभाव को जोड़ना स्वाभाविक है।