हरिश्चंद्र
हरिश्चंद्र — ८ अध्याय, ८० सवाल। ऐतरेय ब्राह्मण, मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत से।
हरिश्चंद्र की दो अलग कथाएँ — ऐतरेय ब्राह्मण में वह पिता, जिसने वरुण को बेटा अर्पित करने का वचन दिया, और मार्कंडेय पुराण व देवी भागवत में वह राजा, जिसने सत्य के लिए राज्य, पत्नी, बेटा और अपना मान सब कुछ खोया। ये एक कथा के दो रूप नहीं, दो अलग कथाएँ हैं, और यहाँ अलग रखी गई हैं। जहाँ पुराण आपस में अलग पड़ते हैं — झगड़े की शुरुआत, दक्षिणा, बिक्री, श्मशान की रात और अंत — वहाँ दोनों रूप दिए गए हैं, और कहीं निर्णय नहीं दिया गया। कथा के लोकप्रिय रूपों की कुछ बातें, जैसे शव-दाह का "कर", इन ग्रंथों में नहीं मिलीं और कथा में नहीं रखी गईं। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।
- दो हरिश्चंद्र — एक ही नाम के राजा की दो अलग कहानियाँ — एक जो वैदिक यज्ञ-भूमि में घटती है, और एक जो काशी के श्मशान में — और वह होड़, जो दोनों के पीछे खड़ी है
- वरुण का वचन — सौ रानियों वाला राजा, जिसने बेटे के बदले एक देवता को वचन दे दिया — और फिर उस वचन के डर से उसी बेटे को जंगल भागना पड़ा
- जंगल में एक पुकार — एक शिकार, एक पुकार, और एक क्षण की भूल — जिसने एक तपस्वी का तप तोड़ दिया, और एक राजा से उसका पूरा राज्य माँगा
- सब कुछ, फिर उससे भी ज़्यादा — राज्य दे देने के बाद भी दान पूरा नहीं होता — दक्षिणा बाक़ी है, और एक महीने की मियाद है; और इसी बीच पाँच देवता एक शाप की क़ीमत चुकाते हैं
- जो बेचा नहीं जा सकता था — काशी की गली में एक राजा अपनी पत्नी और बेटे को बेचता है — और फिर ख़ुद बिकता है, एक ऐसे मालिक के हाथों जिसे वह मन से कभी मालिक नहीं मान सका
- श्मशान का पहरेदार — अयोध्या का राजा अब काशी के श्मशान में शवों से कफ़न बटोरता है — और सपने में उसे अपने कई जन्मों की झलक मिलती है
- वह रात — एक साँप, एक बच्चा, और श्मशान की एक रात — जब एक स्त्री अपने मृत बेटे को गोद में लेकर उसी घाट पर पहुँची जहाँ उसका पति कफ़न बटोर रहा था
- धर्म का चेहरा — चिता की आग से ठीक पहले देवता आ पहुँचे — और तब पता चला कि जो चांडाल मालिक बना था, वह स्वयं धर्म था; और एक राजा ने स्वर्ग लेने से इनकार कर दिया