अध्याय १

दो हरिश्चंद्र

एक ही नाम के राजा की दो अलग कहानियाँ — एक जो वैदिक यज्ञ-भूमि में घटती है, और एक जो काशी के श्मशान में — और वह होड़, जो दोनों के पीछे खड़ी है

एक राजा, एक नाम

हरिश्चंद्र इक्ष्वाकु वंश के राजा थे — उसी वंश के, जिसमें आगे चलकर राम जन्मे। पुराणों की वंश-सूचियों में उनका नाम सगर से कुछ पीढ़ी ऊपर आता है।

हरिश्चंद्र के नाम से दो बहुत अलग कथा-सूत्र मिलते हैं। उन्हें केवल एक ही कथा के छोटे-मोटे पाठभेद मानना ठीक नहीं: ऐतरेय ब्राह्मण का केंद्र वरुण और पुत्र-बलि का वचन है, जबकि मार्कंडेय पुराण का केंद्र विश्वामित्र की परीक्षा और सत्य-पालन है। बाद की परंपरा, विशेषकर देवी भागवत, इन्हें एक ही विस्तृत हरिश्चंद्र-चरित में जोड़ती है।

पहली कथा सबसे पुरानी है। वह ऐतरेय ब्राह्मण में मिलती है — वैदिक यज्ञों की विधि समझाने वाला ग्रंथ, जो पहली सहस्राब्दी ईसा-पूर्व की वैदिक परत का माना जाता है। उसमें हरिश्चंद्र एक ऐसा पिता है जिसने वरुण को अपना बेटा अर्पित करने का वचन दे दिया था, और फिर उस वचन से बचता फिरा।

दूसरी कथा वह है जो सबको याद है। वह मार्कंडेय पुराण में है, और देवी भागवत में और भी विस्तार से — यानी पहली कथा से कई सदियाँ बाद के ग्रंथों में। उसमें हरिश्चंद्र वह राजा है जो सत्य की रक्षा में राज्य, पत्नी, बेटा और अपना मान सब कुछ दे देता है, और काशी के श्मशान में एक चांडाल का सेवक बनकर काम करता है।

पक्षियों की सभा

मार्कंडेय पुराण में दूसरी कथा एक अनोखी जगह पर सुनाई जाती है। ऋषि जैमिनी के मन में महाभारत को लेकर चार सवाल थे। उन्हें उत्तर देने वाले चार ज्ञानी पक्षी थे, जो विंध्य पर्वत पर रहते थे और पिछले जन्म में ब्राह्मण थे।

चौथा सवाल द्रौपदी के पाँच बेटों के बारे में था: पांडवों और कृष्ण के होते हुए वे इस तरह क्यों मारे गए, और उनका कोई ब्याह, कोई संतान क्यों नहीं हुई?

उसके उत्तर में पक्षियों ने हरिश्चंद्र की कथा सुनाई। मार्कंडेय पुराण के भीतर यह कथा अपने आप शुरू नहीं होती; वह जैमिनी के चौथे सवाल के उत्तर के रूप में आती है — और इसी से उसका सिरा महाभारत तक जाता है।

दो ऋषि

इस कथा के पीछे दो ऋषि खड़े हैं, जिनकी आपसी होड़ पूरे पुराण-साहित्य में चलती रहती है: वसिष्ठ और विश्वामित्र। वसिष्ठ जन्म से ब्रह्मर्षि माने जाते हैं। विश्वामित्र क्षत्रिय राजा थे, जो तप के बल पर ऋषि बने।

देवी भागवत में यह होड़ कथा की सीधी वजह बनती है। वह दोनों कथाओं को साथ रखता है, और हरिश्चंद्र की कथा को दो हिस्सों में कहता है: पहले शुनःशेप की वह पुरानी कथा, जिसमें विश्वामित्र भी आते हैं, और उसके बाद विश्वामित्र से हरिश्चंद्र का वह झगड़ा, जो राज्य छिनने से श्मशान तक ले जाता है।

इस पूरी कथा को इस तरह भी पढ़ा जा सकता है: दो ऋषियों की एक पुरानी बहस, जो एक राजा की देह पर लड़ी गई।

टिप्पणी: हरिश्चंद्र की पुरानी कथा ऐतरेय ब्राह्मण (७.१३–१८) में है; दूसरी, जो सबको याद है, मार्कंडेय पुराण (सातवें-आठवें अध्याय, कुछ गिनतियों में नौवाँ भी) में और उसके बाद देवी भागवत (स्कंध ७, अध्याय १४–२७) में विस्तार से। ये दो बहुत अलग कथा-सूत्र हैं; इन्हें केवल एक ही कथा के छोटे-मोटे पाठभेद मानना ठीक नहीं — और इस अध्याय ने उन्हें अलग रखा है। मार्कंडेय पुराण में यह कथा जैमिनी के चौथे सवाल के उत्तर में पक्षियों द्वारा कही जाती है; देवी भागवत दोनों कथाओं को एक ही सूत्र में रखता है। पहली कथा के अंत का वह प्रसंग, जिसमें ग्रंथ विश्वामित्र के शापित पुत्रों को कुछ जन-समूहों का पूर्वज बताता है, इस साइट ने जान-बूझकर नहीं दोहराया; पाठक इसे ऐतरेय ब्राह्मण में देख सकते हैं, और बाद के पाठक इस उत्पत्ति-कथा को असहज पाते हैं। कथा की तारीख़ें विद्वानों के अनुमान हैं। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: ऐतरेय ब्राह्मण, मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत से, दो हरिश्चंद्र

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

हरिश्चंद्र किस वंश के राजा थे?

  • यदुवंश के
  • कुरुवंश के
  • इक्ष्वाकु वंश के
  • चंद्रवंश की पौरव शाखा के
पूरी कथा पढ़िए — राम के वंश का राजा

हरिश्चंद्र इक्ष्वाकु वंश के थे — उसी वंश के, जिसमें बाद में राम आए।

पुराणों की वंश-सूचियों में उनका नाम सगर से कुछ पीढ़ी पहले आता है।

इसीलिए इस कथा को अक्सर "सूर्यवंश की कथा" कहा जाता है।

तथ्य

हरिश्चंद्र की सबसे पुरानी कथा किस ग्रंथ में मिलती है?

  • ऐतरेय ब्राह्मण में
  • मार्कंडेय पुराण में
  • रामायण में
  • महाभारत में
पूरी कथा पढ़िए — सबसे पुरानी परत

ऐतरेय ब्राह्मण ऋग्वेद से जुड़ा गद्य-ग्रंथ है, जो यज्ञ की विधियों और उनकी कथाओं को समझाता है।

उसमें हरिश्चंद्र, वरुण को दिया गया वचन और शुनःशेप की कथा एक साथ आती हैं।

जो कथा आज सबको याद है, वह इससे कई सदियाँ बाद की है।

ग्रंथ असहमत

हरिश्चंद्र की दोनों कथाओं में सबसे बड़ा फ़र्क़ क्या है?

  • कुछ नहीं
  • पहली कथा बाद की है और दूसरी पुरानी
  • पहली में हरिश्चंद्र काशी जाते हैं, दूसरी में जंगल
  • पहली में बेटे की बलि का वचन है, दूसरी में विश्वामित्र की परीक्षा
पूरी कथा पढ़िए — दो कथाएँ, एक नाम

ऐतरेय ब्राह्मण में एक पिता है, जिसने वरुण को बेटा देने का वचन दिया था, और उससे बचता है।

मार्कंडेय पुराण में एक राजा है, जो विश्वामित्र की परीक्षा में सब कुछ गँवाता है।

दोनों में राजा का नाम और इक्ष्वाकु वंश एक है, और विश्वामित्र दोनों में आते हैं; पर कथा का केंद्र, स्थान और डर अलग हैं।

क्या हुआ?

जैमिनी अपने चार सवाल लेकर कहाँ गए, और किससे मिले?

  • हिमालय के एक आश्रम में, वसिष्ठ से
  • विंध्य पर्वत पर, चार ज्ञानी पक्षियों से
  • काशी के श्मशान में, एक चांडाल से
  • नैमिषारण्य में, सूत जी से
पूरी कथा पढ़िए — सवाल पूछने वाला ऋषि

जैमिनी के मन में महाभारत को लेकर चार सवाल थे।

वे विंध्य पर गए, जहाँ चार ज्ञानी पक्षी रहते थे।

पक्षियों ने हर सवाल का उत्तर दिया, और हरिश्चंद्र की कथा उनमें से एक उत्तर के भीतर आती है।

ऐसा क्यों?

मार्कंडेय पुराण में हरिश्चंद्र की कथा सुनाई क्यों जाती है?

  • क्योंकि वह द्रौपदी के पाँच बेटों की कथा का उत्तर है
  • क्योंकि राजा हरिश्चंद्र का श्राद्ध करना था
  • क्योंकि जैमिनी ने सत्य के बारे में पूछा था
  • क्योंकि विश्वामित्र ने उसे सुनाने को कहा था
पूरी कथा पढ़िए — एक कथा जो एक सवाल का जवाब है

चौथा सवाल था: द्रौपदी के पाँचों बेटे पांडवों और कृष्ण के रहते कैसे मारे गए, और उनका ब्याह और संतान क्यों नहीं हुई।

उत्तर में पक्षी हरिश्चंद्र की कथा सुनाते हैं — और उसके भीतर पाँच देवताओं का शाप आता है।

यह कथा मार्कंडेय पुराण में अपने आप शुरू नहीं होती, बल्कि जैमिनी के चौथे सवाल के उत्तर के रूप में महाभारत से जुड़कर आती है।

कौन हूँ मैं?

मैं क्षत्रिय राजा था, तप से ऋषि बना। हरिश्चंद्र की इन दोनों मुख्य कथा-परंपराओं में मेरा नाम आता है, और वसिष्ठ से मेरी होड़ कभी ख़त्म नहीं होती। मैं कौन हूँ?

  • नारद
  • जैमिनी
  • परशुराम
  • विश्वामित्र
पूरी कथा पढ़िए — दोनों कथाओं में एक ही ऋषि

ऐतरेय ब्राह्मण में विश्वामित्र शुनःशेप को अपने पुत्र की तरह अपनाते हैं।

पुराणों में वही विश्वामित्र हरिश्चंद्र से सब कुछ छीन लेते हैं।

इसी से लगता है कि परंपरा ने दोनों कथाओं को एक-दूसरे के पास रखा।

ग्रंथ असहमत

देवी भागवत हरिश्चंद्र की कथा कैसे कहता है?

  • केवल ऐतरेय वाली कथा, बिना किसी परीक्षा के
  • दोनों को साथ रखता है
  • केवल श्मशान वाली कथा, बिना शुनःशेप के
  • वह हरिश्चंद्र का ज़िक्र ही नहीं करता
पूरी कथा पढ़िए — जहाँ दो कथाएँ मिलती हैं

देवी भागवत के सातवें स्कंध के अध्यायों में यह कथा विस्तार से आती है।

वहाँ शुनःशेप की कथा और हरिश्चंद्र की परीक्षा एक ही कथा-सूत्र में जुड़ी हैं।

यानी परंपरा ने ख़ुद इन दोनों को जोड़ा — इसीलिए इस अध्याय ने इन्हें अलग-अलग रखकर दिखाया है।

सही क्रम

हरिश्चंद्र की कथा के स्रोतों को पुराने से नए के क्रम में रखें।

  • मार्कंडेय पुराण → ऐतरेय ब्राह्मण → देवी भागवत
  • देवी भागवत → मार्कंडेय पुराण → ऐतरेय ब्राह्मण
  • ऐतरेय ब्राह्मण → मार्कंडेय पुराण → देवी भागवत
  • ऐतरेय ब्राह्मण → देवी भागवत → मार्कंडेय पुराण
पूरी कथा पढ़िए — तीन परतें

सबसे नीचे ऐतरेय ब्राह्मण है, जो पहली सहस्राब्दी ईसा-पूर्व की वैदिक परत का माना जाता है।

उसके बाद मार्कंडेय पुराण, और फिर और भी बाद का देवी भागवत, जो कथा को सबसे विस्तार से कहता है।

तारीख़ें विद्वानों के अनुमान हैं, इसलिए यहाँ केवल क्रम पक्का है, सन नहीं।

तथ्य

परीक्षा वाली कथा में हरिश्चंद्र को किस नगर के श्मशान में काम करना पड़ता है?

  • मथुरा के
  • उज्जैन के
  • अयोध्या के
  • काशी (वाराणसी) के
पूरी कथा पढ़िए — काशी का घाट

पुराणों की कथा में राजा को काशी के श्मशान में एक चांडाल का सेवक बनना पड़ता है।

आज भी वाराणसी का एक घाट हरिश्चंद्र घाट कहलाता है।

यह कथा आगे के अध्यायों में विस्तार से आती है।

पहेली

मैं एक ही नाम के राजा की कथा हूँ, पर मेरे दो अलग रूप हैं, जिनके बीच सदियाँ हैं। एक में पिता अपना वचन तोड़ना चाहता है, दूसरे में राजा अपना वचन निभाने के लिए सब कुछ गँवाता है। मैं क्या हूँ?

  • हरिश्चंद्र की कथा
  • रामायण की एक कथा
  • सत्यवान की कथा
  • शुनःशेप की कथा
पूरी कथा पढ़िए — एक नाम, दो वचन

पहली कथा में वचन वरुण से किया गया है, और पिता उससे बचता है।

दूसरी में वचन विश्वामित्र से किया गया है, और राजा उसे निभाने के लिए सब कुछ खो देता है।

इसीलिए "हरिश्चंद्र" नाम सुनकर हम अक्सर केवल दूसरी कथा को सोचते हैं, जबकि पहली उससे पुरानी है।