
अध्याय ५
जो बेचा नहीं जा सकता था
काशी की गली में एक राजा अपनी पत्नी और बेटे को बेचता है — और फिर ख़ुद बिकता है, एक ऐसे मालिक के हाथों जिसे वह मन से कभी मालिक नहीं मान सका
काशी
महीना बीत रहा था, और दक्षिणा का कोई प्रबंध नहीं हुआ था। तीनों काशी पहुँच गए — शैव्या, रोहिताश्व, और वह राजा जो कभी अयोध्या का था।
विश्वामित्र वहाँ आ पहुँचे और अपना हिसाब माँगने लगे। मियाद ख़त्म होने को थी। देवी भागवत में ऋषि दिन के एक चौथाई हिस्से भर का समय देते हैं। पैसे कहीं से नहीं आने थे।
शैव्या की माँग
देवी भागवत में तब शैव्या ने कहा: मुझे बेच दीजिए।
एक बार नहीं, बार-बार। हरिश्चंद्र ने मना किया। पर आख़िर वे मान गए। "मैं वह काम करूँगा," उन्होंने कहा, "जो निर्दय से निर्दय आदमी भी करने की हिम्मत नहीं करता।"
कथा ख़ुद इस क्षण से असहज है। वह इसे सहज नहीं बनाती।
बाज़ार में
देवी भागवत में राजा पत्नी को रास्ते पर खड़ा करते हैं और पुकारते हैं: "किसी को दासी चाहिए? यह स्त्री मुझे प्राणों से भी प्यारी है।"
एक बूढ़े ब्राह्मण ने उसे ख़रीद लिया। देवी भागवत में यह ब्राह्मण ख़ुद विश्वामित्र का बदला हुआ रूप है।
देवी भागवत में रोहिताश्व माँ का पल्लू छोड़ने को तैयार नहीं होता। वह हर क़दम पर लड़खड़ाता, गिरता, फिर उठकर माँ का कपड़ा पकड़ लेता। ब्राह्मण ने उसे पीटा, पर बच्चा रोता हुआ माँ के साथ चलता रहा। इसलिए ब्राह्मण ने उसे भी ख़रीद लिया।
पर पैसा फिर भी कम पड़ा। विश्वामित्र दक्षिणा लेने आए और पूरी माँग की।
अब राजा की बारी
हरिश्चंद्र ने पुकारा: कोई मुझे ख़रीदेगा? पर सूरज ढलने से पहले।
एक चांडाल आगे आया, जिसका नाम मार्कंडेय पुराण में प्रवीर है। उसके रूप में स्वयं धर्म आया था — पर हरिश्चंद्र को यह पता नहीं था।
राजा ने मना कर दिया। वे क्षत्रिय थे, और एक चांडाल के सेवक बनना उनकी अपनी नज़र में सबसे बड़ी गिरावट थी। देवी भागवत में वे कहते हैं कि श्रेष्ठ का धर्म श्रेष्ठ है, मध्यम का मध्यम, और नीच का धर्म मन को दबाने वाला।
तब विश्वामित्र सामने आए, और शाप का डर दिखाया। राजा घबरा गए, और उन्होंने कहा: मैं ख़ुद आपका सेवक बनता हूँ। विश्वामित्र ने उन्हें उसी चांडाल के हाथों बेच दिया, और दक्षिणा वसूल ली।
हरिश्चंद्र अब उस चांडाल के दास थे।
टिप्पणी: काशी की बिक्री मार्कंडेय पुराण (अध्याय ८) और देवी भागवत (७.२२–२३) में आती है। मार्कंडेय में पत्नी और बेटे को "एक बूढ़ा ब्राह्मण" ख़रीदता है, और ख़ुद को बेचने के बाद हरिश्चंद्र चांडाल प्रवीर के सेवक बनते हैं, जिसके रूप में स्वयं धर्म आया है। देवी भागवत ७.२२ में पत्नी और बेटे को ख़रीदने वाला बूढ़ा ब्राह्मण कौशिक, यानी विश्वामित्र का बदला हुआ रूप बताया गया है, और हरिश्चंद्र पहले चांडाल को मना करते हैं। लेकिन आगे ७.२७ में धर्म अंत में कहते हैं कि वही चांडाल, वही ब्राह्मण और वही साँप भी वे स्वयं थे। दोनों कथन पाठ में मौजूद हैं; यह साइट इस आंतरिक तनाव को दर्ज करती है, किसी एक को हटाकर दूसरे से नहीं मिलाती। यह कथा पत्नी को बेचने और एक चांडाल के सेवक बनने पर टिकी है; पाठ इन दोनों प्रसंगों में ख़ुद असहज है और यहाँ भी उन्हें वैसा ही रखा गया है। चांडाल की जाति-स्थिति को कथा "सबसे नीची पायदान" की तरह बरतती है, पर यह किसी की स्वाभाविक या उचित हैसियत का दावा नहीं है — और अंत में वही चांडाल स्वयं धर्म निकलता है। बिक्री की रक़में दोनों ग्रंथों में अलग-अलग हैं और यहाँ नहीं दी गई हैं। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।
स्रोत: ऐतरेय ब्राह्मण, मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत से, जो बेचा नहीं जा सकता था