
अध्याय ४
सब कुछ, फिर उससे भी ज़्यादा
राज्य दे देने के बाद भी दान पूरा नहीं होता — दक्षिणा बाक़ी है, और एक महीने की मियाद है; और इसी बीच पाँच देवता एक शाप की क़ीमत चुकाते हैं
दान
हरिश्चंद्र ने राज्य दे दिया। कोष, सेना, ज़मीन, हाथी-घोड़े, राज-छत्र — सब कुछ।
पर विश्वामित्र का कहना था कि दान बिना दक्षिणा के अधूरा है। इसलिए राजा को अब दक्षिणा भी चुकानी थी। मार्कंडेय पुराण में यह राजसूय यज्ञ की दक्षिणा है। देवी भागवत में वह ढाई भार सोना है, और राजा के तन के राज-वस्त्र भी दान में गिने जाते हैं।
राजा के हाथ अब ख़ाली थे। जो कुछ था, वह अब ऋषि का हो चुका था।
एक महीने की मियाद
हरिश्चंद्र ने कहा कि दक्षिणा मैं चुका दूँगा, पर मुझे समय दीजिए। विश्वामित्र ने एक महीना दिया।
हरिश्चंद्र ने पत्नी शैव्या और बेटे रोहिताश्व से कहा: मैंने राज्य ऋषि को दे दिया है। हम तीनों के सिवा अब मेरे पास कुछ नहीं है।
वे तीनों अयोध्या से चल पड़े। देवी भागवत के अनुसार पूरा नगर रो पड़ा, और चारों ओर कोलाहल मच गया।
पाँच देवताओं की आपत्ति
विश्वामित्र का कठोर व्यवहार पाँच विश्वेदेवों से देखा नहीं गया। उन्होंने ऋषि को टोका।
विश्वामित्र क्रोध में थे। उन्होंने उन पाँचों देवताओं को शाप दिया कि तुम मनुष्य बनोगे। फिर उन्होंने शाप में एक रियायत जोड़ दी: वे विवाह और संतान से मुक्त रहेंगे।
वही पाँच देवता द्रौपदी के पाँच बेटे बने — प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन। वे पांडवों के पुत्र कहलाए, और युवावस्था में ही मारे गए; उनका कोई ब्याह या संतान नहीं हुई।
यही जैमिनी के चौथे सवाल का उत्तर है। हरिश्चंद्र की कथा महाभारत के इन बच्चों तक जाती है।
टिप्पणी: राज्य-दान और दक्षिणा का यह प्रसंग मार्कंडेय पुराण (अध्याय ७) और देवी भागवत (७.१९–२१) में है। मार्कंडेय में विश्वामित्र राजसूय यज्ञ की दक्षिणा माँगते हैं और एक महीने की मियाद देते हैं; देवी भागवत में यह ढाई भार सोना है, और वहाँ राजा के राज-वस्त्र भी दान में गिने जाते हैं। द्रौपदी के पाँच बेटों का पाँच विश्वेदेवों के शाप से बनना मार्कंडेय पुराण (अध्याय ७) में है। मार्कंडेय का पाठ इन देवताओं को विश्वेदेव कहता है, और यहाँ वही लिया गया है। पाँचों बेटों के नाम महाभारत की परंपरा के हैं। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।
स्रोत: ऐतरेय ब्राह्मण, मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत से, सब कुछ, फिर उससे भी ज़्यादा