
अध्याय २
वरुण का वचन
सौ रानियों वाला राजा, जिसने बेटे के बदले एक देवता को वचन दे दिया — और फिर उस वचन के डर से उसी बेटे को जंगल भागना पड़ा
बिना बेटे का राजा
इक्ष्वाकु वंश के राजा हरिश्चंद्र की सौ रानियाँ थीं, और एक भी बेटा नहीं था। सौ महलों में एक बच्चे की किलकारी कहीं नहीं थी।
तब नारद ने उन्हें राह सुझाई। वरुण से बेटा माँगो, उन्होंने कहा, और वचन दो कि बेटा हुआ तो उसी को वरुण को अर्पित कर दोगे।
राजा ने वैसा ही किया। और उनके यहाँ बेटा जन्मा — रोहित।
वरुण की माँग
वरुण आ पहुँचे। "बेटा हुआ है," उन्होंने कहा। "अब यज्ञ करो, और उसे मुझे अर्पित करो।"
राजा टालने लगे। पशु दस दिन का होने के बाद ही यज्ञ के योग्य होता है, उन्होंने कहा; पहले उसके दाँत निकल आने दीजिए। दाँत निकले, तो बोले: अब उन्हें गिर जाने दीजिए। दाँत गिरे, तो कहा: अब नए निकलने दीजिए। नए निकले, तो कहा: अब यह क्षत्रिय बने, शस्त्र उठाना सीखे।
आख़िर वरुण का धैर्य टूट गया। उन्होंने राजा को जलोदर से जकड़ दिया — पेट फूल जाने की ऐसी बीमारी, जो वचन तोड़ने की सज़ा थी।
जंगल के छह साल
रोहित को यह सब पता चल गया। वह बड़ा हो चुका था, और उसने पिता की बात मानने से इनकार कर दिया। धनुष उठाया, और जंगल की ओर निकल पड़ा।
फिर छह साल वह वन-वन भटकता रहा। हर साल, जब वह घर लौटने की सोचता, इंद्र एक ब्राह्मण के वेश में उसके रास्ते में आ खड़े होते।
"चलते रहो," वे कहते। "जो बैठा है, उसका सौभाग्य भी बैठा रहता है। जो खड़ा होता है, उसका खड़ा होता है। जो सोया है, उसका सो जाता है। और जो चलता है, उसका सौभाग्य भी चल पड़ता है। इसलिए चलते रहो।"
यही "चरैवेति, चरैवेति" वाली पंक्तियाँ हैं, जो आज भी उद्धृत की जाती हैं।
तीन बार सौ गायें
छठे साल रोहित की भेंट अजीगर्त ऋषि से हुई, जो गरीबी से टूट चुके थे और जिनके तीन बेटे थे।
रोहित ने उनसे कहा: मुझे अपना एक बेटा दे दीजिए, मेरी जगह बलि के लिए। बदले में सौ गायें।
पिता बड़े बेटे को देना नहीं चाहते थे। माँ छोटे को नहीं छोड़ सकती थी। इसलिए बीच का बेटा चुना गया — शुनःशेप। अजीगर्त ने सौ गायें लीं और अपना बेटा सौंप दिया।
यज्ञ शुरू हुआ। पुरोहितों में विश्वामित्र भी थे। पर शुनःशेप को यूप से बाँधने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। तब अजीगर्त ने कहा: और सौ गायें दो, मैं ख़ुद बाँध देता हूँ। उसने बाँध दिया।
फिर बलि देने के लिए कोई हाथ नहीं उठा। अजीगर्त ने कहा: और सौ गायें दो, मैं ख़ुद मार दूँगा। एक पिता, तीन बार, गायों के बदले।
उषा की ऋचाएँ
शुनःशेप ने प्रार्थना शुरू की। उसने एक-एक देवता की स्तुति की, और अंत में उषा की, प्रभात की देवी की।
मंत्रों के साथ उसके बंधन ढीले पड़ते गए और हरिश्चंद्र का रोग भी घटता गया। अंतिम उषा-स्तुति तक शुनःशेप पूरी तरह मुक्त हो गया, और हरिश्चंद्र रोगमुक्त।
विश्वामित्र ने उस लड़के को अपना बेटा बना लिया और उसका नाम रखा देवरात — देवों का दिया हुआ। उनके सौ बेटों में से जो बड़े थे, उनमें से कुछ ने इस नए बड़े भाई को मानने से इनकार कर दिया, और वे शापित हुए।
रामायण के बालकांड में इसी कथा का एक और रूप है। वहाँ राजा हरिश्चंद्र नहीं, अंबरीष हैं, और पिता अजीगर्त नहीं, ऋचीक हैं। यह एक ही कथा की अलग-अलग परंपराएँ हैं, इसलिए इसे हरिश्चंद्र की कथा से गड्डमड्ड न करें।
टिप्पणी: यह कथा ऐतरेय ब्राह्मण (७.१३–१८) की है, जिसे राजसूय यज्ञ में सुनाए जाने की परंपरा बताई जाती है; रोहित की भटकन के चरैवेति-श्लोक ७.१५ के आसपास हैं। पुरोहितों में विश्वामित्र का नाम ग्रंथ में आता है। ग्रंथ के अंत में विश्वामित्र के शापित पुत्रों को कुछ जन-समूहों का पूर्वज बताया गया है; यह एक जाति-उत्पत्ति की कथा है जो जीवित समुदायों का नाम लेती है, इसलिए इस साइट ने उसे नहीं दोहराया। रामायण (बालकांड) में इसी विषय की एक और परंपरा है, जिसमें राजा अंबरीष हैं, पिता ऋचीक हैं और लड़का ख़ुद जाने को राज़ी होता है — उसे यहाँ हरिश्चंद्र की कथा में नहीं मिलाया गया है। इस कथा में मानव-बलि की माँग है, और बलि पूरी नहीं होती; कथा इसी पर ख़त्म होती है।
स्रोत: ऐतरेय ब्राह्मण, मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत से, वरुण का वचन