
अध्याय १०
कौए, उल्लू और नीति
बूढ़े कौए ने अपने ही पंख नुचवाए, दुश्मन उल्लुओं के बीच जा बैठा — और उन्हें उन्हीं की गुफा में बंद करवा दिया
कौए, उल्लू और नीति — कथासरित्सागर का अध्याय १०। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 10 (शक्तियशस), तरंग 62 (कथा 121–131)। इसमें ५ दृश्य हैं — गोमुख की रात की कहानी; तेंदुए की खाल में गधा; पंछियों का राजा कौन; मेघवर्ण का दाँव; मूर्खों की छोटी-छोटी कथाएँ — और अंत में १० सवाल।
गोमुख की रात की कहानी
राजकुमार नरवाहनदत्त अपनी प्रिय शक्तियशा से बिछड़कर उदास था। उसके मंत्री गोमुख ने, जो उसके साथ ही पले-बढ़े थे, उस रात उसका मन बहलाने के लिए एक कथा छेड़ी। यह कथा पंचतंत्र के तीसरे भाग जैसी है। (सोमदेव के समय पंचतंत्र की कथाएँ पहले से घूम रही थीं, और वे उन्हें अपने ढंग से दोहराते हैं।)
एक जगह घना बरगद का पेड़ था, जिसकी डालियों पर पंछियों की आवाज़ें ऐसी गूँजती थीं मानो वह थके राहियों को छाँव में बुला रहा हो। वहाँ कौओं का राजा मेघवर्ण रहता था। उसका पुराना दुश्मन था उल्लुओं का राजा अवमर्द। एक रात अवमर्द ने अचानक आकर बहुत-से कौओं को मार डाला और मेघवर्ण को हराकर चला गया। सुबह मेघवर्ण ने अपने मंत्रियों को बुलाकर कहा, 'वह ताक़तवर दुश्मन सैकड़ों सैनिक जुटाकर फिर आ सकता है। कोई उपाय सोचो।'
पाँच मंत्रियों ने पाँच बातें कहीं। किसी ने कहा कि बलवान से लड़ने के बजाय देश छोड़ दो या सुलह कर लो। किसी ने कहा कि अभी ख़तरा सामने नहीं है, पहले दुश्मन की ताक़त और अपनी ताक़त तौल लो। किसी ने कहा कि झुकने से मरना भला है, चलकर लड़ेंगे। किसी ने कहा कि सुलह करके मौक़े की ताक में रहो। सबसे बूढ़े मंत्री चिरंजीवी ने कहा, 'सुलह किससे? दूत बनकर कौन जाएगा? कौओं और उल्लुओं की दुश्मनी तो पुरानी है। यह काम नीति से होगा, क्योंकि कहते हैं कि नीति साम्राज्यों की जड़ है।'
राजा ने कहा, 'तुम बूढ़े हो, पहले यह बताओ कि इस दुश्मनी की शुरुआत कैसे हुई। नीति बाद में सुनाना।' चिरंजीवी बोला, 'यह एक बिना सोचे कही गई बात से शुरू हुई। गधे की कहानी सुनिए।'
तेंदुए की खाल में गधा
एक धोबी का गधा दुबला था। उसे मोटा करने के लिए धोबी उस पर तेंदुए की खाल डालकर पड़ोसी के खेत में चरने छोड़ देता। लोग उसे तेंदुआ समझकर डर के मारे भगाते नहीं थे। एक दिन धनुष लिए एक किसान ने उसे देखा। उसने सोचा, 'तेंदुआ है।' वह डर से कमर झुकाकर, चादर ओढ़कर चुपचाप खिसकने लगा। गधे ने उसे झुका हुआ देखा तो समझा कोई दूसरा गधा है, और दाने से मस्त होकर वह ज़ोर से रेंक उठा। किसान समझ गया कि यह गधा है। उसने लौटकर तीर से उसे मार डाला। उस मूर्ख को उसकी अपनी आवाज़ ने ही मरवाया।
चिरंजीवी ने कहा, 'हमारी उल्लुओं से दुश्मनी भी ऐसी ही एक अनजाने में कही बात से हुई।'
पंछियों का राजा कौन
एक बार पंछियों का कोई राजा नहीं था। सब इकट्ठे हुए और छत्र-चँवर लेकर उल्लू का राजतिलक करने चले। तभी ऊपर उड़ता एक कौआ यह देखकर बोला, 'अरे मूर्खो, क्या कोयल जैसे और पंछी नहीं हैं? इस क्रूर आँखों वाले, अशुभ चेहरे के दुष्ट पंछी को राजा बनाओगे? उसे राजा बनाओ जिसका नाम सुनकर कल्याण हो। मैं एक कथा सुनाता हूँ।'
हाथी और ख़रगोश। चंद्रसर नाम की एक बड़ी झील थी, जिसके किनारे ख़रगोशों का राजा शिलीमुख रहता था। सूखे के दिनों में चतुर्दंत नाम का हाथियों का मुखिया अपने झुंड के साथ वहाँ पानी पीने आया, और झील में उतरते हुए झुंड के पैरों तले बहुत-से ख़रगोश कुचले गए। शिलीमुख ने विजय नाम के एक चतुर ख़रगोश को भेजा, 'जाओ, हाथी से मिलकर कोई उपाय निकालो।'
विजय हाथी के पीछे-पीछे चलकर एक चट्टान पर चढ़ा और बोला, 'मैं चंद्रमा का दूत हूँ। देवता ने तुम्हें कहलाया है कि मैं चंद्रसर में रहता हूँ, वहाँ के ख़रगोश मेरे प्यारे हैं (इसी से लोग मुझे शशांक, यानी ख़रगोश-चिह्न वाला कहते हैं)। तुमने उस झील को गंदा किया और मेरे ख़रगोशों को मारा। फिर ऐसा किया तो तुम्हें इसका फल भुगतना पड़ेगा।' हाथी डर गया और बोला, 'मैं फिर ऐसा नहीं करूँगा। मुझे चंद्रदेव का आदर करना है।' विजय उसे झील पर ले गया और पानी में चाँद की परछाईं दिखाई। हाथी ने दूर से ही डरते हुए उसे प्रणाम किया और फिर कभी वहाँ नहीं गया।
पंछी, ख़रगोश और बिल्ली। कौए ने आगे कहा, 'ओछे का भरोसा नहीं करना चाहिए। मैं एक पेड़ पर रहता था, और नीचे उसी पेड़ में कपिंजल नाम के एक पंछी का घोंसला था। वह कई दिनों के लिए कहीं चला गया तो एक ख़रगोश आकर उसके घोंसले में बस गया। लौटने पर दोनों झगड़ने लगे, "यह मेरा है!" "नहीं, मेरा!" वे किसी जानकार पंच की खोज में निकले। मैं भी जिज्ञासा से छिपकर पीछे चला। झील के किनारे एक बिल्ली थी, जो हिंसा त्यागने का ढोंग करके आँखें मूँदे ध्यान में बैठी थी। दोनों ने कहा, "महात्मा जी, हमारा न्याय कीजिए।" बिल्ली धीमी आवाज़ में बोली, "तपस्या से कमज़ोर हो गई हूँ, कान पास लाकर बोलो। ग़लत फ़ैसला करने से लोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं।" जैसे ही वे उसके सामने पहुँचे, उस नीच ने एक ही झपट्टे में दोनों को मार डाला।' यह सुनकर पंछियों ने उल्लू को राजा बनाने का विचार छोड़ दिया और सब उड़ गए। उल्लू ने कौए से कहा, 'आज से तेरी-मेरी दुश्मनी।' कौए ने जो कहा था, ठीक कहा था, पर वह सोचता रह गया कि एक बात कहकर उसने ख़तरनाक झगड़ा मोल ले लिया।
मेघवर्ण का दाँव
चिरंजीवी ने राजा से कहा, 'उल्लू गिनती में बहुत हैं और ताक़तवर हैं। जहाँ गिनती भारी हो, वहाँ अकेला क्या करे? एक कथा सुनिए।'
ब्राह्मण, बकरा और ठग। एक ब्राह्मण बकरा ख़रीदकर उसे कंधे पर रखे गाँव से लौट रहा था। कुछ ठगों ने उसे देखा और बकरा हथियाना चाहा। एक ठग सामने आकर बोला, 'ब्राह्मण देवता, कुत्ता कंधे पर क्यों उठाए हो? उतारो।' ब्राह्मण ने ध्यान नहीं दिया। फिर दो और ठगों ने यही कहा। उसे शक होने लगा। तीन और ठग आए और बोले, 'जनेऊ भी पहने हो और कुत्ता भी ढो रहे हो? लगता है तुम शिकारी हो।' ब्राह्मण बोला, 'शायद कोई भूत मेरी आँखों पर परदा डाल रहा है, तभी सब ग़लत देख रहे हैं।' उसने बकरा फेंक दिया और नहाने चला गया। ठगों ने बकरा उठाकर दावत उड़ा ली।
चिरंजीवी बोला, 'महाराज, अब मेरी बात मानिए। मेरे कुछ पंख नोचकर मुझे इसी पेड़ के नीचे पटककर पहाड़ पर चले जाइए, जब तक मैं अपना काम पूरा करके लौटूँ।' राजा ने ग़ुस्से का दिखावा करके उसके पंख नोचे, उसे पेड़ के नीचे डाल दिया और अपने झुंड के साथ पहाड़ चला गया।
रात को उल्लुओं का राजा अवमर्द अपने दल के साथ आया। पेड़ पर कोई कौआ नहीं था। तभी चिरंजीवी ने नीचे से कमज़ोर आवाज़ में काँव किया। अवमर्द ने नीचे उतरकर उसे देखा और पूछा कि तू कौन है और यह हाल क्यों है। चिरंजीवी बोला, 'मैं कौओं के राजा का मंत्री चिरंजीवी हूँ। राजा आप पर हमला करना चाहता था। मैंने मना किया, कहा कि बलवान उल्लू राजा से सुलह कीजिए। उसने ग़ुस्से में कहा कि यह तो दुश्मन का पक्षधर है, और उसने और उसके दल ने मुझे चोंच मारकर यह हाल कर दिया।' यह कहकर उसने आह भरी और ज़मीन की ओर मुँह कर लिया।
अवमर्द ने अपने मंत्रियों से पूछा कि इसका क्या किया जाए। पहले मंत्री दीप्तनयन ने कहा, 'भले लोग चोर को भी छोड़ देते हैं, अगर वह उपकारी निकले।' और उसने एक बूढ़े व्यापारी की कथा सुनाई, जिसकी जवान पत्नी उससे विमुख थी। रात में घर में चोर घुसा तो डरकर वह पति से लिपट गई, और व्यापारी ने इसे अपना सौभाग्य मानकर चोर को माफ़ करके जाने दिया। दूसरे मंत्री वक्रनास ने कहा, 'इसे रहने दें। यह दुश्मन के भेद जानता है, और दुश्मन के राजा और मंत्री का झगड़ा हमारे फ़ायदे का है।' और उसने उस ब्राह्मण की कथा सुनाई जिसकी दो गायें एक चोर चुराना चाहता था और जिसे राक्षस खाना चाहता था। दोनों रास्ते में मिले और झगड़ने लगे कि पहले कौन। झगड़े से ब्राह्मण जाग गया, उसने तलवार उठाई और मंत्र पढ़ा, और दोनों भाग गए। तीसरे और चौथे मंत्री प्राकारकर्ण और क्रूरलोचन ने भी कहा कि शरण में आए का साथ देना चाहिए, जैसे पुराने समय में राजा शिबि ने शरणागत को अपना मांस दिया था।
पाँचवें मंत्री रक्ताक्ष ने विरोध किया। 'राजन्, इन मंत्रियों ने अनीति की सलाह देकर आपको बर्बाद करने की ठानी है। जो नीति जानते हैं वे जन्मजात दुश्मन पर भरोसा नहीं करते।' उसने चेताया कि मूर्ख मीठी बातों से बहल जाता है। 'यह सच है कि कोई अपराध आँखों के सामने हो तब भी चापलूसी से बहलने वाला हँसी का पात्र बनता है।' पर अवमर्द ने उसकी बात नहीं मानी।
चिरंजीवी ने राजा से कहा, 'मेरा अब जीना क्या? मुझे लकड़ियाँ मँगवा दीजिए, मैं आग में कूद जाऊँगा और अग्नि से वरदान माँगूँगा कि अगले जन्म में उल्लू बनूँ और कौओं के राजा से बदला लूँ।' रक्ताक्ष हँसा, 'तुम्हें आग की क्या ज़रूरत? और जब तक तुम्हारा स्वभाव कौए का है, तुम उल्लू नहीं बनोगे। हर प्राणी वैसा ही रहता है जैसा विधाता ने उसे बनाया है।' और उसने चुहिया की कथा कही।
चुहिया से बनी कन्या। एक ऋषि को चील के पंजे से छूटी एक नन्ही चुहिया मिली। दया करके उन्होंने तपोबल से उसे कन्या बना दिया और अपने आश्रम में पाला। बड़ी होने पर किसी बलवान वर से उसका ब्याह करने के लिए उन्होंने सूर्य को बुलाया। सूर्य बोला, 'बादल मुझसे बलवान है, वह मुझे पल में ढक देता है।' बादल ने कहा, 'हवा मुझसे बलवान है, जो चाहे दिशा में उड़ा देती है।' हवा ने कहा, 'पहाड़ मुझसे बलवान है, मैं उसे हिला नहीं सकती।' हिमालय ने कहा, 'चूहे मुझसे बलवान हैं, वे मुझमें बिल खोद देते हैं।' तब ऋषि ने एक जंगली चूहे को बुलाकर कहा, 'इससे ब्याह कर लो।' चूहे ने कहा, 'पहले बताइए कि यह मेरे बिल में कैसे घुसेगी।' ऋषि ने कहा, 'तब इसे फिर चुहिया ही बना देना ठीक है', और उसे चुहिया बनाकर चूहे को दे दिया। रक्ताक्ष ने कहा, 'हर प्राणी लंबी भटकन के बाद अपने स्वभाव पर लौट आता है। इसलिए चिरंजीवी कभी उल्लू नहीं बनेगा।'
यह सुनकर चिरंजीवी ने मन में सोचा, 'राजा ने इस नीति-कुशल मंत्री की बात नहीं मानी। बाक़ी सब मूर्ख हैं, मेरा काम बन गया।'
अवमर्द रक्ताक्ष की सलाह दरकिनार करके चिरंजीवी को अपने क़िले की गुफा में ले गया। वहाँ मांस और तरह-तरह के टुकड़े खिला-खिलाकर उसने उसे जल्दी ही मोर जैसे चमकीले पंखों वाला बना दिया।
एक दिन चिरंजीवी ने उल्लू-राजा से कहा, 'महाराज, मैं जाकर कौओं के राजा को हिम्मत बँधाता हूँ और उसे यहाँ ले आता हूँ, ताकि आप आज रात उस पर हमला करके उसे मार सकें और मैं आपके उपकार का बदला चुका सकूँ। आप सब गुफा में रहिए और दरवाज़े और रास्ते पर घास-पत्ते लगा लीजिए, ताकि दिन में वे आपके घोंसलों पर हमला न कर सकें।' उल्लू ऐसा करके गुफा में चले गए। चिरंजीवी लौटकर मेघवर्ण के पास आया, और अब कौओं का पूरा दल आया। चिरंजीवी की चोंच में चिता से उठा जलता हुआ अंगारा था, और हर कौए की चोंच में एक-एक जलती लकड़ी। उन्होंने घास-पत्तों से ढके दरवाज़े पर आग डाल दी। दिन में अंधे उल्लू गुफा में ही जल गए, राजा समेत। मेघवर्ण ने विजय के बाद अपने बरगद पर लौटकर चिरंजीवी का बहुत सम्मान किया।
चिरंजीवी ने राजा को सीख दी, 'इसीलिए, महाराज, दुश्मन के एक ही अच्छे मंत्री रक्ताक्ष की बात राजा ने नहीं मानी, और भरोसे के नशे में वह मारा गया।' उसने साँप और मेंढकों की कथा भी सुनाई: एक बूढ़ा साँप तालाब के किनारे मेंढकों को पकड़ नहीं पाता था, तो वह चुपचाप बैठ गया। मेंढकों ने पूछा तो उसने कहा कि भूल से मैंने एक ब्राह्मण-पुत्र को काट लिया, उसके पिता ने मुझे शाप दिया कि अब मैं मेंढकों को ढोऊँगा, खाऊँगा नहीं। मेंढकों का राजा उसकी पीठ पर चढ़कर घूमने का शौक़ीन हो गया। फिर साँप ने थकने का बहाना किया, 'बिना खाए एक क़दम नहीं चल सकता।' राजा मेंढक ने कहा, 'तो मेरे दो-चार लोग खा लो।' साँप ने एक-एक करके सब खा डाले, और राजा मेंढक गर्व में अंधा बना देखता रहा।
चिरंजीवी बोला, 'इस तरह चतुर मूर्ख को भरोसे में लेकर चौपट कर देता है। जो राजा नीति जानता है और संयमी है, लक्ष्मी उससे रस्सी से बँधी-सी चिपकी रहती है, बाक़ी के लिए वह जुए की तरह धोखा देती है।' मेघवर्ण ने उसकी सलाह मानकर निष्कंटक राज किया।
मूर्खों की छोटी-छोटी कथाएँ
कथा पूरी होने पर गोमुख ने राजकुमार से कहा, 'देखिए, पशु भी विवेक से राज करते हैं, और बिना विवेक वाले हमेशा हँसी के पात्र बनते हैं। जैसे ये मूर्ख।' और उसने कुछ छोटी कथाएँ छेड़ीं।
धन बाँटने वाले दो भाई। मालव देश में दो ब्राह्मण भाई पिता की संपत्ति बाँट रहे थे और झगड़ पड़े कि मुझे कम मिला, उसे ज़्यादा। उन्होंने एक वेदज्ञ गुरु को पंच बनाया। गुरु ने कहा, 'हर चीज़ को बराबर दो हिस्सों में बाँट लो।' दोनों मूर्खों ने मकान, खाट, सब कुछ आधा-आधा काटा-बाँटा, यहाँ तक कि गाय-बैल भी। राजा को पता चला तो उसने उनकी सारी संपत्ति ज़ब्त करवा दी। (पाठ में एक दासी को भी काटने की बात है; यहाँ उसे छोड़ दिया गया है।)
संतोष का पाठ। कुछ घुमक्कड़ भिक्षुक भिक्षा में जो मिलता उसी से संतुष्ट होकर मोटे हो गए थे। एक आदमी ने दोस्तों से शर्त लगाई कि मैं इन्हें दुबला कर दूँगा, जबकि ये वही खाएँगे जो पहले खाते थे। उसने एक दिन सबको बुलाकर छहों रसों वाला उम्दा भोजन खिलाया। उसके बाद स्वाद याद करके भिक्षुकों को भिक्षा का सादा खाना रुचा ही नहीं, और वे दुबले हो गए। उस आदमी ने दोस्तों से कहा कि जो सुख चाहे उसे संतोष में मन टिकाना चाहिए, क्योंकि असंतोष दोनों लोकों में दुख देता है।
पानी में सोना। एक जवान तालाब पर पानी पीने गया तो पानी में पेड़ पर बैठे एक सुनहरी कलगी वाले पंछी की परछाईं देखी। उसे सोना समझकर वह बार-बार पानी में कूदा, पर हाथ कुछ न आया। पिता ने आकर पंछी को उड़ा दिया, परछाईं मिट गई, और उसे समझाकर घर ले गया।
संदूकों का चमड़ा। व्यापारी का ऊँट बोझ से बैठ गया। वह दूसरा ऊँट लेने गया, और नौकरों से कहा कि बारिश आए तो संदूकों का चमड़ा गीला न होने देना, उनमें कपड़े भरे हैं। बादल बरसा तो मूर्ख नौकरों ने संदूकों से कपड़े निकालकर चमड़े पर लपेट दिए। कपड़े बर्बाद हो गए। व्यापारी ने लौटकर कहा, 'मैंने चमड़े के लिए नहीं, कपड़ों के लिए कहा था।' उसने नौकरों का सारा धन जुर्माने में ले लिया।
सातवाँ पुआ। एक यात्री ने एक पण में आठ पुए ख़रीदे। छह खाने पर भी भूख नहीं मिटी, सातवें से मिट गई। वह रोने लगा, 'मैंने सातवाँ ही पहले क्यों नहीं खाया? बाक़ी छह बेकार गए!' लोग उसकी मूर्खता पर हँसे।
दरवाज़े की रखवाली। व्यापारी ने नौकर से कहा, 'दुकान के दरवाज़े का ध्यान रखना, मैं अभी आता हूँ।' नौकर दरवाज़ा कंधे पर उठाकर नाटक देखने चल दिया। मालिक ने डाँटा तो वह बोला, 'आपने दरवाज़ा सँभालने को कहा था, मैंने सँभाला।'
भैंस खाने वाले गाँव वाले। कुछ गाँव वालों ने एक आदमी की भैंस बरगद के नीचे मारकर खा ली। मालिक ने राजा से शिकायत की, कि गाँव के पूरब में तालाब के पास बरगद के नीचे, अष्टमी के दिन, मेरी आँखों के सामने मेरी भैंस खाई गई। एक बूढ़े मूर्ख ने कहा, 'हमारे गाँव में न तालाब है, न बरगद, न पूरब, न अष्टमी।' राजा हँसा और बोला, 'तुम सच्चे आदमी हो। बताओ, भैंस खाई कि नहीं?' वह बोला, 'पिता की मृत्यु के तीन साल बाद मेरा जन्म हुआ, और उन्होंने मुझे बोलना सिखाया है। मैं झूठ नहीं बोलता, महाराज। भैंस हमने खाई, बाक़ी सब झूठ है।' राजा और दरबारी हँसी रोक न सके। राजा ने मालिक को भैंस की क़ीमत दिलवाई और गाँव वालों पर जुर्माना लगाया।
वैद्य और कुबड़ा। एक ब्राह्मण ने एक अनाड़ी वैद्य से कहा कि मेरे बेटे का कूबड़ ठीक कर दो। वैद्य ने शर्त लगाई: दस पण दो, और असफल रहूँ तो सौ पण दूँगा। उसने कुबड़े को सेंक-सेंककर तकलीफ़ दी, पर कूबड़ नहीं गया, और उसे सौ पण भरने पड़े।
सुबह तक की ये कहानियाँ सुनकर नरवाहनदत्त गोमुख से बहुत प्रसन्न हुआ। शक्तियशा की याद में वह दुखी था, पर कहानियों के सुख से उसे नींद आ गई, और वह अपने साथ पले मंत्रियों से घिरा सोया।
टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 10, तरंग 62, कथा 121–131) से सीधे लिखा गया है। कौओं और उल्लुओं का युद्ध पंचतंत्र के तीसरे भाग (काकोलूकीय) में भी आता है; कथासरित्सागर पंचतंत्र से बाद का ग्रंथ है, इसलिए सोमदेव ने उसे अपने ढंग से दोहराया है, उलटा नहीं। कथा 121 की बढ़ई और उसकी पत्नी वाली एक भीतरी कथा, और दो भाइयों की कथा में दासी को काटने का ब्योरा, जान-बूझकर छोड़े गए हैं। उल्लुओं को जलाना जानवरों की कथा है, किसी जाति या समुदाय के बारे में नहीं। 'ढोंगी बिल्ली', 'ठग' और 'मूर्ख' जैसे विशेषण पात्रों के लिए हैं, किसी समुदाय के लिए नहीं।
स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, कौए, उल्लू और नीति