मृगांकदत्त की खोज — कथासरित्सागर, चित्र

अध्याय ११

मृगांकदत्त की खोज

सपने में मिली राजकुमारी की खोज में निकला राजकुमार, साँप के शाप से बिछड़े दस मंत्री — और उज्जयिनी के मंदिर में एक रात

मृगांकदत्त की खोज — कथासरित्सागर का अध्याय ११। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 12 (शशांकवती), तरंग 69–74, 100–103 (कथा 163)। इसमें ८ दृश्य हैं — दो सपने; नीति की एक कथा, और भाग्य की एक कथा; जब बेटा देश से निकाला गया; सूखा पेड़, और साँप का शाप; एक-एक कर बिछड़े मिले; संधि का प्रस्ताव और युद्ध; गौरी के मंदिर की रात; ससुर का संदेश, और विवाह — और अंत में १० सवाल।

दो सपने

पिछले अध्यायों में बेताल की कथाएँ जिस मृगांकदत्त की कहानी के भीतर कही गईं, अब उसकी अपनी कथा। अयोध्या के राजा अमरदत्त और रानी सुरतप्रभा का एक बेटा था, मृगांकदत्त, जिसके गुणों की सब सराहना करते थे। उसके दस मंत्री थे, सब उसी की उम्र के, वीर और बुद्धिमान: प्रचंडशक्ति, स्थूलबाहु, विक्रमकेसरी, दृढ़मुष्टि, मेघबल, भीमपराक्रम, विमलबुद्धि, व्याघ्रसेन, गुणाकर और दसवाँ विचित्रकथ। वह उनके साथ सुख से रहता था, पर उसे अपने योग्य पत्नी नहीं मिली थी।

एक दिन भीमपराक्रम ने उसे अकेले में बताया, 'कल रात महल की छत पर सोते हुए मैंने सपना देखा कि एक सिंह मुझ पर झपट रहा है। मैं तलवार लेकर उठा तो वह भागा। मैंने उसका पीछा किया। वह नदी पार करके मुँह चिढ़ाकर लंबी जीभ निकालने लगा तो मैंने तलवार से जीभ काट दी। वह जीभ पुल बन गई और मैं उससे नदी पार कर गया। तभी सिंह एक विकराल दानव बन गया। उसने कहा, "मैं बेताल हूँ, और तेरी वीरता से प्रसन्न हूँ।" मैंने पूछा, "मेरे स्वामी मृगांकदत्त की पत्नी कौन होगी?" बेताल ने कहा, "उज्जयिनी में राजा कर्मसेन की बेटी शशांकवती है, जिसकी सुंदरता अप्सराओं से भी बढ़कर है। वही उसकी पत्नी होगी, और उसे पाकर वह पूरी पृथ्वी का राजा बनेगा।"'

मृगांकदत्त ने सब मंत्रियों को बुलाकर यह बताया, और कहा, 'मैंने भी एक सपना देखा। हम सब एक जंगल में प्यास से भटकते पानी तक पहुँचे तो पाँच हथियारबंद आदमी हमें पीने से रोकने उठे। हमने उन्हें मार डाला, पर फिर न वे थे, न पानी। हम बहुत दुखी थे कि अचानक नंदी पर सवार, माथे पर चाँद लिए, शिव आ गए। हमने उन्हें प्रणाम किया तो उन्होंने दाईं आँख से एक आँसू गिराया। वह एक समुद्र बन गया। मैंने उसमें से मोतियों का हार निकालकर गले में पहना, और उस समुद्र को ख़ून लगी एक खोपड़ी में भरकर पी लिया। तभी मेरी आँख खुल गई।' विमलबुद्धि ने कहा, 'शिव ने आप पर कृपा की है। हार पाना और समुद्र पीना कहता है कि आप शशांकवती को पाएँगे और धरती पर राज करेंगे। बाक़ी सपना बताता है कि बीच में थोड़ी विपत्ति भी आएगी।'

नीति की एक कथा, और भाग्य की एक कथा

मृगांकदत्त ने कहा, 'सपना तो अपनी जगह है, पर कर्मसेन अपनी सेना और क़िलों के भरोसे है। मुझे नीति से शशांकवती को पाना होगा। नीति सबसे बड़ा साधन है।' और उसने मंत्री मंत्रगुप्त की कथा सुनाई।

मगध के राजा भद्रबाहु को वाराणसी के राजा धर्मगोप की बेटी अनंगलीला से ब्याह करना था, पर धर्मगोप शत्रुता के कारण नहीं मानता था और उसके पास भद्रदंत नाम का बलवान हाथी था। मंत्री मंत्रगुप्त ने कहा, 'सफलता वीरता से नहीं, नीति से मिलती है।' वह पाशुपत संन्यासी का वेश बनाकर अपने कुछ साथियों के साथ वाराणसी गया और अपनी सिद्धि की चर्चा फैला दी। हाथियों के रखवाले की भागी हुई पत्नी और चुराया हुआ धन उसने रहस्य से बताकर वापस दिलाया, इस तरह उसका भरोसा जीत लिया। फिर रखवाले की दी हुई दावत में वह हाथियों के बाड़े में रुका और एक बाँस की नली में छिपाकर लाया गया साँप रात में भद्रदंत के कान में छोड़ दिया। हाथी मर गया। सबसे बड़े सहारे के जाते ही धर्मगोप ने अनंगलीला भद्रबाहु को दे दी। मृगांकदत्त ने कहा, 'इसी तरह मैं भी बुद्धि से शशांकवती को पाऊँगा।'

विचित्रकथ ने उत्तर दिया, 'शिव की कृपा से आपके सपने सफल होंगे। देवों की कृपा से कठिन काम भी बन जाते हैं।' और उसने तक्षशिला के राजा पुष्कराक्ष की कथा सुनाई, जिसे पिछले जन्म के पुण्य से हंसिनी से जन्मी राजकुमारी विनयवती पत्नी के रूप में मिली। मृगांकदत्त को उसमें हौसला मिला, और वह अपने मंत्रियों के साथ उज्जयिनी जाने को तैयार हो गया।

जब बेटा देश से निकाला गया

वे पाशुपत साधुओं का वेश बनाकर चुपचाप निकलने की योजना बना रहे थे। भीमपराक्रम ने डंडे, खोपड़ियाँ और बाक़ी सामान घर में जमा कर लिया। राजा के प्रधान मंत्री को जासूस से यह पता चल गया। उसी समय एक छोटी-सी घटना हुई। महल की छत पर टहलते मृगांकदत्त ने पान की पीक थूकी, जो नीचे चल रहे उस मंत्री के सिर पर गिरी। राजकुमार ने उसे देखा नहीं था, पर मंत्री ने सब जान लिया और अपमान को मन में गाँठ बाँधकर रख लिया।

अगले दिन राजा को हैज़ा हो गया। मौक़ा देखकर मंत्री ने अभय का वचन माँगकर राजा से कहा, 'महाराज, राजकुमार भीमपराक्रम के घर में आपके विरुद्ध तांत्रिक अनुष्ठान कर रहे हैं, इसीलिए आप बीमार हैं। उन्हें देश निकाला दीजिए, तभी बीमारी जाएगी।' राजा ने सेनापति को भेजा। सेनापति को भीमपराक्रम के घर में खोपड़ियाँ और बाक़ी सामान मिला। राजा ने क्रोध में आदेश दिया कि बेटे को मंत्रियों सहित तुरंत राज्य से निकाल दो। विश्वास करने वाला राजा दुष्ट मंत्रियों की चालें नहीं देख पाता। मृगांकदत्त ने गणेश की पूजा की, मन ही मन माता-पिता को प्रणाम किया, और अपने दसों मंत्रियों के साथ चल पड़ा। उसे इस निकाले जाने से उलटे प्रसन्नता हुई, क्योंकि अब वह शशांकवती की खोज में निकल सकता था।

सूखा पेड़, और साँप का शाप

चलते-चलते वे एक निर्जल जंगल में पहुँचे। बहुत खोजने पर एक तालाब मिला, जिसके किनारे एक सूखा पेड़ खड़ा था। रात उन्होंने उसी के नीचे बिताई। आधी रात को चाँद की रोशनी में मृगांकदत्त की आँख खुली तो उसने देखा कि वह सूखा पेड़ पहले हरे पत्तों से भर गया, फिर फूलों से, फिर फलों से। उसने मंत्रियों को जगाया। भूखे सबने मीठे फल खाए, और फल खाते ही पेड़ एक ब्राह्मण युवक बन गया।

उसने बताया, 'मैं श्रुतधि हूँ, अयोध्या के ब्राह्मण दमधि का बेटा। अकाल में मेरे पिता मुझे लेकर भटकते-भटकते यहाँ पहुँचे, भूख से अधमरे। किसी ने उन्हें पाँच फल दिए। उन्होंने तीन मुझे दिए और दो अपने लिए रखे, फिर नहाने गए। मैं भूख के मारे पाँचों खा गया, और सोने का बहाना करके लेट गया। लौटकर पिता ने मुझे निश्चल लेटा देखकर शाप दिया, "सूखा पेड़ बन जा। चाँदनी रात में तुझ पर फूल-फल आएँगे, और जब तू अतिथियों को फल खिला देगा, तब तू शाप से छूटेगा।" आपने मेरे फल खाए, इसलिए मैं छूट गया।' श्रुतधि का अब कोई नहीं था। वह नीति-शास्त्र का जानकार था, इसलिए मृगांकदत्त की सेवा में आ गया।

आगे वे एक वन में पाँच जटाधारी पुरुषों से मिले, जो काशी के ग्वाले ब्राह्मण थे। उन्होंने बताया कि अकाल में गायें लेकर वे यहाँ आए थे। तालाब के किनारे के पेड़ों के तीन तरह के फल उसके पानी में घुलते थे, और उस पानी और गायों के दूध पर रहकर वे पाँच सौ साल से इस निर्जन वन में जी रहे थे। उन्होंने मृगांकदत्त को दिन भर दूध पिलाकर आश्रम में रखा।

फिर वे किरातों के देश में पहुँचे। वहाँ राजा शक्तिरक्षित था, राजकुमार का बचपन का मित्र। उसके पिता जब युद्ध में पकड़े गए तो उसने उन्हें छुड़वाने के लिए अपने को बंधक बनाकर अयोध्या भेजा था, और पिता के बाद उसके सगे-संबंधियों के विद्रोह करने पर मृगांकदत्त के कहने पर अमरदत्त ने उसे सेना देकर पिता के सिंहासन पर बिठाया था। अब किरात राजा ने उसका बहुत सत्कार किया और ज़रूरत पड़ने पर सहायता का वचन दिया।

उज्जयिनी की ओर बढ़ते हुए उन्हें एक सुनसान जंगल में राख लगाए, मृगचर्म पहने और जटा बाँधे एक साधु मिला। उसने बताया कि वह एक तलवार खोज रहा है। पारावताक्ष नाम के एक नाग-राजा के पास 'वैदूर्यकांति' नाम की अद्भुत तलवार है, जिसे पाने वाला सिद्धों का राजा बन जाता है। उसे वीर सहायकों की ज़रूरत थी। मृगांकदत्त ने कहा, 'हम और मेरे मंत्री आपकी मदद करेंगे।'

रात में साधु ने अपने मंत्रों से नागों के घर के विघ्न दूर किए। तब अशोक के पेड़ से एक दिव्य स्त्री निकली, और उसके तिरछे कटाक्ष से साधु अपना संयम खो बैठा, उसके हाथ से आहुति का पात्र गिर गया। उसी क्षण साँप पारावताक्ष बादल की तरह भयंकर रूप में बाहर आया। साधु उसे देखकर भय से मर गया। साँप ने डरावना रूप त्यागकर मृगांकदत्त और उसके साथियों को शाप दिया, 'तुम सबने इस आदमी का साथ दिया, जो नहीं करना था, इसलिए कुछ समय तक एक-दूसरे से बिछड़े रहोगे।'

तुरंत सबकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया और कानों में कुछ सुनाई देना बंद हो गया। सब अलग-अलग दिशाओं में बहक गए, एक-दूसरे को पुकारते, ढूँढ़ते हुए। जब रात का भ्रम मिटा तो मृगांकदत्त जंगल में अकेला था।

एक-एक कर बिछड़े मिले

दो-तीन महीने बाद श्रुतधि ने उसे ढूँढ़ निकाला, और बोला, 'मैंने किसी को नहीं देखा, पर सब उज्जयिनी की ओर ही जाएँगे। चलिए वहीं चलें।' कुछ दिनों बाद विमलबुद्धि मिला, फिर और साथी। हर मिलने वाला मंत्री बीती हुई घटनाओं की अपनी-अपनी कथा कहता गया, एक कथा के भीतर दूसरी कथा।

नर्मदा तट पर राजकुमार एक बार पुलिंदों के राजा के नगर में रुका। वहीं मायावटु नाम का शबरों का राजा नदी में नहाने आया, और तीन जल-जीव उसे पकड़ ले गए। मृगांकदत्त ने तलवार लेकर पानी में उतरकर तीनों को मारा और उसे बचाया। मायावटु ने कहा, 'आज से मैं आपका सहयोगी हूँ।' मायावटु का साथी मतंगों का राजा दुर्गपिशाच भी उसके साथ आ मिला।

भीमपराक्रम ने पुलिंदों के नगर में रात को अपनी कथा सुनाई। गुणाकर घायल मिला। जब वह स्वस्थ हुआ तो एक यक्ष ने उसे बचाया था, जिसकी कथा उसने बताई। एक दिन राजकुमार ने एक पेड़ के नीचे एक आदमी को सोते देखा, जो उसका मित्र निकला। आगे एक जंगली हाथी को आदमी की तरह बोलते देखकर वह चौंका। हाथी के पास अंधा प्रचंडशक्ति बैठा था। हाथी ने कहा कि वह गंधर्व है, जिसे ऋषि के शाप से हाथी बनना पड़ा, और उसकी मुक्ति तब होगी जब वह मृगांकदत्त के किसी अंधे मंत्री प्रचंडशक्ति की सेवा करके उसे अपनी कहानी सुना देगा। वही हुआ, और दोनों शाप से छूट गए। विक्रमकेसरी कैसे लौटा, यह आप अध्याय 9 के अंत में देख चुके हैं।

सबसे आख़िर में गणेश-वृक्ष पर उसके चार बिछड़े मंत्री, व्याघ्रसेन, स्थूलबाहु, दृढ़मुष्टि और मेघबल, मिले। वे पहले ही प्यास और भूख से उस पेड़ पर चढ़कर फल बन चुके थे। वहाँ मृगांकदत्त के साथ चल रहे छह मंत्री भी फल बन गए, और उसकी तपस्या के बाद सभी दस मंत्री एक साथ अपने रूप में लौटे। एक सरोवर के तट पर वे दुख में प्राण देने जा रहे थे, तभी कण्व जैसे एक ऋषि और एक बालक तपस्वी महातपस ने उन्हें धीरज दिया और कहा कि जो विपत्ति में हिम्मत रखते हैं, उन्हें अंत में मनचाहा मिलता है, और तुम्हारा स्वामी भी अपने सब मंत्रियों से मिलकर शशांकवती को पाएगा। रात में मृगांकदत्त को गणेश ने स्वप्न में कहा, 'पुत्र, तुम्हारे मंत्री शाप से छूटेंगे, तुम शशांकवती को जीतकर राज करोगे।'

संधि का प्रस्ताव और युद्ध

अब पूरी मंडली, यानी दसों मंत्री, श्रुतधि और तीनों राजा, उज्जयिनी की ओर बढ़ी। श्रुतधि ने नीति की बात कही, 'विजय चाहने वाले को पहले यह देखना चाहिए कि क्या संभव है। चार उपाय हैं: साम, दाम, भेद और दंड, और इसी क्रम में एक उपाय दूसरे से अच्छा है। कर्मसेन लालची नहीं है, इसलिए दाम काम न करेगा। उसके सेवक उससे नाराज़ नहीं हैं, इसलिए भेद भी नहीं। बल से जीतना जोखिम का काम है, उसका क्षेत्र दुर्गम है और सेना बड़ी है, और जो कन्या का हाथ माँग रहा हो उसके लिए उसके संबंधियों को मारना ठीक नहीं। इसलिए पहले दूत भेजकर साम, यानी मेल-मिलाप आज़माइए।' सबने सहमति दी। सुविग्रह नाम का एक चतुर ब्राह्मण दूत बनाकर भेजा गया।

उज्जयिनी के राजदरबार में उसने पत्र दिया। पत्र में लिखा था, 'तुम्हारी बेटी को किसी को देना ही है, तो मुझे दो, क्योंकि देवताओं ने उसे मेरे योग्य बताया है। इससे हम मित्र बनेंगे और पुरानी दुश्मनी ख़त्म होगी। न मानो तो मैं अपनी भुजाओं पर भरोसा करूँगा।' कर्मसेन आग-बबूला हो गया। 'इसने अपना नाम पहले रखा, मेरा बाद में। बेटी तो मैं इसे नहीं दूँगा। दूत, जा, तेरा स्वामी जो कर सके, कर ले।' सुविग्रह ने भी कड़ा उत्तर दिया, 'तू अभी इस राजकुमार को देख नहीं पाया है। तैयार हो जा, जब वह आएगा तब तुझे फ़र्क़ समझ आएगा।' दूत का वध अनुचित मानकर दरबार ने उसे जाने दिया। सुविग्रह ने लौटकर सब बता दिया, और मृगांकदत्त ने सेना को कूच का आदेश दिया।

विंध्य पार करके दोनों सेनाएँ उज्जयिनी की सीमा पर मिलीं, और पाँच दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा।

गौरी के मंदिर की रात

पाँचवीं शाम श्रुतधि भिक्षुक के वेश में चुपके से उज्जयिनी जाकर लौटा और बोला, 'जब कर्मसेन युद्ध को गया, तब शशांकवती माँ की अनुमति से पिता की जीत की कामना लेकर नगर के गौरी-मंदिर में चली गई। उसने अपनी विश्वस्त सखी चतुरिका से कहा, "मेरे कारण पिता युद्ध में पड़े हैं। मैं नहीं जानती कि वह राजकुमार रूप में मेरे योग्य है या नहीं। जाकर सेना में उसे देख आ।" सखी आई, तुम्हें देखकर लौटी और बोली, "जैसे संसार में तुम्हारे समान कोई स्त्री नहीं, वैसे ही उसके समान कोई पुरुष नहीं।" तब से शशांकवती आपकी हो चुकी है और पिता और आपकी कुशलता चाहती हुई तप और विरह से दुबली हो रही है।' श्रुतधि ने कहा, 'आज रात चुपचाप जाकर उसे मंदिर से ले आइए और मायावटु के महल में पहुँचा दीजिए। युद्ध बंद कराइए, सैनिकों का और संहार न हो। जिस युद्ध में बहुत जानें जाएँ, वह अंतिम उपाय है।'

मृगांकदत्त और उसके मंत्री रात को घोड़ों पर नगर पहुँचे। रक्षक ऊँघ रहे थे, और नगर के बाग़ पुष्पकरंड में गौरी का मंदिर श्रुतधि के बताए संकेतों से आसानी से मिल गया। उधर शशांकवती सो नहीं पा रही थी, 'मेरे लिए दोनों सेनाओं के वीर मर रहे हैं। पिता मुझे उस राजकुमार को नहीं देंगे, पुरानी दुश्मनी और अभिमान के कारण। गौरी का सपने में दिया वचन भी क्या करे, जब भाग्य ही उलटा हो? तो क्यों न मैं पहले ही प्राण दे दूँ, इससे पहले कि पिता या प्रियतम पर विपत्ति की ख़बर आए?' उसने गौरी के सामने प्रार्थना की, 'हे देवी, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में मृगांकदत्त मेरा पति बने।' उसने अशोक के पेड़ में अपनी चुनरी का फंदा बाँधा और गले में डाल लिया।

तभी विमलबुद्धि ने पेड़ों की ओट से कहा, 'कुमार, कोई कन्या फाँसी लगा रही है।' मृगांकदत्त उसकी सुंदरता को देखकर सोचता ही रह गया, पर सखियाँ जाग गईं और फंदा काट दिया। इसी बीच मंदिर के भीतर से आवाज़ आई, 'निराश मत हो, शशांकवती। जो मैंने सपने में कहा था वह झूठा नहीं होता। तेरा पति, जो पूर्वजन्म में भी तेरा पति था, मृगांकदत्त, तेरे सामने आ गया है। जा, उसके साथ पूरी पृथ्वी का सुख भोग।' तब विक्रमकेसरी ने उसकी ओर इशारा करके कहा, 'राजकुमारी, भवानी ने सच कहा। यह रहे आपके भावी पति।' शशांकवती ने तिरछी नज़र से उसे देखा तो वह जड़ बन गई, उसके रोंगटे खड़े हो गए।

मृगांकदत्त ने कोमल स्वर में कहा, 'सुंदरी, तुमने मुझे देश, राज्य और संबंधियों से छुड़ाकर इतनी दूर बुला लिया। अब यह देखकर मेरे जंगल में रहने, ज़मीन पर सोने और कंद-मूल खाने का फल मिल गया। मैं चाहता हूँ कि युद्ध रुके, दोनों सेनाओं का भला हो, और मेरे पिता का आशीर्वाद भी मुझे मिले।' शशांकवती ने आँखें झुकाकर कहा, 'मैं आपके गुणों से ख़रीदी जा चुकी हूँ। आप जो उचित समझें, वही करें।' मृगांकदत्त ने गौरी को प्रणाम करके उसे अपने घोड़े पर बिठाया। मंत्रियों ने उसकी सखियों को बिठाया। नगर के रक्षक उन ग्यारह वीरों को तलवारें खींचे जाते देखकर रोकने का साहस न कर सके।

ससुर का संदेश, और विवाह

वे सब मायावटु के कांचनपुर के महल में पहुँचे। उधर सुबह कर्मसेन को पता चला कि उसकी बेटी चली गई है। उसने सोचा, 'मृगांकदत्त चतुराई से उसे ले गया। कोई बात नहीं, उससे योग्य वर और कौन होगा?' उसने कहलवाया कि राजकुमार उसके महल आएँ, वहीं वह बेटी का विवाह करवाएगा। मित्र-राजाओं ने कहा कि वह दुष्ट है, पर श्रुतधि ने सलाह दी कि जाना ठीक रहेगा, क्योंकि कर्मसेन बेटी की इज़्ज़त की ख़ातिर नियम से ब्याह चाहता है। मृगांकदत्त ने कहा, 'पर मैं माता-पिता के बिना विवाह नहीं करूँगा।' उसने भीमपराक्रम को अयोध्या भेजा।

उधर अमरदत्त को जनता से पता चल गया था कि उसके मंत्री ने बेटे पर झूठा इलज़ाम लगाया था। उसने क्रोध में उस मंत्री को परिवार समेत मरवा डाला। बेटे की याद में वह राजधानी छोड़कर नंदिग्राम के शिव-मंदिर में तपस्या करने लगा था। जब भीमपराक्रम ने पैरों में गिरकर कहा, 'आपका बेटा शशांकवती को अपनी वीरता से जीत चुका है और आपकी प्रतीक्षा में कांचनपुर में है', तो राजा ने उसी क्षण हाथी पर चढ़कर रानी और सेना के साथ प्रस्थान किया। पिता और बेटा मिले तो पिता की बाँहें भर गईं और माता ने बेटे को ऐसे थामा मानो फिर बिछड़ने से डरती हो।

कर्मसेन ने अपने बेटे सुषेण से कहलाया कि वह स्वयं बहन का कन्यादान करेगा। अमरदत्त ने उत्तर दिया, 'कर्मसेन जैसी भलमनसी किसमें होगी? सुषेण अयोध्या आएँ, वहीं ब्याह होगा।' अयोध्या में नगर ऐसा सजा मानो कुबेर की नगरी हो। लोग शशांकवती को देखकर चकित रह गए। सुषेण आए तो मृगांकदत्त उन्हें रथ पर बिठाकर नगर में लाया। सुषेण ने बहन से कहा, 'पिता ने कहा है कि तूने कुछ अनुचित नहीं किया। उन्हें पता चला है कि गौरी ने सपने में मृगांकदत्त को तेरा पति बताया था।' शशांकवती की लाज दूर हुई। सुषेण ने उसका निजी धन दिया, दो हज़ार भार सोना, गहनों से लदे पाँच ऊँट। फिर शुभ मुहूर्त में अग्नि के फेरे हुए, और हर फेरे पर सुषेण ने घोड़े, हाथी, सोना और रेशमी वस्त्र उपहार में दिए।

फिर राजा अमरदत्त ने सुषेण को पगड़ी बाँधकर सम्मानित किया, और किरात, शबर और मतंग राजाओं को, और मृगांकदत्त के मंत्रियों और श्रुतधि को, ज़मीन, गायें, घोड़े और सोना देकर विदा किया। मृगांकदत्त लंबे संघर्ष से पाई शशांकवती के साथ अपने मंत्रियों के बीच सुख से रहने लगा। कथा जहाँ से चली थी, वहीं पूरी हुई: एक सपना, एक वचन, और उस पर खड़े रहने वाले साथी।

टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 12, तरंग 69–74, 100–103) से सीधे लिखा गया है। मृगांकदत्त की कथा लंबक 12 की मुख्य कथा है, जिसके भीतर बेताल की पचीस कथाएँ और अनेक दूसरी कथाएँ आती हैं, इसलिए इस अध्याय में हर मंत्री की अपनी बिछड़ने की कथा पूरी नहीं दी गई, बस सार दिया है। मंत्री को ग़ुस्सा दिलाने वाली घटना, पान की पीक, मूल में है। जादू-टोने का आरोप पुरानी मान्यता है, जिसे यहाँ दुष्ट मंत्री की चाल के रूप में ही दिखाया गया है। 'दुष्ट', 'चालाक' आदि शब्द पात्रों के हैं। टॉनी के पाठ में आगे अमरदत्त के संन्यास लेकर मृगांकदत्त को राज सौंपने का प्रसंग भी है, जिसका यहाँ संकेत भर है।

स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, मृगांकदत्त की खोज

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

बेताल का सपना किसे आया, जिसमें शशांकवती का नाम बताया गया?

  • मृगांकदत्त को
  • विमलबुद्धि को
  • भीमपराक्रम को, जिसने सिंह की जीभ काटकर उसका पुल बनाया
  • राजा अमरदत्त को
पूरी कथा पढ़िए — सिंह की जीभ

सपने में सिंह दानव बना और बेताल कहलाया।

उसने बताया कि कन्या उज्जयिनी के राजा कर्मसेन की बेटी है।

क्या हुआ?

मृगांकदत्त के सपने में शिव ने क्या किया?

  • दाईं आँख से एक आँसू गिराया, जो समुद्र बन गया, जिससे मृगांकदत्त ने मोतियों का हार निकाला
  • उसे तलवार दी
  • उसे उज्जयिनी का रास्ता बताया
  • उसे अपना नंदी दे दिया
पूरी कथा पढ़िए — आँसू का समुद्र

उसने समुद्र को एक खोपड़ी में भरकर पी लिया।

विमलबुद्धि ने इसका अर्थ बताया कि वह पृथ्वी पर राज करेगा।

ऐसा क्यों?

मृगांकदत्त को अयोध्या से क्यों निकाला गया?

  • उसने राजा का अपमान किया था
  • उसने ख़ुद राज्य छोड़ दिया था
  • राजा ने उसकी कोई आज्ञा ठुकराई
  • प्रधान मंत्री ने, पीक की बात से नाराज़ होकर, राजा को झूठा बताया कि राजकुमार तांत्रिक अनुष्ठान से उन पर बुरा कर रहा है
पूरी कथा पढ़िए — पान की पीक

राजकुमार ने छत से थूका और पीक मंत्री के सिर पर गिरी।

राजा को हैज़ा हुआ तो मंत्री ने मौक़ा देखा।

क्या हुआ?

श्रुतधि कौन था, जो सूखे पेड़ से इंसान बना?

  • एक नाग का बेटा
  • अयोध्या के ब्राह्मण का बेटा, जिसे पिता के पाँच फल खा जाने पर सूखे पेड़ का शाप मिला था
  • एक किरात राजा
  • मृगांकदत्त का सबसे पुराना मंत्री
पूरी कथा पढ़िए — पाँच फल

उसके पिता का नाम दमधि था।

अतिथियों को फल खिलाने पर वह शाप से छूट गया।

ऐसा क्यों?

साँप पारावताक्ष ने मृगांकदत्त और उसके साथियों को शाप क्यों दिया?

  • उन्होंने उस साधु की मदद की थी, जो उसकी तलवार पाने आया था
  • उन्होंने उसके नाग-महल को तोड़ा था
  • उन्होंने उसकी पत्नी को चुराया था
  • उन्होंने उसे युद्ध में हराया था
पूरी कथा पढ़िए — शाप का कारण

शाप था कि वे कुछ समय बिछड़े रहेंगे।

साधु साँप को देखकर डर से मर गया था।

किसने कहा?

'विजय चाहने वाले को पहले देखना चाहिए कि क्या संभव है। साम, दाम, भेद और दंड, और पहले साम आज़माइए।' यह किसने कहा?

  • विमलबुद्धि ने
  • भीमपराक्रम ने
  • मृगांकदत्त ने
  • श्रुतधि ने, उज्जयिनी की ओर बढ़ते समय
पूरी कथा पढ़िए — नीति का जानकार

उसने बताया कि दाम और भेद यहाँ काम नहीं करेंगे।

दूत के रूप में सुविग्रह भेजा गया।

क्या हुआ?

कर्मसेन ने मृगांकदत्त के पत्र का क्या उत्तर दिया?

  • उसने बेटी देने का वचन दिया
  • वह क्रोधित हुआ और बोला कि वह बेटी नहीं देगा, दूत लौट जाए और उसका स्वामी जो कर सके, कर ले
  • उसने दूत को बंदी बना लिया
  • उसने सेना बुलाकर तुरंत दूत का वध करवाया
पूरी कथा पढ़िए — ग़ुस्से भरा उत्तर

पत्र में मृगांकदत्त का नाम पहले और कर्मसेन का बाद में था।

दूत ने भी कड़ा उत्तर दिया, और अनुचित मानकर उसे जाने दिया गया।

क्या हुआ?

शशांकवती गौरी-मंदिर में क्या करने जा रही थी?

  • पिता की जीत के लिए नृत्य करने
  • मृगांकदत्त से मिलने
  • अशोक की डाल में चुनरी बाँधकर फाँसी लगाने, क्योंकि उसे लगा कि पिता उसे मृगांकदत्त को नहीं देंगे
  • मंदिर में विवाह करने
पूरी कथा पढ़िए — निराशा

पहले वह पिता की जीत की प्रार्थना करने आई थी।

सखियों ने फंदा हटा लिया।

क्या हुआ?

जब शशांकवती की जान जाने वाली थी तो मंदिर के भीतर से क्या सुनाई दिया?

  • शिव की आवाज़
  • उसकी माँ की आवाज़
  • विक्रमकेसरी की आवाज़
  • गौरी की आवाज़, जिसने कहा कि सपने में दिया वचन झूठा नहीं और पूर्वजन्म का पति मृगांकदत्त सामने है
पूरी कथा पढ़िए — भवानी का वचन

यह वचन उसे पहले सपने में भी मिला था।

विक्रमकेसरी ने राजकुमार की ओर इशारा किया।

व्याख्या

इस पूरी कथा में सपने, शाप और संयोग क्या भूमिका निभाते हैं, हमारे पठन में?

  • कथा में सपने भविष्य बताते हैं और शाप बिछोह लाते हैं, पर आगे का रास्ता नीति, साहस, मित्रता और धैर्य से तय होता है
  • भविष्य कोई नहीं बदल सकता, इसलिए कोशिश बेकार है
  • केवल युद्ध से ही विवाह संभव है
  • शाप हमेशा स्थायी होते हैं
पूरी कथा पढ़िए — एक पठन

मंत्रियों ने हर बिछोड़े के बाद एक-दूसरे को खोजा।

कर्मसेन ने अंत में ख़ुद विवाह का प्रस्ताव भेजा।

मृगांकदत्त की खोज के बारे में सवाल

मृगांकदत्त की खोज (कथासरित्सागर) में क्या होता है?

सपने में मिली राजकुमारी की खोज में निकला राजकुमार, साँप के शाप से बिछड़े दस मंत्री — और उज्जयिनी के मंदिर में एक रात। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: दो सपने; नीति की एक कथा, और भाग्य की एक कथा; जब बेटा देश से निकाला गया; सूखा पेड़, और साँप का शाप; एक-एक कर बिछड़े मिले; संधि का प्रस्ताव और युद्ध; गौरी के मंदिर की रात; ससुर का संदेश, और विवाह।

कथासरित्सागर में मृगांकदत्त की खोज के बाद क्या आता है?

आगे सम्राट और कथा का अंत: गुफ़ा में सात रत्न, कैलास के आर-पार एक सम्राट — और जहाँ से कथा चली थी, वहीं लौटकर कश्मीर की रानी तक।

मृगांकदत्त की खोज का स्रोत क्या है?

कथासरित्सागर, लंबक 12 (शशांकवती), तरंग 69–74, 100–103 (कथा 163)।