
अध्याय २
वह राजा जिसे व्याकरण नहीं आता था
पानी में खेलते राजा पर रानी ने एक शब्द की ग़लती पकड़ ली — और उस एक अपमान से एक शर्त, एक वरदान और एक नया व्याकरण निकला
वह राजा जिसे व्याकरण नहीं आता था — कथासरित्सागर का अध्याय २। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 1, तरंग 6–7। इसमें ५ दृश्य हैं — एक ब्राह्मण का बेटा; सातवाहन; वसंत-उत्सव का अपमान; छह साल या छह महीने?; कार्तिकेय की कृपा — और अंत में १० सवाल।
एक ब्राह्मण का बेटा
सुप्रतिष्ठित नाम का एक नगर था, जो प्रतिष्ठान (आज के पैठण) के इलाक़े में पड़ता था। वहाँ सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके दो बेटे थे, वत्स और गुल्म, और एक बेटी, श्रुतार्था। माता-पिता के मरने के बाद दोनों भाई बहन की देखभाल करने लगे।
एक दिन भाइयों को पता चला कि श्रुतार्था गर्भवती है। दोनों एक-दूसरे पर शक करने लगे, क्योंकि घर में कोई और पुरुष नहीं आता था। बहन ने उनके मन की बात पढ़ ली और कहा, 'बुरा मत सोचो, सच सुनो। वासुकि का एक भतीजा है, नाग-राजकुमार कीर्तिसेन। उसने मुझे नहाने जाते हुए देखा, अपना नाम और वंश बताकर मुझसे गुप्त विवाह कर लिया। वह ब्राह्मण-वंश का है, और मेरा गर्भ उसी का है।'
भाइयों को भरोसा नहीं हुआ। तब श्रुतार्था ने चुपचाप उस नाग-राजकुमार को याद किया, और वह तुरंत आ गया। उसने कहा, 'मैंने सचमुच इसे अपनी पत्नी बनाया है। यह एक देवांगना है जो शाप से धरती पर आई है, और तुम दोनों भी इसी कारण यहाँ हो। इसका एक बेटा होगा, और तब तुम सबका शाप छूट जाएगा।' कुछ ही दिनों में श्रुतार्था के बेटा हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई, 'यह बालक धर्म का अंश है। इसका नाम गुणाढ्य होगा।'
फिर वही हुआ जो कहा गया था: शाप का समय पूरा हुआ और माँ और दोनों मामा गुज़र गए। गुणाढ्य अकेला रह गया। उसने शोक झटक दिया और बचपन में ही अपने भरोसे दक्खिन चला गया। वहाँ उसने सारी विद्याएँ सीखीं और नाम कमाया। जब वह शिष्यों के साथ लौटा तो अपने नगर की गलियाँ देखकर हैरान रह गया। कहीं सामवेद के गायक पाठ कर रहे थे, कहीं ब्राह्मण शास्त्रों के अर्थ पर बहस कर रहे थे, कहीं जुआरी जुए की तारीफ़ कर रहे थे, और कहीं व्यापारी अपनी कमाई के क़िस्से सुना रहे थे।
उन्हीं में एक व्यापारी बोल रहा था। 'धन से धन कमाना कोई बड़ी बात नहीं। मैंने बिना पूँजी के कमाया है। मेरे जन्म से पहले ही पिता मर गए। रिश्तेदारों ने माँ का सब कुछ छीन लिया। वह मुझे गर्भ में लिए भाग गई और कुमारदत्त नाम के पिता के मित्र के घर शरण ली। वहीं मेरा जन्म हुआ। माँ ने नौकरानी का काम करके मुझे पाला, और किसी तरह एक गुरु से मुझे लिखना-गिनना सिखवाया। उसने कहा, "तू व्यापारी का बेटा है, व्यापार कर। विशाखिल नाम का एक धनी सेठ ग़रीब कुलीन लड़कों को पूँजी उधार देता है। उससे माँग।"
'मैं उसके घर पहुँचा। ठीक उसी क्षण वह किसी नौजवान पर बिगड़ रहा था, "देख, फ़र्श पर यह मरा चूहा पड़ा है। इससे भी कोई चतुर आदमी धन कमा सकता है! और मैंने तुझे इतने दीनार दिए, तूने न बढ़ाए, न बचाए।" मैंने तुरंत कहा, "ठीक है, मैं यह चूहा आपसे पूँजी के रूप में लेता हूँ।" मैंने उसे रसीद लिखकर दी और चूहा उठाकर चल दिया। सेठ ज़ोर से हँस पड़ा।
'मैंने वह चूहा बिल्ली के खाने के लिए एक व्यापारी को बेचा और दो मुट्ठी चने पाए। चने पीसकर और घड़ा भर पानी लेकर मैं शहर के बाहर चौराहे पर छाँव में बैठ गया। वहाँ से जो लकड़हारे गुज़रते, उन्हें आदर से पानी और चने देता। हर लकड़हारा बदले में मुझे दो-दो लकड़ियाँ दे देता। मैं वे लकड़ियाँ बाज़ार में बेच देता, उसके एक छोटे हिस्से से फिर चने ख़रीदता। रोज़ यही करते हुए मेरे पास पूँजी जमा हो गई, और मैंने तीन दिन की सारी लकड़ी ख़रीद ली। तभी भारी बारिश के कारण लकड़ी की कमी हो गई और मैंने वही लकड़ी सैकड़ों पण में बेची। उस पैसे से मैंने दुकान खोली और अपनी काबिलियत से धनी हो गया। फिर मैंने सोने का एक चूहा बनवाकर विशाखिल को भेंट किया। उसने अपनी बेटी मुझसे ब्याह दी। तब से लोग मुझे "चूहा" कहकर जानते हैं। इस तरह बिना एक पैसे के मैंने यह सब कमाया।'
सब व्यापारी यह सुनकर हैरान रह गए। दीवार के बिना चित्र खींचने जैसी बात थी।
सातवाहन
जब गुणाढ्य राजा के महल पहुँचा, तो राजा सातवाहन रत्नों के सिंहासन पर मंत्री शर्ववर्मन और बाक़ी दरबारियों के बीच बैठा था। मंत्रियों ने कहा, 'महाराज, यह पृथ्वी पर सब विद्याओं में प्रसिद्ध है। इसका नाम गुणाढ्य, यानी गुणों से भरा, इसके स्वभाव पर बिल्कुल ठीक बैठता है।' राजा प्रसन्न हुआ और उसने उसे अपना मंत्री बना लिया। गुणाढ्य ने विवाह किया, राजा के काम सँभाले और शिष्यों को पढ़ाने लगा।
सातवाहन के नाम की भी एक कथा है, जो गुणाढ्य ने बाद में काणभूति को सुनाई। द्वीपिकर्णि नाम का एक पराक्रमी राजा था। उसकी रानी शक्तिमती उसे प्राणों से भी प्यारी थी। एक दिन बाग़ में सोते हुए उसे साँप ने काट लिया और वह मर गई। राजा ने उसी के शोक में आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया, जबकि उसके कोई पुत्र नहीं था। तब एक रात चंद्रमौलि शिव ने उसे स्वप्न में कहा, 'वन में घूमते हुए तू एक बालक को सिंह पर सवार देखेगा। उसे घर ले जा, वही तेरा बेटा होगा।'
राजा शिकार के शौक़ में एक दूर के जंगल में गया। दोपहर को उसने कमल-तालाब के किनारे सूर्य के समान तेजस्वी एक बालक को सिंह पर सवार देखा। सिंह पानी पीने के लिए रुका और बालक को उतार दिया। राजा को स्वप्न याद आया और उसने एक ही बाण से सिंह को मार डाला। सिंह ने तुरंत सिंह का रूप छोड़ दिया और मनुष्य बन गया। राजा ने पूछा, 'यह क्या है?' उसने कहा, 'राजन्, मैं शात नाम का यक्ष हूँ, कुबेर का सेवक। मैंने एक ऋषि-कन्या को गंगा में नहाते देखा था। वह भी मुझे देखकर मुझ पर रीझ गई। मैंने गुप्त विवाह कर लिया। उसके सगे-संबंधियों ने पता चलने पर हम दोनों को शाप दिया, "तुम दोनों सिंह बन जाओ।" ऋषियों ने तय किया कि कन्या का शाप संतान होने पर छूटेगा, और मेरा तब तक रहेगा जब तक तुम बाण से मुझे न मारो। हम सिंह-सिंहनी बने। वह गर्भवती हुई और बेटे के जन्म के बाद मर गई। मैंने उसे दूसरी सिंहनियों के दूध से पाला। आज तुम्हारे बाण से मैं शाप से मुक्त हुआ। इस पुत्र को ले लो।' इतना कहकर शात अदृश्य हो गया।
राजा बालक को घर ले आया। चूँकि वह शात (यक्ष) पर सवार था, इसलिए उसका नाम सातवाहन रखा। समय आने पर द्वीपिकर्णि वन चला गया और सातवाहन पूरी पृथ्वी का राजा बना।
वसंत-उत्सव का अपमान
एक वसंत-उत्सव पर राजा सातवाहन उसी बाग़ में गया जो देवी की कृपा से गुणाढ्य के नगर में बना था। वह वहाँ इंद्र की तरह घूमा और फिर अपनी रानियों के साथ तालाब में उतरकर जल-क्रीड़ा करने लगा। रानियाँ और राजा एक-दूसरे पर पानी उछाल रहे थे। उन्हीं में एक रानी, जो बहुत सुकुमार थी, थककर बोली, 'मुझ पर पानी की बूँदें मत फेंको।' संस्कृत में ये शब्द थे *मा उदकैः*।
राजा ने यह सुनकर तुरंत नौकर से मिठाइयाँ मँगवा लीं। *मा उदकैः* के मेल से *मोदकैः* बनता है, जिसका अर्थ है 'मिठाइयों से'। राजा ने समझा कि रानी मिठाई माँग रही है।
रानी ज़ोर से हँस पड़ी, 'महाराज, पानी में मिठाई का क्या काम? मैंने कहा था, पानी की बूँदें मत मारो। क्या आप *मा* और *उदक* की संधि भी नहीं जानते? आप व्याकरण का यह अध्याय भी नहीं जानते? आप ऐसे मूर्ख कैसे हो सकते हैं?' रानी व्याकरण जानती थी। सेवक हँस पड़े।
सातवाहन भीतर से शर्म से भर गया। वह पानी से निकल आया और चुपचाप महल में चला गया। वह चित्र की तरह चुप रहा, सवाल पूछने पर भी कुछ न बोला, खाना-पीना छोड़ दिया और सोच में पड़ गया कि या तो मैं विद्या पाऊँगा या मर जाऊँगा। वह बिस्तर पर पड़ गया।
छह साल या छह महीने?
सब दरबारी घबराए। जब गुणाढ्य और शर्ववर्मन को यह पता चला, तब तक दिन ढल चुका था। उन्होंने राजा के सेवक राजहंस को बुलाकर पूछा। उसने बताया, 'मैंने राजा को ऐसा कभी नहीं देखा। दूसरी रानियों ने ग़ुस्से में बताया कि आज विष्णुशक्ति की बेटी, उस पढ़ी-लिखी रानी ने राजा का अपमान कर दिया।'
उन्होंने सोचा, 'अगर शरीर की बीमारी होती तो वैद्य बुलाते, पर यह मन की बीमारी है।' तब बुद्धिमान शर्ववर्मन बोला, 'मैं कारण जानता हूँ। राजा अपनी अज्ञानता पर दुखी है। वह हमेशा कहता है, "मैं मूर्ख हूँ।" मैंने पहले ही यह इच्छा भाँप ली थी।' रात काटकर वे सुबह राजा के निजी कक्ष में गए, जहाँ किसी को आने की मनाही थी। गुणाढ्य कठिनाई से भीतर गया और उसके बाद शर्ववर्मन।
गुणाढ्य ने पूछा, 'महाराज, आप बिना कारण क्यों उदास हैं?' राजा चुप रहा। तब शर्ववर्मन बोला, 'महाराज, आपने मुझसे कभी कहा था, "मुझे विद्वान बना दो।" मैंने कल रात एक मंत्र से स्वप्न बुलाया और देखा कि स्वर्ग से एक कमल गिरा, किसी दिव्य कुमार ने उसे खोला, उसमें से श्वेत वस्त्र पहने एक दिव्य स्त्री निकली और आपके मुँह में प्रवेश कर गई। मुझे लगता है वह सरस्वती थीं।'
तब राजा ने मौन तोड़ा, 'कोई मेहनती आदमी कितने समय में विद्या पा सकता है? बिना विद्या के राज-वैभव मुझे नहीं भाता। मूर्ख के लिए पद और शक्ति लकड़ी के लट्ठे पर गहनों जैसी है।'
गुणाढ्य ने कहा, 'महाराज, व्याकरण सीखने में बारह वर्ष लगते हैं, पर मैं आपको छह वर्ष में सिखा दूँगा।' यह सुनकर शर्ववर्मन ईर्ष्या से बोल पड़ा, 'सुख भोगने के आदी राजा इतने समय तक कष्ट कैसे सहेंगे? मैं छह महीने में सिखा दूँगा।'
गुणाढ्य ने ग़ुस्से में कहा, 'अगर तुम राजा को छह महीने में व्याकरण सिखा दो, तो मैं संस्कृत, प्राकृत और देशी भाषा, इन तीन भाषाओं को सदा के लिए छोड़ दूँगा।' शर्ववर्मन ने कहा, 'और अगर मैं न सिखा सका, तो मैं बारह वर्ष तक तुम्हारी जूतियाँ अपने सिर पर ढोऊँगा।' इतना कहकर वह निकल गया। राजा को आशा बँधी कि उन दोनों में से कोई तो उसे विद्या देगा।
कार्तिकेय की कृपा
अब शर्ववर्मन मुश्किल में पड़ गया। उसे पछतावा हुआ। उसने पत्नी को सब बताया। पत्नी ने कहा, 'स्वामी, इस संकट से भगवान कार्तिकेय की कृपा ही बचा सकती है।' शर्ववर्मन ने वही ठान लिया।
पिछली पहर वह भूखा-प्यासा कार्तिकेय के मंदिर की ओर चल पड़ा। गुणाढ्य के गुप्तचरों ने उसे बताया, और सुबह उसने राजा को। तभी सिंहगुप्त नाम का एक वफ़ादार राजपूत बोला, 'महाराज, जब मैंने आपकी चिंता सुनी, तो मैं नगर से बाहर दुर्गा के सामने अपना सिर काटने जा रहा था कि आपका भला हो। तभी आकाशवाणी ने रोका, "ऐसा मत कर। राजा की इच्छा पूरी होगी।" इसलिए मुझे विश्वास है कि आप सफल होंगे।' इतना कहकर सिंहगुप्त ने शर्ववर्मन के पीछे दो दूत भेजे।
शर्ववर्मन ने मौन और उपवास रखकर, आख़िर कार्तिकेय के मंदिर तक पहुँचकर, तप से अपना शरीर गला दिया। देवता प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने हाथ से उसे एक नया छोटा व्याकरण दिया। देवता ने कहा, 'अगर तू अगला सूत्र स्वयं न बोल देता, तो यह व्याकरण पाणिनि के व्याकरण को हटा देता। संक्षिप्त होने के कारण यह *कातंत्र* कहलाएगा, और मेरे मोर की पूँछ (*कलाप*) से *कलापक* भी।' देवता ने यह भी बताया कि राजा पिछले जन्म में कृष्ण नाम का तपस्वी था, जिसे एक ऋषि-कन्या से प्रेम करने पर शाप मिला था, और अब सातवाहन बनकर जन्मा है, इसलिए गुणाढ्य को देखते ही उसे सारी विद्याएँ याद आ जाएँगी। देवता के सेवकों ने उसे चावल के कुछ दाने दिए। लौटते समय वह रोज़ वही दाने खाता रहा, पर वे कभी कम नहीं हुए।
दूतों ने राजा को सफलता की ख़बर दी। राजा प्रसन्न हुआ, और गुणाढ्य निराश, जैसे बादल देखकर चातक खुश और हंस उदास होता है। उसकी शर्त हार में बदल चुकी थी। शर्ववर्मन लौटा और जैसे ही उसने सब विद्याओं को याद किया, वे राजा के भीतर उतर आईं। पूरे राज्य में उत्सव हुआ, हर घर पर पताकाएँ फहराईं। राजा ने झुककर शर्ववर्मन को अपना गुरु कहा, उसे रत्न दिए और नर्मदा-तट का बकाकच्छ प्रदेश दिया। सिंहगुप्त को उसने अपने बराबर वैभव दिया। और जिस रानी के कारण यह सब हुआ था, उसे सब रानियों से ऊपर उठा दिया और अपने हाथ से राज्याभिषेक किया।
और गुणाढ्य ने, जैसा कहा था, तीनों भाषाएँ — संस्कृत, प्राकृत और देशी भाषा — छोड़ दीं और मौन-व्रत ले लिया। अब वह दरबार में सिर झुकाकर ही राजा को प्रणाम करता, कुछ बोलता नहीं।
टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 1, तरंग 6–7) से सीधे लिखा गया है। यहाँ 'गुप्त विवाह' मूल के 'गांधर्व विवाह' के लिए है; ब्योरा जान-बूझकर नहीं दिया गया। सामवेद-गायक और गणिका की चुटकुले-जैसी उपकथा छोड़ी गई है। शर्ववर्मन और कातंत्र (कलाप) व्याकरण की परंपरा बाद के विद्वानों ने भी दर्ज की है; यहाँ केवल ग्रंथ का कथन दिया गया है। सातवाहन और 'बकाकच्छ' जैसे नाम पाठ के हैं।
स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, वह राजा जिसे व्याकरण नहीं आता था