सात लाख श्लोक और एक आग — कथासरित्सागर, चित्र

अध्याय ३

सात लाख श्लोक और एक आग

पिशाचों की भाषा में सात लाख श्लोक, ख़ून की स्याही से लिखे — और जिस राजा के लिए लिखे, उसने उन्हें 'पिशाच की भाषा' कहकर लौटा दिया

सात लाख श्लोक और एक आग — कथासरित्सागर का अध्याय ३। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 1, तरंग 7–8। इसमें ५ दृश्य हैं — विंध्य का जंगल; दो नाम; ख़ून की स्याही; राजा का तिरस्कार; जलती पोथियाँ — और अंत में १० सवाल।

विंध्य का जंगल

गुणाढ्य ने मौन-व्रत ले लिया था। एक दिन दरबार में एक ब्राह्मण ने अपना बनाया एक श्लोक पढ़ा, और राजा ने स्वयं शुद्ध संस्कृत में उसका उत्तर दिया। दरबारी बहुत प्रसन्न हुए। राजा ने शर्ववर्मन से कहा कि वह स्वयं बताए कि देवता ने उस पर कैसे कृपा की। शर्ववर्मन ने सब बताया।

फिर गुणाढ्य ने सिर झुकाकर राजा से विदा ली। राजा उसे जाने नहीं देना चाहता था, पर उसकी भाषा-शपथ के कारण वह राज-काज में रह नहीं सकता था। वह केवल दो शिष्यों के साथ नगर से निकल गया। तप में मन लगाकर वह विंध्य की देवी के मंदिर पहुँचा, और देवी ने स्वप्न में उसे काणभूति से मिलने का आदेश दिया। वह भयानक विंध्य-वन में गया। एक पुलिंद ने उसे संकेत से एक क़ाफ़िले का पता बताया, और किसी तरह वह उस जगह पहुँचा, जहाँ पिशाचों का झुंड था। वहाँ दूर से उनकी बातचीत सुन-सुनकर उसने उनकी पैशाची भाषा सीख ली। वही चौथी भाषा थी, जिसमें बोलने से उसकी शपथ नहीं टूटती थी। इस तरह उसकी शर्त ने ही उसे पिशाचों की भाषा तक पहुँचाया।

काणभूति तब उज्जयिनी गया हुआ था। गुणाढ्य वहीं रुककर प्रतीक्षा करता रहा। काणभूति जब लौटा तो उसने गुणाढ्य से कहा कि पिछली रात उसे उसके आने की ख़बर कैसे मिली। 'मेरा भूतिवर्मा नाम का एक राक्षस मित्र है जो दिव्य दृष्टि रखता है। उज्जयिनी के एक बाग़ में मैंने उससे पूछा कि मेरा शाप कब टूटेगा। उसने कहा, "दिन में हमारी शक्ति नहीं चलती। रात को बताऊँगा।" रात आई तो मैंने पूछा कि भूत-प्रेत रात में ही क्यों खेलते हैं। उसने बताया, "मैंने शिव को ब्रह्मा से बात करते सुना था। राक्षस, यक्ष और पिशाच दिन में सूर्य की चमक से चौंधिया जाते हैं, इसलिए रात में आनंद लेते हैं। जहाँ देवताओं की पूजा नहीं होती, जहाँ ब्राह्मणों का विधिवत आदर नहीं होता, जहाँ लोग शास्त्र के विपरीत खाते हैं, वहाँ उनकी शक्ति चलती है। जहाँ कोई मांस-त्यागी या सती स्त्री है, वहाँ वे नहीं जाते।"' फिर भूतिवर्मा ने कहा, 'जा, गुणाढ्य आ गया है, तेरे शाप से छूटने का साधन।' इसलिए काणभूति दौड़ा आया।

दो नाम

काणभूति ने गुणाढ्य से एक बात पूछी, 'पुष्पदंत का नाम पुष्पदंत क्यों पड़ा, और तुम्हारा माल्यवान क्यों?'

गुणाढ्य ने बताया। गंगा के किनारे बहुसुवर्णक नाम का एक ब्राह्मण-गाँव था। वहाँ गोविंददत्त नाम का एक पंडित रहता था। उसके पाँच बेटे थे, सुंदर पर मूर्ख और उद्दंड। एक दिन अतिथि वैश्वानर आया तो बेटों ने उसे हँसकर नमस्कार किया। ब्राह्मण नाराज़ होकर जाने लगा, 'तुम्हारे बेटे मूर्ख हैं, इसलिए जाति-बाहर हो गए, और उनके साथ रहने से तुम भी।' गोविंददत्त ने शपथ ली कि वह इन बेटों को छुएगा भी नहीं। उसकी पत्नी ने भी यही कहा, तब कहीं अतिथि रुका। पुत्रों में से देवदत्त पिता की इस कठोरता से इतना दुखी हुआ कि तप के लिए बदरिकाश्रम चला गया। वहाँ उसने पहले पत्ते खाए, फिर केवल धुआँ पिया, और शिव को प्रसन्न किया। शिव ने कहा, 'विद्या पाओ, पृथ्वी पर सुख भोगो, और फिर तुम्हारी इच्छा पूरी होगी।'

वह पाटलिपुत्र पढ़ने गया। वहाँ गुरु वेदकुंभ की पत्नी उस पर रीझ गई। देवदत्त ने वह जगह छोड़ दी और प्रतिष्ठान जाकर बूढ़े गुरु मंत्रस्वामी से सब विद्याएँ सीखीं। वहाँ राजा सुशर्मा की बेटी श्री ने खिड़की पर उसे देखा। दोनों एक-दूसरे को देखकर बँध गए। राजकुमारी ने उसे इशारे से पास बुलाया, फिर अपने दाँतों से एक फूल उसके सामने गिराया। देवदत्त उस संकेत का अर्थ नहीं समझा और दुखी हुआ। उसके गुरु ने उसकी परेशानी भाँप ली और पहेली सुलझाई, 'दाँत से फूल गिराकर उसने तुम्हें कहा कि पुष्पदंत नाम के फूलों से भरे मंदिर में जाकर प्रतीक्षा करो।' देवदत्त वहाँ गया। राजकुमारी भी अष्टमी के बहाने मंदिर आई। उसने पूछा, 'तुमने मेरा संकेत कैसे समझ लिया?' उसने सच कहा, 'यह तो मेरे गुरु ने समझाया था।' राजकुमारी बिगड़कर बोली, 'तुम मूर्ख हो', और चली गई। देवदत्त फिर दुख में सूख गया।

तब शिव ने अपने गण पंचशिख को देवदत्त की सहायता करने भेजा। पंचशिख ने उसे स्त्री का वेश पहनाया, ख़ुद बूढ़े ब्राह्मण का रूप लेकर राजा सुशर्मा के पास गया और कहा, 'मेरा बेटा कहीं चला गया है, मैं उसे खोजने जा रहा हूँ। तब तक अपनी बहू तुम्हारे पास रखता हूँ।' ब्राह्मण के शाप से डरे राजा ने उसे राजकुमारी के पहरेदार महल में रखवा दिया। वहीं देवदत्त ने राजकुमारी से गुप्त विवाह कर लिया। फिर पंचशिख ने उसे चुपके से निकाला, उसका स्त्री-वेश उतारा, और सुबह फिर ब्राह्मण बनकर राजा से कहा, 'मेरा बेटा मिल गया, मेरी बहू लौटा दो।' राजा बहू को खोजकर थक गया, और ब्राह्मण के शाप के भय से अपनी बेटी का विवाह देवदत्त से कर दिया।

बाद में राजा सुशर्मा ने अपने नाती महीधर को राजा बनाया और वन चला गया। देवदत्त भी पत्नी के साथ वन में गया, तप किया और शिव की कृपा से गण बना। 'क्योंकि उसने अपनी प्रिया के दाँत से गिराए फूल का संकेत नहीं समझा था,' गुणाढ्य ने कहा, 'उसे गणों की सभा में पुष्पदंत कहा गया, और उसकी पत्नी पार्वती के घर की द्वारपाल जया बनी।'

फिर गुणाढ्य ने अपनी कथा कही। वह भी उसी गोविंददत्त का बेटा था, उसका नाम सोमदत्त था। वह भी उसी कारण दुखी होकर हिमालय गया और शिव को जंगल के फूलों की माला चढ़ाता रहा। शिव ने कहा, 'तूने मुझे अपने हाथ से लाई वन-पुष्पों की मालाएँ चढ़ाईं, इसलिए तू मेरा गण होगा और माल्यवान कहलाएगा।' उसी से माल्यवान नाम पड़ा।

ख़ून की स्याही

काणभूति ने गुणाढ्य के कहने पर वह सात कथाओं की दिव्य कथा अपनी भाषा में सुनाई, और गुणाढ्य ने उसी पैशाची भाषा में उसे सात साल में सात लाख श्लोकों में उतारा। उसके पास स्याही नहीं थी, इसलिए उस महाकवि ने विद्याधरों के चुरा लेने के डर से जंगल में उसे अपने ही रक्त से लिखा। विद्याधर, सिद्ध और दूसरे देवता उसे सुनने आए, और जहाँ काणभूति कथा सुना रहा था, वहाँ आकाश जैसे छत की तरह ढक गया। गुणाढ्य की लिखी कथा देखकर काणभूति शाप से मुक्त हो गया और अपने लोक चला गया। उसके साथ के दूसरे पिशाच भी कथा सुनकर स्वर्ग गए।

राजा का तिरस्कार

अब गुणाढ्य सोचने लगा, 'देवी ने कहा था कि मुझे यह कथा धरती पर फैलानी है। पर किसे दूँ?' उसके दो शिष्य, गुणदेव और नंदिदेव, बोले, 'राजा सातवाहन ही इसके योग्य हैं। वे रसिक हैं और फूल की सुगंध की तरह वायु इसे फैला देंगे।' गुणाढ्य ने मान लिया। उसने कथा शिष्यों को दी और उन्हें राजा के पास भेजा, ख़ुद प्रतिष्ठान के बाहर देवी के बनाए बाग़ में रुक गया।

शिष्यों ने राजा को पोथी दी और बताया कि यह गुणाढ्य की रचना है। राजा ने पैशाची भाषा देखी और उन शिष्यों को पिशाच जैसा रूप देखा। विद्या के घमंड में आकर वह व्यंग्य से बोला, 'सात लाख श्लोक कोई छोटी बात नहीं हैं, पर पैशाची भाषा बर्बर है और अक्षर ख़ून से लिखे हैं। ले जाओ यह पिशाच की कथा।' दोनों शिष्य पोथी लेकर लौटे और गुणाढ्य को सब बताया।

जिसे योग्य जानकार ठुकरा दे, उसे किसे दुख नहीं होता? गुणाढ्य सुनते ही शोक से भर गया।

जलती पोथियाँ

गुणाढ्य शिष्यों के साथ पास की एक पथरीली, सुनसान पहाड़ी पर गया। उसने वहाँ पहले एक यज्ञ-कुंड बनाया, फिर पोथी के पन्ने एक-एक करके उठाए, उन्हें पशु-पक्षियों को पढ़कर सुनाया और आग में फेंकता गया। शिष्य रोते हुए देखते रहे। पर एक कथा उसने बचा ली: नरवाहनदत्त के चरित की एक लाख श्लोकों की कथा, क्योंकि दोनों शिष्यों को वही सबसे प्रिय थी।

जब वह पढ़ रहा था और जला रहा था, तब हिरन, सूअर, भैंसे और जंगल के सब पशु चरना छोड़कर वहाँ आ गए और उसे घेरकर आँखों में आँसू लिए सुनते रहे। वे वहाँ से हिल नहीं पाते थे।

उधर राजा सातवाहन बीमार पड़ गया। वैद्यों ने कहा कि उसे पोषण-रहित मांस खिलाया जा रहा है। रसोइयों को डाँटा गया तो उन्होंने कहा कि शिकारी ऐसा ही मांस लाते हैं। शिकारियों से पूछा गया तो उन्होंने बताया, 'यहाँ से थोड़ी दूर एक पहाड़ी पर एक ब्राह्मण पढ़-पढ़कर हर पन्ना आग में डालता जाता है। सब जानवर वहीं जाकर सुनते रहते हैं, चरते नहीं, कहीं और नहीं जाते। इसी से उनका मांस पोषण-रहित है।'

यह सुनकर राजा उत्सुकता से शिकारियों के साथ वहाँ गया। उसने जटाओं से ढके, बुझती आग के धुएँ जैसे दिख रहे गुणाढ्य को पहचाना। वह रोते हुए पशुओं के बीच खड़ा था। राजा ने झुककर प्रणाम किया और सब पूछा। गुणाढ्य ने उसे पैशाची में अपनी पूरी कथा बताई: कि वह पुष्पदंत का अवतार है, कि कथा शिव के मुँह से धरती पर कैसे उतरी। राजा समझ गया कि यह एक गण का अवतार है, उसने चरण छुए और शिव के मुख से निकली वह दिव्य कथा माँगी।

गुणाढ्य ने कहा, 'राजन्, मैं छह कथाएँ जला चुका हूँ, छह लाख श्लोक। एक लाख श्लोकों की एक कथा बची है। उसे ले लो, और मेरे ये दोनों शिष्य तुम्हें उसका अर्थ समझाएँगे।' राजा को बृहत्कथा सौंपकर गुणाढ्य ने विदा ली और अपने योग के बल से शरीर त्याग दिया। वह शाप से मुक्त हो गया और अपने दिव्य लोक चला गया।

राजा पोथी लेकर नगर लौटा। उसने गुणदेव और नंदिदेव को ज़मीन, सोना, वस्त्र, पशु, महल और ख़ज़ाने दिए। उनकी मदद से कथा का सार समझकर सातवाहन ने *कथापीठ* रचा, यह बताने के लिए कि पैशाची भाषा में यह कथा पहली बार कैसे सामने आई। कथा इतनी विविध और रसभरी थी कि लोग देवताओं की कथाएँ भूल गए। नगर में फैलकर वह तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गई।

टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 1, तरंग 7–8) से सीधे लिखा गया है। पैशाची भाषा के बारे में ग्रंथ का दावा यहाँ केवल ग्रंथ के रूप में दिया गया है; विद्वान इस भाषा के क्षेत्र पर सहमत नहीं हैं। 'गुप्त विवाह' मूल के 'गांधर्व विवाह' के लिए है। देवदत्त की कथा में स्त्री-वेश वाला प्रसंग मूल कथा में है; यहाँ केवल उतना दिया गया है जितना कथा के लिए ज़रूरी है। बकाकच्छ, पाटलिपुत्र और कौशाम्बी जैसे नाम पाठ के हैं।

स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, सात लाख श्लोक और एक आग

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

गुणाढ्य ने बृहत्कथा किस भाषा में लिखी?

  • संस्कृत में
  • प्राकृत में
  • पैशाची, पिशाचों की भाषा, में
  • तमिल में
पूरी कथा पढ़िए — चौथी भाषा

संस्कृत, प्राकृत और देशी भाषा छोड़ने की शपथ के बाद उसने पैशाची सीखी।

पिशाचों की बातचीत सुन-सुनकर उसने उसे सीख लिया।

क्या हुआ?

गुणाढ्य ने पैशाची भाषा कैसे सीखी?

  • विंध्य के जंगल में पिशाचों की बातचीत दूर से सुनकर
  • काणभूति ने उसे पढ़ाई
  • देवी ने स्वप्न में सिखाई
  • शर्ववर्मन ने उसे सिखाई
पूरी कथा पढ़िए — सुनकर सीखी भाषा

वह पिशाचों के झुंड के पास पहुँचकर उनकी बातें सुनता रहा।

उसी भाषा से उसने अपना मौन तोड़ा।

ऐसा क्यों?

गुणाढ्य ने कथा अपने ख़ून से क्यों लिखी?

  • राजा ने उसे आदेश दिया था
  • यह शिव का आदेश था
  • वह शपथ का एक हिस्सा था
  • उसके पास स्याही नहीं थी, और उसे डर था कि विद्याधर रचना चुरा लेंगे
पूरी कथा पढ़िए — ख़ून से लिखी कथा

जंगल में स्याही नहीं थी।

विद्याधर उसे सुनने के लिए ऊपर मँडराते रहते थे।

किसने कहा?

'सात लाख श्लोक कोई छोटी बात नहीं हैं, पर पैशाची भाषा बर्बर है और अक्षर ख़ून से लिखे हैं।' यह किसने कहा?

  • गुणाढ्य ने, अपने शिष्यों से
  • राजा सातवाहन ने, गुणाढ्य के दोनों शिष्यों से
  • शर्ववर्मन ने, राजा से
  • काणभूति ने, गुणाढ्य से
पूरी कथा पढ़िए — विद्या का घमंड

राजा विद्या के गर्व में था और उसने ग्रंथ को ठुकरा दिया।

शिष्यों ने लौटकर गुणाढ्य को यह बताया।

क्या हुआ?

राजा के ठुकराने के बाद गुणाढ्य ने क्या किया?

  • एक-एक पन्ना पशु-पक्षियों को पढ़कर आग में डालना शुरू किया
  • सब पोथियाँ नदी में बहा दीं
  • पोथियाँ काणभूति को लौटा दीं
  • नई पोथी दूसरे राजा के पास भेजी
पूरी कथा पढ़िए — पन्नों की आग

वह एक पथरीली, सुनसान पहाड़ी पर गया और यज्ञ-कुंड बनाया।

पशु और पक्षी वहाँ आकर सुनते रहे।

तथ्य

जलने से कितनी कथा बची?

  • सातों कथाएँ
  • कोई नहीं
  • तीन कथाएँ
  • एक कथा, एक लाख श्लोकों की, जिसमें नरवाहनदत्त का चरित था
पूरी कथा पढ़िए — बची हुई कथा

छह कथाएँ, यानी छह लाख श्लोक, जल गईं।

बची हुई कथा दोनों शिष्यों को सबसे प्रिय थी।

ऐसा क्यों?

राजा सातवाहन बीमार क्यों पड़ा?

  • गुणाढ्य ने उसे शाप दिया था
  • शिकारी ऐसा मांस लाते थे जिसमें पोषण नहीं था, क्योंकि पशु गुणाढ्य की कथा सुनते हुए चरना भूल गए थे
  • उसे साँप ने काट लिया था
  • वह कथा के शोक में डूब गया था
पूरी कथा पढ़िए — पशुओं का सुनना

पशु चरना छोड़कर गुणाढ्य के पास बैठे रहते थे।

शिकारियों से यह जानकर राजा उसे खोजने गया।

तथ्य

देवदत्त का नाम 'पुष्पदंत' क्यों पड़ा?

  • वह दाँतों से फूल तोड़ता था
  • उसने पुष्पदंत नाम का मंदिर बनवाया था
  • उसने राजकुमारी के दाँत से गिराए फूल का संकेत नहीं समझा था
  • शिव ने उसे यह नाम दिया था
पूरी कथा पढ़िए — फूल का इशारा

राजकुमारी ने दाँत से फूल गिराकर उसे पुष्पदंत मंदिर में बुलाया।

वह समझा नहीं, गुरु ने समझाया।

क्या हुआ?

बचे हुए एक लाख श्लोक सौंपने के बाद गुणाढ्य का क्या हुआ?

  • वह राजा का मंत्री बन गया
  • वह फिर विंध्य लौट गया
  • उसने नई कथा लिखनी शुरू की
  • उसने योग के बल से शरीर छोड़ दिया और शाप से मुक्त होकर अपने दिव्य लोक चला गया
पूरी कथा पढ़िए — गुणाढ्य की मुक्ति

माल्यवान की शाप-मुक्ति की शर्त थी कि वह कथा धरती पर फैलाए।

राजा ने बृहत्कथा लेकर *कथापीठ* रचा।

व्याख्या

यह कथा गुणाढ्य के अपमान और उसकी रचना के जल जाने की बात करती है। इसे कैसे पढ़ना ठीक है?

  • एक ऐसी कथा की तरह जो बताती है कि अनमोल रचना को संभालने वाला हर पाठक समझदार नहीं होता
  • गुणाढ्य की सच्ची जीवनी की तरह
  • राजा सातवाहन के चरित्र के ख़िलाफ़ गवाही की तरह
  • भाषाओं की श्रेष्ठता के बारे में एक निर्णय की तरह
पूरी कथा पढ़िए — एक पठन

ग्रंथ में रचना तभी बचती है जब दो शिष्य और एक बदला हुआ राजा उसे सँभालते हैं।

यह आज के पाठक का पठन है, पाठ का स्वयं का दावा नहीं।

सात लाख श्लोक और एक आग के बारे में सवाल

सात लाख श्लोक और एक आग (कथासरित्सागर) में क्या होता है?

पिशाचों की भाषा में सात लाख श्लोक, ख़ून की स्याही से लिखे — और जिस राजा के लिए लिखे, उसने उन्हें 'पिशाच की भाषा' कहकर लौटा दिया। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: विंध्य का जंगल; दो नाम; ख़ून की स्याही; राजा का तिरस्कार; जलती पोथियाँ।

कथासरित्सागर में सात लाख श्लोक और एक आग के बाद क्या आता है?

आगे नकली हाथी और वीणा की शिष्या: वीणा बजाते हुए हाथी पकड़ने निकला वत्स का राजा ख़ुद पकड़ा गया — और जिस राजकुमारी को उसे संगीत सिखाना था, उसी के साथ उसे भागना पड़ा।

सात लाख श्लोक और एक आग का स्रोत क्या है?

कथासरित्सागर, लंबक 1, तरंग 7–8।