
अध्याय १२
सम्राट और कथा का अंत
गुफ़ा में सात रत्न, कैलास के आर-पार एक सम्राट — और जहाँ से कथा चली थी, वहीं लौटकर कश्मीर की रानी तक
सम्राट और कथा का अंत — कथासरित्सागर का अध्याय १२। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 15 (महाभिषेक), तरंग 109–110; लंबक 18 (विषमशील), तरंग 120, 124, और कवि का उपसंहार। इसमें ८ दृश्य हैं — मलय पर्वत की गुफ़ा; कैलास के आर-पार; मेरु का लालच, नारद की सीख; ऋषभ पर्वत पर राज्याभिषेक; पिता का आगमन; कण्व की सुनाई वह कथा; जहाँ से चली थी, वहीं पहुँची; कवि का परिचय — और अंत में १० सवाल।
मलय पर्वत की गुफ़ा
कौशांबी के राजा उदयन का बेटा नरवाहनदत्त अब विद्याधरों का सम्राट बनने की राह पर था। एक दिन वह गोविंदकूट पर्वत पर अपनी सभा में बैठा था कि अमृतप्रभा नाम का विद्याधर आकाश से उतरा। यह वही था जिसने पहले अग्नि-पर्वत पर शत्रु के फेंके जाने पर नरवाहनदत्त को बचाया था। उसने कहा, 'दक्षिण में मलय पर्वत है, जहाँ वामदेव नाम के महामुनि का आश्रम है। वे किसी बड़े काम के लिए आपको अकेले बुला रहे हैं।' नरवाहनदत्त अपनी पत्नियों और सेना को छोड़कर अमृतप्रभा के साथ आकाश-मार्ग से मलय पहुँचा।
वामदेव बूढ़े थे, उनके केश लताओं की तरह लहराते थे। उन्होंने कहा, 'मेरे आश्रम की भीतरी गुफ़ा में कुछ रत्न हैं, जिन्हें तुम्हें लेना है। उन्हें पाने के बाद तुम मंदरदेव को आसानी से जीत लोगे। शिव की आज्ञा से मैंने तुम्हें इसीलिए बुलाया है।' नरवाहनदत्त गुफ़ा में गया। वहाँ कई बाधाएँ पार करके उसे एक बौखलाया, गरजता हाथी दिखा। उसने उसके माथे पर घूँसा मारा, उसके दाँतों पर पैर रखकर चढ़ गया और सवार हो गया। गुफ़ा से आवाज़ आई, 'शाबाश, सम्राट! तुमने हाथी-रत्न पा लिया।' फिर उसने साँप जैसी चमकती तलवार झपटकर उठा ली, तब आवाज़ आई, 'तुमने विजयी तलवार-रत्न पाया।' इसी तरह चंद्रिका-रत्न, पत्नी-रत्न और मंत्र-रत्न मिले। पहले के दो, यानी सरोवर और चंदन-वृक्ष, जोड़कर अब सात रत्न उसके पास थे। वामदेव ने कहा, 'जाओ पुत्र, कैलास के उत्तर-दक्षिण दोनों ओर का राज पाओ।'
कैलास के आर-पार
लौटकर उसने सबको अपने रत्न पाने की कथा सुनाई। उत्सव हुआ। अगले दिन शुभ मुहूर्त में वह ब्रह्मा के बनाए रथ पर, जो शिव ने उसे दिया था, अपनी सेना और पत्नियों के साथ मंदरदेव को जीतने चला। गंधर्वों और विद्याधरों के राजा, उसके सेनापति हरिशिख, और चंडसिंह, उसकी माँ-जैसी सास धनवती और अमृतप्रभा, सब साथ थे। मानस सरोवर पार करके वे कैलास की तलहटी में पहुँचे, जहाँ मंदाकिनी बहती है।
विद्याधर मंदर ने कहा, 'कैलास शिव का निवास है। उसे लाँघने से विद्या नष्ट हो जाती है। उस पार जाने के लिए त्रिशीर्ष की गुफ़ा से जाना होगा, पर उसका रखवाला देवमाय बड़ा अभिमानी है।' नरवाहनदत्त ने पहले संधि का संदेश भेजा, जिसे देवमाय ने नहीं माना। अगले दिन युद्ध हुआ। चंडसिंह ने उसके सेनापति वराह को मारा, और नरवाहनदत्त ने, बिना किसी जादुई शक्ति के, घायल और थके हुए देवमाय को बंदी बना लिया। आकाश में देवताओं के रथों से आवाज़ आई, 'शाबाश! शाबाश!' नरवाहनदत्त ने बंदी देवमाय को ढाँढस बँधाया और छोड़ दिया। देवमाय ने समर्पण कर दिया।
अगली सुबह देवमाय ने गुफ़ा की कथा सुनाई। 'पुराने समय में कैलास के उत्तर और दक्षिण दो अलग राज्य थे। ऋषभ नाम के विद्याधर ने शिव को तप से मनाया और दोनों का सम्राट बना। पर कैलास लाँघते समय शिव के क्रोध से उसकी विद्या छिन गई और वह गिर पड़ा। फिर तप करके शिव से वर पाया तो उसने पूछा कि दोनों ओर जाने का रास्ता कैसा हो। शिव ने कैलास को चीरकर यह गुफ़ा बनाई। पर फिर पर्वत दुखी हुआ कि मनुष्यों के लिए यह रास्ता खुल गया। शिव ने रखवाली के लिए दिशाओं के हाथी, विषैली दृष्टि वाले सर्प और गुह्यक रखे, और दक्षिणी द्वार पर कालरात्रि चंडिका को। उन्होंने नियम बनाया कि जिसके पास रत्न हों और जो विद्याधरों का सम्राट हो, वही इस गुफ़ा से निकल सकेगा, और कोई नहीं। ऋषभ बाद में घमंड में देवताओं से लड़ा और इंद्र के हाथों मारा गया। मेरे जन्म पर आकाशवाणी हुई थी कि जो मुझे जीतेगा वह सम्राट होगा। आपने मुझे जीता है, इसलिए आप ही सबके स्वामी हैं।'
नरवाहनदत्त ने गुफ़ा में रथ पर प्रवेश किया। रत्नों ने उसकी हर बाधा दूर की: चंद्रिका-रत्न ने अँधेरा, चंदन-वृक्ष ने विषैली दृष्टि वाले साँप, हाथी-रत्न ने दिशाओं के हाथी, तलवार-रत्न ने गुह्यक। वह उत्तरी द्वार पर निकला तो आकाशवाणी हुई, 'शाबाश सम्राट!' पर धनवती और देवमाय ने कहा कि कालरात्रि की पूजा करनी होगी। रात को सारी सेना अचेत हो गई, केवल नरवाहनदत्त जागता रहा। वह समझ गया कि कालरात्रि पूजा न होने से रुष्ट है। उसने उसकी स्तुति की। जब देवी प्रसन्न न हुई तो वह अपना सिर अर्पित करने को तलवार उठाने लगा, तभी देवी ने कहा, 'जल्दबाज़ी मत कर, पुत्र! मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। तेरी सेना जाग जाए, और तुम्हारी विजय हो।' सेना जाग गई।
अगले दिन उसने धूम्रशिख को हराकर अपने अधीन किया, फिर मंदरदेव की सेना से बड़ा युद्ध हुआ, जिसमें कंचनदंष्ट्र आदि राजाओं ने मंदरदेव का साथ दिया। अंत में मंदरदेव वन चला गया, और उसकी रानियाँ आग में जलने को तैयार हुईं तो सम्राट ने उन्हें रोका, घर और उपहार देकर बहनों की तरह रखा। उसने अमितगति को मंदरदेव का राज दिया, जिसे शिव ने पहले ही चुन रखा था।
मेरु का लालच, नारद की सीख
दोनों ओर का सम्राट बनकर भी नरवाहनदत्त के मन में और पाने की चाह जागी। वह मेरु पर्वत के उत्तरी क्षेत्र, देवताओं के घर, को जीतने निकला, मंत्रियों के मना करने पर भी। तब नारद ने आकर कहा, 'राजन्, तुम नीति जानकर भी असंभव की कामना क्यों करते हो? रावण ने अपने घमंड में कैलास उखाड़ना चाहा था और अपमानित हुआ। शिव ने तुम्हें देवताओं का नहीं, विद्याधरों का राज दिया है। मेरु तुम्हारे लिए नहीं।' नरवाहनदत्त ने ऋषभ का अंत याद करके विचार छोड़ दिया, और नारद के कहने पर मंदरदेव के पिता राजर्षि अकंपन के आश्रम गया।
वहाँ वह मंदरदेव से गले मिला, जो संन्यासी बन चुका था, क्योंकि सच्चे वीर हारे हुए का भी सम्मान करते हैं। अकंपन ने अपनी बेटी मंदरदेवी का हाथ उसे दे दिया। मंदरदेवी ने कहा, 'हम पाँच सखियाँ वन में घूमते हुए एक तपोवन में आपको देख चुकी थीं और हमने प्रण किया था कि सब एक साथ आपको पति चुनेंगी, वरना अकेले ब्याह करने वाली से बाक़ी अग्नि में प्राण देंगी। मैं अपनी सखियों के बिना कैसे ब्याह करूँ?' उसकी चार सखियाँ थीं: कंचनदंष्ट्र की बेटी कनकवती, कालजिह्व की बेटी कालवती, दीर्घदंष्ट्र की बेटी श्रुता और पौंड्र के राजा की बेटी अंबरप्रभा। पिताओं को बुलवाया गया और नरवाहनदत्त ने पाँचों से विवाह किया।
ऋषभ पर्वत पर राज्याभिषेक
अकंपन और देवमाय ने कहा कि पुराने सम्राटों का अभिषेक ऋषभ पर्वत पर हुआ था, वहीं तुम्हारा भी हो। हरिशिख ने पास के मंदर पर्वत का नाम सुझाया, पर आकाशवाणी ने कहा, 'सब पुराने सम्राटों ने ऋषभ पर्वत पर ही अभिषेक कराया, तुम भी वहीं जाओ।' वह फिर त्रिशीर्ष की गुफ़ा से लौटा। रास्ते में उसने सोचा कि शिव पास ही कैलास पर रहते हैं। वह गोमुख के साथ उनके दर्शन को गया। नंदी ने द्वार खोला। भीतर शिव पार्वती के साथ पासे खेल रहे थे। नरवाहनदत्त ने दोनों को प्रणाम करके तीन बार प्रदक्षिणा की। शिव ने कहा, 'अच्छा हुआ, पुत्र, तू आया, वरना तुझे हानि हो सकती थी। अब तेरी सब विद्याएँ अचूक रहेंगी। ऋषभ पर्वत पर अभिषेक करा।'
लौटने पर मदनमंचुका ने हँसकर पूछा, 'कहाँ गए थे, स्वामी? लगता है यहाँ भी पाँच कन्याएँ मिल गईं?' उसने सच बताया और वह प्रसन्न हुई।
अगले दिन वह गंधर्वों, विद्याधरों, पत्नियों और मंत्रियों के साथ रथ पर ऋषभ पर्वत पहुँचा। वहाँ सब विद्याधर, कोई श्रद्धा से, कोई भय से, कोई हारकर, उपहार लाए। उन्होंने पूछा, 'आपके आधे सिंहासन पर कौन बैठेगी?' उसने कहा, 'रानी मदनमंचुका।' विद्याधर सोच में पड़ गए तो आकाशवाणी हुई, 'विद्याधरो, यह मदनमंचुका मनुष्य नहीं, रति का अवतार है, जो तुम्हारे सम्राट कामदेव की पत्नी बनने के लिए जन्मी है। कलिंगसेना की जिस संतान को मदनवेग की बेटी माना गया, उसे देवताओं ने बदलकर यह कन्या रखी थी। शिव ने उसे तप से प्रसन्न होकर यह सम्मान दिया है।'
तब शुभ दिन पर महर्षियों ने सोने के घड़ों में सब तीर्थों का जल भरकर सम्राट का राज्याभिषेक किया, और मदनमंचुका उसके बाएँ आधे सिंहासन पर बैठी। पुरोहित शांतिसोम व्यस्त रहे, अप्सराओं के वाद्य गूँजे, ब्राह्मणों के मंत्र दिशाओं में फैल गए। कहते हैं कि अभिषेक का जल पड़ते ही उसके शत्रुओं के मन से वैर की गाँठ धुल गई।
पिता का आगमन
सम्राट ने अपने पिता को याद किया और वायुपथ को कौशांबी भेजा। वह सत्तर लाख विद्याधरों के साथ पहुँचा, जिसे देखकर नगर के लोग हक्के-बक्के रह गए। उसने उदयन को पुत्र के विजय और अभिषेक की ख़बर दी। उदयन, वासवदत्ता और पद्मावती, यौगंधरायण और अन्य मंत्री और पुत्र के मामा गोपालक पालकी में आकाश से ऋषभ पर्वत पहुँचे। नरवाहनदत्त पिता को देखते ही दौड़कर उनके गले लगा, और पिता के आनंद के आँसुओं से उसका दूसरा अभिषेक हो गया। वासवदत्ता ने उसे इतनी देर तक लिपटाए रखा कि उसे अपना बचपन याद आ गया। कलिंगसेना ने बेटी-दामाद को देखा तो उसकी ख़ुशी समा न सकी। मदनमंचुका के साथ रत्नप्रभा, अलंकारवती, ललितलोचना, कर्पूरिका, शक्तियशा और सब रानियों ने सास-ससुर को प्रणाम किया, और उन्होंने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी।
भोज में रत्नों के प्याले, फूल-बिछे आँगन और जादू से बने तरह-तरह के पकवान थे। दिन बीते और उदयन को अपने नगर की याद आने लगी। उसने बेटे से कहा, 'बेटा, इन दिव्य सुखों की क़द्र कौन नहीं करेगा? पर अपनी जन्मभूमि में रहने का मोह हर किसी को खींचता है। तुम यहाँ राज करो, जो आधे देव-आधे मनुष्य हो। कभी उचित अवसर आए तो मुझे फिर बुला लेना। मेरे जन्म का फल यही है कि मैंने तुम्हारा यह चाँद-सा मुख देखा।' नरवाहनदत्त ने आँसू भरी आवाज़ में देवमाय से कहा कि पिता के आगे एक हज़ार भार सोना और रत्न भेज दो। उदयन परिवार और मंत्रियों के साथ दिव्य रथ पर लौट गए। बेटा काफ़ी दूर तक साथ गया, और माँ वासवदत्ता ने रुँधे गले से उसे वापस लौटाया।
कण्व की सुनाई वह कथा
अब कथा वहाँ लौटती है जहाँ नरवाहनदत्त ने अपने बिछोह की बात छेड़ी थी। काले पर्वत पर कश्यप के आश्रम में बैठे नरवाहनदत्त ने ऋषियों से कहा, 'जब वेगवती मुझे ले जाकर एक विद्या की रक्षा में छोड़ गई, तब मैं अपनी पत्नी से बिछड़कर दुख में प्राण देना चाहता था। तभी मुझे जंगल में महर्षि कण्व मिले। उन्होंने मुझसे कहा, "तुम चंद्रवंश के वीर होकर भी इतने उदास क्यों हो? जो अनहोनी लगती है, वैसे मिलन भी होते हैं। मैं तुम्हें विक्रमादित्य की कथा सुनाता हूँ।"'
उज्जयिनी का राजा महेंद्रादित्य संतान के लिए शिव की उपासना करता था। उधर कैलास पर देवता शिव के पास गए, 'म्लेच्छों के रूप में जन्मे असुर यज्ञ बंद करा रहे हैं और ब्राह्मणों को सता रहे हैं, इसलिए देवताओं का भाग घट रहा है।' (यहाँ 'म्लेच्छ' कवि का शब्द है, जो धर्म न मानने वाले अत्याचारियों के लिए है, किसी आज के समुदाय के लिए नहीं।) शिव ने अपने गण माल्यवत् को आदेश दिया कि वह महेंद्रादित्य के घर जन्म लेकर उनका नाश करे। माल्यवत् ने पूछा, 'मनुष्य जीवन में तो बिछोह, बुढ़ापा और रोग हैं।' शिव ने कहा, 'तुझे ये दुख नहीं छुएँगे।' राजा ने सपने में शिव का वचन सुना कि तुझे पराक्रमी पुत्र होगा, जिसका नाम विक्रमादित्य और विषमशील होगा। रानी ने सपने में सात समुद्र पार किए, और यक्ष, वेताल और राक्षस उसकी सेवा में थे। एक दिन उसने पुत्र को जन्म दिया तो आकाश से फूल बरसे और देवताओं के नगाड़े बजे। राजा ने इतना धन लुटाया कि बौद्धों को छोड़कर, कहते हैं, कोई बिना देव के न रहा। मंत्री के बेटे महामति, द्वारपाल के बेटे भद्रायुध और पुरोहित के बेटे श्रीधर, तीनों उसके साथ बड़े हुए।
(कण्व की इस विक्रमादित्य-कथा में आगे बहुत-सी कथाएँ गूँथी हैं: यक्षिणी मदनमंजरी की, कलिंगसेना के विवाह की, पति-पत्नी के बिछोह और मिलन की। वे इस अध्याय में नहीं ली गईं।)
कथा के अंत में सीख यह थी: 'इसी तरह अनायास बिछोह और मिलन होते हैं। इसलिए, नरवाहनदत्त, तुम भी जल्दी अपनी प्रिया से मिलोगे। धैर्य रखो। तुम वत्स-राज के बेटे, अपनी पत्नियों और मंत्रियों के बीच बहुत समय तक विद्याधरों के सम्राट का सुख भोगोगे।' इस उपदेश से नरवाहनदत्त को धैर्य मिला। इसी तरह उसे पत्नियाँ, विद्याएँ और विद्याधरों का साम्राज्य मिला, जैसा कि उसने ऋषियों को बताया। बरसात गोपालक के साथ बिताकर वह अपनी पत्नियों के साथ रथ पर ऋषभ पर्वत लौटा, और कल्प भर तक, यानी अनगिनत वर्षों तक, उसने राज किया।
जहाँ से चली थी, वहीं पहुँची
कथासरित्सागर कहता है: यही वह बृहत्कथा है जो बहुत पहले कैलास के शिखर पर निडर शिव ने हिमालय की बेटी के अनुरोध पर सुनाई। फिर शाप से पृथ्वी पर कात्यायन आदि के रूप में जन्मे पुष्पदंत और उसके साथियों ने इसे संसार में फैलाया। और शिव ने इस कथा को एक आशीर्वाद दिया: 'जो भी मेरे मुँह से निकली इस कथा को पढ़ेगा, ध्यान से सुनेगा या अपने पास रखेगा, वह जल्दी पापों से छूटेगा, श्रेष्ठ विद्याधर का पद पाएगा और मेरे अनंत लोक में प्रवेश करेगा।' इस तरह कथा का पहला श्रोता, पार्वती, और आख़िरी सम्राट, नरवाहनदत्त, एक ही आशीर्वाद के भीतर आ मिले।
कवि का परिचय
अंत में सोमदेव ने अपने बारे में कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं। कश्मीर में संग्राम नाम का राजा था। उसके बेटे अनंत हुए, जिनकी कीर्ति दूर तक फैली थी। अनंत ने त्रिगर्त के राजा की बेटी सूर्यवती से विवाह किया। सूर्यवती ने कश्मीर में उत्तम विहार और मंदिर बनवाए, वितस्ता नदी के किनारे श्वेत भवन बनवाए, और सोना, रत्न, गायें और ज़मीन दान की। उनके बेटे राजा कलश थे, और पोते राजा हर्ष। सोमदेव कहते हैं कि उन्होंने इस बृहत्कथा का सार, यानी यह संक्षेप, उसी रानी का मन थोड़ी देर बहलाने के लिए रचा, जो पूजा-विधि में लगी रहती थीं और पुस्तकों से सीखती थीं। उसके रचयिता सोम थे, राम के बेटे, एक सज्जन ब्राह्मण। आख़िर में उन्होंने कामना की कि यह कथाओं की नदियों का सागर, निर्मल मन वाले सोम की रचना, सज्जनों के हृदय को आनंद दे।
टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 15, तरंग 109–110; लंबक 18, तरंग 120 और 124) से सीधे लिखा गया है। कवि के अंतिम श्लोक ब्रॉकहाउस के संस्कृत पाठ में शामिल नहीं थे, इसलिए टॉनी में भी नहीं हैं; बाद में वे दूसरे संस्कृत संस्करणों में छपे। पेंज़र के संस्करण में उनका एल. डी. बार्नेट का अंग्रेज़ी अनुवाद है, जिसे पेंज़र पहली बार अंग्रेज़ी में छपा बताते हैं; यहाँ केवल उसका सार लिया है, टिप्पणियाँ नहीं। विक्रमादित्य की कथा में पहले से बहुत-सी भीतरी कथाएँ हैं; कलिंगसेना के विवाह वाली कथा जबरन विवाह की है और बाक़ी भी लंबी हैं, इसलिए केवल जन्म और ढाँचा लिया गया है। कालरात्रि को सिर अर्पित करने की तैयारी का वर्णन संयत रखा गया है। मेरु पर चढ़ाई, मंदरदेव की रानियों के सती होने का विचार और 'म्लेच्छ' शब्द पात्रों और कवि की भाषा हैं।
स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, सम्राट और कथा का अंत