नकली हाथी और वीणा की शिष्या — कथासरित्सागर, चित्र

अध्याय ४

नकली हाथी और वीणा की शिष्या

वीणा बजाते हुए हाथी पकड़ने निकला वत्स का राजा ख़ुद पकड़ा गया — और जिस राजकुमारी को उसे संगीत सिखाना था, उसी के साथ उसे भागना पड़ा

नकली हाथी और वीणा की शिष्या — कथासरित्सागर का अध्याय ४। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 2 (कथामुख), तरंग 9, 11–13। इसमें ५ दृश्य हैं — रक्त का तालाब; साँप और वीणा; नकली हाथी; संगीत सिखाने की शर्त; हथिनी पर भागना — और अंत में १० सवाल।

रक्त का तालाब

कथा अब गुणाढ्य से आगे बढ़कर वत्स देश पहुँचती है। वहाँ कौशाम्बी नगरी में राजा शतानीक का वंश चलता था। उसके बेटे सहस्रानीक का विवाह अयोध्या की राजकुमारी मृगावती से हुआ। पर यह विवाह एक पुरानी बात से जुड़ा था।

इंद्र ने सहस्रानीक को स्वर्ग बुलाकर बताया, 'बहुत पहले मैं ब्रह्मा के दरबार गया था। वहाँ विधूम नाम का एक वसु और अलंबुषा नाम की अप्सरा एक-दूसरे को देखकर मोहित हो गए। मैंने क्रोध में दोनों को शाप दिया: "धरती पर जन्म लो और वहीं पति-पत्नी बनो।" वह वसु तुम हो, और अप्सरा अयोध्या के राजा कृतवर्मा की बेटी मृगावती है।'

लौटते समय अप्सरा तिलोत्तमा ने राजा से कहा, 'मुझे एक बात कहनी है, ज़रा रुको।' पर राजा का मन तब भी मृगावती में था। वह बिना सुने चला गया। तिलोत्तमा ने क्रोध में उसे शाप दिया, 'जिसके ध्यान में तुम मेरी बात नहीं सुनते, उससे तुम चौदह वर्ष अलग रहोगे।' इंद्र के सारथी मातलि ने यह शाप सुना, राजा ने नहीं।

सहस्रानीक का विवाह मृगावती से हुआ। कुछ समय बाद वह गर्भवती हुई, और उसने राजा से एक अजीब इच्छा बताई: वह रक्त के तालाब में नहाना चाहती थी। धर्मात्मा राजा ने उसकी इच्छा पूरी करने के लिए लाख और दूसरे लाल रंगों से एक तालाब भरवाया, जो ख़ून जैसा लगता था। जब रानी उसमें नहाकर लाल रंग से लथपथ खड़ी थी, तभी गरुड़ जाति का एक पक्षी झपटा। उसने उसे कच्चा मांस समझकर उठा लिया और उड़ गया।

राजा बेहोश होकर गिर पड़ा। होश आने पर मातलि ने आकर उसे तिलोत्तमा का शाप बताया और यह भी कि वह कब समाप्त होगा। राजा ने उम्मीद के सहारे जैसे-तैसे जान बचाए रखी।

उधर पक्षी को जब पता चला कि वह जीवित स्त्री को उठा लाया है, तो उसने उसे उदयाचल की एक पहाड़ी पर छोड़ दिया। अकेली, एक ही वस्त्र में, वह जंगल में रोती रही। एक विशाल साँप उसे निगलने आया, तभी कोई दिव्य वीर उतरा, साँप को मारा और ग़ायब हो गया। निराश होकर उसने एक जंगली हाथी के सामने ख़ुद को डाल दिया, पर हाथी ने भी उसे नहीं मारा। फिर वह पहाड़ से कूदकर जान देने चली, तब कंद-मूल खोजने आए एक ऋषि-पुत्र ने उसका रोना सुना। उसने उसे जमदग्नि के आश्रम पहुँचाया। जमदग्नि ने कहा, 'बेटी, यहाँ तुझे एक पुत्र होगा जो पिता का वंश सँभालेगा, और तू अपने पति से मिलेगी। रो मत।'

कुछ दिन बाद उसे बेटा हुआ। आकाशवाणी हुई, 'उदयन नाम का एक यशस्वी राजा जन्मा है, और उसका पुत्र सब विद्याधरों का सम्राट होगा।' मृगावती का खोया हुआ सुख लौट आया।

साँप और वीणा

उदयन आश्रम में बड़ा हुआ। जमदग्नि ने उसके क्षत्रिय-संस्कार किए और उसे विद्या और तीरंदाज़ी सिखाई। प्यार से मृगावती ने अपनी कलाई से सहस्रानीक के नाम वाला कंगन उतारकर उसकी कलाई में पहना दिया।

एक दिन उदयन हिरन के पीछे जंगल में घूम रहा था। उसने देखा कि एक शबर ने एक साँप को पकड़ रखा है। उदयन को तरस आया। उसने कहा, 'मेरे कहने से इस साँप को छोड़ दो।' शबर बोला, 'स्वामी, यही मेरी रोज़ी है। मैं ग़रीब हूँ और नाचने वाले साँप दिखाकर पेट भरता हूँ। मेरा पहला साँप मर गया, तो मैंने जंगल में खोजकर इसे मंत्र से वश में किया।' उदयन ने उदारता से अपनी माँ का दिया कंगन उस शबर को दे दिया और साँप को छुड़वा लिया।

साँप ने उसके सामने सिर झुकाया और कहा, 'मैं वासुकि का बड़ा भाई वसुनेमि हूँ। तुमने मुझे बचाया, इसलिए यह वीणा लो। इसके तार मीठे बजते हैं और स्वर चौथाई सुरों में बँटे हैं। साथ में पान का पत्ता, कभी न मुरझाने वाली मालाएँ गूँथने की कला और माथे पर ऐसे तिलक लगाने की कला, जो कभी धुँधले नहीं होते।'

वीणा लेकर उदयन आश्रम लौटा। उधर शबर वही कंगन बाज़ार में बेचने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया। उस पर राजा सहस्रानीक का नाम खुदा था। राजा ने ख़ुद उससे पूछा। शबर ने पूरी बात बताई। कंगन पहचानकर राजा के मन में आशा और शंका दोनों जागीं। तभी आकाशवाणी हुई, 'राजन्, तुम्हारा शाप समाप्त हुआ। तुम्हारी पत्नी मृगावती पुत्र के साथ जमदग्नि के आश्रम में है।' अगले दिन राजा शबर के बताए रास्ते से सेना लेकर पूर्वी पहाड़ पर आश्रम पहुँचा। जमदग्नि को प्रणाम करके वह मृगावती और उदयन को लेकर कौशाम्बी लौटा। उदयन को युवराज बना दिया गया। मंत्रियों के बेटे यौगंधरायण, रुमण्वान और वसंतक उसके साथी बने। फिर आकाश से फूल बरसे और आवाज़ आई, 'इन अच्छे मंत्रियों की सहायता से राजकुमार पूरी धरती पर राज करेगा।' बाद में बुढ़ापा आने पर सहस्रानीक ने उदयन को गद्दी देकर पत्नी और मंत्रियों के साथ हिमालय की राह ली।

नकली हाथी

उदयन ने वत्स का राज सँभाला और कौशाम्बी में प्रजा का पालन किया। पर धीरे-धीरे उसने राज-काज मंत्रियों पर छोड़ दिया और मनोरंजन में डूब गया। वह दिन-रात शिकार करता, और वासुकि के भाई की दी हुई वीणा बजाता। उस वीणा के जादू से वह जंगली मतवाले हाथियों को मोह लेता और पालतू बनाकर घर ले आता।

उसके मन में एक ही चिंता थी, 'मेरे जैसे कुल और रूप की कोई स्त्री कहीं नहीं मिलती। बस वासवदत्ता नाम की कन्या ही मुझे पसंद करती है। पर उसे पाऊँ कैसे?'

उज्जयिनी में राजा चंडमहासेन भी यही सोच रहा था, 'मेरी बेटी के लिए दुनिया में उदयन के सिवा कोई योग्य वर नहीं, और वह हमेशा मेरा शत्रु रहा है। उसे दामाद और मित्र कैसे बनाऊँ?' उसे उपाय सूझा। 'वह शिकार का शौक़ीन है, हाथी पकड़ने अकेला जंगल में घूमता है, संगीत जानता है। मैं उसे उसी की कमज़ोरी से फँसाऊँगा, और अपनी बेटी को उसकी शिष्या बनाऊँगा। तब वह ज़रूर उस पर रीझेगा।' उसने दुर्गा के मंदिर में जाकर प्रार्थना की और आकाशवाणी सुनी, 'तेरी यह इच्छा जल्द पूरी होगी।' उसने पहले दूत से उदयन के पास प्रस्ताव भेजा, पर उदयन का उत्तर सुनकर समझ गया कि वह घमंडी राजा ख़ुद नहीं आएगा। और वह अपनी बेटी उसके दरबार में भेज भी नहीं सकता था।

तब उसने अपने मंत्रियों से सलाह करके एक बड़ा नकली हाथी बनवाया और उसके भीतर सैनिक छिपाकर उसे विंध्य के जंगल में खड़ा करवा दिया। उदयन के भेदियों ने उसे दूर से देखा और दौड़कर राजा को बताया, 'महाराज, जंगल में एक अकेला हाथी घूम रहा है, जिसके बराबर पूरी दुनिया में कोई नहीं। वह विंध्य की चलती चोटी जैसा लगता है।' उदयन ने ख़ुश होकर उन्हें लाख सोने के सिक्के दिए। उसने रात भर सोचा, 'अगर मैं यह हाथी पकड़ लूँ, जो नलागिरि के बराबर है, तो चंडमहासेन ज़रूर मेरे वश में आ जाएगा।' सुबह वह मंत्रियों की बात अनसुनी करके चल पड़ा, यहाँ तक कि उसने ज्योतिषियों की इस चेतावनी पर भी ध्यान नहीं दिया कि इस घड़ी में प्रस्थान का फल 'कन्या का लाभ और क़ैद' है।

विंध्य पहुँचकर उसने सेना को दूर रोका, ताकि हाथी डर न जाए। फिर भेदियों के साथ, हाथ में अपनी मधुर वीणा लिए, वह जंगल में घुसा। दक्षिण की ढलान पर उसने वह हाथी देखा, जो बिल्कुल असली लगता था। वह धीरे-धीरे अकेला उसकी ओर बढ़ा, वीणा बजाता और मीठे स्वर में गाता हुआ, यह सोचता कि हाथी को कैसे बाँधे। संगीत में डूबे उसे शाम का अँधेरा घिरने लगा, और उसे पता न चला कि हाथी नक़ली है। हाथी कान फड़फड़ाता रहा, मानो संगीत सुनकर ख़ुश हो रहा हो, कभी आगे आता, कभी पीछे हटता, और इस तरह राजा को बहुत दूर खींच ले गया। तभी नकली हाथी के भीतर से कवचधारी सैनिक निकल पड़े और उदयन को घेर लिया। उसने क्रोध में शिकारी छुरी खींच ली और सामने वालों से लड़ा, पर पीछे से दूसरों ने उसे पकड़ लिया। उसे उज्जयिनी ले जाया गया।

संगीत सिखाने की शर्त

चंडमहासेन बड़े आदर से उसे लेने आया और नगर में ले गया। नागरिकों ने उसे देखा, चंद्रमा की तरह सुंदर पर अपमान के धब्बे से भरा। उन्हें लगा कि उसे मार दिया जाएगा, और उसके गुणों से स्नेह के कारण वे धरना देने बैठ गए। तब चंडमहासेन ने नगरवासियों को शांत किया कि वह उसे मारना नहीं, मित्र बनाना चाहता है। उसने अपनी बेटी वासवदत्ता को उसी समय उदयन को संगीत सिखाने के लिए सौंप दिया और कहा, 'राजन्, इस कन्या को संगीत सिखाओ। इसी से तुम्हारे इस साहस का अच्छा फल मिलेगा। निराश मत होओ।'

उस सुंदरी को देखते ही उदयन का क्रोध ग़ायब हो गया। उसका मन प्रेम में डूब गया। वासवदत्ता का मन भी उसी तरह उसकी ओर मुड़ा, उसकी आँखें लज्जा से झुकी रहीं, पर मन नहीं। इस तरह वत्स का राजा चंडमहासेन के संगीत-कक्ष में रहता, वासवदत्ता को गाना सिखाता, उसकी आँखें हर समय उसी पर टिकी रहतीं। गोद में उसकी वीणा, कंठ में सुर, और सामने खड़ी वासवदत्ता।

उधर कौशाम्बी में राजा के साथी लौट आए और पूरे राज्य में हलचल मच गई। नाराज़ प्रजा उज्जयिनी पर चढ़ाई करना चाहती थी। पर सेनापति रुमण्वान ने उन्हें रोका कि चंडमहासेन बलवान राजा है और हमला राजा की जान को ख़तरे में डाल सकता है। युक्ति से काम लेना होगा। शांत और दृढ़ यौगंधरायण ने कहा, 'तुम सब यहीं सावधान रहो और देश की रक्षा करो। मैं केवल वसंतक के साथ जाऊँगा और अपनी बुद्धि से राजा को छुड़ा लाऊँगा। मेरे पास दीवारें तोड़ने, बेड़ियाँ काटने और अदृश्य होने के मंत्र और नुस्ख़े हैं।' उसने अपने मंत्र से अपना ऐसा रूप बना लिया कि देखने वालों को वह पागल लगा, और वसंतक को एक बेढब रूप दिया, उभरी नसों, बड़ा पेट और बाहर निकले दाँत वाला। वसंतक को आगे भेजकर वह नाचता-गाता, ब्राह्मण लड़कों से घिरा, उज्जयिनी में घुसा और राजा के महल तक पहुँचा। रानियों में उत्सुकता जगी, और वासवदत्ता ने एक दासी भेजकर उसे संगीत-कक्ष में बुलवा लिया।

वहाँ जंजीरों में बँधे उदयन को देखकर पागल का वेश धरे यौगंधरायण की आँखों में आँसू आ गए। उसने राजा को इशारा किया। राजा ने उसे तुरंत पहचान लिया। फिर यौगंधरायण ने अपनी शक्ति से ख़ुद को वासवदत्ता और उसकी सखियों से अदृश्य कर लिया। सबने हैरानी से कहा, 'वह पागल अचानक कहाँ चला गया?' राजा ने समझ लिया और चालाकी से वासवदत्ता से कहा, 'बेटी, सरस्वती की पूजा की सामग्री ले आओ।' वह सखियों के साथ चली गई। तब यौगंधरायण ने राजा को बेड़ियाँ तोड़ने के मंत्र बताए और वीणा के तारों से बँधे ऐसे मंत्र दिए जिनसे वासवदत्ता का मन जीता जा सके। उसने कहा कि वसंतक बाहर खड़ा है, उसे बुलवा लो, और यह भी कि जब वासवदत्ता को आप पर भरोसा हो जाए तब जो मैं कहूँ वही करना, तब तक चुप रहो।

वासवदत्ता पूजा-सामग्री लेकर लौटी, तो राजा ने कहा, 'बाहर एक ब्राह्मण खड़ा है, उसे भीतर बुलाओ, सरस्वती की पूजा करवा देगा।' वसंतक को बुलवाया गया। वह राजा को देखकर रो पड़ा, तब राजा ने भेद छिपाने को कहा, 'ब्राह्मण, मैं तुम्हारी यह बीमारी की विकृति दूर कर दूँगा। रोओ मत, यहीं रहो।' राजा उसकी सूरत देखकर अपनी हँसी नहीं रोक पाया। वसंतक ने भाँप लिया और ऐसा खिलखिलाया कि उसका बिगड़ा चेहरा और बिगड़ गया। उसे गुड़िया की तरह दाँत निकालते देखकर वासवदत्ता भी हँस पड़ी। उसने मज़ाक में पूछा, 'ब्राह्मण, तुम कौन-सी विद्या जानते हो?' वह बोला, 'राजकुमारी, मैं कथा सुनाने में निपुण हूँ।' उसने कहा, 'तो सुनाओ।' और वसंतक ने उसे कथाएँ सुनाईं।

हथिनी पर भागना

जैसे-जैसे दिन गुज़रे, वासवदत्ता का राजा के प्रति स्नेह बढ़ता गया और वह अपने पिता के विरुद्ध उसका साथ देने लगी। तब यौगंधरायण ने फिर अदृश्य होकर आकर राजा को निजी रूप से सलाह दी, 'राजा, चंडमहासेन ने आपको छल से बंदी बनाया था, और अब वह आपको अपनी बेटी देकर आदर से छोड़ना चाहता है। पर हम उसकी बेटी को ही भगा ले चलें। इस तरह हम उसके घमंड का बदला भी लेंगे और दुनिया हमें कमज़ोर नहीं समझेगी। राजा ने वासवदत्ता को भद्रावती नाम की एक हथिनी दी है। उसके बराबर तेज़ केवल नलागिरि है, पर वह इस हथिनी को देखकर लड़ेगा नहीं। इसका महावत आषाढ़क है, जिसे मैंने धन देकर अपनी ओर कर लिया है। आप शस्त्र बाँधकर वासवदत्ता के साथ रात को चुपके से उस पर निकल जाइए। हाथियों के अधीक्षक को शराब पिलवा दीजिए, ताकि वह कुछ भाँप न सके। मैं पुलिंदक के पास जाता हूँ, जो आपका मित्र है, ताकि वह रास्ते की रक्षा करे।'

राजा ने यह सब वासवदत्ता को बताया। वह मान गई। उसने आषाढ़क को बुलाकर उसे तैयार किया, और देवताओं की पूजा के बहाने हाथियों के अधीक्षक और सब महावतों को शराब पिलाकर नशे में कर दिया। शाम को, जब बादल गरज रहे थे, आषाढ़क हथिनी तैयार करके लाया। साज बाँधते हुए हथिनी चिंघाड़ी। हाथियों की भाषा समझने वाले अधीक्षक ने उसे सुना और नशे में हकलाकर कहा, 'हथिनी कह रही है कि आज वह तिरसठ योजन जाएगी।' पर नशे में उसके मन में कुछ नहीं बैठा, और बाक़ी महावतों ने तो सुना ही नहीं।

उदयन ने यौगंधरायण के मंत्रों से अपनी बेड़ियाँ तोड़ीं, अपनी वीणा ली, वासवदत्ता ने ख़ुद उसके शस्त्र लाकर दिए। वह वसंतक के साथ हथिनी पर बैठा, फिर वासवदत्ता अपनी सखी काञ्चनमाला के साथ चढ़ी। राजा और महावत सहित पाँचों उज्जयिनी से निकले। हथिनी ने क्रोध में परकोटे को चीर डाला, और राजा ने वहाँ पहरा दे रहे दो योद्धाओं वीरबाहु और तालभट को मार गिराया। फिर वह तेज़ी से प्रिया को लेकर निकल पड़ा।

उधर नगर के पहरेदारों ने परकोटे पर मरे हुए प्रहरियों को देखा और घबराकर राजा को ख़बर दी। चंडमहासेन को पता चला कि वत्सराज वासवदत्ता को लेकर भाग गया है। नगर में हड़कंप मच गया, और उसका एक बेटा पालक नलागिरि पर चढ़कर पीछे दौड़ा। पर नलागिरि भद्रावती को देखकर लड़ा ही नहीं। भाई गोपालक ने, जो पिता का हित चाहता था, पालक को रोक लिया।

आधे दिन तक वे विंध्य के जंगल पहुँच गए। हथिनी तिरसठ योजन चल चुकी थी और प्यासी थी। राजा और रानी उतरे, हथिनी ने पानी पिया, पर पानी बुरा था और वह वहीं गिरकर मर गई। उसी समय आकाश से यह आवाज़ आई, 'राजन्, मैं मायावती नाम की विद्याधरी हूँ, शाप से इतने दिनों से हथिनी बनी थी। आज मैंने आपका भला किया है, और आपके पुत्र का भी भला करूँगी। यह आपकी रानी वासवदत्ता कोई साधारण स्त्री नहीं। एक ख़ास कारण से वह देवी धरती पर जन्मी है।'

फिर राजा ने वसंतक को पुलिंदक के पास भेजा, और वह रानी के साथ पैदल धीरे-धीरे चल रहा था कि डाकुओं ने घात लगाकर घेर लिया। अकेले धनुष से राजा ने वासवदत्ता के सामने एक सौ पाँच डाकू मार दिए। तभी पुलिंदक, यौगंधरायण और वसंतक आ पहुँचे। भीलों के राजा ने बचे हुए डाकुओं को रोका और राजा को प्रणाम करके उसे और उसकी प्रिया को अपने गाँव ले गया। अगली सुबह रुमण्वान सारी सेना के साथ पहुँच गया, ऐसा लगा जैसे पूरा विंध्य-वन घिर गया हो।

थोड़ी देर बाद उज्जयिनी से यौगंधरायण का एक व्यापारी मित्र आया और बोला, 'राजा चंडमहासेन आपको दामाद बनाकर प्रसन्न हैं। वे अपना द्वारपाल भेज रहे हैं।' आगे संदेश आया कि चंडमहासेन कहता है, 'आपने ठीक किया कि वासवदत्ता को ख़ुद ले गए। मैंने आपको इसीलिए दरबार में बुलवाया था। मैंने क़ैद के समय उसे इसलिए नहीं दिया कि कहीं आप मुझसे नाराज़ न रहें। अब कृपा करके थोड़ा रुकिए, ताकि विवाह विधि से हो सके। मेरा बेटा गोपालक कौशाम्बी आकर यह विवाह विधिवत् कराएगा।' राजा प्रसन्न हुआ और वासवदत्ता को लेकर कौशाम्बी चल पड़ा। नगर के लोगों ने उसे वैसे ही देखा जैसे मोर बिजली से भरे बादल को देखते हैं। गोपालक आया तो वासवदत्ता की आँखों में पिता का संदेश पाकर आँसू आ गए, और उसे अपना जीवन सफल लगा। अगले दिन उसने पूरे विधि-विधान से वासवदत्ता का विवाह वत्सराज से करवाया। उदयन ने गोपालक और पुलिंदक को पगड़ियाँ पहनाकर सम्मानित किया, और यौगंधरायण तथा रुमण्वान को आए हुए राजाओं का स्वागत सौंप दिया।

टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 2, तरंग 9 और 11–13) से सीधे लिखा गया है। यहाँ उदयन के प्रसंग का केवल मुख्य सूत्र लिया गया है। चंडमहासेन का जादुई तलवार वाला पूर्व-प्रसंग (अंगारवती और सूअर के रूप का दैत्य) और वसंतक की सुनाई कथाएँ (रूपिणिका, देवस्मिता आदि) इस अध्याय में नहीं हैं। 'हथिनी तिरसठ योजन' पाठ की संख्या है। रानियों और 'गुप्त विवाह' के ब्योरे जान-बूझकर नहीं दिए गए। नाम पाठ के रूप में हैं: सहस्रानीक, मृगावती, उदयन, यौगंधरायण, रुमण्वान, वसंतक, चंडमहासेन, वासवदत्ता, नलागिरि, भद्रावती।

स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, नकली हाथी और वीणा की शिष्या

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

उदयन के माता-पिता कौन थे?

  • शतानीक और विष्णुमती
  • चंडमहासेन और अंगारवती
  • सहस्रानीक और मृगावती
  • जमदग्नि और कलावती
पूरी कथा पढ़िए — दो शापित जीव

इंद्र के शाप से वसु विधूम राजा सहस्रानीक बना, और अप्सरा अलंबुषा मृगावती।

उदयन का जन्म जमदग्नि के आश्रम में हुआ।

क्या हुआ?

मृगावती को आकाश में कौन उठा ले गया, और क्यों?

  • गरुड़ जाति का एक पक्षी, जिसने लाल रंग से लथपथ उसे कच्चा मांस समझ लिया
  • एक राक्षस, जो उससे बदला लेना चाहता था
  • एक विद्याधर, जो उस पर मोहित था
  • एक दैत्य, जिसने शिव का आदेश पाया था
पूरी कथा पढ़िए — लाख का तालाब

राजा ने उसकी इच्छा पर लाख के रंग से ख़ून जैसा तालाब भरवाया।

पक्षी को पता चला कि वह जीवित है, तो उसने उसे पूर्व के पर्वत पर छोड़ दिया।

ऐसा क्यों?

तिलोत्तमा ने सहस्रानीक को चौदह वर्ष के वियोग का शाप क्यों दिया?

  • उसने तिलोत्तमा का अपमान किया था
  • वह युद्ध से भाग आया था
  • उसने मृगावती को छोड़ दिया था
  • मृगावती के ध्यान में डूबे राजा ने तिलोत्तमा की बात नहीं सुनी और चल दिया
पूरी कथा पढ़िए — अनसुनी बात

तिलोत्तमा ने पुकारकर कहा था कि वह कुछ कहना चाहती है।

शाप मातलि ने सुना, राजा ने नहीं।

क्या हुआ?

उदयन को उसकी वीणा किसने दी?

  • जमदग्नि ने
  • साँप वसुनेमि ने, जिसे उदयन ने शबर से छुड़वाया था
  • चंडमहासेन ने
  • इंद्र के सारथी मातलि ने
पूरी कथा पढ़िए — बदले में वीणा

उदयन ने माँ का दिया कंगन देकर साँप को छुड़वाया।

साँप ने कृतज्ञता में वीणा, पान और मालाएँ बाँधने की कला दी।

किसने कहा?

'राजन्, इस कन्या को संगीत सिखाओ। इसी से तुम्हारे इस साहस का अच्छा फल मिलेगा। निराश मत होओ।' यह किसने कहा?

  • चंडमहासेन ने, उदयन से
  • यौगंधरायण ने, उदयन से
  • वासवदत्ता ने, वसंतक से
  • गोपालक ने, पालक से
पूरी कथा पढ़िए — बंदी गुरु

चंडमहासेन ने अपनी बेटी को उसकी शिष्या बना दिया।

उदयन का क्रोध वासवदत्ता को देखते ही ग़ायब हो गया।

ऐसा क्यों?

चंडमहासेन ने नकली हाथी क्यों बनवाया?

  • वह नगर की रक्षा के लिए हाथी चाहता था
  • वह राजकुमारी का विवाह किसी और से कराना चाहता था
  • वह उदयन की वीणा चुराना चाहता था
  • उदयन को हाथी पकड़ने का शौक़ था, और चंडमहासेन उसे उसी कमज़ोरी से फँसाकर उज्जयिनी बुलाना चाहता था
पूरी कथा पढ़िए — शौक़ ही जाल

दूत बुलाने पर उदयन नहीं आता, यह चंडमहासेन जानता था।

इसलिए उसने नकली हाथी में सैनिक छिपाकर जंगल में रखवाया।

क्या हुआ?

यौगंधरायण उज्जयिनी में महल तक कैसे पहुँचा?

  • सैनिकों से लड़कर
  • मंत्र से पागल का वेश बनाकर, और वसंतक को भी बेढब रूप देकर
  • साधु बनकर
  • व्यापारी का वेश बनाकर
पूरी कथा पढ़िए — भेस में मंत्री

वह नाचता-गाता, ब्राह्मण लड़कों से घिरा महल पहुँचा।

वासवदत्ता ने ख़ुद उसे संगीत-कक्ष में बुलवा लिया।

तथ्य

उदयन और वासवदत्ता किस पर बैठकर उज्जयिनी से भागे?

  • नलागिरि पर
  • एक घोड़े पर
  • भद्रावती नाम की हथिनी पर
  • एक रथ पर
पूरी कथा पढ़िए — तेज़ हथिनी

केवल नलागिरि ही उसके बराबर तेज़ था, पर वह उसे देखकर लड़ता ही नहीं था।

महावत आषाढ़क पहले ही यौगंधरायण की ओर था।

क्या हुआ?

विंध्य में पानी पीकर मर जाने पर हथिनी ने क्या कहा?

  • वह राजा की शत्रु थी
  • वह चंडमहासेन की भेजी जासूस थी
  • वह कृतज्ञ साँप का रूप थी
  • वह मायावती नाम की विद्याधरी थी जो शाप से हथिनी बनी थी, और वासवदत्ता कोई साधारण स्त्री नहीं
पूरी कथा पढ़िए — आकाश से आवाज़

मायावती ने कहा कि आज उसने राजा का भला किया है, आगे उसके पुत्र का भी भला करेगी।

उसने वासवदत्ता को एक ख़ास कारण से धरती पर जन्मी देवी कहा।

व्याख्या

उदयन के पकड़े जाने और फिर वासवदत्ता के साथ भाग निकलने की कथा को कैसे पढ़ना ठीक है?

  • एक ऐसी कथा की तरह जिसमें राजा की कमज़ोरी (शिकार का शौक़) ही जाल बनती है, पर वही कमज़ोरी उसे अपनी रानी तक पहुँचा देती है
  • एक सच्चे राजनीतिक युद्ध के वर्णन की तरह
  • शिकार के विरुद्ध एक उपदेश की तरह
  • वत्स और अवंति की ऐतिहासिक संधि की तरह
पूरी कथा पढ़िए — एक पठन

ग्रंथ में चंडमहासेन भी अंत में उदयन को दामाद के रूप में स्वीकार करता है।

यह आज के पाठक का पठन है, पाठ का स्वयं का दावा नहीं।

नकली हाथी और वीणा की शिष्या के बारे में सवाल

नकली हाथी और वीणा की शिष्या (कथासरित्सागर) में क्या होता है?

वीणा बजाते हुए हाथी पकड़ने निकला वत्स का राजा ख़ुद पकड़ा गया — और जिस राजकुमारी को उसे संगीत सिखाना था, उसी के साथ उसे भागना पड़ा। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: रक्त का तालाब; साँप और वीणा; नकली हाथी; संगीत सिखाने की शर्त; हथिनी पर भागना।

कथासरित्सागर में नकली हाथी और वीणा की शिष्या के बाद क्या आता है?

आगे यौगंधरायण की चाल: एक मंत्री ने अपनी ही रानी को 'जला' दिया — राजा को सम्राट बनाने के लिए, और रानी की अपनी सहमति से।

नकली हाथी और वीणा की शिष्या का स्रोत क्या है?

कथासरित्सागर, लंबक 2 (कथामुख), तरंग 9, 11–13।