बेताल का वरदान — कथासरित्सागर, चित्र

अध्याय ९

बेताल का वरदान

आख़िरी रात में बेताल ने राजा को बताया कि संन्यासी असल में उसी की बलि देना चाहता है — और राजा ने संन्यासी की चाल उसी पर लौटा दी

बेताल का वरदान — कथासरित्सागर का अध्याय ९। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 12 (शशांकवती), तरंग 85, 96–99 (कथा 163 ग, 11, 22–25)। इसमें ६ दृश्य हैं — तीन नाज़ुक रानियाँ; चार भाई और शेर; जो रोया और फिर नाचा; बेताल की सलाह; श्मशान का आख़िरी घेरा; कथा वहीं लौट आती है — और अंत में १० सवाल।

तीन नाज़ुक रानियाँ

एक और रात, एक और फेरा, एक और कथा। इस बार बेताल ने राजा से तीन रानियों की बात कही।

उज्जयिनी में धर्मध्वज नाम का एक राजा था। उसकी तीन रानियाँ थीं, तीनों राजाओं की बेटियाँ, और तीनों उसे प्राणों से प्यारी: इंदुलेखा, तारावली और मृगांकवती। एक वसंत-उत्सव पर वह तीनों रानियों के साथ बाग़ गया। वहाँ फूलों से झुकी लताएँ कामदेव के धनुष जैसी लगती थीं और कोयलें कामदेव का आदेश-सा सुना रही थीं। खेल-खेल में इंदुलेखा राजा के बाल खींच रही थी कि उसके कान से एक नीला कमल उछलकर उसकी जाँघ पर आ गिरा। उस चोट से उसके घाव हो गया और वह 'आह!' करके बेहोश हो गई। राजा और सेवक घबरा गए। ठंडे पानी और पंखे से उसे होश आया तो राजा उसे महल ले गया, पट्टी बँधवाई और वैद्यों से इलाज करवाया।

रात को राजा तारावली के साथ महल की छत पर चाँदनी में सोया। जाली से चाँद की किरणें उसकी देह पर पड़ीं, जो वस्त्र हटने से खुली थी। वह चिल्लाकर जाग गई, 'हाय, मैं जल गई!' और बिस्तर से उठकर अपने अंग मलने लगी। राजा चौंककर उठा और देखा कि उसके शरीर पर फफोले पड़ गए हैं। उसने सेवकों को बुलवाया, कमल के पत्तों का बिस्तर बनवाया और चंदन का लेप लगवाया।

तीसरी रानी मृगांकवती ने यह सब सुना और अपने महल से राजा के पास आने निकली। खुली हवा में, रात की ख़ामोशी में, उसे दूर किसी घर में मूसल से धान कूटने की आवाज़ साफ़ सुनाई दी। वह 'हाय, मैं मर गई!' कहकर रास्ते में बैठ गई और हाथ झटकने लगी। सेविकाएँ उसे अपने कक्ष में ले गईं, और देखा कि उसके हाथों पर चोट के नील पड़ गए हैं, जैसे कमलों पर काले भौंरे बैठे हों। राजा घबराकर आया। उसने रानी से पूछा, तो उसने हाथ दिखाकर कहा, 'मूसल की आवाज़ सुनते ही ये चोट पड़ गई।' राजा ने उसके हाथों पर चंदन लगवाया और सोचने लगा, 'एक रानी को कमल गिरने से चोट लगी, दूसरी को चाँदनी से जलन हुई, और तीसरी को सिर्फ़ मूसल की आवाज़ से चोट पड़ गई। नियति की बात है कि मेरी रानियों का सबसे बड़ा गुण, उनकी नाज़ुकता, एक साथ उनका दोष बन गई।' रात तीन पहर की न रहकर सौ पहर की लगी। सुबह वैद्यों के इलाज से रानियाँ ठीक हो गईं।

बेताल ने पूछा, 'बताओ राजन्, इन रानियों में सबसे नाज़ुक कौन थी? जानकर भी न बताया तो वही शाप लगेगा।' राजा ने उत्तर दिया, 'सबसे नाज़ुक वही रानी थी जिसके हाथों पर मूसल की आवाज़ मात्र सुनने से चोट पड़ गई, उसे छुए बिना। बाक़ी दोनों उसके बराबर नहीं, क्योंकि एक को कमल के स्पर्श से घाव हुआ और दूसरी को चंद्रकिरणों के स्पर्श से फफोले पड़े।' बेताल फिर कंधे से उड़ गया और राजा फिर उसे लाने चल पड़ा।

चार भाई और शेर

अगली रात बेताल ने कहा, 'राजन्, तुम अच्छे और वीर हो, इसलिए यह कथा सुनो।'

पाटलिपुत्र के राजा धरणीवराह के राज्य में ब्रह्मस्थल नाम की एक ब्राह्मण-बस्ती थी। वहाँ विष्णुस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके चार बेटे हुए। जब वे वेद पढ़ चुके और बचपन बीत गया, तो पिता और माँ गुज़र गए। चारों भाई अनाथ हो गए, और रिश्तेदारों ने उनकी सारी संपत्ति छीन ली। उन्होंने तय किया कि वे ननिहाल के गाँव यज्ञस्थल जाएँगे। वहाँ मामाओं ने पहले तो उन्हें खाना-रहना दिया, पर ग़रीब जानकर धीरे-धीरे उनका अपमान करने लगे और खाने-कपड़े की परवाह छोड़ दी।

अपमान से घायल होकर सबसे बड़े भाई ने एक दिन बाक़ियों से कहा, 'भाइयो, हम क्या करें? सब कुछ नियति के हाथ में है। आज मैं उदास भटकता श्मशान पहुँचा तो वहाँ एक मुर्दा लेटा देखा। मुझे उसके चैन से ईर्ष्या हुई। मैंने सोचा कि यह कितना भाग्यशाली है कि दुख के बोझ से छूट गया। मैंने मरने का निश्चय किया और पेड़ की डाल से रस्सी बाँधकर फाँसी लगाने की कोशिश की। मैं बेहोश हो गया, पर साँस नहीं गई, और रस्सी टूट गई। होश आया तो कोई दयालु आदमी मुझे अपने कपड़े से हवा कर रहा था। उसने कहा, "मित्र, तुम बुद्धिमान होकर भी इतने दुखी क्यों हो? सुख अच्छे कर्मों से आता है, दुख बुरे कर्मों से। अगर तुम दुखी हो तो अच्छे कर्म करो। आत्महत्या करके नरक की पीड़ा क्यों चाहते हो?" यह कहकर वह कहीं चला गया, और मैंने मरने का इरादा छोड़ दिया। अब मैं किसी तीर्थ में जाकर तप से देह गला दूँगा, ताकि फिर कभी ग़रीबी की पीड़ा न सहूँ।'

छोटे भाइयों ने कहा, 'भैया, आप बुद्धिमान होकर ग़रीबी से इतने दुखी क्यों हैं? क्या आप नहीं जानते कि धन शरद के बादल की तरह चला जाता है? चंचल लक्ष्मी और चंचल स्त्री पर किसका भरोसा टिका है, चाहे उन्हें जितना सँभालो? बुद्धिमान को चाहिए कि वह मेहनत से कोई ऊँची कला सीखे, जिससे दौड़ते हिरन जैसे धन को वह बाँधकर घर ला सके।' बड़ा भाई सँभल गया। 'तो हम कौन-सी विद्या सीखें?' उन्होंने तय किया कि पृथ्वी पर घूमकर कोई जादू की विद्या सीखेंगे। मिलने की जगह तय करके वे चारों दिशाओं में निकल गए। कुछ समय बाद लौटकर मिले और एक-दूसरे से पूछा कि क्या सीखा। पहले ने कहा, 'मैंने यह रहस्य सीखा है: किसी भी जानवर की हड्डी का टुकड़ा मिल जाए तो मैं उस पर उसका मांस बना सकता हूँ।' दूसरे ने कहा, 'जब हड्डी पर मांस बन जाए, तब मैं उस जानवर के योग्य खाल और बाल बना सकता हूँ।' तीसरे ने कहा, 'और जब खाल, बाल और मांस बन जाएँ, तब मैं उस जानवर के सारे अंग बना सकता हूँ।' चौथे ने कहा, 'और जब जानवर के अंग पूरे हो जाएँ, तब मैं उसमें प्राण डाल सकता हूँ।'

वे चारों जंगल में अपनी विद्या दिखाने के लिए हड्डी का टुकड़ा ढूँढ़ने गए। उन्हें एक शेर की हड्डी का टुकड़ा मिला, पर उन्हें पता नहीं था कि वह किस जानवर की है। पहले ने उस पर मांस बनाया, दूसरे ने खाल और बाल, तीसरे ने सारे अंग, और जब वह शेर बन गया तो चौथे ने उसमें प्राण डाल दिए। वह भयानक शेर उठ खड़ा हुआ, घनी अयाल और दाँतों से डरावना मुँह, पंजों पर मुड़े हुए नाख़ून। और उठते ही उसने अपने चारों रचयिताओं पर झपटकर उन्हें वहीं मार डाला, और पेट भरकर जंगल चला गया। इस तरह वे ब्राह्मण शेर जैसा ख़तरनाक जानवर बनाने की भूल से मरे। कथा कहती है कि अगर नियति साथ न दे, तो कठिनाई से सीखी विद्या भी समृद्धि नहीं, विनाश लाती है। वीरता का पेड़ तभी फल देता है जब उसकी जड़ को बुद्धि के पानी से सींचा जाए और नीति की खाई उसे घेरे।

बेताल ने पूछा, 'राजन्, इन चारों में शेर के बनने का दोषी कौन था, जिसने सबको मार डाला? बताओ। और याद रखो कि पुरानी शर्त अब भी लागू है।' राजा ने मन में सोचा, 'यह बेताल मुझसे बुलवाकर भाग जाना चाहता है। कोई बात नहीं, मैं फिर उसे ले आऊँगा।' फिर उसने कहा, 'जिसने शेर में प्राण डाले, वही दोषी है। बाक़ी तीनों ने तो बिना जाने कि कौन-सा जानवर बन रहा है, अपनी विद्या से मांस, खाल, बाल और अंग बनाए, इसलिए उनकी अज्ञानता में कोई दोष नहीं। पर जिसने शेर का रूप देखकर भी सिर्फ़ अपनी कला दिखाने के लिए उसमें प्राण डाल दिए, वही उन ब्राह्मणों की मृत्यु का दोषी है।' बेताल फिर उड़ गया।

जो रोया और फिर नाचा

एक और रात। बेताल ने कहा, 'राजन्, जिस काम में तुम लगे हो, वह तुम्हें शोभा नहीं देता, फिर भी तुम निडर दृढ़ता से लगे हो। सुनो, मैं तुम्हारी थकान दूर करने के लिए एक कथा सुनाता हूँ।'

कलिंग देश में शोभावती नाम का एक नगर था, जिसका राजा प्रद्युम्न था। वहाँ यज्ञसोम नाम का एक धनी ब्राह्मण रहता था, जिसने वेद साधे थे। जवानी ढल जाने पर उसके यहाँ एक ही बेटा हुआ, सैकड़ों मन्नतों का, जिसका नाम देवसोम रखा गया। सोलह वर्ष की आयु में, जब सब उसकी विद्या, विनय और गुणों के क़ायल थे, वह अचानक बुख़ार से मर गया।

यज्ञसोम और उसकी पत्नी लड़के के शव से लिपटकर रोते रहे और उसे जलाने नहीं देते थे। बूढ़े लोग इकट्ठे हुए और समझाने लगे, 'ब्राह्मण, तुम तो जानकार हो। यह संसार पानी के बुलबुले जैसा है। उन राजाओं को देखो जिन्होंने सेनाओं से धरती भरी और अपने को अमर माना, जो रत्नों के बिस्तर पर, चंदन से लिपटे, स्त्रियों से घिरे सोते थे। उन्हें भी कोई चिता से, सियारों से नहीं बचा सका। फिर औरों की क्या बात?' आख़िर किसी तरह रिश्तेदारों ने उसे शव से अलग किया और बहुत विलाप के साथ उसकी अर्थी श्मशान ले चले।

उस श्मशान में उसी समय वामशिव नाम का एक बूढ़ा पाशुपत संन्यासी रहता था, जो साधना से सिद्धियाँ पा चुका था। उसकी देह बुढ़ापे और तप से सूख गई थी और नसों से बँधी थी, बाल राख से सफ़ेद और जटाएँ बिजली जैसी पीली थीं। उसने कुटिया से बाहर के रोने की आवाज़ सुनी और अपने शिष्य से कहा, 'जाकर देख, यह कैसा शोर है।' पर उसका शिष्य ढोंगी और अहंकारी था, और गुरु की डाँट से नाराज़ था। उसने कहा, 'मैं नहीं जाता। आप जाइए, मेरा भिक्षा का समय निकल रहा है।' गुरु ने कहा कि अभी तो आधा पहर ही बीता है। शिष्य चिढ़कर बोला, 'अरे बुड्ढे! अब न मैं तुम्हारा शिष्य, न तुम मेरे गुरु। यह लो अपना कमंडल और डंडा', और चला गया।

वामशिव हँसता हुआ कुटिया से निकला और वहाँ पहुँचा जहाँ उस ब्राह्मण-बालक का शव लाया गया था। उसने जवानी के फूल के लिए रोते लोगों को देखा। वह बुढ़ापे से पीड़ित था और सिद्धियाँ जानता था, इसलिए उसने उस शरीर में प्रवेश करने का निश्चय किया। वह एक ओर गया, पहले ज़ोर-ज़ोर से रोया, फिर तुरंत हाव-भाव के साथ नाचने लगा। जवान होने की इच्छा से उसने अपना शरीर छोड़ा और योग-शक्ति से उस ब्राह्मण-बालक के शरीर में घुस गया। चिता पर रखा बालक जम्हाई लेकर उठ बैठा। सबने 'जी उठा! जी उठा!' का शोर मचाया।

बालक के शरीर में पहुँचे उस साधु ने, जो अपना व्रत नहीं छोड़ना चाहता था, झूठ कहा, 'अभी मैं दूसरे लोक गया था। वहाँ ख़ुद शिव ने मुझे जीवन लौटाया और कहा कि मुझे पाशुपत व्रत ग्रहण करना है। मुझे अभी एकांत में जाकर उसे निभाना है, नहीं तो मैं जी नहीं पाऊँगा। इसलिए आप सब चले जाइए, मैं भी जाता हूँ।' इतना कहकर उसने सबको घर भेज दिया। वह ख़ुद अपना पुराना शरीर एक खाई में फेंककर जवान होकर दूसरी जगह चला गया।

बेताल ने राजा से पूछा, 'बताओ, वह जादूगर दूसरे शरीर में जाते समय पहले क्यों रोया और फिर क्यों नाचा? मैं यह जानना चाहता हूँ।' ऋषियों के भी ऋषि राजा ने शाप के डर से चुप्पी तोड़ी, 'सुनो, उस साधु की भावनाएँ। उसे दुख हुआ कि वह जिस शरीर के साथ बरसों रहा, जिससे उसने सिद्धि पाई और जिसे उसके माँ-बाप ने बचपन में दुलारा था, उसे छोड़ना है। इसलिए वह फूट-फूटकर रोया, क्योंकि देह से लगाव बहुत गहरी जड़ वाला भाव है। पर वह इसलिए नाचा कि वह नया शरीर पाने जा रहा था, जिससे और बड़ी सिद्धि पा सकेगा। जवानी भला किसे अच्छी नहीं लगती?' बेताल फिर कंधे से उड़ गया।

बेताल की सलाह

इस तरह चौबीस बार बेताल ने राजा से सवाल पूछे। चौबीसवीं कथा, रिश्तों की ऐसी उलझन वाली, जिसका उत्तर राजा को सूझा ही नहीं। जब राजा बिना जवाब दिए चुपचाप आगे बढ़ता रहा, तो कंधे पर बैठे बेताल ने मन ही मन हँसकर सोचा, 'अब राजा बोल नहीं पा रहा, इसलिए ख़ुश होकर तेज़ी से चल रहा है। इस वीर को मैं अब और धोखा नहीं दे सकता, और संन्यासी की चाल रोकने के लिए यह काफ़ी नहीं। अब मैं इस दुष्ट को ही धोखा दूँगा, और अपनी चतुराई से जिस सिद्धि के लिए राजा ने इतना कष्ट सहा है, वह राजा को दिला दूँगा।'

तब बेताल ने राजा से कहा, 'राजन्, इतने फेरों से थकने के बाद भी तुम प्रसन्न हो और ज़रा भी संकल्प नहीं छोड़ा। मैं तुम्हारे इस साहस से प्रसन्न हूँ। अब इस शव को ले जाओ। मैं इसमें से निकल रहा हूँ। एक भलाई की सलाह सुन लो। वह दुष्ट संन्यासी, जिसके लिए तुम यह शव लाए हो, मुझे तुरंत इसमें बुलाएगा और पूजेगा। फिर तुम्हें बलि देने की इच्छा से कहेगा, "राजन्, ज़मीन पर इस तरह लेटो कि आठों अंग छुएँ।" तब तुम उससे कहना, "पहले आप दिखाइए कि कैसे लेटना है, फिर मैं वैसा ही करूँगा।" वह ज़मीन पर लेटकर तुम्हें दिखाएगा, और उसी क्षण तुम तलवार से उसका सिर काट देना। तब विद्याधरों का वह राज्य, जिसकी उसे चाह है, तुम्हें मिलेगा। उसकी बलि देकर तुम धरती भोगना। नहीं तो वह तुम्हारी बलि चढ़ाएगा। इसीलिए मैं इतने समय तक तुम्हारे रास्ते में रोड़े अटकाता रहा। जाओ, तुम्हारा कल्याण हो।' इतना कहकर बेताल उस शव से निकल गया। राजा संन्यासी को अपना शत्रु जानकर, फिर भी प्रसन्न मन से, शव को लेकर बरगद के नीचे बैठे संन्यासी के पास गया।

श्मशान का आख़िरी घेरा

राजा ने श्मशान की उस काली रात में संन्यासी को अकेले पेड़ के नीचे बैठा देखा, जो उसकी प्रतीक्षा में था। संन्यासी हड्डियों के पीले चूर्ण से बना घेरा बनाकर बैठा था, जिसके भीतर की ज़मीन रक्त से लीपी गई थी, और चारों दिशाओं में रक्त के घड़े रखे थे। वह अपने इष्टदेव की पूजा की तैयारी में था। उसने राजा के कंधे पर शव देखकर प्रसन्न होकर उसकी प्रशंसा की, 'महाराज, आपने एक कठिन उपकार किया। ऐसे समय और ऐसी जगह यह काम कोई आप जैसा ही कर सकता है। सच कहते हैं कि आप श्रेष्ठ राजाओं में हैं, जो अपने स्वार्थ की परवाह किए बिना दूसरे का काम पूरा करते हैं।'

संन्यासी ने शव को राजा के कंधे से उतारा, उसे नहलाया, लेप लगाया, माला पहनाई और घेरे के भीतर रखा। फिर अपने अंगों पर राख मलकर, मुर्दों के कपड़े पहनकर, कुछ देर ध्यान में बैठा। फिर उसने अपने मंत्र से उस महाबली बेताल को बुलाकर शव में प्रवेश कराया और उसकी पूजा करने लगा। उसने पूजा पूरी करके पास खड़े राजा से कहा, 'राजन्, ज़मीन पर गिरकर अपने आठों अंगों से इस मंत्रों के स्वामी को साष्टांग प्रणाम करो, ताकि यह वर देने वाला तुम्हारी इच्छा पूरी करे।'

राजा को बेताल की बात याद आई। उसने संन्यासी से कहा, 'मुझे यह करना नहीं आता, पूज्य। पहले आप दिखाइए, फिर मैं वैसा ही करूँगा।' संन्यासी राजा को सिखाने के लिए ज़मीन पर लेट गया। उसी क्षण राजा ने तलवार के एक वार से उसका सिर काट दिया। (पाठ में आगे उसके हृदय और सिर को बेताल को अर्पित करने का एक भयानक ब्योरा है, जिसे यहाँ छोड़ दिया गया है।) चारों ओर पिशाचों ने हर्ष-ध्वनि की।

शव के भीतर से बेताल ने राजा से कहा, 'राजन्, विद्याधरों का वह राज्य, जिसकी चाह इस संन्यासी को थी, तुम्हारे पास आएगा, जब तुम अपना पृथ्वी का राज भोग लोगे। मैंने तुम्हें बहुत कष्ट दिया है, इसलिए जो चाहो वर माँगो।' राजा ने कहा, 'जब आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मेरी हर इच्छा पूरी हो गई। फिर भी आपके वचन व्यर्थ न जाएँ, इसलिए मैं यह वर माँगता हूँ कि ये पहले चौबीस प्रश्न और उत्तर, अपनी तरह-तरह की कथाओं के साथ, और यह पचीसवीं समाप्ति-कथा, पृथ्वी पर प्रसिद्ध और आदर के योग्य हों।' बेताल ने कहा, 'ऐसा ही हो। और सुनो, इसकी एक ख़ास विशेषता मैं बताता हूँ। यह कथा-माला, इन चौबीस और इस आख़िरी पचीसवीं कथा के साथ, "बेताल की पचीस कथाएँ" नाम से पृथ्वी पर प्रसिद्ध और कल्याणकारी होगी। जो इसका एक श्लोक भी आदर से पढ़ेगा या पढ़ा हुआ सुनेगा, वह तुरंत शाप से मुक्त हो जाएगा। और जहाँ इसका पाठ होगा, वहाँ यक्ष, बेताल, कूष्मांड, डाकिनियाँ और राक्षस जैसे प्राणी अपनी शक्ति नहीं चला सकेंगे।' इतना कहकर बेताल उस मनुष्य-शव को छोड़कर अपनी माया से इच्छित स्थान चला गया।

तब शिव देवताओं के साथ राजा के सामने प्रकट हुए और बोले, 'शाबाश, पुत्र! तुमने आज उस ढोंगी संन्यासी को मारा, जिसे विद्याधरों का साम्राज्य पाने की प्रबल इच्छा थी। मैंने तुम्हें अपने अंश से पहले विक्रमादित्य बनाया था, ताकि तुम म्लेच्छों के रूप में जन्मे असुरों का नाश करो। अब मैंने तुम्हें त्रिविक्रमसेन नाम के वीर राजा के रूप में एक दुस्साहसी दुष्ट को हराने के लिए फिर बनाया। अब तुम द्वीपों और पाताल-लोकों के साथ पृथ्वी को अपने वश में करोगे, और शीघ्र विद्याधरों के सर्वोच्च राजा बनोगे। लंबे समय तक दिव्य सुख भोगकर जब तुम उदास होगे, तब स्वेच्छा से उन्हें छोड़ दोगे और अंत में निश्चित रूप से मुझमें मिल जाओगे। लो, यह 'अजेय' नाम की तलवार, जिससे तुम यह सब पा लोगे।' शिव ने उसे अपनी श्रेष्ठ तलवार दी और पूजा पाकर अंतर्धान हो गए।

राजा ने देखा कि सारा काम पूरा हो चुका है और रात बीत चली है। वह अपने नगर प्रतिष्ठान लौट आया। प्रजा ने उसका स्वागत किया, और उसकी रात की करनी की ख़बर उन तक पहुँच गई। उसने सारा दिन स्नान, दान, शिव-पूजा, नृत्य, गान और संगीत में बिताया। कुछ ही दिनों में शिव की तलवार के बल से वह शत्रुओं से मुक्त हुई पृथ्वी, द्वीपों और पाताल-लोकों के साथ भोगने लगा। फिर शिव की आज्ञा से उसे विद्याधरों का सर्वोच्च साम्राज्य मिला, और उसे लंबे समय तक भोगकर वह अंत में उस परमेश्वर में लीन हो गया।

कथा वहीं लौट आती है

यह सब विक्रमकेसरी ने राजकुमार मृगांकदत्त को रास्ते में बताया। उसने कहा, 'राजकुमार, उस बूढ़े ब्राह्मण ने यह सब मुझे उस गाँव में सुनाया। फिर उसने मुझसे कहा, "बेटा, वीर राजा त्रिविक्रमसेन को बेताल की कृपा से जो चाहा मिला। तुम भी यह मंत्र और उसकी विधि लो, निराशा छोड़ो, और एक बेताल-प्रमुख को प्रसन्न करो, ताकि तुम मृगांकदत्त से फिर मिल सको। धीरज वालों के लिए कुछ असंभव नहीं।" मैंने वह मंत्र और विधि उससे ली और उज्जयिनी जाकर रात को श्मशान में बेताल को बुलाया और पूजा की। बेताल ने मेरी निडरता से प्रसन्न होकर कहा, "वर माँगो।" मैंने कहा, "मुझे उस जगह पहुँचा दो जहाँ मेरे स्वामी मृगांकदत्त हैं।" बेताल ने मुझे अपने कंधे पर चढ़ाया और आकाश से यहाँ ले आया। फिर जब उसने तुम्हें रास्ते में देखा तो मुझे नीचे उतार दिया और अपना काम पूरा कर चला गया। यही है मेरी बड़ी कथा, हे प्रभु, उस नाग के शाप से बिछड़ने के बाद की।' मृगांकदत्त यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ, क्योंकि उसने अपने बिछड़े मंत्रियों में से एक को पा लिया था, और उसे अपने काम की सफलता का शुभ संकेत मिला।

टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 12, तरंग 85, 96–99) से सीधे लिखा गया है। इसमें मूल क्रम की कथा 11, 22 और 23 ली गई हैं; 24वीं कथा (रिश्तों की उलझन वाली) का केवल उल्लेख है, उसका ब्योरा जान-बूझकर छोड़ा गया है। संन्यासी की अंतिम पूजा-विधि और राजा के उस पर वार का पाठ में एक भयानक ब्योरा है, जिसे संयत रखा गया है; यहाँ सिर्फ़ उतना दिया गया है जितना कथा के क्रम के लिए ज़रूरी है। राजा के निर्णय, 'पतिव्रता' जैसे शब्द और पात्रों के सुख-दुख के विचार कथा के पात्रों के हैं, इस वेबसाइट के नहीं। शिव का 'विक्रमादित्य' से राजा को जोड़ना ग्रंथ का अपना कथन है।

स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, बेताल का वरदान

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

इंदुलेखा को चोट कैसे लगी?

  • मूसल की आवाज़ सुनकर
  • चाँद की किरणों से
  • खेल में उसके कान से एक नीला कमल उछलकर उसकी जाँघ पर आ गिरा
  • राजा के हाथ से
पूरी कथा पढ़िए — पहली रानी

कमल के गिरने से उसे घाव हुआ और वह बेहोश हो गई।

वसंत-उत्सव के बाग़ में यह हुआ।

क्या हुआ?

रानी तारावली 'हाय, मैं जल गई!' कहकर क्यों चीख़ी?

  • छत पर सोते समय चाँद की किरणें उसके खुले अंगों पर पड़ीं और फफोले पड़ गए
  • उसे साँप ने काट लिया
  • राजा ने उसे गुस्से में डाँटा
  • उसका महल जल गया
पूरी कथा पढ़िए — चाँदनी की जलन

राजा ने कमल के पत्तों का बिस्तर और चंदन का लेप करवाया।

तीसरी रानी ने यह ख़बर सुनी और राजा के पास आने निकली।

ऐसा क्यों?

राजा ने तीन रानियों में मृगांकवती को सबसे नाज़ुक क्यों माना?

  • उसे सबसे गहरा घाव हुआ
  • उसने सबसे ज़्यादा आँसू बहाए
  • वह सबसे छोटी थी
  • मूसल की केवल आवाज़ सुनने से, उसे छुए बिना, उसके हाथों पर नील पड़ गए
पूरी कथा पढ़िए — बिना छुए चोट

बाक़ी दो को कमल और चाँदनी के स्पर्श से चोट आई।

राजा ने उत्तर देते ही बेताल कंधे से ग़ायब हो गया।

क्या हुआ?

चारों ब्राह्मण भाइयों ने क्या-क्या विद्या सीखी थी?

  • चारों ने केवल वेद सीखा था
  • हड्डी पर मांस बनाना, खाल और बाल बनाना, अंग बनाना, और प्राण डालना, हर भाई ने एक
  • चारों ने लोहे को सोना बनाना सीखा
  • चारों ने युद्ध की कला सीखी
पूरी कथा पढ़िए — चार विद्याएँ

वे ग़रीबी और रिश्तेदारों के अपमान से बचने के लिए कोई विद्या सीखने निकले थे।

चारों दिशाओं में जाकर वे फिर मिले।

ऐसा क्यों?

राजा के अनुसार शेर के बनने का दोषी कौन था?

  • जिसने शेर में प्राण डाले, क्योंकि उसने शेर का रूप देखकर भी अपनी कला दिखाने के लिए ऐसा किया
  • वह जिसने हड्डी खोजी
  • वह जिसने मांस बनाया
  • सब चारों समान दोषी थे
पूरी कथा पढ़िए — दोष किसका

बाक़ी तीन को पता नहीं था कि वे किस जानवर को बना रहे हैं।

प्राण डालने वाले को शेर साफ़ दिख रहा था।

ऐसा क्यों?

साधु वामशिव ने ब्राह्मण-बालक के शव में प्रवेश क्यों किया?

  • वह बालक को जिलाना चाहता था
  • वह बालक के माता-पिता के आँसू नहीं देख सका
  • उसके शिष्य ने उसे ऐसा करने को कहा
  • वह बूढ़ा था और जवान शरीर पाकर और बड़ी सिद्धि पाना चाहता था
पूरी कथा पढ़िए — नया शरीर

उसने अपना पुराना शरीर एक खाई में फेंक दिया।

जवान शरीर में उसने कहा कि शिव ने उसे जीवन लौटाया और पाशुपत व्रत दिया।

क्या हुआ?

राजा के अनुसार वामशिव पहले रोया और फिर नाचा, इसका कारण क्या था?

  • वह शव के साथ रोने वाले लोगों की नक़ल कर रहा था
  • वह अपनी पुरानी देह से बिछड़ने पर रोया, और नई देह पाने की ख़ुशी में नाचा
  • वह अपने शिष्य को चिढ़ाना चाहता था
  • वह शिव के आदेश पर नाचा
पूरी कथा पढ़िए — देह का लगाव

राजा ने कहा कि देह से लगाव बहुत गहरी जड़ वाला होता है।

और जवानी भला किसे नहीं भाती?

किसने कहा?

'पहले आप दिखाइए कि कैसे करना है, फिर मैं वैसा ही करूँगा।' यह किसने कहा?

  • बेताल ने, राजा से
  • संन्यासी ने, राजा से
  • राजा त्रिविक्रमसेन ने, संन्यासी से, बेताल की सलाह के अनुसार
  • विक्रमकेसरी ने, ब्राह्मण से
पूरी कथा पढ़िए — बेताल की चेतावनी

बेताल ने बताया कि संन्यासी राजा की बलि देना चाहता है।

उसने कहा कि संन्यासी को ही दिखाने दो, और तभी तलवार चला देना।

क्या हुआ?

संन्यासी के ज़मीन पर लेटकर दिखाते ही राजा ने क्या किया?

  • संन्यासी को माफ़ कर दिया
  • संन्यासी को मंत्र का स्वामी बना दिया
  • बेताल को शव में बंद कर दिया
  • तलवार के एक वार से संन्यासी का सिर काट दिया
पूरी कथा पढ़िए — चाल का उलटा

संन्यासी राजा की बलि देकर विद्याधरों का साम्राज्य चाहता था।

बेताल ने कहा कि अब वह साम्राज्य राजा को मिलेगा।

व्याख्या

बेताल का राजा को आख़िर में बचाना और बलि की चाल बताना कैसे पढ़ना ठीक है?

  • एक ऐसे फ्रेम की तरह जहाँ पूरी कथा-शृंखला एक वीर की परीक्षा थी, और बेताल का कठिन सवाल पूछना उसकी दृढ़ता को परखना था
  • बेताल के भूत होने के प्रमाण की तरह
  • संन्यासियों के विरुद्ध एक चेतावनी की तरह
  • राजा के हिंसा के औचित्य की तरह
पूरी कथा पढ़िए — एक पठन

ग्रंथ में बेताल कहता है कि उसने रास्ते के रोड़े इसलिए डाले कि संन्यासी राजा को न मार दे।

यह आज के पाठक का पठन है, पाठ का स्वयं का दावा नहीं।

बेताल का वरदान के बारे में सवाल

बेताल का वरदान (कथासरित्सागर) में क्या होता है?

आख़िरी रात में बेताल ने राजा को बताया कि संन्यासी असल में उसी की बलि देना चाहता है — और राजा ने संन्यासी की चाल उसी पर लौटा दी। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: तीन नाज़ुक रानियाँ; चार भाई और शेर; जो रोया और फिर नाचा; बेताल की सलाह; श्मशान का आख़िरी घेरा; कथा वहीं लौट आती है।

कथासरित्सागर में बेताल का वरदान के बाद क्या आता है?

आगे कौए, उल्लू और नीति: बूढ़े कौए ने अपने ही पंख नुचवाए, दुश्मन उल्लुओं के बीच जा बैठा — और उन्हें उन्हीं की गुफा में बंद करवा दिया।

बेताल का वरदान का स्रोत क्या है?

कथासरित्सागर, लंबक 12 (शशांकवती), तरंग 85, 96–99 (कथा 163 ग, 11, 22–25)।