
अध्याय ८
बेताल का पहला सवाल
श्मशान के पेड़ पर लटकी लाश, कंधे पर बेताल — और हर कहानी के अंत में एक सवाल, जिसका जवाब देते ही वह वापस पेड़ पर लौट जाता है
बेताल का पहला सवाल — कथासरित्सागर का अध्याय ८। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 12 (शशांकवती), तरंग 75–82 (कथा 163 ग, 1–8)। इसमें ७ दृश्य हैं — कहानी के भीतर की कहानी; फल और रत्न; शिंशपा का पेड़; पहली कथा: तीन ब्राह्मण और एक कन्या; दूसरी कथा: वीरवर; तीसरी कथा: सोमप्रभा और तीन वर; चौथी कथा: तीन नाज़ुक मिज़ाज भाई — और अंत में १० सवाल।
कहानी के भीतर की कहानी
अब कथा राजकुमार मृगांकदत्त तक पहुँचती है। वह अपनी प्रिया शशांकवती को पाने उज्जयिनी की ओर जा रहा है। रास्ते में उसे उसका बिछड़ा हुआ मंत्री विक्रमकेसरी आकाश में एक कुरूप पुरुष के कंधे पर बैठा मिलता है। मिलकर वह अपनी कथा बताता है। एक गाँव में एक बूढ़े ब्राह्मण को साँप ने काटा था, और उसने उसका ज़हर उतार दिया था। बदले में ब्राह्मण ने उसे बेतालों को वश करने का एक मंत्र दिया। उसी मंत्र का हाल बताने के लिए ब्राह्मण ने उसे राजा त्रिविक्रमसेन और बेताल की कथा सुनाई थी। वही कथा अब चलती है, जिसे 'बेताल-पचीसी' के नाम से दुनिया जानती है।
फल और रत्न
गोदावरी के किनारे प्रतिष्ठान नाम का नगर था। वहाँ विक्रमसेन का बेटा त्रिविक्रमसेन राजा था, जो इंद्र जैसा बलवान था। रोज़ दरबार में क्षांतिशील नाम का एक संन्यासी आता, राजा को प्रणाम करता और एक फल भेंट करता। राजा फल लेते ही ख़ज़ांची के हाथ में दे देता। दस साल यही चला।
एक दिन संन्यासी के जाने के बाद एक पालतू बंदर रखवालों के हाथ से छूटकर भीतर आ गया। राजा ने फल उसे दे दिया। बंदर ने फल खाया तो वह फट गया और उसमें से एक बेशक़ीमती रत्न निकला। राजा ने ख़ज़ांची से पूछा, 'जो फल मैं तुम्हें देता रहा, वे कहाँ हैं?' ख़ज़ांची डरकर बोला, 'महाराज, मैं उन्हें खिड़की से ख़ज़ाने में फेंकता रहा, दरवाज़ा नहीं खोला। आज्ञा हो तो खोलकर देख लूँ।' उसने जाकर देखा। फल सब सड़ चुके थे, पर उनकी जगह चमकते रत्नों का ढेर लगा था। राजा ने सब रत्न ख़ज़ांची को दे दिए।
अगले दिन राजा ने संन्यासी से कहा, 'तुम रोज़ इतना धन ख़र्च करके मुझे क्यों रिझाते हो? जब तक बताओगे नहीं, मैं आज तुम्हारा फल नहीं लूँगा।' संन्यासी ने एकांत में कहा, 'मुझे एक अनुष्ठान करना है, जिसके लिए एक वीर पुरुष की मदद चाहिए। हे वीर, मेरी सहायता कीजिए।' राजा ने वचन दे दिया। संन्यासी ने कहा, 'आने वाले कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात मैं यहाँ के बड़े श्मशान में बरगद के नीचे आपकी प्रतीक्षा करूँगा।'
शिंशपा का पेड़
कृष्ण पक्ष आया तो राजा ने वचन याद किया। रात होते ही वह सिर पर काला कपड़ा लपेटकर, हाथ में तलवार लिए, चुपचाप महल से निकला और निडर होकर श्मशान पहुँचा। चारों ओर घना अँधेरा था, चिताओं की भयानक लपटें थीं, हड्डियाँ, कंकाल और खोपड़ियाँ बिखरी थीं, भूत-बेताल अपने भयानक खेल में लगे थे और सियार चीख रहे थे। बरगद के नीचे संन्यासी एक घेरा बना रहा था।
राजा ने कहा, 'मैं आ गया। बताइए मैं क्या करूँ?' संन्यासी प्रसन्न हुआ। 'हे राजन्, अगर मुझ पर आपकी कृपा है, तो यहाँ से दक्षिण की ओर बहुत दूर जाइए। वहाँ एक शिंशपा का पेड़ मिलेगा। उस पर एक मुर्दा लटका है। उसे यहाँ ले आइए।'
राजा चिताओं की रोशनी में चलकर बड़ी मुश्किल से उस पेड़ तक पहुँचा। पेड़ चिताओं के धुएँ से झुलसा था, उससे कच्चे मांस की गंध आ रही थी, और उसके तने से लाश ऐसे लटकी थी जैसे किसी दैत्य के कंधे पर। राजा चढ़ा, रस्सी काटी और लाश को नीचे गिरा दिया। गिरते ही लाश दर्द से चीख उठी। राजा ने उसे ज़िंदा समझकर करुणा से उसका बदन सहलाया, तो लाश ज़ोर से राक्षसी हँसी हँसी। राजा समझ गया कि इसमें बेताल घुसा है। उसने बिना डरे कहा, 'क्यों हँसते हो? चलो।' तुरंत लाश नीचे से ग़ायब हो गई और फिर उसी पेड़ पर लटकी दिखी। राजा फिर चढ़ा और उसे उतारा, क्योंकि वीरों का हृदय हीरे से भी कठोर होता है। फिर उसने लाश को कंधे पर डाला और चुपचाप चल पड़ा।
तभी कंधे पर बैठा बेताल बोला, 'राजन्, रास्ता कटे इसलिए मैं एक कथा सुनाता हूँ। पर याद रखना, कथा के अंत में मैं एक सवाल पूछूँगा। अगर तुम उसका उत्तर जानते हुए भी नहीं दोगे, तो तुम्हारा सिर सौ टुकड़े हो जाएगा।' राजा चुप रहता, पर हर बार उत्तर देना पड़ता, और जैसे ही वह बोलता, बेताल उसके कंधे से ग़ायब होकर उसी पेड़ पर लौट जाता। राजा बिना थके हर बार उसे लेने लौट पड़ता।
पहली कथा: तीन ब्राह्मण और एक कन्या
यमुना के किनारे ब्रह्मस्थल नाम का एक ब्राह्मणों का इलाक़ा था। वहाँ अग्निस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जिसने वेद पूरी तरह साध लिए थे। उसकी बेटी मंदारवती इतनी सुंदर थी कि लगता था विधाता ने उसे बनाकर अप्सराओं से अपना मन हटा लिया है। जब वह बड़ी हुई तो कान्यकुब्ज से तीन ब्राह्मण युवक, सब विद्याओं में बराबर, वहाँ आए। तीनों ने उसके पिता से उसका हाथ माँगा, और तीनों जान दे देते पर उसे किसी और को न लेने देते। पिता ने किसी को नहीं दिया, क्योंकि उसे डर था कि किसी एक को देने पर दो की जान जाएगी। इसलिए कन्या कुँआरी रही। तीनों रात-दिन उसके चंद्रमुख को देखते रहते, चकोर के व्रत की तरह।
फिर मंदारवती को अचानक तेज़ बुख़ार आया और वह मर गई। तीनों ने शोक में उसका विधिवत् संस्कार किया। उनमें से एक वहीं श्मशान में कुटिया बनाकर उसकी राख को ही बिस्तर बनाकर रहने लगा और भीख से जीने लगा। दूसरा उसकी अस्थियाँ लेकर गंगा में प्रवाहित करने चला गया। तीसरा संन्यासी बनकर दूसरे देशों में घूमने निकल गया।
संन्यासी भटकता हुआ वज्रलोक नाम के गाँव पहुँचा और एक ब्राह्मण के घर अतिथि बना। वहाँ उसने देखा कि घर के स्वामी के पास एक मंत्र की पोथी है, जिसका एक मंत्र पढ़कर धूल डालने से मरे हुए बच्चे को जीवित कर दिया गया। उसका मन शांत हुआ और उसने भोजन किया। (पाठ में यहाँ बच्चे की मृत्यु का एक कठोर ब्योरा है, जिसे यहाँ छोड़ दिया गया है।) घर का स्वामी पोथी एक आले में रखकर सो गया। रात में संन्यासी डरते-डरते उठा, पोथी ली, और अपनी प्रिया को जिलाने की इच्छा से भाग निकला। दिन-रात चलकर वह उसी श्मशान पहुँचा, जहाँ उसे जलाया गया था।
वहाँ उसने दूसरे ब्राह्मण को देखा, जो उसकी अस्थियाँ गंगा में बहाकर लौटा था, और तीसरे को, जो राख पर कुटिया बनाए सो रहा था। उसने दोनों से कहा, 'यह कुटिया हटा दो। मैं इसकी राख से एक मंत्र द्वारा अपनी प्रिया को जिलाऊँगा।' उनसे बहुत विनती करके कुटिया हटवाकर उसने पोथी खोली और मंत्र पढ़ा। मंत्र पढ़ी धूल राख पर डाली तो मंदारवती जी उठी। आग में से निकलने के कारण उसकी देह पहले से भी सुंदर, मानो सोने की बनी थी। उसे जीवित देखकर तीनों कामातुर होकर आपस में झगड़ने लगे। पहला बोला, 'यह मेरी पत्नी है, मेरे मंत्र की शक्ति से यह मिली।' दूसरा बोला, 'यह मेरी है, पवित्र तीर्थ के प्रभाव से जी उठी।' तीसरा बोला, 'यह मेरी है, क्योंकि मैंने इसकी राख की रक्षा की और तप से इसे जिलाया।'
बेताल ने राजा से पूछा, 'अब न्याय करो। यह कन्या किसकी पत्नी हो? अगर जानकर भी नहीं बोले, तो तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा।' राजा ने उत्तर दिया, 'जिसने मंत्र से उसे जिलाया, वह चाहे कितना भी कष्ट उठा आया हो, उसे पिता मानना चाहिए, क्योंकि उसने पिता का काम किया। जो अस्थियाँ गंगा में ले गया, वह पुत्र माना जाएगा। पर जो प्रेम में राख पर सोता रहा और श्मशान में रहकर तप करता रहा, वही उसका पति कहलाएगा, क्योंकि उसने पति जैसा ही व्यवहार किया।' यह सुनकर बेताल राजा के कंधे से ग़ायब हो गया। राजा फिर उसे लाने चल पड़ा।
दूसरी कथा: वीरवर
एक और रात, एक और फेरा। इस बार बेताल बोला, 'राजन्, इस दुष्ट संन्यासी के लिए इतना कष्ट क्यों उठाते हो? तुम सोच-समझकर काम नहीं कर रहे। चलो, यह कथा सुनो।'
शोभावती नाम के नगर में शूद्रक नाम का वीर राजा रहता था। उसके राज में धर्म इतना फैला था कि धरती राम तक को भूल गई थी। एक दिन मालव देश से वीरवर नाम का एक ब्राह्मण उसकी नौकरी करने आया। उसकी पत्नी धर्मवती थी, बेटा सत्त्ववर, बेटी वीरवती। उसके परिवार के तीन लोग थे और सेवक तीन: कमर में कटार, एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में ढाल। इतने छोटे परिवार के लिए भी उसने राजा से रोज़ पाँच सौ दीनार माँगे। राजा ने उसकी चाल से उसका साहस भाँपकर माँग मान ली।
राजा ने जानना चाहा कि वह इतनी रक़म अपने ऐश पर ख़र्च करता है या किसी अच्छे काम में। उसने चुपके से गुप्तचर लगाए। पता चला कि वीरवर सुबह राजा से मिलता, दोपहर में तलवार लिए राजमहल के द्वार पर पहरा देता, फिर घर जाकर पत्नी को सौ दीनार खाने के लिए देता, सौ से कपड़े और पान ख़रीदता, नहाकर सौ विष्णु और शिव की पूजा में लगाता, और दो सौ ग़रीब ब्राह्मणों को दान कर देता। फिर हवन करके भोजन करता और रात को फिर अकेला तलवार लिए महल के द्वार पर पहरा देता। राजा ने गुप्तचर हटा दिए और उसका आदर करने लगा।
वर्षा ऋतु आई। रात-दिन मूसलाधार पानी बरसता रहा, पर वीरवर वैसे ही महल के द्वार पर अडिग खड़ा रहा। राजा ने एक रात छत पर चढ़कर पुकारा, 'द्वार पर कौन है?' वीरवर बोला, 'मैं हूँ, महाराज।' राजा ने सोचा, 'यह निडर और मेरा भक्त है। इसे ज़रूर ऊँचा पद देना चाहिए।' अगली रात वर्षा और भी तेज़ थी, गहरा अँधेरा था। राजा फिर छत पर गया और पुकारा, 'द्वार पर कौन है?' वीरवर ने फिर वही उत्तर दिया। तभी राजा को दूर किसी स्त्री के रोने की आवाज़ सुनाई दी। राजा ने सोचा, 'मेरे राज्य में कोई दुखी या दीन नहीं, तो यह स्त्री रात में अकेली क्यों रो रही है?' उसने नीचे वीरवर से कहा, 'वह दूर कोई स्त्री रो रही है। जाकर पता लगाओ कि वह कौन है और क्यों रोती है।'
वीरवर कमर में कटार और हाथ में तलवार लेकर चला गया। राजा को उस पर करुणा और जिज्ञासा हुई। वह भी तलवार लेकर चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा। वीरवर शहर के बाहर एक तालाब पर पहुँचा। वहाँ पानी के बीच एक स्त्री यह कहकर रो रही थी, 'हाय, वीर! दयालु! उदार! मैं तुम्हारे बिना कैसे जिऊँगी?' वीरवर ने पूछा, 'तुम कौन हो और क्यों रोती हो?' उसने कहा, 'वीरवर, मैं पृथ्वी हूँ। राजा शूद्रक मेरा धर्मात्मा स्वामी है। पर आज से तीसरे दिन उसकी मृत्यु होगी। ऐसा दूसरा स्वामी मैं कहाँ पाऊँगी? इसीलिए अपने और उसके लिए रो रही हूँ।' वीरवर घबराकर बोला, 'देवी, क्या इस राजा की मृत्यु टालने का कोई उपाय है, जो संसार का रक्षा-कवच है?' पृथ्वी ने कहा, 'एक उपाय है, जो केवल तुम कर सकते हो। अगर तुम अपने पुत्र सत्त्ववर को देवी चंडी को अर्पित कर दो, जिसका मंदिर राजा ने महल के पास बनवाया है, तो राजा सौ वर्ष और जीएगा। पर आज ही रात करना होगा, नहीं तो तीसरे दिन वह मर जाएगा।' वीरवर ने कहा, 'देवी, मैं यह अभी करता हूँ।' पृथ्वी बोली, 'तुम्हारा कल्याण हो', और ग़ायब हो गई। राजा, जो पीछे छिपकर सब सुन रहा था, चुप रहा।
वीरवर घर गया और पत्नी को जगाकर पृथ्वी की बात बताई। धर्मवती ने कहा, 'स्वामी, राजा की भलाई हमें करनी ही चाहिए। इसलिए इस बालक को जगाकर ख़ुद बता दीजिए।' वीरवर ने सोए हुए सत्त्ववर को जगाया और बात बताई। छोटे से बालक ने वीर हृदय दिखाया और अपना नाम सार्थक किया। उसने कहा, 'अगर मेरे प्राण देने से राजा की जान बचती है, तो मुझे सब कुछ मिल गया, क्योंकि मैंने उसका अन्न चुकाया। देर किस बात की? मुझे अभी देवी के सामने ले चलिए।' वीरवर ने कहा, 'शाबाश! तू सचमुच मेरा बेटा है।' राजा, जो पीछे-पीछे यह सब सुन रहा था, मन में बोला, 'वाह! ये सब एक-से साहसी हैं।'
फिर वीरवर बेटे को कंधे पर लेकर और धर्मवती बेटी वीरवती को लेकर चंडी के मंदिर चले, और राजा चुपके से उनके पीछे गया। वहाँ सत्त्ववर ने देवी को प्रणाम करके कहा, 'मेरे सिर के अर्पण से राजा शूद्रक की जान बचे, और वह सौ वर्ष निर्विरोध राज करे।' वीरवर ने कहा 'शाबाश!' और बेटे को देवी को अर्पित कर दिया। तुरंत आकाशवाणी हुई, 'शाबाश वीरवर! राजा के प्रति तुम-सा भक्त कौन है, जिसने अपना इकलौता बेटा देकर राजा को जीवन और राज्य दिया?' तभी बेटी वीरवती भाई के शव से लिपटकर इतना रोई कि उसका हृदय फट गया और वह मर गई। राजा सब कुछ अपनी छिपी जगह से देख-सुन रहा था।
तब धर्मवती ने पति से कहा, 'हमने राजा की भलाई कर ली। अब मुझे एक बात कहनी है। मेरी बेटी भी भाई के दुख में मर गई, और मैं दो संतान खो चुकी हूँ। अब मेरा जीवन किस काम का? मैंने देवी को राजा के लिए अपना सिर पहले क्यों नहीं दिया, यह मेरी मूर्खता है। अब मुझे बच्चों के शरीरों के साथ अग्नि में प्रवेश करने की आज्ञा दीजिए।' वीरवर ने कहा, 'ऐसा ही करो। तुम्हारा कल्याण हो।' उसने मंदिर की बाड़ के लिए जुटाई लकड़ी से चिता बनाई और बच्चों को उस पर रखा, चिता जलाई। धर्मवती ने चंडी की पूजा करके प्रार्थना की, 'इस जन्म का पति अगले जन्म में भी मेरा पति हो, और मेरे प्राणों के बलिदान से राजा का कल्याण हो।' फिर वह चिता में प्रवेश कर गई। वीरवर ने सोचा, 'मैंने राजा के हित का काम पूरा किया, और अन्न का ऋण चुका दिया। अब मैं अकेला हूँ, तब जीना क्यों? जिस कुटुंब का पोषण मेरा कर्तव्य था, उसे बलि चढ़ाकर अपनी जान बचाना ठीक नहीं।' ऐसा सोचकर उसने देवी की स्तुति की और ख़ुद को भी उनके चरणों में अर्पित कर दिया।
राजा सब अपनी छिपी जगह से देख रहा था। वह हैरान होकर सोचने लगा, 'इस श्रेष्ठ आदमी और उसके परिवार ने मेरे लिए ऐसा अनोखा काम किया। अगर मैं इसका बदला न चुकाऊँ, तो मेरा राज किस काम का?' उसने म्यान से तलवार खींची और देवी से कहा, 'देवी, इस ब्राह्मण वीरवर और उसके परिवार को जीवित कर दो। इसके बदले मैं अपना सिर तुम्हें अर्पित करता हूँ।' जैसे ही वह अपना सिर काटने चला, आकाशवाणी हुई, 'जल्दबाज़ी मत करो। मैं तुम्हारे साहस से प्रसन्न हूँ। वीरवर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जीवित हो जाए।' वीरवर, उसकी पत्नी, बेटा और बेटी सब जीवित, बिना किसी घाव के उठ बैठे। राजा आँखों में हर्ष के आँसू लिए उन्हें देखता रहा, फिर वहीं छिप गया।
वीरवर जैसे नींद से जागा। पत्नी और बच्चों को जीवित देखकर वह हैरान हुआ। 'हम तो राख हो गए थे, मैंने भी सिर काटा था। यह क्या हुआ?' पत्नी और बच्चों ने कहा, 'यह देवी की कृपा है, हमें इसका पता नहीं।' वीरवर ने देवी की पूजा की और परिवार को घर ले गया। फिर वह उसी रात राजा के महल के द्वार पर लौट आया। राजा छत पर गया और पुकारा, 'द्वार पर कौन है?' वीरवर बोला, 'मैं ही हूँ, महाराज। आपकी आज्ञा से मैं उस स्त्री की खोज में गया था, पर वह राक्षसी की तरह पल भर में कहीं ग़ायब हो गई।' राजा ने सोचा, 'ऊँचे मन के लोग समुद्र जैसे गंभीर होते हैं। अनोखा काम करके भी उसकी बात तक नहीं करते।' सुबह दरबार में राजा ने मंत्रियों को सब बताया, तो सब हैरान रह गए। उसने वीरवर और उसके बेटे को लाट और कर्नाट के प्रदेश दे दिए।
बेताल ने राजा से पूछा, 'बताओ, इन सबमें सबसे बड़ा वीर कौन था? जानकर भी नहीं बोले तो तुम पर शाप पड़ेगा।' राजा ने कहा, 'राजा शूद्रक सबसे बड़ा वीर था।' बेताल ने कहा, 'क्या वीरवर बड़ा नहीं, जिसके बराबर पृथ्वी पर कोई नहीं? क्या उसकी पत्नी बड़ी नहीं, जिसने माँ होकर बेटे को बलि चढ़ते देखा? क्या उसका बेटा बड़ा नहीं, जिसने छोटी उम्र में ऐसा साहस दिखाया? तब तुम राजा को सबसे बड़ा क्यों कहते हो?' राजा ने कहा, 'ऐसा मत कहो। वीरवर ऊँचे कुल का था, जिसकी रीति थी कि राजा की रक्षा के लिए अपने प्राण, बेटा और पत्नी तक न्योछावर करो। उसकी पत्नी भी ऊँचे कुल की, पतिव्रता थी, जिसका सबसे बड़ा धर्म पति के बताए रास्ते पर चलना था। और बेटा उन्हीं का बेटा था। जैसे धागे, वैसा कपड़ा। पर शूद्रक सबसे बढ़कर था, क्योंकि वह उन सेवकों के लिए अपने प्राण देने को तैयार हो गया, जिनके प्राण देकर राजा अपने प्राण बचाया करते हैं।' यह सुनते ही बेताल कंधे से ग़ायब हो गया और राजा फिर श्मशान की राह चल पड़ा।
तीसरी कथा: सोमप्रभा और तीन वर
उज्जयिनी में हरिस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जो राजा पुण्यसेन का मंत्री था। उसके बेटे का नाम देवस्वामी था और बेटी का सोमप्रभा, जो अपने रूप पर बहुत गर्व करती थी। जब उसके विवाह का समय आया, तो उसने माँ के हाथ पिता और भाई से कहलवाया, 'मुझे ऐसे पुरुष को दीजिए जिसमें वीरता हो, ज्ञान हो या जादू की शक्ति हो। अगर आपको मेरे प्राण प्यारे हैं तो किसी और को मत दीजिए।' हरिस्वामी चिंतित होकर ऐसा वर खोजने लगा। इसी बीच वह राजा का दूत बनकर दक्खिन के एक राजा से संधि कराने गया। उसका काम पूरा हुआ ही था कि एक ब्राह्मण ने आकर उसकी बेटी का हाथ माँगा। हरिस्वामी ने उससे पूछा कि तीन में से कौन-सी शक्ति उसके पास है। उसने कहा, 'मेरे पास जादू की शक्ति है।' तब उसने अपनी विद्या से आकाश में उड़ने वाला रथ बनाया और हरिस्वामी को पल भर में स्वर्ग और सब लोकों की सैर कराकर वहीं लौटा लाया। हरिस्वामी ने उसे बेटी देने का वचन दिया और सातवें दिन का विवाह तय कर दिया।
उसी बीच उज्जयिनी में एक और ब्राह्मण ने देवस्वामी से बहन का हाथ माँगा और ख़ुद को वीर बताया। उसने हथियार चलाने का कौशल दिखाया और देवस्वामी ने उसे भी उसी सातवें दिन बहन देने का वचन दे दिया, माँ को बिना बताए। उसी समय एक तीसरे पुरुष ने माँ से चुपके से बेटी का हाथ माँगा और कहा, 'मेरे पास ज्ञान है।' माँ ने उससे भूत और भविष्य के सवाल पूछे और उसकी विद्या देखकर उसे भी उसी सातवें दिन बेटी देने का वचन दे दिया।
अगले दिन हरिस्वामी घर लौटा और सबने अलग-अलग अपने वचन बताए, तो वह घबरा गया कि अब तीन वर बुलाए जा चुके हैं। विवाह के दिन तीनों वर आ पहुँचे: ज्ञानी, जादूगर और वीर। तभी एक अजीब बात हुई, सोमप्रभा अचानक ग़ायब हो गई और ढूँढ़ने पर भी नहीं मिली। हरिस्वामी ने जल्दी से ज्ञानी से पूछा, 'तुम बताओ, मेरी बेटी कहाँ गई?' ज्ञानी ने कहा, 'धूम्रशिख नाम का राक्षस उसे विंध्य के जंगल में अपने घर ले गया है।' हरिस्वामी घबरा गया। जादूगर बोला, 'चिंता मत करो। मैं तुम्हें पल भर में वहाँ पहुँचा दूँगा, जहाँ ज्ञानी कहता है।' उसने फिर आकाश में उड़ने वाला रथ बनाया, उसमें हथियार रखे और हरिस्वामी, ज्ञानी और वीर को बैठाकर पल भर में विंध्य के जंगल में राक्षस के घर पहुँचा दिया। राक्षस ग़ुस्से में बाहर निकला। हरिस्वामी के आगे किए गए वीर ने उसे लड़ाई के लिए ललकारा। राम और रावण जैसा भयानक युद्ध छिड़ा। थोड़ी देर में वीर ने अर्धचंद्र-बाण से उस बलवान राक्षस का सिर काट दिया। फिर सब सोमप्रभा को घर से निकाल लाए और जादूगर के रथ में बैठकर लौट आए।
घर पहुँचे, तो शुभ मुहूर्त आने पर भी विवाह नहीं हुआ, क्योंकि तीनों में झगड़ा छिड़ गया। ज्ञानी बोला, 'अगर मैं न बताता कि वह कहाँ है, तो छिपी हुई कन्या कैसे मिलती? इसलिए वह मुझे मिलनी चाहिए।' जादूगर बोला, 'अगर मैंने उड़ने वाला रथ न बनाया होता, तो तुम सब पल भर में देवताओं की तरह जाकर लौट कैसे आते? और बिना रथ के तुम राक्षस से कैसे लड़ते, जिसके पास भी रथ था? इसलिए मुझे दो, क्योंकि यह शुभ मुहूर्त भी मेरे ही कौशल का फल है।' वीर बोला, 'अगर मैं राक्षस को युद्ध में न मारता, तो तुम सबकी कोशिशों के बावजूद इस कन्या को यहाँ कौन लाता? इसलिए वह मुझे मिलनी चाहिए।' वे इसी तरह झगड़ते रहे, और हरिस्वामी भ्रम में चुप खड़ा रहा।
बेताल ने राजा से पूछा, 'तो बताओ, राजन्, वह कन्या किसे दी जानी चाहिए? जानकर भी नहीं बोलोगे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा।' राजा ने कहा, 'वह वीर को दी जानी चाहिए, क्योंकि उसने अपनी भुजाओं के बल से, अपनी जान जोखिम में डालकर, राक्षस को मारकर उसे जीता। ज्ञानी और जादूगर तो विधाता ने उसके औज़ार के रूप में बनाए थे। क्या गिनने वाले और बनाने वाले हमेशा दूसरों के सहायक नहीं होते?' यह सुनकर बेताल फिर कंधे से ग़ायब हो गया, और राजा फिर उसे लाने चल पड़ा।
चौथी कथा: तीन नाज़ुक मिज़ाज भाई
अंग देश के वृक्षघाट नाम के ब्राह्मण-अग्रहार में विष्णुस्वामी नाम का एक धनी, यज्ञ करने वाला ब्राह्मण रहता था। उसके तीन बेटे थे, जो असाधारण रूप से तेज़ थे। एक बार जब उसने यज्ञ आरंभ किया तो तीनों बेटों को समुद्र के किनारे से एक कछुआ लाने भेजा। वे गए और कछुआ मिल गया, तो सबसे बड़े ने दोनों भाइयों से कहा, 'तुम में से कोई एक पिता के यज्ञ के लिए कछुआ ले लो। मुझसे नहीं हो सकता, यह तो कीचड़ से चिपचिपा है।' दोनों ने कहा, 'अगर आप हिचकते हैं तो हम क्यों न हिचकें?' बड़ा बोला, 'तुम दोनों ले लो, नहीं तो पिता का यज्ञ बिगड़ेगा और तुम नरक में जाओगे।' वे हँसे, 'आप अपना कर्तव्य इतना साफ़ देखते हैं तो अपना कर्तव्य क्यों नहीं देखते?' बड़े ने कहा, 'क्या तुम नहीं जानते कि मैं कितना नाज़ुक-मिज़ाज हूँ? मुझे खाने की चीज़ों में बहुत छुआ-छूत है, मैं किसी घिनौनी चीज़ को छू नहीं सकता।' बीच वाले ने कहा, 'तब मैं तुमसे भी ज़्यादा नाज़ुक हूँ, क्योंकि मैं स्त्रियों के मामले में बहुत नाज़ुक रुचि रखता हूँ।' बड़े ने कहा, 'तब सबसे छोटा कछुआ उठाए।' छोटे ने नाक-भौं सिकोड़कर कहा, 'तुम दोनों मूर्ख हो। मैं बिस्तरों के बारे में बहुत नाज़ुक हूँ, इसलिए सब में सबसे नाज़ुक मैं हूँ।' तीनों भाई झगड़ पड़े, अहंकार में कछुआ वहीं छोड़ दिया और अपना झगड़ा सुलझवाने उस देश के राजा प्रसेनजित के पास वितंकपुर चले गए।
द्वारपाल ने उन्हें राजा के पास पहुँचाया। राजा ने कहा, 'तुम सबकी बारी-बारी परीक्षा लूँगा। यहीं रुको।' जब राजा का भोजन का समय हुआ, तो तीनों को सम्मान के आसन पर बैठाकर छहों स्वाद वाला राजसी भोजन दिया गया। सब खा रहे थे, पर खाने में नाज़ुक भाई, मुँह बिचकाकर, एक कौर भी नहीं खाया। राजा ने कारण पूछा तो उसने धीरे से कहा, 'इस पके चावल में मुझे शवों के धुएँ की बदबू आ रही है, इसलिए मैं नहीं खा सकता, चाहे कितना भी स्वादिष्ट हो।' राजा के आदेश पर सबने चावल सूँघा, 'यह तो सफ़ेद, अच्छा और सुगंधित है।' पर वह नहीं माना। राजा ने पता लगवाया तो मालूम हुआ कि वह चावल एक गाँव के श्मशान के पास के खेत में उगा था। राजा बहुत हैरान और प्रसन्न हुआ और बोला, 'तुम सचमुच खाने में बड़े नाज़ुक हो। कोई और चीज़ खाओ।'
भोजन के बाद राजा ने तीनों को उनके कमरों में भेजा और अपने दरबार की सबसे सुंदर स्त्री को बुलाया। शाम को उसने उसे सुंदर गहनों में सजाकर दूसरे ब्राह्मण के कमरे में भेजा, जो स्त्रियों के बारे में नाज़ुक था। वह चाँद-सी सुंदरी, राजा के सेवकों के साथ, उसके कमरे में गई। पर जैसे ही वह भीतर आई और कमरा उसकी चमक से जगमगाया, वह ब्राह्मण बेहोश-सा हो गया, उसने बाएँ हाथ से नाक दबाई और राजा के सेवकों से कहा, 'इसे ले जाओ। नहीं तो मैं मर जाऊँगा। इसमें से बकरी जैसी गंध आ रही है।' सेवक घबराई हुई उस स्त्री को राजा के पास ले आए। राजा ने उस नाज़ुक ब्राह्मण को बुलाकर कहा, 'चंदन, कपूर और अगर के इतने सुगंधित इत्र लगाए यह सुंदरी भला बकरी जैसी कैसे महक सकती है?' पर वह अपनी बात पर अड़ा रहा। तब राजा को शक हुआ। उसने चतुराई से सवाल पूछकर उसी स्त्री से जाना कि बचपन में माँ और दाई से बिछड़ जाने के कारण उसे बकरी का दूध पिलाकर बड़ा किया गया था। राजा बहुत हैरान हुआ और उस ब्राह्मण की परख की बहुत तारीफ़ की। फिर उसने तीसरे ब्राह्मण के लिए, जो बिस्तरों में नाज़ुक था, उसकी रुचि के अनुसार सात गद्दों वाला पलंग बिछवाया, साफ़ चिकनी चादरों के साथ, और उसे एक सुंदर कमरे में सुलाया। पर पहर भर रात बीतने से पहले ही वह दर्द से चीख़ता हुआ बिस्तर से उठ गया, हाथ बग़ल पर दबाए। राजा के सेवकों ने देखा कि उसकी बग़ल में एक लाल टेढ़ा निशान था, जैसे किसी बाल को गहरा दबा दिया गया हो। उन्होंने राजा को बताया। राजा ने कहा, 'गद्दों के नीचे देखो।' एक-एक गद्दे के नीचे देखा तो सबसे नीचे पलंग पर एक बाल पड़ा मिला। राजा ने वह देखा और निशान भी देखा तो हैरान रह गया, और रात भर सोचता रहा कि सात गद्दों के आर-पार एक बाल इतना गहरा निशान कैसे छोड़ सकता है। सुबह उसने तीनों को तीन-तीन लाख सोने के सिक्के दिए, क्योंकि वे असाधारण पारखी थे, और वे राजा के पास आराम से रहने लगे। कछुए और पिता के बिगड़े यज्ञ को वे भूल ही गए।
बेताल ने राजा से पूछा, 'राजन्, मेरा पुराना शाप याद रखो, और बताओ कि इन तीनों में सबसे नाज़ुक-मिज़ाज कौन था?' राजा ने कहा, 'मेरी राय में बिस्तर वाला सबसे नाज़ुक था, क्योंकि उसके शरीर पर निशान साफ़ दिखा, इसलिए धोखे की गुंजाइश नहीं थी। बाक़ी दोनों ने शायद किसी और से जानकारी पहले पा ली हो।' यह सुनते ही बेताल कंधे से उड़ा, और राजा थके बिना उसे लाने फिर चल पड़ा।
टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 12, तरंग 75–82) से सीधे लिखा गया है। बेताल-पचीसी (वेतालपंचविंशति) कथासरित्सागर के भीतर की एक कथा-शृंखला है, और अलग पुस्तक के रूप में भी बहुत प्रसिद्ध है। 25 में से यहाँ चार कथाएँ (2, 4, 5, 8) ली गई हैं। कथा 1, 3, 6 और 7 छोड़ी गई हैं, क्योंकि उनमें स्त्रियों का अपमान, हत्या या आत्मघात के कठोर ब्योरे हैं। कथा 2 में बच्चे के साथ घटी एक कठोर घटना, और कथा 4 (वीरवर) में बेटे के बलिदान का पूरा ब्योरा संयत रखा गया है, पर कथा का आधार वही है। 'बलिदान', 'पतिव्रता' और कुल-रीति के बारे में कथा के पात्रों की बातें उनके अपने विचार हैं; इस वेबसाइट के नहीं। बेताल के उत्तरों में राजा के निर्णय उसी युग की न्याय-दृष्टि के हैं।
स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, बेताल का पहला सवाल