
अध्याय ५
यौगंधरायण की चाल
एक मंत्री ने अपनी ही रानी को 'जला' दिया — राजा को सम्राट बनाने के लिए, और रानी की अपनी सहमति से
यौगंधरायण की चाल — कथासरित्सागर का अध्याय ५। स्रोत: कथासरित्सागर, लंबक 3 (लावाणक), तरंग 15–16। इसमें ६ दृश्य हैं — मंत्री की चिंता; नारद का आना; लावाणक की आग; अवंतिका; राजा का शोक; मिलन और सत्य की शपथ — और अंत में १० सवाल।
मंत्री की चिंता
वासवदत्ता को पाकर वत्स का राजा उदयन धीरे-धीरे उसी के सुख में डूब गया। राज्य का बोझ उसके मंत्री यौगंधरायण और सेनापति रुमण्वान उठाते रहे। एक रात यौगंधरायण ने चिंतित होकर रुमण्वान को घर बुलाया और कहा, 'हमारा राजा पांडव-वंश का है, और धरती उसे पूर्वजों से मिली है। पर वह अपने वंश के हस्तिनापुर तक को छोड़ बैठा है। उसे जीतने की इच्छा नहीं। वह स्त्री, शराब और शिकार में लगा रहता है और राज्य की सारी चिंता हम पर छोड़ दी है। इसलिए हमें अपनी बुद्धि से ऐसा उपाय करना होगा कि उसे वह पूरी पृथ्वी मिले, जो उसके वंश का अधिकार है। तभी हम अपने कर्तव्य और अपने राजा के प्रति भक्ति निभाएँगे।'
उसने इसके लिए एक कथा सुनाई। महासेन नाम का एक राजा था। एक बलवान शत्रु ने उस पर चढ़ाई की, और मंत्रियों ने सलाह देकर उसे कर देने को राज़ी कर दिया। कर देने के बाद राजा इतना खिन्न रहने लगा कि उसके पेट में फोड़ा हो गया, और वह मरने की कगार पर पहुँच गया। तब एक बुद्धिमान वैद्य ने सोचा कि यह रोग दवा से नहीं जाएगा। उसने राजा से झूठ कहा, 'महाराज, आपकी रानी मर गई।' शोक के धक्के से फोड़ा अपने आप फट गया और राजा ठीक हो गया। वह फिर रानी के साथ सुख से रहा और उसने शत्रुओं को जीत लिया। 'वैद्य ने बुद्धि से राजा का भला किया,' यौगंधरायण ने कहा, 'हम भी अपने राजा का भला करें।'
फिर उसने अपनी योजना बताई। 'हमारा एक ही बड़ा शत्रु है, मगध का राजा, जो हमारे पीछे से बार-बार हमला करता है। हमें उसकी बेटी पद्मावती को अपने राजा के लिए माँगना होगा। मगध का राजा मना कर चुका है। उसने कहा था, "मैं अपनी बेटी को, जिसे अपने से अधिक चाहता हूँ, वत्सराज को नहीं दूँगा, क्योंकि वह अपनी पत्नी वासवदत्ता में लीन है।" और जब तक रानी जीवित है, राजा दूसरा विवाह करेगा भी नहीं। इसलिए हम वासवदत्ता को कहीं छिपा देंगे और उसका महल जलाकर हर जगह फैला देंगे कि रानी जल गई। तब पद्मावती राजा को मिल जाएगी। मगध हमारा संबंधी बन जाएगा और पीछे से हमला नहीं करेगा। फिर हम पूर्व दिशा जीतने निकलेंगे, फिर बाक़ी दिशाएँ, और इस तरह राजा को पूरी पृथ्वी दिला देंगे। वैसे भी, बहुत पहले आकाशवाणी ने यही कहा था।'
रुमण्वान ने पहले डर जताया कि ऐसी चाल से वे दोनों ही हँसी के पात्र बन सकते हैं, पर फिर मान गया। उसने एक और चिंता बताई, 'जब राजा सुनेगा कि रानी जल गई, तो वह अपने प्राण त्याग देगा। उसे कैसे रोका जाए?' यौगंधरायण बोला, 'रानी गोपालक की छोटी बहन है और उसे प्राणों से प्रिय है। जब राजा देखेगा कि गोपालक को ज़्यादा दुख नहीं है, तो उसे लगेगा कि रानी शायद जीवित हो। और वह वीर है, अपने को सँभाल लेगा। पद्मावती का विवाह भी जल्दी निपट जाएगा, फिर हम रानी को छिपाव से बाहर ले आएँगे।'
तीनों ने तय किया कि सब राजा-रानी के साथ लावाणक चलें। वह मगध की सीमा पर का इलाक़ा था, जहाँ शिकार की अच्छी जगहें थीं। राजा उन्हीं में महल से दूर रहेगा, और वे रानियों के भवन में आग लगाकर योजना पूरी कर सकेंगे। अगले दिन रुमण्वान ने राजा से कहा, 'महाराज, लावाणक गए बहुत समय हो गया। जगह बहुत सुंदर है, शिकार भी बढ़िया है और घोड़ों के लिए घास मिलती है। मगध का राजा उस इलाक़े को सताता है, इसलिए उसकी रक्षा के बहाने भी चलें।' राजा को हर तरह के आनंद की चाह थी, उसने वासवदत्ता के साथ चलना तय कर लिया।
नारद का आना
यात्रा का मुहूर्त तय हो चुका था, तभी अचानक महर्षि नारद उसके पास आए। वे आकाश के बीच से उतरे, मानो चंद्रमा अपने वंशजों के प्रेम में धरती पर आया हो। उन्होंने राजा को पारिजात की माला दी और रानी को आशीर्वाद दिया कि उसे एक पुत्र होगा, जो कामदेव का अंश होगा और सब विद्याधरों का राजा बनेगा।
नारद ने राजा से कहा, 'तुम्हारे पूर्वज युधिष्ठिर और उनके भाइयों की एक ही पत्नी द्रौपदी थी, और वह भी वासवदत्ता की तरह अनुपम सुंदरी थी। मैंने उन्हें ईर्ष्या से बचने की सीख दी थी, क्योंकि वह विपत्तियों का बीज है। मैंने उन्हें सुंद और उपसुंद की कथा सुनाई थी। वे दो असुर भाई थे। उन्हें मारने के लिए ब्रह्मा ने तिलोत्तमा नाम की एक अनुपम स्त्री रचवाई। जब वह कैलास के बाग़ में उनके सामने आई, तो दोनों ने उसे एक साथ पकड़ना चाहा, उसे खींचते हुए लड़ पड़े और दोनों मारे गए।' वे इसी सीख को राजा तक पहुँचाने आए थे। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि राजा को कुछ समय के लिए दुख सहना होगा।
लावाणक की आग
राजा लावाणक पहुँचा। उसकी सेना की गूँज से लगा कि मंत्रियों का उद्देश्य सफल होकर रहेगा। मगध के राजा ने सुना कि वत्सराज इतनी बड़ी सेना के साथ आ गया है, तो वह हमले के डर से काँप उठा। पर वह समझदार था और उसने यौगंधरायण के पास दूत भेजा, जिसने उसका स्वागत किया।
राजा हर दिन जंगल में शिकार करने निकल जाता। एक दिन जब वह शिकार पर था, यौगंधरायण गोपालक, रुमण्वान और वसंतक के साथ चुपके से रानी वासवदत्ता के पास गया। रानी को भाई से योजना का पूरा हाल पहले ही मिल चुका था। मंत्री ने उसे अलग-अलग तरह से मनाया कि वह राजा के हित में सहयोग करे। वियोग के दुख के बावजूद उसने मान लिया। कुलीन स्त्रियाँ, जो पति से प्रेम करती हैं, क्या नहीं सह लेतीं? यौगंधरायण ने उसे एक मंत्र दिया, जिससे उसने ब्राह्मणी का रूप धर लिया। वसंतक को उसने काना और ब्राह्मण बालक जैसा बना दिया, और ख़ुद एक बूढ़े ब्राह्मण का वेश धारण किया। फिर वह रानी और वसंतक को लेकर धीरे-धीरे मगध नगर की ओर चल पड़ा। वासवदत्ता शरीर से राह चल रही थी, पर मन से अपने पति के साथ थी।
तभी रुमण्वान ने उसके मंडप में आग लगा दी और चिल्लाया, 'हाय, हाय! रानी और वसंतक जल गए!' उस जगह एक साथ लपटें और रोना-पीटना आकाश तक उठा। लपटें धीरे-धीरे बुझ गईं, पर रोना नहीं बुझा।
अवंतिका
यौगंधरायण वासवदत्ता और वसंतक के साथ मगध नगर पहुँचा। बाग़ में उसे राजकुमारी पद्मावती दिखी। पहरेदारों के रोकने पर भी वह उसके पास गया। वासवदत्ता को ब्राह्मणी के वेश में देखते ही पद्मावती उस पर पहली नज़र में रीझ गई। उसने पहरेदारों को रोका और बूढ़े ब्राह्मण को अपने पास बुलवाया। उसने पूछा, 'महाब्राह्मण, आपके साथ यह कन्या कौन है, और आप क्यों आए हैं?' उसने उत्तर दिया, 'राजकुमारी, यह मेरी बेटी अवंतिका है। इसका पति व्यसनी है और इसे छोड़कर कहीं चला गया है। मैं इसे आपके पास धरोहर रखकर पति को खोजने जा रहा हूँ, जो जल्द लौट आऊँगा। यह काना लड़का इसका भाई है, यह इसके साथ रहेगा ताकि यह अकेली न रहे।' पद्मावती ने मान लिया। मंत्री उसी रात लावाणक लौट गया।
पद्मावती वासवदत्ता को, जो अवंतिका नाम से रह रही थी, और काने लड़के के रूप में वसंतक को अपने सुंदर महल में ले गई। वहाँ दीवारों पर राम की कथा के चित्र बने थे, उनमें सीता को देखकर वासवदत्ता को अपना दुख सहने की शक्ति मिली। पद्मावती ने देखा कि अवंतिका के रूप, उसकी कोमलता, उसके बैठने और खाने की शैली और उसके शरीर की कमल जैसी सुगंध से वह बहुत ऊँचे घराने की लगती है। उसने सोचा, 'यह ज़रूर कोई ऊँचे दर्जे की स्त्री है जो छिपकर रह रही है। द्रौपदी भी तो विराट के महल में छिपकर रही थी।' इसलिए उसने उसे जी भरकर आराम से रखा।
वासवदत्ता ने पद्मावती के प्रति स्नेह में उसके लिए कभी न मुरझाने वाली मालाएँ और माथे के तिलक बनाए, जो उसने अपने राजा से सीखे थे। पद्मावती की माँ ने बेटी को उनसे सजा देखा तो पूछा कि ये किसने बनाए। पद्मावती ने बताया कि हमारे घर में अवंतिका नाम की एक स्त्री रहती है, उसी ने बनाए। माँ ने कहा, 'तो बेटी, वह साधारण स्त्री नहीं, वह कोई देवी है। ऐसी विद्या वाले लोग भलों के घर भेस बदलकर रह जाते हैं।' और उसने कुंती और दुर्वासा की कथा सुनाई: राजा कुंतिभोज ने अपनी बेटी कुंती को ऋषि दुर्वासा की सेवा में रखा, तो ऋषि ने परीक्षा के लिए गरम खीर का बर्तन उसके पीठ पर रखवा लिया। कुंती जलती पीठ के बावजूद शांत खड़ी रही और ऋषि ने प्रसन्न होकर उसे वर दिया। 'इसलिए उसे प्रसन्न रखने का प्रयास करो,' माँ ने कहा। पद्मावती ने वैसा ही किया। वासवदत्ता पति से अलग होकर वहाँ रात के कमल की तरह मुरझाई रहती, पर वसंतक की बचकानी हरकतें उसके चेहरे पर बार-बार मुस्कान ला देती थीं।
राजा का शोक
उधर वत्स का राजा दूर के शिकार-स्थलों में घूमकर देर शाम लावाणक लौटा। उसने रानियों के भवन को राख होते देखा और मंत्रियों से सुना कि रानी और वसंतक जल गए। सुनते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ा। पल भर बाद होश आया तो उसके हृदय में रानी की छवि के साथ दुख की आग जल उठी। वह रोया, और उसने जान देने की ठान ली। फिर क्षण भर में उसे नारद की बात याद आई, 'इस रानी से एक पुत्र होगा जो सब विद्याधरों पर राज करेगा। नारद ने यह भी कहा था कि मुझे कुछ समय दुख मिलेगा। फिर गोपालक का दुख हल्का दिखता है। यौगंधरायण और दूसरे मंत्रियों में भी बहुत शोक नहीं दिखता। हो सकता है रानी जीवित हो, और मंत्रियों ने कोई युक्ति की हो। तब मैं किसी दिन उससे मिलूँगा।' ऐसा सोचकर और मंत्रियों के समझाने पर उसने मन को सँभाल लिया। गोपालक ने भी चुपके से अपनी बहन के पास संदेशवाहक भेजकर हाल बता दिया।
मगध के जासूसों ने राजा को सब बता दिया था। वह हमेशा मौक़े का इंतज़ार करने वाला राजा था। उसने फिर वत्सराज को अपनी बेटी का प्रस्ताव भेजा, जो पहले मंत्रियों ने माँगी थी। यौगंधरायण की सलाह पर वत्सराज ने मान लिया, यह सोचते हुए कि शायद रानी को इसीलिए छिपाया गया है। यौगंधरायण ने मगध के राजा को संदेश भेजा, 'आपकी इच्छा हमें मान्य है। आज से सातवें दिन वत्सराज आपके दरबार आकर पद्मावती से विवाह करेंगे, ताकि वे जल्दी वासवदत्ता को भूल सकें।' वासवदत्ता को यह ख़बर मिली तो उसका मन बैठ गया। पर वसंतक ने कहा, 'इस तरह शत्रु मित्र बन जाएगा और आपके पति का मन आपसे नहीं हटेगा।' इस बात से वह सँभल गई। उसने पद्मावती के विवाह के लिए फिर से दिव्य सुंदरता की मालाएँ और तिलक बनाए।
सातवें दिन वत्सराज अपनी सेना और मंत्रियों के साथ आ पहुँचा। अपनी विरह-दशा में भी वह कैसे यह विवाह मानता, अगर उसे अंदर से रानी के लौटने की आशा न होती? मगध का राजा बड़े आनंद से उसे लेने आया, जैसे समुद्र चंद्रमा के स्वागत में आगे बढ़ता है। वत्सराज ने विवाह-मंडप में पद्मावती को सजी हुई देखा। उसने देखा कि उसने ऐसी मालाएँ और तिलक पहने हैं, जिन्हें वही बना सकता था, और वह हैरान रह गया कि ये उसे कहाँ से मिले। उसने वेदी पर चढ़कर उसका हाथ थामा। वेदी का धुआँ उसकी आँखों में आँसू ले आया, जैसे वह वासवदत्ता से इतने प्रेम के कारण यह विवाह देख ही नहीं सकता था। पद्मावती का चेहरा अग्नि की परिक्रमा से लाल हुआ, मानो वह पति के मन की बात जानकर क्रोधित थी। विवाह के बाद भी वत्सराज के हृदय से वासवदत्ता की छवि एक पल को भी नहीं हटी। मगध के राजा ने उसे इतने रत्न दिए कि पृथ्वी रत्नहीन लगने लगी। यौगंधरायण ने अग्नि को साक्षी बनाकर मगध के राजा से वचन लिया कि वह कभी अपने स्वामी को हानि नहीं पहुँचाएगा।
मिलन और सत्य की शपथ
विवाह के उत्सव के बीच वासवदत्ता चुपचाप आशा से देखती रही, मानो दिन में सोई चंद्रकला। यौगंधरायण को डर था कि राजा रानियों के भवन में जाकर उसे देख लेगा और सारा भेद खुल जाएगा। उसने मगध के राजा से कहा कि वत्सराज आज ही यहाँ से चल देंगे, और राजा को भी यही बताया। राजा सब सेना और नई दुल्हन पद्मावती के साथ चल पड़ा। वासवदत्ता पद्मावती की भेजी गाड़ी पर सेना के पीछे चुपचाप चली और वसंतक को आगे चलाती रही। राजा लावाणक पहुँचकर अपने महल में गया, पर मन में सिर्फ़ वासवदत्ता को सोचता रहा। रानी भी रात को पहुँची और भाई गोपालक के घर में गई, और पहरेदारों को बाहर रखा। भाई-बहन एक-दूसरे के गले लगकर रोए। उसी क्षण यौगंधरायण और रुमण्वान भी वहाँ आ गए।
इधर पद्मावती के पहरेदारों ने उसे बताया कि अवंतिका आ गई है, पर अजीब ढंग से उन्हें दूर करके गोपालक के घर चली गई। पद्मावती घबराकर राजा के सामने बोली, 'जाकर अवंतिका से कहो, "रानी कहती है कि तुम मेरी धरोहर हो। तुम्हें यहाँ क्या काम? मेरे पास आओ।"' तब राजा ने पद्मावती से एकांत में पूछा कि ये अनमोल मालाएँ और तिलक किसने बनाए। पद्मावती ने कहा, 'ये अवंतिका की कारीगरी है, जिसे एक ब्राह्मण मेरे पास धरोहर रख गया था।' यह सुनते ही राजा सीधे गोपालक के घर गया, यह सोचता हुआ कि वहाँ वासवदत्ता ज़रूर होगी। द्वार पर नपुंसक पहरेदार थे। भीतर रानी, गोपालक और दोनों मंत्री थे। उसने वासवदत्ता को वनवास से लौटी हुई देखा, जैसे ग्रहण से छूटा चंद्रमा। वह शोक के विष से बेहोश होकर गिर पड़ा। वासवदत्ता भी वियोग से पीली पड़कर गिर पड़ी और अपने को दोष देने लगी।
दोनों का विलाप सुनकर यौगंधरायण की भी आँखों से आँसू बहने लगे। पद्मावती उस रोने की आवाज़ सुनकर घबराई हुई वहाँ आ गई। धीरे-धीरे उसे भी राजा और वासवदत्ता का सच पता चल गया, और वह भी वैसी ही हो गई, क्योंकि भली स्त्रियाँ कोमल हृदय होती हैं। वासवदत्ता बार-बार रोकर कहती थी, 'मेरे जीवन का क्या लाभ, जो पति को केवल दुख देता है?' तब शांत यौगंधरायण ने राजा से कहा, 'महाराज, मैंने यह सब आपको सम्राट बनाने के लिए, मगध के राजा की बेटी से आपका विवाह कराने के लिए किया है। रानी का इसमें ज़रा भी दोष नहीं। उसकी सौत पद्मावती इस पूरे समय की उसकी सच्चरित्रता की साक्षी है।' ईर्ष्या से मुक्त पद्मावती बोली, 'मैं तुरंत अग्नि में प्रवेश करके इसकी निर्दोषता सिद्ध करने को तैयार हूँ।' राजा ने कहा, 'दोष मेरा है, क्योंकि मेरे कारण रानी को यह कष्ट सहना पड़ा।' वासवदत्ता ने दृढ़ होकर कहा, 'मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी ताकि राजा के मन से संदेह दूर हो।'
तब सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा यौगंधरायण ने आचमन किया, पूर्व की ओर मुँह करके निर्मल वचन बोला, 'अगर मैंने इस राजा का भला किया है, और अगर रानी निष्कलंक है, तो हे लोकपालो, बोलो। अगर यह सच नहीं, तो मैं अपना शरीर छोड़ दूँगा।' इतना कहकर वह चुप हुआ, तो आकाश से यह वाणी सुनाई दी, 'राजन्, तुम धन्य हो कि यौगंधरायण जैसा मंत्री और वासवदत्ता जैसी पत्नी तुम्हारे पास है, जो पूर्वजन्म में देवी थी। उस पर ज़रा भी दोष नहीं है।' वहाँ मौजूद सबने यह ध्वनि सुनकर, जो पहली बारिश के बादलों की गर्जना जैसी सब दिशाओं में गूँजी, मोरों की तरह अपनी बाँहें उठाईं और हर्ष से नाचे। राजा और गोपालक ने यौगंधरायण के इस कार्य की प्रशंसा की, और राजा ने मान लिया कि सारी पृथ्वी अब उसके अधीन है। वह दोनों पत्नियों के साथ, जिनका स्नेह उसके साथ रहने से रोज़ बढ़ता गया, परम सुख से रहने लगा।
टिप्पणी: यह अध्याय सी. एच. टॉनी के अंग्रेज़ी अनुवाद (लंबक 3, तरंग 15–16) से सीधे लिखा गया है। इसी चाल पर संस्कृत नाटक 'स्वप्नवासवदत्तम्' का कथानक आधारित माना जाता है (भास को श्रेय दिया जाता है, पर यह विवादित है)। नाटक में राजा को पूरा विश्वास हो जाता है कि रानी जल गई; सोमदेव के पाठ में राजा को शंका रहती है। 'प्रद्योत' या 'मगध के राजा' जैसे नाम ग्रंथ में कुछ जगह मिले-जुले हैं; यहाँ 'मगध का राजा' रखा गया है। सुंद-उपसुंद और कुंती-दुर्वासा की उपकथाएँ संक्षेप में दी गई हैं। रानी की 'पतिव्रता' परीक्षा का यह प्रसंग उस समय की कथा-परंपरा का है; इसे आज की किसी स्त्री-अपेक्षा की तरह न पढ़ें।
स्रोत: सोमदेव भट्ट — कथासरित्सागर (कश्मीर, ग्यारहवीं सदी), गुणाढ्य की खोई हुई बृहत्कथा का संक्षेप, यौगंधरायण की चाल