आपुत्रन् — मणिमेखलै, चित्र

अध्याय ६

आपुत्रन्

गाय के दूध पर पला एक बच्चा जिसने यज्ञ की गाय चुराई, मदुरै के मंदिर में भिक्षा माँगकर भूखों को खिलाया — और इंद्र के सामने हँस पड़ा

आपुत्रन् — मणिमेखलै का अध्याय ६। स्रोत: मणिमेखलै, सर्ग 13–15। इसमें ९ दृश्य हैं — बच्चा जिसे एक गाय ने बचाया; यज्ञ की गाय; आपुत्रन् का उत्तर; साली की बात; मदुरै का मंदिर; वह बरसाती रात; इंद्र के सामने; जब कोई भूखा न रहा; सोने का अंडा — और अंत में १० सवाल।

बच्चा जिसे एक गाय ने बचाया

अरवणर ने मणिमेखलै को बताया, 'सुन, मैं तुझे आपुत्रन् की कथा सुनाता हूँ — जिसने तुझे यह दिव्य कटोरा दिया।

'वाराणसी में अबञ्जिकन् नाम का एक ब्राह्मण था, जो वेद पढ़ता और अग्निहोत्र करता। उसकी पत्नी साली ने उसके प्रति निष्ठा नहीं रखी। गाँव में रहने से डरकर वह दक्षिण की ओर चली, कन्याकुमारी पहुँची और सागर में स्नान किया। आधी रात को उसने एक बेटे को जन्म दिया — पर वह ब्राह्मणों के गाँव में डर के मारे रह नहीं सकी। बच्चे की चिंता में उसने उसे एक उपवन में छोड़ा और चली गई।

'बच्चे का रोना एक गाय ने सुना। वह पास आई, उसे प्यार से चाटा और मीठा दूध पिलाया। सात दिन तक वह बच्चे के पास रही और उसकी रक्षा करती रही।

'वायंगोडु गाँव में वेदों का एक ज्ञाता ब्राह्मण रहता था — पुदि। उसने बच्चे का रोना सुना, पास गया, देखा। उसे करुणा हुई और वह रो पड़ा। उसने समझ लिया कि यह गाय का बेटा नहीं है, और कहा, "यह मेरा बेटा है!" वह बच्चे को घर ले गया और पत्नी के हाथ में दे दिया। दोनों ने देवताओं को धन्यवाद दिया — "हमें बेटा मिला है, हमारा कुल फले!" पिता ने उसे सारे शास्त्र पढ़ाए, मित्रों को बुलाकर जन्मदिन पर उसका जनेऊ किया। लड़का जो कुछ सीखता, बिना भूल याद रखता।'

यज्ञ की गाय

'एक दिन लड़का किसी और ब्राह्मण के घर गया और वहाँ पशु-बलि की तैयारी देखी। एक गाय बँधी थी — सींगों पर रंगीन माला, और वह ऐसे काँप रही थी जैसे बहेलिए के जाल में फँसी हिरनी। वह अपने शत्रुओं — ब्राह्मणों — से डरकर करुणा-भरी पुकार रही थी।

'लड़के ने उसे देखा, हृदय से काँप गया, आँखों से आँसू बहे। उसने सोचा, "मैं आधी रात के अँधेरे में इस गाय को चुराकर ले जाऊँगा।" उसने यही किया — छिपकर, रात में, गाय को खोलकर जंगल की ओर निकल पड़ा।

'जंगल पार करते हुए कुछ बलवान, कठोर ब्राह्मणों ने उसे गाय के साथ पकड़ लिया। उन्होंने कहा, "तू आधी रात को गाय चुराकर भाग रहा है! तू अच्छे ब्राह्मण का बेटा नहीं है। तू तो किसी नीच कुल का बेटा है और हम तुझे जाति से बाहर करेंगे!" और उसे लाठी से मारा।

'जब गाय ने देखा कि एक ब्राह्मण आपुत्रन् को मारने जा रहा है, वह भड़क गई, उसने ब्राह्मण के पेट में सींग मारा और जंगल में भाग गई।'

आपुत्रन् का उत्तर

आपुत्रन् ने ब्राह्मणों से कहा, 'किसी को चोट मत पहुँचाओ। सुनो। जन्म से ही यह गाय राजा की दी हुई मुफ़्त ज़मीन की घास खाती है और सारे संसार के लोगों को प्रेम से मीठा दूध देती है। इस ग़रीब गाय पर तुम क्यों क्रोधित हो? तुम तो पुराने वेद जानते हो — बताओ, तुम ऐसा क्यों सोचते हो?'

ब्राह्मणों ने उसे डाँटा, 'ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं, वे विष्णु के पुत्र हैं... उन्होंने हमें ये पवित्र वेद दिए। तू उनकी महिमा नहीं जानता और हमारा अपमान करता है। तू गाय का बेटा होने लायक है, इंसान का नहीं।'

आपुत्रन् बोला, 'असलन् गाय का बेटा था। शृंगी हिरन का बेटा था। विरिंजि बाघ का बेटा था। और कैसकंबलन् — जिसकी ऋषि प्रशंसा करते हैं — क्या लोमड़ी का बेटा नहीं था? तुम अपने ब्राह्मण-कुलों में इन सबको ऋषि कहकर सराहते हो। क्या चारों वेदों में कहीं लिखा है कि कोई गाय के कुल का नहीं हो सकता?'

साली की बात

उन ब्राह्मणों में एक बोला, 'मैं इस लड़के के जन्म की बात जानता हूँ। उत्तर से एक स्त्री आई थी, साली, थकी-हारी, कन्याकुमारी के सागर तक पैदल। जब वह कन्याकुमारी देवी के चरण पूज रही थी, मैंने उससे पूछा, "तुम कहाँ से आई हो?" उसने मुझे अपनी कथा सुनाई: "मैं वाराणसी के एक वेदज्ञ ब्राह्मण की प्रिय पत्नी हूँ। मैंने ब्राह्मणों का अच्छा जीवन नहीं जिया और पति के प्रति अविश्वासी रही। मैंने उन्हें अपमानित किया और वे मुझे छोड़ गए। गाँव वालों के डर से मैं तीर्थयात्रियों के साथ शहर छोड़कर दक्षिण आई। दस मील चलकर कोरकै पहुँची, जहाँ पांड्य राजा राज करते हैं। गोपालकों के घरों में रही और बच्चे को जन्म दिया। उसे प्यार न दे सकी और अनजान उपवन में छोड़कर चली आई। मैंने भारी पाप किया है — क्या देवता मुझे क्षमा करेंगे?" वह रोती-बिलखती रही। यह लड़का उसी दुखी स्त्री का बेटा है। मैं यह बात बताना नहीं चाहता था, क्योंकि सब इसे ब्राह्मण का बेटा समझते थे; पर अब तुम जान गए। इसे बचाओ मत — यह नीच जाति का है।' यहाँ पाठ का विवरण पहले कथन से अलग है: अरवणर की शुरुआती कथा में जन्म कन्याकुमारी पहुँचने के बाद बताया गया था; साली के अपने कथन में वह कोरकै में बच्चे को जन्म देने की बात कहती है।

आपुत्रन् यह सुनकर ज़ोर से हँसा। उसने कहा, 'जिन कुलों में वेदों के बड़े विद्वान ब्राह्मण जन्मे हैं, उनके बारे में भी सुनो। क्या यह सच नहीं कि वेदों के रचयिता ब्रह्मा और स्वर्ग की नर्तकी तिलोत्तमा से दो ब्राह्मण ऋषि जन्मे थे? ओ जनेऊधारी ब्राह्मण, साली ने क्या ग़लत किया?'

वह उन चार वेदों के ज्ञाताओं पर हँसा और वहीं खड़ा रहा। पर उसके पालक पिता पुदि ने सोचा कि ब्राह्मण लड़के को स्वीकार नहीं करेंगे और वह वेद पढ़ने योग्य नहीं रहा, और उसने उसे घर से निकाल दिया। पूरे ब्राह्मण-गाँव ने उसे डाँटा — 'चोर! गाय-चोर!' — और उसके भिक्षापात्र में पत्थर फेंके।

मदुरै का मंदिर

आपुत्रन् गाँव छोड़कर मदुरै चला गया, जहाँ धनी लोग बसते थे। वह देवी सिंधादेवी के सुंदर मंदिर में, पीठ के पास के मंडप में ठहरा। हाथ में भिक्षापात्र लिए वह अच्छे घरों से भीख माँगता, और जो मिलता उसमें से अंधों, बहरों, लँगड़ों, अनाथों और बीमारों को बुलाकर खुशी-खुशी खिलाता — जो बचता, वही खुद खाता — और भिक्षापात्र को तकिया बनाकर सो जाता। वह प्राणियों का रक्षक था।

वह बरसाती रात

'एक अँधेरी बरसाती रात,' अरवणर ने कहा, 'कुछ लोग मंदिर में आए। उन्होंने आपुत्रन् को जगाया, उसे प्रणाम किया, और कहा, "हम बहुत भूखे हैं और कष्ट में हैं।" उसके पास खिलाने को कुछ नहीं था — वह जो भीख लाता, सब बाँट देता। वह चिंता में पड़ा कि कैसे खिलाए।

'तभी मंदिर की देवी, सब द्वारा पूजित सिंधादेवी, उसके सामने प्रकट हुईं। उन्होंने कहा, "बेटा, चिंता मत कर। उठ और इसे ले — तेरी चिंता मिट जाएगी। देश में अकाल पड़े तब भी यह पात्र ख़ाली नहीं होगा। लोगों के हाथों में इतना भोजन भर देगा कि उनके हाथ दुखने लगें।" और उन्होंने पात्र आपुत्रन् के हाथ में रख दिया।

'उसने देवी की स्तुति की और लोगों को खिलाने लगा। अमृतसुरभि लोगों के हाथ भर-भर कर भोजन देने लगा; फलदार पेड़ों पर रहने वाले पशु-पक्षी भी जमा होकर ख़ुशी की आवाज़ें करने लगे।'

इंद्र के सामने

'आपुत्रन् की इस उदारता से स्वर्ग में इंद्र का संगमरमर का सिंहासन हिल गया। वह बूढ़े ब्राह्मण का वेश धरकर, छड़ी के सहारे, झुकी कमर के साथ आपुत्रन् के सामने आया, और बोला, "मैं इंद्र हूँ और तुझे देखने आया हूँ। तेरी उदारता से प्रसन्न होकर कोई भी वरदान दूँगा — माँग।"

'आपुत्रन् इतनी ज़ोर से हँसा कि लगा उसकी छाती की हड्डियाँ टूट जाएँगी। उसने व्यंग्य से कहा, "जाइए। आपके स्वर्ग में तो केवल सुंदर देवता रहते हैं और अपने पुण्य का फल भोगते हैं। आप स्वर्ग के बलवान राजा हैं, पर वहाँ के देवता दान नहीं देते। लोगों के रक्षक, कठोर तप करने वाले ऋषि और इच्छा-रहित लोग आपके स्वर्ग में नहीं रहते। क्या आपके लोक में मेरे इस अमृतसुरभि जैसे दिव्य पात्र हैं जो भूखों को खिलाएँ? क्या ग़रीबों के लिए वस्त्र हैं? क्या वहाँ स्त्रियाँ ग़रीबों को खिलाती और उनकी रक्षा करती हैं? हे देवताओं के राजा, आप मुझे क्या दे सकते हैं?"

'सहस्र-नेत्र इंद्र क्रोधित हो उठा। उसने कहा, "खूब बारिश हो! यह भूमि अपार धन से फले! तुझे कोई भिखारी नहीं मिलेगा, और तू अपने इस अमृतसुरभि से, जो इतना भोजन देता है, किसी को नहीं खिला पाएगा — निराश रह जाएगा!"

'उसके बाद बारह वर्ष तक पांड्य देश में अकाल नहीं पड़ा। बारिश ऐसी हुई और भोजन इतना मिला कि लोग भूख जानते ही नहीं थे।'

जब कोई भूखा न रहा

'जिस मंदिर में आपुत्रन् ठहरा था, वहाँ बुद्ध-पीठ के पास कोई खाने नहीं आता था। लोगों, पशुओं और पक्षियों की आवाज़ बंद हो गई। वह जगह बुरे लोगों, बेकार लोगों, बे-रिश्तेदारों और आवारा लोगों से भर गई, जो जुआ खेलते, गपशप करते, और आपुत्रन् का मज़ाक उड़ाते। आपुत्रन् मंदिर छोड़कर गाँव-गाँव घूमा और पूछता रहा कि कोई भूखा है क्या। लोग हँसते, "यह कौन है?" उसे किसी ने खाना नहीं माँगा, यहाँ तक कि यह भी नहीं पूछा कि वह ज़िंदा है या नहीं। वह उस अकेले राजा की तरह हो गया जिसका धन महासागर ले गया हो।

'तभी कुछ लोग जहाज़ से आए और उससे कहा, "ओ प्राणों के रक्षक, जावग देश में बारिश नहीं हो रही; वहाँ बहुत-से लोग और प्राणी भूख से मर रहे हैं।" आपुत्रन् ने कहा, "इंद्र के शाप से मैं यहाँ किसी को नहीं खिला पा रहा। मैं अपने अमृतसुरभि को लेकर जावग जाना चाहता हूँ।" वह ख़ुशी से जहाज़ पर चढ़ गया।

'रास्ते में समुद्र में तूफ़ान आया और जहाज़ एक दिन मणिपल्लवम् द्वीप पर रुका। अगले दिन जब जहाज़ चला, तो यात्रियों ने सोचा कि आपुत्रन् जहाज़ पर लौट आया है और अँधेरी रात में उसे छोड़कर चले गए। जब आपुत्रन् को पता चला तो वह दुखी हुआ। उसने ढूँढ़ा पर कोई नहीं मिला — उसे समझ आया कि द्वीप पर कोई नहीं रहता। उसने सोचा, "यह अद्भुत पात्र प्राण बचाने के लिए है। इसे केवल अपनी जान बचाने के लिए रखना ठीक नहीं। मैंने वह तप खो दिया है जिससे इस पात्र से प्राणियों को बचा सकता था। अब यह मेरे अकेले के पास रखने से क्या फ़ायदा?"

'तब वह गोमुखी तालाब पर गया और पात्र को उसके जल में डाल दिया। उसने कहा, "तू वर्ष में एक बार तालाब से उठ। अगर कोई दयालु और उदार हो, जो दूसरों की देखभाल करने और अनमोल प्राण बचाने के लिए जीता हो, तो तू उसके हाथों में चले जाना।" फिर आपुत्रन् ने अनशन करके प्राण त्यागने का व्रत लिया। मैंने उसे देखा और पूछा, "क्या तुम किसी संकट में हो?" उसने मुझे सब बताया, और जैसे पूर्व में उगा सूर्य अँधेरा हरकर पश्चिम में डूब जाता है, वैसे उसने मणिपल्लवम् द्वीप पर अपना शरीर त्याग दिया।

'फिर वह एक गाय के गर्भ से जन्मा — ताकि वह संसार के सब प्राणियों के प्राण बचा सके। वह जावग देश का राजा बना।'

सोने का अंडा

'आगे सुन,' अरवणर ने कहा। 'ठंडे श्वेत जावग पर्वतों में मन्मुहन् नाम के दिव्य ऋषि रहते थे। उनकी एक गाय थी — सोने के सींग और सोने के खुरों वाली — जो अपने बछड़ों को जन्म देने से पहले भी निःस्वार्थ भाव से सबको दूध देती थी। आपुत्रन् ने मणिपल्लवम् में प्राण इसीलिए दिए कि वह फिर जन्म लेकर दान करे और भूख का रोग हर सके। गाय का वह प्रेम उसके साथ रहा, जिसने बचपन में उसे दूध पिलाया और रक्षा की थी। इस जन्म में वह ऋषि मन्मुहन् की गाय से जन्मा। उसकी नाल नहीं थी — वह एक सोने के अंडे से निकला। देवता प्रसन्न हुए।

'वह वसंत में, वैशाख के तेरहवें दिन विशाखा नक्षत्र में, पूर्णिमा को जन्मा — उसी समय जब बुद्ध का जन्म हुआ था। जन्म के समय बारिश नहीं थी, फिर भी चारों ओर शुद्ध जल और फूल बरस पड़े। चक्रवाल-कोट्टम के ऋषि चकित हुए: "यह बुद्ध के जन्म का वर्ष नहीं है, फिर भी धरती फल-फूल रही है!" वे आधी रात को कंदिल-पावै के पास गए, और पावै ने कहा, "आपुत्रन् ने मणिपल्लवम् में प्राण दिए और प्राणियों को बचाने जावग में फिर जन्मा है। उसकी कथा ऋषि अरवणर जानते हैं — उनसे पूछो।"

'राजा भूमिसंद्रन् ने ऋषि मन्मुहन् के चरणों की पूजा करके उनकी कृपा से एक पुत्र पाया था। उसे पुत्रहीन राजा ने अपना बेटा मानकर पाला, और वही लड़का जावग देश का फूलों की माला पहना राजा बना। उसका नाम पड़ा पुण्यराजन्। उसके जन्म के बाद वहाँ कभी बारिश नहीं रुकी।'

फिर अरवणर ने मणिमेखलै से कहा, 'तेरे पास जो पात्र है, वह भूख की भयानक पीड़ा हर लेगा। इसे लोगों से छिपाकर मत रखना। जब क्षीर-सागर मथा गया और देवताओं ने अमृत पिया, तो बचा हुआ अमृत असुरों को न देकर उन्होंने छिपा लिया — यह ठीक नहीं था।'

मणिमेखलै ने सुधमती और माधवी के साथ अरवणर को प्रणाम किया और दिव्य पात्र लेकर नगर की चौड़ी गलियों में निकल पड़ी।

टिप्पणी: सर्ग 13–15, कौसल्या हार्ट के अंग्रेज़ी अनुवाद से। यह कथा अलग-अलग सारांशों में अलग-अलग रूप में मिलती है — कुछ स्रोतों में आपुत्रन् सीधे मदुरै का ब्राह्मण साधु बताया जाता है, कुछ में साली को गणिका कहा गया है; यहाँ हार्ट के पाठ का पालन किया गया है, जिसमें साली को 'पति के प्रति अविश्वासी' कहा गया है। जनेऊ और जाति से जुड़े अपमान-वाक्य पाठ में पात्रों की ज़बान से हैं — ब्राह्मणों के आपुत्रन् पर लगाए आरोप और उसके अपने उत्तर, दोनों; यहाँ कोई वाक्य कवि की अपनी राय के रूप में नहीं पेश किया गया। पाठ में ब्राह्मण-पात्रों को कठोर दिखाया गया है; इसे इस बौद्ध महाकाव्य के दृष्टिकोण के रूप में पढ़ें, किसी पूरे समुदाय के बारे में कथन के रूप में नहीं। असलन्, शृंगी, विरिंजि और कैसकंबलन् पाठ के नाम हैं — शृंगी (ऋष्यशृंग) हिरनी से जन्मे माने जाते हैं; बाक़ी तीन की पहचान यहाँ नहीं दी गई। 'जावग' का भौगोलिक अर्थ (जावा, सुमात्रा या मलय क्षेत्र) विद्वानों में विवादित है।

स्रोत: तमिल पंचकाव्य — मणिमेखलै (परंपरा से सीतलै सात्तनार रचित), आपुत्रन्

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

जब साली ने बच्चे को उपवन में छोड़ा, तब उसकी रक्षा किसने की?

  • एक भिक्षुणी ने
  • एक ब्राह्मण ने
  • एक गाय ने, जिसने उसे चाटा और सात दिन तक दूध पिलाया
  • मदुरै के राजा ने
पूरी कथा पढ़िए — गाय की ममता

गाय ने बच्चे का रोना सुना, पास आकर उसे दूध पिलाया।

वह सात दिन तक उसकी रखवाली करती रही।

तथ्य

बच्चे को घर ले जाकर किस ब्राह्मण ने पाला?

  • ब्रह्मधर्मन
  • अबञ्जिकन्
  • वायंगोडु गाँव के वेदज्ञ ब्राह्मण पुदि
  • कौशिक
पूरी कथा पढ़िए — पालक पिता

पुदि ने बच्चे का रोना सुना और उसे अपना बेटा कहकर घर ले गया।

उसने उसे शास्त्र पढ़ाए और उसका जनेऊ कराया।

ऐसा क्यों?

लड़के ने यज्ञ की गाय क्यों चुराई?

  • क्योंकि उसके पिता ने कहा था
  • क्योंकि वह बहुत ग़रीब था
  • क्योंकि वह उसे बेचना चाहता था
  • क्योंकि उसने गाय को बलि से पहले काँपते और रोते देखा और उसे बचाना चाहा
पूरी कथा पढ़िए — दया की चोरी

गाय के गले में माला थी और वह बलि के लिए बँधी थी।

लड़के का हृदय काँप उठा और उसने रात में उसे खोल दिया।

किसने कहा?

'असलन् गाय का बेटा था। शृंगी हिरन का बेटा था। विरिंजि बाघ का बेटा था।' यह किसने कहा?

  • पुदि ने
  • साली ने
  • आपुत्रन् ने, ब्राह्मणों से
  • अरवणर ने
पूरी कथा पढ़िए — आपुत्रन् का उत्तर

ब्राह्मणों ने उसे 'गाय के बेटे' कहकर ताना मारा।

उसने उन्हीं की परंपरा के ऋषियों के जन्म गिनाकर पूछा कि वेदों में कहाँ लिखा है कि कोई गाय के कुल का नहीं हो सकता।

व्याख्या

इस कथा में जन्म को लेकर बार-बार ताने सुनने वाले आपुत्रन् के प्रसंग को कैसे पढ़ना ठीक है?

  • ऐतिहासिक घटना की तरह
  • एक ऐसे पात्र की कथा की तरह जिसे जन्म की जगह उसकी दया और काम से परखा जाता है
  • ब्राह्मणों की प्रशंसा की तरह
  • केवल एक चमत्कारी कथा की तरह
पूरी कथा पढ़िए — एक पठन

पाठ में आपुत्रन् के जन्म पर प्रश्न उठते हैं, और वह उसका उत्तर अपने काम से और अपनी बात से देता है।

यह पठन आज के पाठक का है; पाठ का वर्णन अपने समय की बौद्ध दृष्टि से हुआ है।

तथ्य

ब्राह्मणों के गाँव से निकाले जाने के बाद आपुत्रन् कहाँ गया?

  • पुहार
  • कांची
  • वंजि
  • मदुरै, जहाँ वह सिंधादेवी के मंदिर में ठहरा
पूरी कथा पढ़िए — मदुरै का मंदिर

वह धनी लोगों के नगर मदुरै गया और सिंधादेवी के मंदिर में रहा।

वहाँ भीख माँगकर वह अंधों, बहरों, लँगड़ों और अनाथों को खिलाता।

क्या हुआ?

आपुत्रन् को अमृतसुरभि किसने दिया?

  • एक ब्राह्मण ने
  • इंद्र ने
  • अरवणर ने
  • मंदिर की देवी सिंधादेवी ने, एक बरसाती रात
पूरी कथा पढ़िए — देवी का दान

भूखे लोग रात में आए और आपुत्रन् के पास खिलाने को कुछ नहीं था।

तब देवी ने उसके हाथ में कभी ख़ाली न होने वाला पात्र रखा।

किसने कहा?

'क्या आपके लोक में मेरे इस अमृतसुरभि जैसे दिव्य पात्र हैं जो भूखों को खिलाएँ?' यह किसने, किससे कहा?

  • मणिमेखलै ने, तीवतिलकै से
  • आपुत्रन् ने, इंद्र से
  • साली ने, पुदि से
  • सिंधादेवी ने, आपुत्रन् से
पूरी कथा पढ़िए — इंद्र पर हँसी

बूढ़े ब्राह्मण के वेश में आए इंद्र ने वरदान देना चाहा।

आपुत्रन् ने हँसकर कहा कि इंद्र के स्वर्ग में दान ही नहीं है।

क्या हुआ?

इंद्र के क्रोध का आपुत्रन् पर क्या असर हुआ?

  • पांड्य देश में बारह वर्ष तक इतनी बारिश हुई कि कोई भूखा ही न रहा, और आपुत्रन् को खिलाने को कोई नहीं मिला
  • उसे नष्ट कर दिया गया
  • वह अंधा हो गया
  • उसे राजा बना दिया गया
पूरी कथा पढ़िए — बिन भूखे का देश

इंद्र ने कहा था कि खूब बारिश हो और तुझे कोई भिखारी न मिले।

बारह वर्ष तक पांड्य देश में अकाल नहीं पड़ा, और आपुत्रन् अकेला रह गया।

क्या हुआ?

जहाज़ के उसे मणिपल्लवम् पर छोड़ जाने के बाद आपुत्रन् ने क्या किया?

  • पात्र को गोमुखी तालाब में डाल दिया, अनशन करके प्राण त्यागे, और अरवणर के अनुसार जावग देश में गाय के गर्भ से जन्म लिया
  • वहीं राज्य बसाया
  • पात्र इंद्र को लौटा दिया
  • पात्र को अपने साथ रखकर नाव बनाई
पूरी कथा पढ़िए — द्वीप पर अंत

उसने कहा कि कटोरा साल में एक बार उठे और जो दयालु हो उसके हाथों में जाए।

फिर उसने अनशन में प्राण छोड़े और, पाठ के अनुसार, जावग में राजा के रूप में फिर जन्म लिया।

आपुत्रन् के बारे में सवाल

आपुत्रन् (मणिमेखलै) में क्या होता है?

गाय के दूध पर पला एक बच्चा जिसने यज्ञ की गाय चुराई, मदुरै के मंदिर में भिक्षा माँगकर भूखों को खिलाया — और इंद्र के सामने हँस पड़ा। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: बच्चा जिसे एक गाय ने बचाया; यज्ञ की गाय; आपुत्रन् का उत्तर; साली की बात; मदुरै का मंदिर; वह बरसाती रात; इंद्र के सामने; जब कोई भूखा न रहा; सोने का अंडा।

मणिमेखलै में आपुत्रन् के बाद क्या आता है?

आगे पहली भिक्षा: पुहार की सड़कों पर कटोरा लिए एक युवा भिक्षुणी, एक सती जिसे आग ने नहीं जलाया, और एक अप्सरा जिसकी भूख बारह वर्ष से नहीं मिटी थी।

आपुत्रन् का स्रोत क्या है?

मणिमेखलै, सर्ग 13–15।