अमृतसुरभि — मणिमेखलै, चित्र

अध्याय ५

अमृतसुरभि

साल में एक बार, बुद्ध-जयंती की पूर्णिमा पर, एक तालाब से एक कटोरा उठता है जो कभी ख़ाली नहीं होता — और उस दिन वह एक गणिका की बेटी के हाथों में आता है

अमृतसुरभि — मणिमेखलै का अध्याय ५। स्रोत: मणिमेखलै, सर्ग 11–12। इसमें ५ दृश्य हैं — तीवतिलकै; गोमुखी का कुंड; भूख एक रोग है; लौटना; अरवणर — और अंत में १० सवाल।

तीवतिलकै

देवी मणिमेखला मणिमेखलै को द्वीप पर छोड़कर उड़ गई। मणिमेखलै लगभग एक कोस तक सफ़ेद रेत के टीलों, फूलों के उपवनों और खिले तालाबों के बीच घूमती रही।

तभी एक देवी उसके सामने प्रकट हुई और पूछा, 'क्या तुम जहाज़ से आई थीं और समुद्र में जहाज़ डूबने पर यहाँ बच निकलीं? तुम सुनहरी बेल जैसी सुंदर हो — तुम कौन हो?'

मणिमेखलै ने कहा, 'आप पूछती हैं मैं कौन हूँ — इस जन्म में या पिछले जन्म में? सुनिए। पिछले जन्म में मैं रागुलन् की पत्नी थी और मेरा नाम लक्ष्मी था। इस जन्म में मैं नर्तकी माधवी की बेटी मणिमेखलै हूँ। देवी मणिमेखला का भी यही नाम है; वही मुझे यहाँ लाई। इस द्वीप के बुद्ध-पीठ ने मुझे मेरा पिछला जन्म बताया। आप कौन हैं?'

देवी ने कहा, 'मेरा नाम तीवतिलकै है। इस द्वीप के बगल में रत्तिनद्वीप है, जिसके ऊँचे पर्वत समंदम् पर धर्म के स्वामी बुद्ध का चरण-चिह्न है। उनके चरण जन्म के सागर से तारने वाली नाव हैं। मैं वहाँ परिक्रमा करके लौटी हूँ। इस चमकते पीठ की रखवाली मैं इसलिए करती हूँ कि इंद्र ने इसे यहाँ रखा और मुझे ज़िम्मा दिया। जो बुद्ध के शुभ धर्म पर चलते हैं, केवल वही इस पीठ को देख सकते हैं; हाथ जोड़ें तो उन्हें अपने पिछले जन्म पता चल जाते हैं। तुम भी ऐसी ही साधिका हो।'

गोमुखी का कुंड

'इस पीठ के आगे,' तीवतिलकै ने कहा, 'गोमुखी नाम का तालाब है — निर्मल जल से भरा, वसंत में खिलने वाले कुमुद और नीलकमल से सजा। वैशाख की पूर्णिमा को, जब चंद्रमा विशाखा नक्षत्र में होता है — यानी उसी दिन, जिस दिन बुद्ध का जन्म हुआ था — उस तालाब से एक कटोरा उठता है। उसका नाम अमृतसुरभि है। यह एक ऐसा पात्र है जो हमेशा भोजन से भरा रहता है और कभी ख़ाली नहीं होता।

'इसे आपुत्रन् नाम के एक व्यक्ति ने रखा था। वह इससे भूखों को खिलाता था। एक बार इंद्र आपुत्रन् से नाराज़ हो गए और उन्होंने इतनी बारिश कर दी कि देश धन-धान्य से भर गया। आपुत्रन् को खिलाने के लिए कोई भूखा ही नहीं मिला, और उसने तप करने का निश्चय किया। तब उसने कटोरे को गोमुखी तालाब में डाला और प्रार्थना की कि हर वर्ष वैशाख की पूर्णिमा को, विशाखा नक्षत्र में, बुद्ध के जन्म के उसी दिन वह तालाब से उठे।

'आज वही वैशाख की पूर्णिमा है। और ऐसा लगता है कि वह कटोरा तुम्हारे हाथों में आएगा। उसका अन्न सब भूखों के लिए अचूक औषधि है; लोग हाथ भरकर ले लें, तब भी वह घटता नहीं। इसके बारे में सब कुछ तुम अपने नगर के ऋषि अरवणर से जान लोगी।'

फिर मणिमेखलै ने तीवतिलकै के साथ गोमुखी तालाब की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। और वह कटोरा तालाब से उठा — और भोली मणिमेखलै के हाथों में आ गया।

वह प्रसन्न हुई। उसने बुद्ध-पीठ को प्रणाम किया और बुद्ध की स्तुति की — 'आपने काम को जीत लिया, मैं आपके चरण पूजती हूँ। आप दुराचार की क्रूर शत्रुता हरते हैं, मैं आपके चरण पूजती हूँ। आप सबको धर्म सिखाते हैं... आप मोक्ष की भी कामना नहीं करते... आप सबकी आँखों की रोशनी हैं... आप बुरे शब्द नहीं सुनते... आप पृथ्वी के प्राणियों के दुख हरते हैं — मैं आपके चरण पूजती हूँ। मेरी जीभ को केवल आपकी स्तुति करना आता है।'

भूख एक रोग है

उस घड़ी तीवतिलकै ने मणिमेखलै से जो कहा, वह इस पूरे महाकाव्य की सबसे सीधी बात है।

'भूख एक बुरा रोग है। वह अच्छे कुल को मिटा देती है, श्रेष्ठता को मार देती है, उस ज्ञान को नष्ट कर देती है जो मनुष्य की जन्म-पार करने वाली नाव है। वह आत्म-सम्मान का रत्न छीन लेती है, सौंदर्य मिटा देती है, और आदमी को अपनी सुंदर स्त्रियों के साथ सड़क पर भीख माँगने पर मजबूर करती है। जो भूख मिटाता है, उसकी महिमा गाने की ताक़त मेरी जीभ में नहीं।'

फिर उसने विश्वामित्र की कथा सुनाई। 'एक बार संसार में बारिश नहीं हुई। सारे पेड़-पौधे धूप में सूख गए, सब जीव बिना अन्न-जल मर गए। वेदों के ज्ञाता विश्वामित्र ने राजपाट छोड़ संन्यास लिया था। वे अपने देश में घूमते हुए देखते रहे कि चारों ओर भूख और अकाल है। उनके पास खाने को कुछ नहीं था — यहाँ तक कि उन्होंने कुत्तों को दिया जाने वाला खाना भी खाया। उन्होंने उदार इंद्र से प्रार्थना की कि बारिश कराओ। इंद्र ने आकर बारिश कराई, फ़सलें उगीं, लोग जिए। भूखों को अन्न देकर, दान करके, और ग़रीबों की भूख मिटाकर जीना ही धरती पर सच्चा जीवन है। अन्न देना जीवन देना है। तुम्हें सबको जीवन देने का वरदान मिला है।'

मणिमेखलै ने भी अपनी बात कही। 'पिछले जन्म में जब साँप ने मेरे पति को काटा और मैं आग में जाने वाली थी, चेतना खोते-खोते मैंने एक स्वप्न देखा जिसमें मैं ऋषि साधु-चक्रन् को भोजन करा रही थी। उसी भोजन-दान का फल है कि यह अमृतसुरभि मेरे हाथ में आया है। यह भूख मिटाएगा और जान बचाएगा। इस धरती पर धनी लोग पिछले जन्म के अच्छे कर्म से सुख भोगते हैं; पर कितने ही लोग बुरे कर्मों के कारण ग़रीब पैदा होते हैं और धनवानों के घर रोटी माँगने जाते हैं। उनके कपड़े फटे हैं, पेट पिचके हैं। यह दिव्य पात्र वैसा ही भोजन देता है जैसे माँ की छाती दूध देती है जब वह अपने बच्चों के मुरझाए चेहरे देखती है। मैं देखना चाहती हूँ कि भोजन पाकर लोगों के चेहरे कैसे खिलते हैं।'

तीवतिलकै ने कहा, 'मैं तो इस अमृतसुरभि की शक्ति भूल गई थी; तुमने फिर याद दिला दी। बादल इसीलिए काले होकर बरसते हैं कि धर्म पर चलने वाले दयालु लोग हैं। अब तुम अपने स्थान को लौट जाओ।'

लौटना

मणिमेखलै ने तीवतिलकै के चरण छुए, कटोरा अपने कमल जैसे हाथों में लिया, बुद्ध-पीठ की परिक्रमा की, और मंत्र से आकाश में उड़कर अपने स्थान पर लौट आई।

इधर माधवी बेटी के लिए बेचैन थी। 'देवी ने कहा था कि मेरी बेटी सात दिन में आएगी। सातवाँ दिन आ गया, पर वह नहीं आई। कुछ बुरा तो नहीं हुआ?'

उसी शाम मणिमेखलै माधवी के सामने प्रकट हो गई और उसकी चिंता मिट गई। उसने कहा, 'पिछले जन्म में आप राजा रविवर्मन् की बेटी थीं, और घुड़सवार सेना वाले राजा तुच्चयन् से ब्याही थीं। आपकी माँ अमुदपति थीं, और आपकी बहनें तारै और वीरै। तारै इस जन्म में मेरी माँ बनी हैं और वीरै सुधमती। आपके बुरे कर्म इस मनुष्य-जन्म में कट जाएँ! अब चलकर साधु अरवणर से अपने जन्मों के बारे में पूछिए। और यह है अमृतसुरभि — जो आपुत्रन् के हाथों से मेरे पास आया। इसे प्रणाम कीजिए।'

माधवी और सुधमती ने कटोरे को प्रणाम किया और उसकी स्तुति की। फिर तीनों अरवणर के दर्शन को चल पड़ीं।

अरवणर

वे अरवणर का आश्रम खोजते-खोजते उनके पास पहुँचीं। वे बूढ़े थे, बाल सफ़ेद थे, और बोलते हुए उनकी जीभ काँपती थी। मणिमेखलै ने तीन बार उनके चरणों में प्रणाम किया।

उसने सब बताया — बाग़ का दिन, राजकुमार, देवी का उसे मणिपल्लवम् ले जाना, पीठ का पिछले जन्म बताना, देवी की सिखाई तीन चीज़ें — *जैसा रूप चाहे वैसा धरना, आकाश में उड़ना, और बिना भोजन के भूख न लगना* — और तीवतिलकै का अमृतसुरभि की बात बताना, पूर्णिमा पर तालाब से कटोरे का उठना। 'तीवतिलकै ने कहा कि आपुत्रन् की कथा आप जानते हैं।'

अरवणर प्रसन्न हुए। 'सुनो, मैं तुम्हारे पिछले जन्म की बात बताता हूँ। एक बार मैं उस पर्वत पर गया जहाँ प्राचीन देव बुद्ध के कमल-चरण हैं। वहाँ फूलों के बाग़ में मैंने कच्छयम् देश के राजा तुच्चयन् को देखा। मैंने पूछा, "तुम और तुम्हारी पत्नियाँ कुशल हैं?" वह दुखी था। उसने बताया कि उसकी पत्नी वीरै ने नशा किया, हाथी के सामने चली गई और मारी गई; उसकी बहन तारै ने यह सुना तो शोक न सह पाई, इमारत पर चढ़ी, गिरी और मर गई। मैंने कहा कि यह उन दोनों के कर्म से हुआ, राजा शोक न करे।'

फिर उन्होंने मणिमेखलै से पूछा, 'तुम नर्तकियाँ आज दूसरे वस्त्रों में क्यों आई हो?' और उन्हें जन्म का सत्य बताया। 'जो लोग दान नहीं करते, उनके जन्म घास-काँटों से भरे रास्ते जैसे हैं, पत्थरों से रुके हुए। जीवन ऐसा है: आसमान में लाल सूरज दिखता है, और ठंडी ओस ग़ायब हो जाती है, और लोग यह नहीं समझते कि दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं।'

फिर उन्होंने बताया कि तुषित लोक के देवता ने चक्रवाल-कोट्टम में जमा देवताओं से कहा था कि जैसे अँधेरे संसार में सूर्य उगता है, वैसे एक बहुत ज्ञानी का जन्म होगा — बुद्ध। 'जब वह प्रकट होंगे, तब धर्म लोगों के छोटे-से कानों में ऐसे घुसेगा जैसे बड़े तालाब की बाढ़ किसी छोटे छेद से बह निकले। सूर्य-चंद्र शुभ दिखेंगे, तारे चमकेंगे, ग्रह भटकना छोड़ देंगे; समय पर बारिश होगी और धरती फलेगी-फूलेगी; प्राणी भूखे नहीं रहेंगे और पीड़ित नहीं होंगे। हवा धीमी चलेगी, गायें घड़े भर दूध देंगी और उनके बछड़े पिएँगे। पक्षियों को घोंसले से दूर नहीं जाना पड़ेगा। सब प्राणी बिना शत्रु के जिएँगे। नरक-वासी और पिशाच किसी को नहीं डराएँगे।'

अंत में अरवणर ने मणिमेखलै से कहा, 'तुम्हारे कारण इस स्थान पर बहुत कुछ घटेगा। तुम्हारे हाथ में जीवन-रक्षक औषधि वाला अमृतसुरभि है। मैं तुम्हें एक ऐसा धर्म बताऊँगा जो मनुष्यों और देवताओं दोनों का भला करे — और वह है भूख मिटाना।'

मणिमेखलै ने कटोरा हाथ में लिया।

टिप्पणी: सर्ग 11–12, कौसल्या हार्ट के अंग्रेज़ी अनुवाद से। आपुत्रन् का नाम तमिल में आपुत्तिरन् भी लिखा जाता है ('गाय का पुत्र')। विश्वामित्र का अकाल में कुत्ते का माँस/अन्न खाना महाभारत और अन्य परंपराओं में भी आता है; यहाँ केवल इतना कहा गया है कि पाठ में उन्होंने कुत्तों का खाना खाया और इंद्र से बारिश माँगी। जैन साधुओं और अन्य धर्मों के बारे में यह अध्याय कुछ नहीं कहता। अरवणर के बुद्ध-आगमन वर्णन का समय-वर्ष (अनुवाद में 2116) यहाँ नहीं दिया गया है, क्योंकि पाठ की गणना का आधार स्पष्ट नहीं है। 'तुषित लोक' बौद्ध परंपरा का वह लोक है जहाँ से भावी बुद्ध उतरते माने जाते हैं।

स्रोत: तमिल पंचकाव्य — मणिमेखलै (परंपरा से सीतलै सात्तनार रचित), अमृतसुरभि

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

तीवतिलकै कौन है?

  • पुहार की नगर-देवी
  • मणिपल्लवम् द्वीप की देवी, जो बुद्ध-पीठ की रखवाली करती है
  • मणिमेखलै की बहन
  • कावेरी की देवी
पूरी कथा पढ़िए — द्वीप की रखवाली

इंद्र ने तीवतिलकै को इस पीठ की रखवाली सौंपी थी।

वह रत्तिनद्वीप के पर्वत पर बुद्ध के चरण-चिह्न की भी परिक्रमा कर आई थी।

तथ्य

अमृतसुरभि गोमुखी तालाब से कब उठता है?

  • साल में एक बार, वैशाख की पूर्णिमा को, विशाखा नक्षत्र में, बुद्ध के जन्म के दिन
  • हर पूर्णिमा को
  • हर दिवाली को
  • केवल जब कोई राजा पुकारे
पूरी कथा पढ़िए — साल में एक बार

कटोरा वैशाख पूर्णिमा को, बुद्ध के जन्म की तिथि पर, उठता है।

उसी दिन वह मणिमेखलै के हाथ में आया।

क्या हुआ?

अमृतसुरभि को गोमुखी तालाब में किसने डाला था?

  • इंद्र ने
  • मणिमेखला ने
  • तीवतिलकै ने
  • आपुत्रन् ने
पूरी कथा पढ़िए — कटोरे का पुराना स्वामी

जब उसे खिलाने को कोई भूखा नहीं मिला, तब उसने तप करने का निश्चय करके कटोरा तालाब में डाल दिया।

उसकी कथा अरवणर आगे के सर्गों में सुनाएँगे।

किसने कहा?

'भूख एक बुरा रोग है। वह अच्छे कुल को मिटा देती है...' यह किसने कहा?

  • तीवतिलकै ने, मणिमेखलै से
  • माधवी ने
  • मणिमेखला ने
  • अरवणर ने
पूरी कथा पढ़िए — भूख एक रोग

तीवतिलकै ने कहा कि भूख आत्म-सम्मान तक छीन लेती है।

आगे पूरी कथा इसी बात की गवाही देती है।

क्या हुआ?

तीवतिलकै की सुनाई विश्वामित्र की कथा में अकाल में विश्वामित्र ने क्या किया?

  • यमराज से जीवन माँगा
  • राज्य जीतने निकल पड़े
  • भोजन-दान का भंडार खोला
  • भूख से कुत्तों को दिया जाने वाला खाना भी खाया, और उदार इंद्र से बारिश माँगी
पूरी कथा पढ़िए — विश्वामित्र का अकाल

अकाल में विश्वामित्र के पास कुछ खाने को नहीं था।

इंद्र ने बारिश की, और सब जीव बच गए।

ऐसा क्यों?

मणिमेखलै के अनुसार अमृतसुरभि उसके हाथ में क्यों आया?

  • क्योंकि उसने बुद्ध की स्तुति की
  • उसके पिछले जन्म में साधु चक्रन् को भोजन कराने के पुण्य से
  • क्योंकि वह राजा की बेटी थी
  • क्योंकि देवी मणिमेखला ने ऐसा चाहा
पूरी कथा पढ़िए — भोजन का पुण्य

पिछले जन्म में मरते समय उसने स्वप्न में साधु चक्रन् को भोजन कराया था।

उसी भोजन-दान का फल यह कटोरा है — ऐसा वह स्वयं कहती है।

तथ्य

पाठ के अनुसार अमृतसुरभि से मिले भोजन में क्या ख़ास बात थी?

  • लोग हाथ भरकर लें तब भी वह घटता नहीं
  • वह केवल पुहार में ही मिलता था
  • वह केवल एक दिन चलता था
  • वह केवल राजाओं के काम आता था
पूरी कथा पढ़िए — कभी न घटने वाला भोजन

तीवतिलकै ने कहा कि हाथ भर लेने पर भी भोजन कम नहीं होता।

मणिमेखलै ने इसकी तुलना माँ की छाती के दूध से की।

क्या हुआ?

घर लौटकर मणिमेखलै ने माधवी को क्या बताया?

  • कि वह राजकुमार से विवाह करेगी
  • कि वह नर्तकी बनेगी
  • कि पिछले जन्म में वे कौन थीं, और उनकी बहनें इस जन्म में किसके रूप में जन्मी हैं
  • कि उसका कटोरा खो गया
पूरी कथा पढ़िए — पिछले जन्म की बातें

मणिमेखलै ने माधवी को बताया कि वह पिछले जन्म में रविवर्मन् की बेटी थी।

फिर उसने माधवी से कहा कि चलकर अरवणर से अपने जन्मों के बारे में पूछें।

तथ्य

तीवतिलकै ने मणिमेखलै से आपुत्रन् के बारे में पूछने के लिए किसके पास जाने को कहा?

  • इंद्र के पास
  • राजा के पास
  • अपने नगर के ऋषि अरवणर के पास
  • देवी मणिमेखला के पास
पूरी कथा पढ़िए — गुरु का नाम

तीवतिलकै ने कहा कि अरवणर इस कटोरे के बारे में सब जानते हैं।

यहीं से अरवणर कथा में मुख्य रूप में आते हैं।

क्या हुआ?

अरवणर ने बुद्ध के आगमन के बारे में क्या बताया?

  • कि वे पुहार को समुद्र में डुबो देंगे
  • कि उनके आने पर धर्म सबके कानों में पहुँचेगा, समय पर बारिश होगी, प्राणी भूखे और पीड़ित नहीं रहेंगे, और सब बिना शत्रु के जिएँगे
  • कि वे युद्ध करके राज्य जीतेंगे
  • कि वे केवल राजाओं को उपदेश देंगे
पूरी कथा पढ़िए — एक भविष्यवाणी

अरवणर ने तुषित लोक के देवता की कही बात बताई कि बुद्ध प्रकट होंगे।

तब भूख, पीड़ा और शत्रुता मिट जाने की बात कही गई है।

अमृतसुरभि के बारे में सवाल

अमृतसुरभि (मणिमेखलै) में क्या होता है?

साल में एक बार, बुद्ध-जयंती की पूर्णिमा पर, एक तालाब से एक कटोरा उठता है जो कभी ख़ाली नहीं होता — और उस दिन वह एक गणिका की बेटी के हाथों में आता है। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: तीवतिलकै; गोमुखी का कुंड; भूख एक रोग है; लौटना; अरवणर।

मणिमेखलै में अमृतसुरभि के बाद क्या आता है?

आगे आपुत्रन्: गाय के दूध पर पला एक बच्चा जिसने यज्ञ की गाय चुराई, मदुरै के मंदिर में भिक्षा माँगकर भूखों को खिलाया — और इंद्र के सामने हँस पड़ा।

अमृतसुरभि का स्रोत क्या है?

मणिमेखलै, सर्ग 11–12।