
अध्याय २
इंद्र-उत्सव के दिन
अठाईस दिन का उत्सव, जिसमें एक माँ बेटी को लेकर नहीं आई — और पूरा पुहार उसी की चर्चा करता रहा
इंद्र-उत्सव के दिन — मणिमेखलै का अध्याय २। स्रोत: मणिमेखलै, सर्ग 1–3। इसमें ४ दृश्य हैं — हाथी की पीठ पर नगाड़ा; जो उत्सव में नहीं आई; भीगी हुई माला; रास्ते के दृश्य — और अंत में १० सवाल।
हाथी की पीठ पर नगाड़ा
पुहार के राजा के पास एक दिन ऋषि अगस्त्य का संदेश आया: अपने नगर में देवताओं के राजा इंद्र के लिए उत्सव कीजिए। चोल राजा चेंबियन ने इंद्र को निमंत्रण भेजा — पृथ्वी पर आकर अठाईस दिन मेरे नगर में रहिए। इंद्र मान गए।
लोगों के बीच एक डर भी चलता था। कहा जाता था कि पुहार का रक्षक भूत, जिसकी आवाज़ बिजली-सी गरजती है और जिसके दाँत मज़बूत हैं, अगर राजा उत्सव भूल जाए तो पूरे नगर को तबाह कर देगा, और देश में अकाल पड़ेगा। इसलिए यह उत्सव केवल उत्सव नहीं था, एक वचन था।
वज्रकोट्टम गाँव का ढोलकिया हाथी की पीठ पर नगाड़ा कसकर बजाने लगा। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे बादल गरजे या यमराज पुकारे। उसने घोषणा की —
*'पुहार फले-फूले। महीने में तीन बार बारिश हो। राजा का राजदंड सीधा रहे। और इन अठाईस दिनों में भूख, रोग और बैर दूर हो जाएँ — घर और धन फलें-फूलें!'*
लोगों ने नगर सजाया — फूल-पत्तों से सजे घड़े, सुनहरे दीपक, केले और सुपारी के पेड़, खंभों पर मोतियों की झालरें; पुरानी रेत हटाकर सड़कों पर नई रेत बिछाई गई। और ढोलकिया ने विद्वानों से यह भी कहा: बहस-सभाओं में जाओ, पर झगड़ा मत करना — अगर कोई तुम्हें नापसंद हो, तो चुपचाप वहाँ से हट जाओ।
यह आख़िरी बात याद रखिए। बहुत आगे इसी महाकाव्य में बहसों की एक पूरी सभा आएगी।
जो उत्सव में नहीं आई
उसी उत्सव के दिन एक माँ बेटी को लेकर नहीं आई। माधवी अपनी बेटी मणिमेखलै के साथ घर के फूलों वाले मंडप में बैठी रही।
उसकी माँ चित्रापति ने जब देखा कि दोनों नहीं आईं, तो उसका मन बैठ गया। उसने माधवी की सहेली वयंदमालै से कहा, 'जाओ, उसे बताओ कि इस रईस नगर में लोग क्या कह रहे हैं।'
वयंदमालै माधवी के पास पहुँची तो वह थकी और दुबली-सी दिखी। वयंदमालै ने उसकी कला गिनाई — 'तुम वेत्तियल और पोदुवियल नृत्य जानती हो; सात ताल पैरों से और हाथों की ताली से निभा लेती हो; याळ बजाती हो, बाँसुरी और मृदंग जानती हो; गेंद खेलना, खाना बनाना, चित्र बनाना, फूलों की माला गूँथना, जोतिष, और चौंसठ अभिनय — सब। और तुम तपस्विनी बन गईं? लोग कहते हैं यह लज्जा की बात है।'
माधवी ने धीरे से उत्तर दिया:
*'सखी, जब मैंने सुना कि मेरा प्रिय कोवलन मारा गया, तब भी मैं मरी नहीं — जीती रही। मैंने धन खोया, लाज खोई। कुछ स्त्रियाँ पति के जाने पर आग में कूद जाती हैं; कुछ तप से शरीर गला देती हैं। पर कन्नगी वैसी स्त्री नहीं थी। जब उसके पति पर यह विपत्ति आई, उसने अपना एक स्तन नोचकर फेंका और मदुरै जला दिया। मणिमेखलै उसी महान सती की बेटी जैसी है। मेरी बेटी के लिए भिक्षुणी बनने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। उसने कभी कोई बुरा काम नहीं किया, और गणिका का जीवन वह नहीं जी सकेगी।'*
फिर उसने बताया कि वह स्वयं अरवण अडिगल के आश्रम गई थी, उनके पैरों पर गिरकर कोवलन की मृत्यु का दुख कहा था। अरवण ने कहा था: *'जो जन्म लेते हैं, वे जीने की इच्छा से दुख पाते हैं; जो जन्म नहीं लेते, उन्हें बड़ा सुख मिलता है।'* और उन्होंने पाँच बातों से बचने को कहा — हिंसा, चोरी, मद्य, झूठ और काम-वासना। 'इच्छा-रहित मार्ग पर चलो, वहीं शांति है।'
माधवी ने वयंदमालै से कहा, जाओ और मेरी माँ चित्रापति को यह बता दो। वयंदमालै को ऐसा लगा जैसे उसे लहराते सागर में डुबो दिया गया हो। वह दुखी मन से लौट पड़ी।
भीगी हुई माला
मणिमेखलै ने माधवी की सब बातें सुन ली थीं। माता-पिता का दुख उसके हृदय में उतर गया। उसकी आँखों से बहते आँसू उस माला को भिगोने लगे जो वह गूँथ रही थी।
माधवी ने बेटी का चेहरा देखा, अपने हाथों से उसके आँसू पोंछे और कहा, 'तेरी माला तेरे आँसुओं से बिगड़ गई। जा, बाग़ से नए फूल ले आ।'
माला गूँथ रही सुधमती यह सुनकर चिंतित हो गई। वह माधवी की क़रीबी सहेली थी, और उसकी अपनी कथा भी कम अनोखी नहीं थी — वह कौशिक नाम के एक ब्राह्मण की बेटी थी, जिसे एक बार मारुतवेगन नाम का विद्याधर आकाश में उठा ले गया था, और फिर अकेली छोड़कर चला गया। 'मैं तो कभी किसी से नहीं डरती थी,' वह कहती थी। फिर भी उसने माधवी से कहा, 'मणिमेखलै अकेली बाग़ में न जाए; मैं उसके साथ चलती हूँ।'
और उसने बताया कि नगर के बाग़ों में कौन-सा सुरक्षित है और कौन-सा नहीं। इलवंदिगै बाग़ के पास राजा के पहरेदार रहते हैं। उय्यावनम् केवल देवताओं के लिए है — उत्सव में भी मनुष्य वहाँ नहीं जाते, क्योंकि कहा जाता है कि भूत हाथ में रस्सियाँ लिए उसकी रखवाली करते हैं। संपाति और कवेर के बाग़ों में एक पुरानी आत्मा देवियों पर हमला करती है। 'पर एक बाग़ है,' उसने कहा, 'उपवनम्। वह बुद्ध का बाग़ है — वहाँ पेड़ कभी फूलना नहीं छोड़ते।'
उस बाग़ के संगमरमर के मंडप में बाहर की आवाज़ें नहीं पहुँचतीं; भीतर बैठे को बाहर वाले केवल धुँधला आकार देख पाते हैं। और मंडप में कमल के आकार का एक रत्नों जड़ा पीठ है, जिस पर बुद्ध के चरण-चिह्न हैं। कहते हैं, उस पर श्रद्धा से फूल चढ़ाओ तो वे मुरझाते नहीं, सीधे उस देवता के चरणों तक पहुँच जाते हैं जिसे तुमने मन में रखा; और जिसने किसी देव को मन में नहीं रखा, उसके फूल वहीं पड़े रह जाते हैं। इसे बहुत पहले मय नाम के शिल्पी ने बनाया था।
तो मणिमेखलै जाएगी तो उपवनम् ही।
रास्ते के दृश्य
दोनों सहेलियाँ पुहार की सड़कों से गुज़रीं। उत्सव की भीड़ में हर तरह के लोग थे।
एक जैन साधु दिखा — निर्वस्त्र, एक लंबी लाठी से लटकते घड़े के साथ; वह किसी जीव को चोट न पहुँचे इस डर से अपने शरीर पर भी सावधान चलता था, और बिना खाए-नहाए ऐसा दुबला दिखता था जैसे थका हुआ हाथी। उसे एक शराबी ने रोक लिया और बोला, 'महाराज, तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ। गुरु ने हमें सिखाया है कि सुख-दुख सब कर्म से आते हैं। ताड़ी पीने से क्या किसी की जान जाती है? तुम तप करते हो — पर अगर मेरी तरह खाओ-पियो और सुख तुम्हारे योग के फल से बढ़कर निकले, तो मुझे शिष्य बना लेना।' आसपास के लोग तमाशा देखने जमा हो गए।
एक पागल-सा आदमी था — गले में आक के फूलों की माला, पत्तों के कपड़े, बदन पर राख; वह कभी रोता, कभी गिरता, कभी भागता; अपनी ही परछाईं देखकर घबरा जाता। लोग उसे दया से घेरकर खड़े थे।
कहीं मोहिनी का वेश धरे एक कलाकार नाच रहा था, जैसे समुद्र-मंथन के समय विष्णु ने रूप बदला था, या जैसे अर्जुन ने विराट के नगर में नर्तक का वेश लिया था; उसे देखने के लिए अलग भीड़ थी। चित्रों से सजी ऊँची दीवारों को लोग देखते रह जाते थे। माताएँ अपने नन्हे बच्चों को, जिनके गले में सोने की ज़ंजीर में पंचायुध-पदक झूल रहे थे, हाथियों और रथों पर बिठाकर घुमा रही थीं — लोग कहते, 'देखो, ये मुरुगन जैसे हैं।'
और जब मणिमेखलै वहाँ से निकली, भीड़ उसके पीछे-पीछे फुसफुसाने लगी: 'कितनी सुंदर है। इसकी माँ ने इसे भिक्षुणी बना दिया — कितनी निष्ठुर है! अगर यह बाग़ में फूल तोड़ने जाए तो हंस इसकी चाल देखकर शरमा न जाएँगे? मोर इसकी छवि सीख पाएँगे? तोते इसकी मीठी बोली से होड़ कर पाएँगे?'
सुधमती उसे लेकर आगे बढ़ती गई। दोनों ने उपवनम् को प्रणाम किया और भीतर चली गईं।
टिप्पणी: इस अध्याय के नाम और घटनाएँ कौसल्या हार्ट के अंग्रेज़ी अनुवाद, सर्ग 1–3 से हैं। हार्ट के अनुवाद में अगस्त्य के निवास का नाम 'विंध्य' आता है; तमिल परंपरा में अगस्त्य दक्षिण की पोतिगै/मलय पहाड़ी से जुड़े माने जाते हैं, इसलिए यहाँ पर्वत का नाम नहीं दिया गया। नृत्य के वेश में कलाकार का वर्णन हार्ट ने 'पेडि' शब्द से किया है; यहाँ केवल इतना लिखा गया कि वह मोहिनी या अर्जुन के (विराट-नगर के) वेश की नकल कर रहा है। पुहार का रक्षक भूत, वज्रकोट्टम का ढोलकिया, और संपाति तथा कवेर के बाग़ पाठ के नाम हैं। हिंदी वर्तनी में तमिल नाम एक ही रूप में रखे गए हैं: माधवी, चित्रापति, वयंदमालै, सुधमती, अरवण अडिगल।
स्रोत: तमिल पंचकाव्य — मणिमेखलै (परंपरा से सीतलै सात्तनार रचित), इंद्र-उत्सव के दिन