
अध्याय ४
मणिपल्लवम्
एक अनजान द्वीप पर अकेली जागी लड़की, एक चमकता हुआ पीठ जो उसे उसके पिछले जन्म दिखा देता है — और पता चलता है कि वह राजकुमार को क्यों नहीं भूल पा रही
मणिपल्लवम् — मणिमेखलै का अध्याय ४। स्रोत: मणिमेखलै, सर्ग 8–10। इसमें ५ दृश्य हैं — समुद्र किनारे की सुबह; पीठ; पीठ ने जो दिखाया; देवी का लौटना; तीन मंत्र — और अंत में १० सवाल।
समुद्र किनारे की सुबह
सफ़ेद चाँदनी जैसी रेत पर गिरे फूलों के बिस्तर पर मणिमेखलै सो रही थी। द्वीप के किनारे मोती थे, सीपियाँ बीज की तरह बिखरी थीं, लहरें मूँगा बहाकर ला रही थीं, चंदन और अगर की महक हवा में थी।
वह जागी। उसके बाल अब भी बिखरे हुए थे। उसने चारों ओर देखा — और ऐसा लगा जैसे कोई आत्मा किसी नए देश में, बिना अपनों के, नया जन्म ले चुकी हो। कोई पहचानी हुई चीज़ नहीं थी। सामने केवल नीला, चौड़ा समुद्र था, और उगता सूरज।
'क्या यह उपवनम् के पास है?' उसने पुकारा। 'सुधमती, तुम कहाँ छिपी हो? मैं समझ नहीं पा रही कि यह सच है या सपना। मेरा हृदय काँप रहा है। जवाब दो! क्या वह चमकती देवी हमें धोखा देकर ग़ायब हो गई? मैं अकेली हूँ और डर रही हूँ। आओ, मेरी प्रिय!'
उसने लहरों पर उड़ते पक्षियों को देखा — एक हंस उनके आगे ऐसे खड़ा था जैसे उनका राजा हो, और पानी जैसे उसकी सेना का शिविर। वह रेत के ऊँचे टीलों पर भटकी, किसी जाने-पहचाने को खोजती। उसके बाल बिना सँवारे थे। वह रोई।
अपने पिता को याद करके वह बोली, 'पिता, आपके बुरे भाग्य से आप अपनी पत्नी के साथ पराए देश गए और पांड्य राजा ने आपको मरवा दिया।'
पीठ
तभी उसके सामने बुद्ध का पीठ प्रकट हुआ। वह चमक रहा था, किरणें फैला रहा था। वह गोल था, संगमरमर का — अनुवाद के नापों में लगभग साढ़े चार फ़ुट ऊँचा, और हर दिशा में साढ़े तेरह फ़ुट चौड़ा। उस पर कमल के आकार का चौकोर आसन था — धर्म के देवता बुद्ध के योग्य। केवल सुगंधित वृक्ष उस पर फूल गिराते, कोई और नहीं। कोई चिड़िया उसके पास पंख फड़फड़ाने नहीं जाती। उस पर इंद्र के दिए रत्न जड़े थे, और वह लोगों को उनके आगामी जन्मों की बातें बताता था।
पाठ यह भी बताता है कि वह यहाँ कैसे आया। पूर्व में नागनाडु में दो राजा इसी बुद्ध-पीठ को पाने के लिए आपस में लगातार लड़ते थे; दोनों अपना दावा नहीं छोड़ते थे। एक दिन जब दोनों सेनाएँ लड़ रही थीं, एक बौद्ध ऋषि उनके बीच आए और बोले, 'लड़ो मत — यह मेरा है,' और उसे उठा लिया। यही धर्म-पीठ की कथा है, जिसे सारे प्रसिद्ध लोग पूजते हैं।
पीठ ने जो दिखाया
उस पीठ को देखकर मणिमेखलै चकित हुई। उसने सिर के ऊपर अपने कमल जैसे हाथ जोड़े; आँखों से मोती जैसे आँसू छाती पर गिरे। उसने तीन बार बाएँ से दाएँ परिक्रमा की, ज़मीन पर माथा टेका। जब वह उठी, तब उसे अहसास हुआ कि जन्म और मृत्यु सच हैं — और उसे अपना पिछला जन्म याद आ गया।
उसने पीठ से कहा, 'आपने कायंगरै के किनारे जो कहा था, वह सब सच निकला।' और उसे पुराने दिन याद आए।
*कायंगरै नदी के किनारे ब्रह्मधर्मन नाम का एक राजा था, जो कांदारम् के पूर्व देश के राजा आदिपति का साला था। पीठ ने उसे बताया था कि सात दिन में भूकंप आएगा और नागनाडु चार हज़ार योजन धरती में धँस जाएगा। राजा ने नगाड़े पिटवाकर प्रजा को चेताया, सब अपने पशुओं-घोड़ों के साथ निकल गए, उत्तर में अवंति नगर की ओर। रास्ते में कायंगरै के तट पर पड़ाव डाला — और जैसा पीठ ने कहा था, देश नष्ट हो गया। तब सब लोग उस पीठ के पास आए, उसके चरणों में झुके और उसने सबके कष्ट हर लिए।*
'उसी समय,' मणिमेखलै ने कहा, 'मैं राजा रविवर्मन् की रानी अमुदपति के घर जन्मी — मेरा नाम लक्ष्मी रखा गया। चितिपुर के राजा श्रीपति की बेटी नीलापति के पुत्र रागुलन् से मेरा विवाह हुआ। ब्याह के बाद मैं और रागुलन् आपके पास आए और आपने कहा, "आठ दिन में रागुलन् को साँप काटेगा और तू आग में जल जाएगी।" आपने यह भी कहा था कि अगले जन्म में तू थवाक्कलि मुदूर में जन्मेगी और तेरा नाम कावेर-कन्नी होगा; तब देवी मणिमेखला तुझे रात में दक्षिण के एक द्वीप पर ले जाएगी, जहाँ एक और बुद्ध-पीठ पर तुझे अपना पिछला जीवन याद आएगा।'
मणिमेखलै का मन भारी हुआ। उसने पीठ से पूछा, 'क्या आप मुझे यह नहीं दिखाएँगे कि मेरा पति आज कहाँ है? आपने कहा था कि एक देवी मुझे यहाँ लाएगी और वही बताएगी कि वह कौन है।' और वह उस देवी के आने की प्रतीक्षा करने लगी।
देवी का लौटना
जब देवी मणिमेखला ने देखा कि मणिमेखलै ने पिछला जन्म पीठ से जान लिया है, वह प्रसन्न हुई। वह सुगंधित फूल लेकर आकाश से धरती पर उतरी — खिलती बेल जैसी। उसने पीठ की पूजा की और कहा, 'जब दुनिया में सब प्राणी अपना विवेक खो रहे हैं, धर्म नहीं सुनना चाहते, और दुनिया ग़रीबी से तड़प रही है, तब आप एक नए सूरज की तरह उगे। मैं आपके चरणों में प्रणाम करती हूँ।'
मणिमेखलै देवी के आगे झुकी और पूछा, 'आपकी कृपा से मैंने अपना पिछला जन्म जान लिया। मेरा प्रिय पति कहाँ है?'
देवी बोली, 'तेरा नाम पिछले जन्म में लक्ष्मी था। एक बार फूलों के बाग़ में तू अपने पति रागुलन् से प्रणय-कलह कर रही थी, और वह कामातुर होकर तेरे कमल-जैसे चरणों में झुक गया। उसी समय साधु चक्रन् आकाश-मार्ग से रत्तिनद्वीप की ओर जा रहे थे और धर्मचक्र हाथ में लिए इसी शीतल उपवन में उतरे। तू इसलिए लजा गई कि पति तेरे पैरों पर झुका था और तू साधु को प्रणाम कर रही थी। रागुलन् क्रोधित हुआ — "यह कौन आया?" तूने हाथ से उसका मुँह बंद किया और कहा, "एक ऋषि हैं; उन पर क्रोध नहीं करना; हमें प्रणाम करना है।" दोनों ने साधु के चरणों में झुककर कहा, "भले हम आपके शिष्य नहीं, पर आपके लिए मीठा जल और भोजन लाएँगे। आप खा-पी लीजिए।" साधु ने कहा, "माँ, मैं खाऊँगा। भोजन ले आओ। ऋषि को भोजन कराने का पुण्य तुम्हारे अगले जन्म को मिटा देगा।"
'जो राजकुमार उदयकुमारन् बाग़ में तुझे देखने आया था, वही तेरा पिछले जन्म का पति रागुलन् है। जैसे वह तेरी ओर खिंचा, वैसे तू भी उसे प्यार करेगी और उसे भूल नहीं पाएगी। तेरा मन कंदसालि धान के खेत जैसा है — खारा होकर बिगड़ना नहीं चाहिए। इसीलिए मैं तुझे मणिपल्लवम् ले आई, ताकि तू उदयकुमारन् से प्रेम न कर बैठे।'
फिर देवी ने उसे बहनों की कथा सुनाई। 'तारै और वीरै तेरी बड़ी बहनें थीं। दोनों अंगनाडु के राजा तुच्चयन् से ब्याही थीं। एक बार वह पत्नियों के साथ ऊँचे पर्वतों में खेलने गया और गंगा के किनारे ठहरा। वहाँ अरवणर नाम के निर्दोष, ज्ञानी बौद्ध ऋषि आए। तूने उनके चरण पूजे और पूछा, "आप क्यों आए?" ऋषि ने कहा, "इस पहाड़ पर प्राचीन देव बुद्ध के कमल-चरणों के चिह्न हैं। वे जन्म-मरण हरते हैं, सबके कष्ट दूर करते हैं। इसी से यह पहाड़ पाद-पंगय कहलाता है। मैं इसकी परिक्रमा और चरणों की पूजा करने आया हूँ। तू भी आ।" उस ऋषि के आशीर्वाद से ही तारै और वीरै इस जन्म में माधवी और सुधमती बनकर जन्मीं।'
तीन मंत्र
देवी ने मणिमेखलै से कहा, 'तू अपने पिछले जन्म, धर्म और तमाम धर्माचार्यों के मत जानती है। पर जब मत वाले तुझे अपने सिद्धांत बताएँगे, तो वे ज़्यादा नहीं बताएँगे, क्योंकि तू उन्हें केवल एक कंगन पहनी नवयुवती लगेगी। मैं तुझे एक दुर्लभ मंत्र देती हूँ जिससे तू रूप बदल सकेगी और आकाश में उड़ सकेगी।'
वह जाने को थी, पर लौट आई। 'एक बात भूल गई। मनुष्यों के शरीर केवल अन्न से बने हैं। जो मंत्र मैं तुझे दे रही हूँ, वह सबकी भूख मिटा सकता है।' ऐसा कहकर देवी ने उसे एक और मंत्र दिया और आकाश में उठ गई।
मणिमेखलै ने बाद में अपने शब्दों में तीनों मंत्र बताए: *जैसा रूप चाहूँ वैसा धर लेना; आकाश में उड़कर घूमना; और बिना भोजन के भूखे न रहना।*
टिप्पणी: सर्ग 8–10, कौसल्या हार्ट के अंग्रेज़ी अनुवाद से। हार्ट के पाठ में मंत्रों का वर्णन सर्ग 10 में दो मंत्रों का है (रूप बदलना और उड़ना; भूख हरना); तीन मंत्र मणिमेखलै अपने मुँह से सर्ग 12 में गिनाती है, और प्रस्तावना (पतिकम्) में भी 'तीन' का उल्लेख है; इसलिए यहाँ तीनों एक साथ दिए गए हैं। 'रागुलन्' नाम का तमिल रूप (राकुलन्/रागुलन्) बुद्ध के पुत्र राहुल से अलग व्यक्ति है; पाठ उसे एक राजकुमार बताता है। पीठ के विवरण का नाप-जोख और उसके नागनाडु के दो राजाओं की कथा का महावंस के नागदीप-वर्णन से मिलना, कुछ विद्वान मणिपल्लवम् को श्रीलंका के नैनातिवु (नागदीप) से जोड़ने का आधार मानते हैं; यह प्रस्तावित पहचान है, निश्चित तथ्य नहीं, और वर्तमान में उस द्वीप पर हिंदू और बौद्ध दोनों के पूजा-स्थल हैं। कायंगरै, कांधार, पाद-पंगय जैसे नाम पाठ के हैं; उनकी भूगोलीय पहचान यहाँ नहीं दी गई।
स्रोत: तमिल पंचकाव्य — मणिमेखलै (परंपरा से सीतलै सात्तनार रचित), मणिपल्लवम्