
अध्याय ३
संगमरमर का मंडप
एक पागल हाथी, एक राजकुमार, एक बंद दरवाज़ा — और रात में समुद्र की एक देवी, जो मणिमेखलै को आकाश में उठा ले गई
संगमरमर का मंडप — मणिमेखलै का अध्याय ३। स्रोत: मणिमेखलै, सर्ग 4–7। इसमें ५ दृश्य हैं — बिगड़ा हुआ हाथी; बंद दरवाज़ा; पाँच बातें और एक कथा; शाम, श्मशान-कोट, और देवी; आकाश की ओर — और अंत में १० सवाल।
बिगड़ा हुआ हाथी
उपवनम् के बाग़ में सुधमती मणिमेखलै को सब दिखा रही थी — भौंरे जो बाँसुरी जैसे गुनगुनाते हैं, मोर जो सरोवर के किनारे हंस के सामने नाच रहा है, कोयल जो मोर के नाच पर गा रही है। 'देखो, मणिमेखलै, देखो!'
उधर नगर की सड़क पर एक महावत ने अपने हाथी को अंकुश मारा और हाथी पागल हो गया। उसका नाम कालमेघम् था, और काले पहाड़ की तरह वह रथों वाली गली में भागता गया। महावत, ढोलकिये और भीड़ चीख़ते हुए भागे।
तभी चोल राजा का बेटा उदयकुमारन् अपने घोड़े पर आ पहुँचा। उसकी माला की पहचान थी — चोलों की अत्ती माला। रथ पर बैठकर उसने हाथी को क़ाबू में किया। उसके बाद वह नर्तकियों की गली में पहुँचा, जहाँ उसका मित्र एट्टिकुमारन् एक स्त्री को बाँहों में लिए मकर-याळ बजाता, एक चित्र की तरह निश्चल बैठा था।
'तुम यहाँ इन स्त्रियों के बीच भी बेचैन लगते हो,' राजकुमार ने कहा। 'क्या बात है?'
एट्टिकुमारन् ने कहा, 'मैंने माधवी की बेटी मणिमेखलै को देखा। वह अपने पिता कोवलन को याद करके ऐसे मुरझा रही थी जैसे डिब्बे में बंद फूल। उसे देखकर मेरा मन भी उदास हो गया, और मैं याळ बजाने लगा। यही मेरी बेचैनी है।'
राजकुमार मुस्कुराया। 'मैं जाऊँगा। उसे अपने सुंदर रथ पर बिठाकर यहाँ ले आऊँगा।' उसका रथ उड़ चला, जैसे चाँद बादलों को चीरता जाए।
बंद दरवाज़ा
बाग़ के फाटक पर रथ की आवाज़ सुनकर मणिमेखलै चौंकी। उसने सुधमती से कहा, 'मैंने वयंदमालै को माँ से कहते सुना था कि उदयकुमारन् ने चित्रापति से कहा है कि वह मुझे चाहता है। लगता है यह उसी के रथ की आवाज़ है। अब मैं क्या करूँ?'
सुधमती घबराई हुई मोरनी-सी काँपी और बोली, 'संगमरमर के मंडप में चली जाओ।' मणिमेखलै भीतर गई; सुधमती ने दरवाज़ा बंद कर दिया और थोड़ी दूर जाकर खड़ी हो गई।
राजकुमार बाग़ में पहुँचा और केवल सुधमती को देखा। 'तुम अकेली हो। अगर तुम्हारी सखी यहाँ तक पैदल आई है, तो क्या उसकी पतली कमर थक नहीं गई होगी? उसकी बोली तुतलाती-सी न होती? वह मठ छोड़कर यहाँ अकेली क्यों आई?'
सुधमती ने जवाब में अपनी बात कही। 'आप करिकालन् जैसे प्रसिद्ध वंश के हैं — कहते हैं कि जब दो बूढ़े उनके पास न्याय माँगने आए तो उन्होंने बूढ़े का वेश बनाकर न्याय किया। मैं भला आपको क्या सिखाऊँ? पर एक बात कहूँगी। मनुष्य को शरीर कर्म से मिलता है। उसके वस्त्र और गहने उतार दीजिए तो केवल माँस बचता है। शरीर बूढ़ा होता है, उसे भयानक रोग लगते हैं, वह क्रोध से भरा है, साँप के बिल जितना ख़तरनाक। आप समझदार हैं — मणिमेखलै को छोड़ दीजिए। वह भी एक इंसान ही है।'
यह सुनते-सुनते राजकुमार की नज़र संगमरमर की दीवार के पार जा पड़ी, जहाँ मणिमेखलै मूँगे की गुड़िया जैसी, या सुनहरी बेल जैसी दिख रही थी। सुधमती के शब्द उसके कान तक पहुँचने से पहले ही उसके मन से फिसल गए।
पाँच बातें और एक कथा
राजकुमार ने मंडप की दीवार पर हाथ रखा, जैसे कोई चित्रकार अपना ही बनाया चित्र छू रहा हो। उसने सुधमती से पूछा, 'यह कैसी स्त्री है? मुझे बताओ।'
'अगर वह आपके सुंदर शरीर का सुख नहीं लेना चाहती,' सुधमती ने कहा, 'तो यह इसलिए कि उसका भाग्य भिक्षुणी बनना है। कामना में पड़ना उसके लिए शाप जैसा है।'
राजकुमार ने कहा, 'बाढ़ आती हुई नदी क्या रोकी जा सकती है? काम भी वैसा ही है। चाहे वह भिक्षुणी हो या न हो, मुझे उसकी परवाह नहीं।' फिर लौटते हुए उसने पूछा, 'नगर में लोग कहते हैं कि तुम किसी अप्सरा-पुरुष के साथ गई थीं और वह तुम्हें जैन आश्रम में छोड़कर चला गया। तुम दोनों वहाँ से अकेली यहाँ क्यों आई हो?'
तब सुधमती ने उसे अपनी कथा सुनाई। 'मेरे पिता ब्राह्मण थे; माँ पहले गुज़र गईं। वे बूढ़े होकर भीख माँगने और व्रत करने लगे। मेरे बुरे कर्म से मुझे बुरा पति मिला और मैं उसे छोड़कर चली गई। पिता मुझे ढूँढ़ते हुए तीर्थयात्रियों के साथ कुमारी तट पहुँचे और मुझे पाया। उनकी आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। वे गाँव-गाँव माँग-माँगकर मेरे लिए खाना लाते। एक दिन एक गाय ने उन्हें सींग मार दिया, उनकी आँतें बाहर निकल आईं, और हम दोनों जैन आश्रम में शरण माँगने गए। जैन साधुओं ने कहा, "तुम यहाँ रहने लायक नहीं हो," और हमें भगा दिया। हम सड़कों पर रोते फिरे: "हम अनाथ हैं — क्या यहाँ कोई दयालु है?" तभी एक बौद्ध भिक्षु मिला, भिक्षापात्र लिए, घर-घर भोजन माँगता हुआ। उसने मुझसे पूछा, "क्या तुम किसी संकट में हो?" उसने अपना पात्र मेरे हाथ में दिया, मेरे पिता को कंधे पर उठाया और हमें अपने विहार ले गया।'
राजकुमार सब सुनकर बोला, 'मैं समझ गया। मैं चित्रापति के पास जाऊँगा और पूछूँगा कि मणिमेखलै को कैसे मनाया जाए।' और उदास होकर बाग़ से चला गया।
मणिमेखलै मंडप से बाहर आई। उसने सुधमती से कहा, 'वह शायद सोचता होगा कि मैं पतिव्रता नहीं हूँ, मेरे मन में तप नहीं है। मैं चारों वर्णों में से किसी की नहीं हूँ, इसलिए कोई वर्ण मेरी रक्षा नहीं करेगा। वह मुझे दासी समझे तो भी मुझे यह नहीं लगता कि उसके मन में मेरे लिए प्रेम नहीं है — मेरा मन भी उसकी ओर जाता है। सखी, क्या यही काम-वासना का स्वभाव है? अगर यही है, तो इसकी शक्ति नष्ट हो जाए।'
शाम, श्मशान-कोट, और देवी
शाम उतर रही थी। उसी समय सागर की देवी मणिमेखला पुहार की एक युवा लड़की के वेश में प्रकट हुई। उसने रत्न-जड़े पीठ की परिक्रमा की, बुद्ध के चरण-चिह्न को प्रणाम किया।
उसने सुधमती से कहा, 'तुम और मणिमेखलै पश्चिम की ओर, उस छोटे रास्ते से चक्रवाल-कोट्टम जाओ। वहाँ तपस्वी रहते हैं; रात को तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा।'
सुधमती ने पूछा, 'लोग उसे सुडुकाट्टुक्कोट्टम कहते हैं; आप चक्रवाल-कोट्टम क्यों कहती हैं?'
देवी ने बताया कि वह श्मशान के पास का एक क़िला है, जिसके चार प्रवेश-द्वार हैं, पेड़ों पर आत्मबलिदानियों के सिर लटके हैं; वहाँ महात्माओं की समाधियाँ हैं, सतियों की, राजाओं की; लोग शव जलाते, गाड़ते, बहाते हैं; सियार और उल्लू बोलते हैं; और लहरें कभी चुप नहीं होतीं।
फिर उसने सार्ंगलन् की कथा सुनाई। 'सार्ंगलन् अपनी माँ गोतमै के साथ उस श्मशान से गुज़र रहा था। उसने एक पिशाचिनी को किसी शव का सिर लिए नाचते देखा और डर के मारे माँ से कहा, 'माँ, मैं इस बुढ़िया पिशाचिनी को अपना प्राण दे दूँगा' — और गिरकर मर गया। माँ ने बेटे को छाती से लगाकर नगर की देवी सम्पापति को पुकारा। सम्पापति ने कहा, 'तुम्हारा बेटा किसी पिशाचिनी के कारण नहीं मरा। यह उसका भाग्य था।' गोतमै ने कहा, 'मेरे पति अंधे हैं; मेरे बेटे को लौटा दो या मुझे भी ले लो।' देवी ने कहा, 'जीवन लौटाने की शक्ति केवल ऊळी (प्रलय) के आदि-देव की है — हमारी नहीं।' तब उसने सब देवताओं और ब्रह्माओं, सूर्य-चंद्र और तारों को बुलाया। सबने कहा कि लड़का पिशाचिनी के कारण नहीं, अपने भाग्य से मरा। गोतमै शांत हुई और बेटे के साथ मर गई।'
इसी सभा के कारण उस स्थान का नाम चक्रवाल-कोट्टम पड़ा — जहाँ सब देवता और देवियाँ एक साथ जमा हुए थे।
आकाश की ओर
कथा सुनते-सुनते सुधमती सो गई। देवी ने मणिमेखलै को उठाया, तीस योजन दक्षिण आकाश-मार्ग से उड़ी, और सोती हुई मणिमेखलै को सागर से घिरे द्वीप मणिपल्लवम् पर रख आई।
फिर वह उदयकुमारन् के पास गई। राजकुमार नर्म बिस्तर पर लेटा था और सोचता था, 'रात बीतेगी, तो मणिमेखलै मुझे मिलेगी।' देवी ने उससे कहा, 'राजन्, अगर राजा न्याय से राज न करे तो तारे राह भूल जाते हैं; तारे राह भूलें तो बारिश नहीं होती; बारिश न हो तो अकाल पड़ता है। राजा को प्रजा को अपने प्राणों जैसा मानना चाहिए। मणिमेखलै अब भिक्षुणी है — वह भी तुम्हारी प्रजा है। उसके बारे में सोचना छोड़ दो।'
फिर वह सुधमती को जगाने गई। 'डरो मत। मैं मणिमेखला हूँ। मैं इंद्र का उत्सव देखने आई थी। तुम्हारी सखी को मैं मणिपल्लवम् पर छोड़ आई हूँ — वह सात दिन बाद तुम्हारे पास लौटेगी। माधवी को बताना कि उसकी बेटी ने कोई ग़लती नहीं की। माधवी मुझे जानती है — जिस दिन उसने बेटी को जन्म दिया, कोवलन ने कहा था कि "समुद्र में एक देवी है," और उसी के नाम पर बेटी का नाम रखा। एक शुभ रात मैं सपने में माधवी के पास आई थी और बताया था कि इस दैवी बालिका को बुद्ध की भक्ति मिलेगी और वह किसी के प्रति काम-वासना में नहीं पड़ेगी।'
इसके बाद सुधमती जागी, डरी हुई। आधी रात को श्मशान-कोट की आवाज़ें उसके कानों में आईं — पहरेदारों के नगाड़े, लोहारों के गीत, यज्ञ-चौराहों पर पुकारें। वह पश्चिमी छोटे द्वार से कोट के बड़े द्वार तक पहुँची और एक कोने में खड़ी हो गई।
वहाँ मय के हाथों बनी एक स्तंभ-प्रतिमा कंदिल-पावै थी, जो लोगों के पिछले और अगले जन्म बताती है। वह सुधमती के सामने बोली: 'पिछले जन्म में तू यशोधर के राजा रविवर्मन् की बेटी थी, और कच्छयम् के राजा दुच्चयन् से ब्याही गई। तेरी बहन तारै की मृत्यु की ख़बर सुनकर तू मूर्च्छित हुई, और हाथी ने तुझे कुचल दिया। अगले जन्म में तू कौशिकन् के घर पैदा हुई। उस जन्म में तू वीरै थी; तारै और लक्ष्मी तेरी बहनें थीं। तारै माधवी बनकर जन्मी है, तू सुधमती बनी है, और लक्ष्मी माधवी की बेटी मणिमेखलै बनी है। सात दिन बाद वह द्वीप पर अपने पिछले और अगले जन्म जान लेगी, और आधी रात को तुम्हारे पास लौट आएगी।'
सुधमती काँपते हुए जागी। सुबह होते ही वह माधवी के पास पहुँची और सब बताया। माधवी, जिसने बेटी को खोया था, मणि खो चुके साँप की तरह तड़पती रही।
टिप्पणी: सर्ग 4–7 कौसल्या हार्ट के अंग्रेज़ी अनुवाद से। नाम के रूप: सार्ंगलन् (सारंगलन्), सम्पापति (पुहार की नगर-देवी), चक्रवाल-कोट्टम (श्मशान के पास का किला; दूसरा नाम सुडुकाट्टुक्कोट्टम)। सुधमती की कथा पाठ में दो जगह दो रूपों में है — सर्ग 3 में विद्याधर के साथ और सर्ग 5 में पिता और जैन आश्रम के साथ; यहाँ दोनों अलग-अलग जगह दी गई हैं, एक को दूसरे से मिलाया नहीं गया। जैन साधुओं के ठुकराने का वर्णन पाठ का है; यह इस बौद्ध कवि का वर्णन है, दूसरी परंपरा का अपना कथन नहीं। पिछले जन्म की दोनों बहनों की मृत्यु का क्रम सर्ग 7 और सर्ग 12 में अलग-अलग बताया गया है (सर्ग 7 में वीरै तारै की मृत्यु की ख़बर पर हाथी से मरती है; सर्ग 12 में वीरै नशे में हाथी के सामने जाती है और तारै ख़बर सुनकर छत से गिरती है), इसलिए अध्याय में केवल 'बहनें' कहा गया है। सुधमती को बचाने वाला बौद्ध भिक्षु पाठ में अनाम है।
स्रोत: तमिल पंचकाव्य — मणिमेखलै (परंपरा से सीतलै सात्तनार रचित), संगमरमर का मंडप