वंजि से काँची — मणिमेखलै, चित्र

अध्याय १२

वंजि से काँची

पुरुष-साधु के वेश में दर्शनों की एक पूरी सभा, भूख से सूखी काँची में कटोरे की बारिश — और एक उपदेश जिस पर यह महाकाव्य समाप्त होता है

वंजि से काँची — मणिमेखलै का अध्याय १२। स्रोत: मणिमेखलै, सर्ग 27–30। इसमें ४ दृश्य हैं — दर्शनों की सभा; भूखी काँची; अरवणर का उपदेश; तप — और अंत में १० सवाल।

दर्शनों की सभा

पुरुष-साधु का रूप धरकर मणिमेखलै वंजि के उस स्थान पर पहुँची जहाँ मत-विद्वान (समय-कणक्कर) रहते थे। वह एक-एक के पास गई और पूछा, 'आप किस मत को मानते हैं, बताइए।'

पहले अळवै-वादी मिला, जो वैदिक परंपरा का था। उसने कहा, 'हम तीन ऋषियों को मानते हैं — वेदव्यास, कृडकूडि और निर्दोष जैमिनि।' और उसने प्रमाण गिनाए: प्रत्यक्ष (देखना), अनुमान (सोचकर जानना), उपमान (तुलना), आगम (ग्रंथ की बात), अर्थापत्ति, और बाक़ी। उसने उदाहरण दिए: जंगल से हाथी की आवाज़ सुनकर जान लेना कि वहाँ हाथी है; नदी में बाढ़ देखकर जान लेना कि कहीं बारिश हुई है; काले बादल देखकर जान लेना कि बारिश आएगी।

फिर शैव-वादी, जो शिव को ईश्वर मानता था: 'शिव का शरीर आठ चीज़ों से बना है — सूर्य, चंद्र, आत्मा, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। वही सब रचता है, चलाता है, और नष्ट करता है; उसके समान कोई देवता नहीं।' फिर ब्रह्म-वादी: 'ये सारे बड़े लोक ब्रह्मा के रचे एक अंडे हैं।' फिर वैष्णव-वादी: 'नारायण संसार के रक्षक हैं।' फिर वेद-वादी: 'वेद-पुरुष के हाथ वेद के छह अंग हैं, छंद उसके पाँव हैं, गणित आँखें, निरुक्त कान, शिक्षा नाक और व्याकरण मुख। वह किसी पर निर्भर नहीं, उसका आदि और अंत नहीं। हम वही मानते हैं जो वेद कहते हैं।'

मणिमेखलै इनमें से किसी से सहमत नहीं हुई और आजीविक-वादी के पास गई। उसने कहा, 'हमारा देव असीम ज्ञान वाला है और हर जगह रहता है। हमारे ग्रंथ पाँच अणु बताते हैं: जीव और चार अन्य — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु। जीव ही जानता है कि अणु कैसे जुड़ते और अलग होते हैं। सब कुछ कर्म के अनुसार है, और जीव के छह प्रकार के जन्म हैं — काला, गहरा नीला, हरा, लाल, सोने जैसा और सफ़ेद; सफ़ेद जन्म के बाद मोक्ष मिलता है।' यह शिक्षा 'मरकलि कोसलर' के ग्रंथ की बताई गई।

फिर निगंठ-वादी (जैन) ने कहा, 'हमारे देव की पूजा इंद्र करते हैं। हमारे ग्रंथों में तन्मात्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, काल, आकाश, जीव, पुण्य, पाप, उनके फल और मोक्ष हैं। हर वस्तु अपने स्वभाव से उगती, टिकती और नष्ट होती है; नित्य-अनित्य दोनों है।' फिर सांख्य ने प्रकृति से बुद्धि, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी के क्रम से सृष्टि बताई और पुरुष के पच्चीस तत्व। फिर वैशेषिक ने छह पदार्थ गिनाए: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय। और अंत में भूत-वादी ने कहा, 'जैसे अत्ती के फूल और चीनी मिलाने से मद्य बनता है, वैसे तत्वों के संयोग से अनुभूति उपजती है; वे अलग हों तो मिट जाती है।' इसके बाद उलगायत (लोकायत) मत का कथन आता है: इस मत के अनुसार कर्म का फल इसी संसार में है और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म नहीं।

यह सुनकर मणिमेखलै हँसी। 'मैंने बहुतों के मत सुने। अच्छे हों या बुरे, मैं किसी के विरुद्ध कुछ नहीं कहूँगी।' पर चूँकि वह अपने पिछले जन्म जानती थी, वह हँसी। लोकायत ने कहा, 'देवता को मानना और सपने देखना एक ही है — दोनों मन का खेल हैं।' मणिमेखलै ने कहा, 'अगर कोई कहे "ये तुम्हारे माता-पिता हैं," तो तुम कैसे जानते हो कि वे सच में हैं? जब तक भीतर से लगे नहीं, कैसे मानोगे? तुम इसे संदेह कहते हो, पर यह नहीं बताते कि क्यों।'

भूखी काँची

पुरुष-साधु का रूप धरकर विभिन्न मतों को सुनने के बाद मणिमेखलै वंजि के बौद्ध विहार पहुँची। राह में वंजि के मंदिर, सरोवर और बाज़ार आए, मछली-नमक-पान बेचने वाले, कुम्हार, सुनार, बढ़ई, मोती गूँथने वाले। वहीं उसकी भेंट अपने दादा मासात्तुवान् से हुई — कोवलन के पिता, जो बेटे-बहू की मृत्यु सुनकर बौद्ध साधु बन गए थे।

मणिमेखलै ने उन्हें सब बताया। मासात्तुवान् ने कहा, 'मेरे अच्छे कर्म से तुझसे भेंट हुई। जब मैंने सुना कि तेरे माता-पिता मदुरै में मारे गए, तब मैं बुद्ध का भक्त बन गया। मैंने समझा कि गृहस्थी एक भ्रम है। मैंने तप शुरू किया।' उन्होंने बताया कि चेर राजा कुडक्को चेरलादन् के पास उन साधुओं ने कावेरीपट्टिनम् के समुद्र में डूबने की बात पहले ही कह दी थी, और यह भी कि कोवलन ने साधुओं की सलाह पर सात दिन में करोड़ों का धन ग़रीबों में बाँट दिया था।

'अरवणर, यह जानकर कि तू काँची में होगी, वहीं चले गए; तेरी माताएँ माधवी और सुधमती भी उनके साथ हैं। काँची में बारिश नहीं हो रही और लोग भूख से मर रहे हैं। वहाँ साधुओं और लोगों को खिलाने वाला कोई नहीं। तेरे हाथ में जीवन-रक्षक औषधि वाला अमृतसुरभि है। तुझे वहाँ बारिश की तरह जाना चाहिए।'

मणिमेखलै ने दादा को प्रणाम किया और दिव्य पात्र लेकर काँची नगर पहुँची, जो कभी इंद्र की अमरावती जैसा फलता-फूलता था और आज अकाल से सूखा था। वहाँ उसने राजा इळंगिल्लि का बनवाया मंदिर देखा, जिसमें हरा बोधि वृक्ष था, और पास के उपवन में ठहर गई।

एक पहरेदार राजा के पास गया: 'कोवलन की बेटी मणिमेखलै ने महान तप किया है; इस संसार में उसके समान कोई नहीं। वह धर्म-वन में ठहरी है; उसका आना सूखी धरती पर बारिश जैसा शुभ है। उसके हाथ में अमृतसुरभि है, जो सबकी भूख हर सकता है।' राजा समझ गया कि कंदिल-पावै की बात सच थी। वह मंत्रियों के साथ मणिमेखलै के पास गया और बोला, 'मैं नहीं जानता था कि इस नगर में अकाल क्यों आया। क्या मैं न्याय से राज नहीं कर रहा? क्या मेरा तप कम है? क्या यहाँ की स्त्रियाँ अपने पतियों से बेवफ़ा हैं? आप अच्छी स्त्री हैं — यह देश ऐसा क्यों है, मैं नहीं समझता। जब मैं सोच रहा था, एक देवी ने मुझसे कहा, "तेरे महान तप से एक स्त्री यहाँ आएगी, जिसके हाथ में ऐसा भिक्षा-पात्र होगा जो सबको खिलाएगा और देश का अकाल हर लेगा। उसकी कृपा से इंद्र वरुण को बारिश करने का आदेश देंगे और धरती फलेगी।" देवी यह कहकर चली गई, और मैंने यह जगह बनवाई जैसा उन्होंने कहा था।'

राजा मणिमेखलै को उस स्थान पर ले गया, जहाँ उसने तीवतिलकै और देवी मणिमेखला का मंदिर बनवाया था और एक कमल-आकार का पीठ भी — 'यही वह पीठ है जिसने मुझे मेरे पिछले जन्म बताए।' मणिमेखलै ने अमृतसुरभि हाथ में लिया और अठारह भाषाएँ बोलने वाले सब लोगों को बुलाया — बहरे, अंधे, लँगड़े, अनाथ, गूँगे, बीमार, तपस्वी, भूखे, ग़रीब, और पशु-पक्षी भी। सब जमा हुए और उसकी स्तुति की: 'वह भूख की इस बीमारी को हर लेगी!' अमृतसुरभि ने समय पर बोई फ़सल की तरह भोजन दिया, बारिश की तरह सबको खिलाया। फिर माधवी और सुधमती अरवणर के साथ धर्म-मंडप में पहुँचीं। मणिमेखलै ने उनके पाँव धोए, स्वादिष्ट भोजन कराया, पान दिया और बोली, 'मेरे मन का धर्म संसार के भ्रम से मुक्त होकर सच्चा हो जाए।'

अरवणर का उपदेश

अरवणर ने मणिमेखलै की बात सुनकर उसे नेडुमुडिक्किल्लि और पीलिवलै की कथा सुनाई — वही कि राजा ने खोए बेटे की खोज में इंद्र का उत्सव छोड़ दिया और देवी मणिमेखला के शाप से पुहार सागर में डूब गया। उन्होंने बताया कि इसी कारण वे मणिमेखलै की माताओं के साथ पुहार छोड़कर वंजि आ गए थे।

अब तक मणिमेखलै ने अनेक मत सुन लिए थे, पर केवल सुन लेना पर्याप्त नहीं था। कौन-सा तर्क सही है और कौन-सा भ्रम, इसे पहचानना बाकी था।

मणिमेखलै ने पूछा, 'मैंने पुरुष का रूप धरकर अनेक मतों के दर्शन सुने, पर उन्हें पूरी तरह नहीं समझी। कृपया उन्हें समझाइए।' अरवणर ने जवाब में उसे तर्क सिखाया — बौद्ध प्रमाण-विद्या का पाठ, जिसके बारे में अनुवादक हार्ट लिखती हैं कि कवि ने इसे संस्कृत के छोटे ग्रंथ 'न्यायप्रवेश' से तमिल में उतारा है।

'बुद्ध ने प्रमाण केवल दो बताए — प्रत्यक्ष और अनुमान। अनुमान में पाँच अंग होते हैं: पक्ष (जिस पर बात है), हेतु (कारण), दृष्टांत (उदाहरण), उपनय (लागू करना) और निगमन (निष्कर्ष)। पक्ष: "इस पहाड़ पर आग है।" हेतु: "क्योंकि यहाँ धुआँ है।" दृष्टांत: "जैसे रसोई में।" उपनय: "और यह पहाड़ भी वैसा ही है।" निगमन: "जहाँ धुआँ है, वहाँ आग है।" पर ध्यान रखना: अगर कोई कहे "जहाँ गधा है वहाँ गणिका है, क्योंकि पहले एक जगह दोनों साथ देखे गए थे," तो यह ग़लत तर्क है।' फिर अरवणर ने बताया कि तर्क के पक्ष, हेतु और दृष्टांत में कैसे दोष आते हैं — नौ तरह के पक्ष-दोष, तीन तरह के हेतु-दोष, दस तरह के दृष्टांत-दोष — 'ताकि तू बिना संदेह जान सके कि ग़लत अनुमान कैसे पहचाना जाए।'

तप

दूसरे मतों को सुनने और तर्क की कसौटी समझने के बाद अब उसकी यात्रा उस प्रश्न पर लौट आई जिससे यह पूरी कथा चलती रही थी: दुख क्यों है, और उससे मुक्ति कैसे हो?

मणिमेखलै ने बहुत दान-पुण्य किया। वह अपने पिछले जन्म जानती थी। उसने बौद्ध संघ के मार्ग का पालन किया। उसने तीन रत्नों — बुद्ध, धर्म और संघ — की शरण ली और बुद्ध को प्रणाम किया, जिन्होंने काम को जीत लिया था और राग, द्वेष और मोह के तीन दोष त्याग दिए थे।

अरवणर ने उसे बताया कि बुद्ध तुषित लोक से कैसे आए, बोधि वृक्ष के नीचे कैसे बैठे और सब प्राणियों को बचाने वाले उपदेश कैसे दिए। उन्होंने बारह निदान गिनाए: अविद्या, संस्कार/कर्म, विज्ञान (चेतना), नाम-रूप, छह इंद्रिय-आधार, स्पर्श, वेदना/अनुभूति, तृष्णा, उपादान, भव, जन्म और जरा-मरण। 'अज्ञान से संस्कार/कर्म, संस्कार से विज्ञान, विज्ञान से नाम-रूप, और इसी क्रम में आगे की कड़ियाँ उत्पन्न होती हैं। फिर जन्म लेकर लोग बुढ़ापा, रोग, मृत्यु, शोक और बेबसी झेलते हैं। अगर अज्ञान चला जाए, तो संस्कार जाता है; संस्कार जाए तो विज्ञान; और इसी क्रम में पूरी शृंखला टूटती है।' उन्होंने चार आर्य सत्य बताए — दुख, दुख का कारण, दुख का अंत, और अंत का मार्ग; पाँच स्कंध — रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान; और कहा कि मुक्ति का मार्ग यह जानना है कि किसी प्राणी की अपनी कोई स्थिर आत्मा नहीं।

अंत में उन्होंने कहा, 'मन का भ्रम हटाने के चार उपाय हैं: यह जानना कि दुख का कारण और उसका अंत बताने वाला कोई और नहीं — राग, द्वेष और मोह ही कारण हैं। यह देखना कि सब कुछ अनित्य है, दुख देता है, उसमें आत्मा नहीं है, और उसमें घृणा छोड़ देनी चाहिए। घृणा छोड़कर प्रेम, करुणा और भलाई का भाव रखना। और इन चारों से मन के अँधेरे को हटाना।'

अरवणर अडिगल ने मणिमेखलै को ये बातें सिखाईं और उसे ज्ञानी बना दिया।

यहीं महाकाव्य का पाठ समाप्त होता है।

टिप्पणी: सर्ग 27–30, कौसल्या हार्ट के अंग्रेज़ी अनुवाद से। यह भाग पाठ का सबसे दार्शनिक हिस्सा है और यहाँ संक्षेप में दिया गया है; विभिन्न मतों का वर्णन उन मतों के अपने शब्दों में नहीं, इस बौद्ध कवि की प्रस्तुति के रूप में पढ़ें। कुछ विद्वान कहते हैं कि पाठ में गैर-बौद्ध मत 'अपूर्ण या हीन' दिखाए गए हैं; हार्ट के अनुवाद में मणिमेखलै इन मतों को सुनकर केवल असहमत होती है, और खंडन का वर्णन कम है — यहाँ वही दिया गया है। बारह निदानों की सूची में हार्ट का अंग्रेज़ी पाठ कुछ पदों का अनुवाद अलग करता है (जैसे तमिल 'उणर्वु' को 'feeling' लिखना); यहाँ तमिल क्रम के अनुसार मानक रूप दिया गया है (अविद्या → संस्कार → विज्ञान → नाम-रूप → षडायतन → स्पर्श → वेदना → तृष्णा → उपादान → भव → जन्म → जरा-मरण)। भूत-वादी और उलगायत/लोकायत हार्ट के पाठ में अलग-अलग मत हैं: पहले में तत्वों के मेल से अनुभूति उपजती है, दूसरे में पुनर्जन्म का निषेध है। अध्याय 29 का तर्क-पाठ हार्ट के अनुसार 'न्यायप्रवेश' का तमिल रूपांतर है, जिसे परंपरा से शंकरस्वामी (कुछ दिङ्नाग) का मानते हैं; इस सारांश में उसके दोषों की पूरी सूची नहीं दी गई, केवल पहाड़-धुआँ-आग वाला मूल उदाहरण और गधे-गणिका का दोषपूर्ण उदाहरण। पाठ मणिमेखलै की मृत्यु या निर्वाण नहीं दिखाता; पतिकम् में 'पुनर्जन्म काटने के लिए तप' का कथन और कंदिल-पावै की भविष्यवाणी ही उसका संकेत हैं। मासात्तुवान् के कथन में आए चेर राजा के नाम (कुडक्को चेरलादन्) और काँची के राजा इळंगिल्लि की पहचान, तथा सिलप्पदिकारम् के राजाओं से उनका संबंध, पाठ से स्पष्ट नहीं है; यहाँ उसे नहीं सुलझाया गया।

स्रोत: तमिल पंचकाव्य — मणिमेखलै (परंपरा से सीतलै सात्तनार रचित), वंजि से काँची

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

वंजि में मणिमेखलै ने किस रूप में दर्शनों की बातें सुनीं?

  • अप्सरा के रूप में
  • भिक्षुणी के रूप में
  • राजकुमारी के रूप में
  • पुरुष-साधु के रूप में, क्योंकि स्त्री-रूप में साधु उसे गंभीरता से नहीं लेते
पूरी कथा पढ़िए — वेश में सुनवाई

कन्नगी की मूर्ति ने कहा था कि साधु उसे युवा स्त्री समझेंगे।

इसलिए उसने पुरुष-साधु का रूप धरा।

तथ्य

पाठ में अळवै-वादी ने 'अनुमान' का उदाहरण कैसे दिया?

  • शास्त्र पढ़कर जानना
  • जंगल से हाथी की आवाज़ सुनकर जानना कि वहाँ हाथी है
  • सूर्य देखकर दिन जानना
  • राजा का आदेश सुनकर
पूरी कथा पढ़िए — अनुमान की तीन मिसालें

पाठ की तीन मिसालों में हाथी की आवाज़, बाढ़ से बारिश और बादल से बारिश है।

ये बौद्ध पाठ में एक वैदिक मत-विद्वान के रूप में दर्ज हैं।

क्या हुआ?

दर्शनों की सभा में मणिमेखलै ने किस मत की बात सुनकर हँसी?

  • शैव मत
  • वेद-वादी
  • उलगायत/लोकायत मत की बात
  • आजीविक मत
पूरी कथा पढ़िए — भौतिकवादी पर हँसी

वह अपने पिछले जन्म जानती थी, इसलिए यह मत उसे अटपटा लगा।

पर उसने कहा कि वह किसी के विरुद्ध कुछ नहीं कहेगी।

किसने कहा?

'जब मैंने सुना कि तेरे माता-पिता मदुरै में मारे गए, तब मैं बुद्ध का भक्त बन गया। मैंने समझा कि गृहस्थी एक भ्रम है।' यह किसने कहा?

  • अरवणर ने
  • धर्मसावगन् ने
  • राजा इळंगिल्लि ने
  • मासात्तुवान् ने, मणिमेखलै से
पूरी कथा पढ़िए — दादा की कथा

मासात्तुवान् कोवलन के पिता और मणिमेखलै के दादा हैं।

बेटे-बहू की मृत्यु के बाद वे बौद्ध साधु बन गए।

क्या हुआ?

काँची नगर की क्या हालत थी जब मणिमेखलै वहाँ पहुँची?

  • वहाँ महामारी फैली थी
  • वह युद्ध से घिरा था
  • वहाँ बारिश नहीं हो रही थी और लोग भूख से मर रहे थे
  • वहाँ बाढ़ आई थी
पूरी कथा पढ़िए — भूखा नगर

काँची कभी इंद्र की अमरावती जैसी फलती-फूलती थी।

अब अकाल में कोई साधुओं और लोगों को खिलाने वाला नहीं बचा था।

क्या हुआ?

काँची के राजा इळंगिल्लि ने मणिमेखलै से क्या कहा?

  • कि एक देवी ने उसे पहले ही बताया था कि भिक्षा-पात्र वाली एक स्त्री आएगी जो अकाल हर लेगी, और उसी के अनुसार उसने यह स्थान बनवाया
  • कि वह राजा बन जाए
  • कि उसे सज़ा दी जाएगी
  • कि वह नगर छोड़ दे
पूरी कथा पढ़िए — राजा की बात

राजा ने देवी के कहे अनुसार धर्म-वन बनवाया था।

उसने तीवतिलकै और देवी मणिमेखला का मंदिर भी बनवाया।

क्या हुआ?

काँची में मणिमेखलै ने अमृतसुरभि से किन-किन को बुलाकर खिलाया?

  • केवल साधुओं को
  • केवल राजा के सैनिकों को
  • केवल ब्राह्मणों को
  • अठारह भाषाएँ बोलने वाले सब लोगों को
पूरी कथा पढ़िए — सबके लिए भोजन

उसने सबको बुलाया और अमृतसुरभि ने समय पर बोई फ़सल की तरह भोजन दिया।

सबने कहा कि वह भूख की बीमारी हर लेगी।

ऐसा क्यों?

पाठ के अनुसार पुहार सागर में क्यों डूब गया — यह अरवणर ने मणिमेखलै को किस कथा से बताया?

  • राजा के अधर्म से
  • नेडुमुडिक्किल्लि और पीलिवलै की कथा से
  • कावेरी की बाढ़ से
  • भूकंप से
पूरी कथा पढ़िए — फिर वही कथा

अरवणर ने तीवतिलकै के बताए अनुसार वही कथा दोहराई।

यहाँ पुहार से माताओं के निकलने का कारण भी खुल जाता है।

तथ्य

अरवणर के अनुसार बुद्ध ने 'प्रमाण' (सही ज्ञान के साधन) कितने बताए?

  • दो
  • आठ
  • केवल एक
  • दस
पूरी कथा पढ़िए — दो प्रमाण

अनुमान के पाँच अंग हैं: पक्ष, हेतु, दृष्टांत, उपनय और निगमन।

'पहाड़ पर धुआँ है, इसलिए आग है' इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।

व्याख्या

पाठ के अंत में अरवणर मणिमेखलै को क्या सिखाते हैं, और इसे कैसे पढ़ें?

  • केवल राजा के कर्तव्य
  • केवल जादू के मंत्र
  • बारह निदान, चार आर्य सत्य, पाँच स्कंध और मन का भ्रम हटाने के चार उपाय
  • केवल पूजा-पद्धति
पूरी कथा पढ़िए — कथा का समापन

हार्ट के पाठ में अंतिम सर्ग शिक्षा के साथ समाप्त होता है।

निर्वाण की बात केवल कंदिल-पावै की भविष्यवाणी और भूमिका (पतिकम्) में आती है।

वंजि से काँची के बारे में सवाल

वंजि से काँची (मणिमेखलै) में क्या होता है?

पुरुष-साधु के वेश में दर्शनों की एक पूरी सभा, भूख से सूखी काँची में कटोरे की बारिश — और एक उपदेश जिस पर यह महाकाव्य समाप्त होता है। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: दर्शनों की सभा; भूखी काँची; अरवणर का उपदेश; तप।

मणिमेखलै में वंजि से काँची के बाद क्या आता है?

वंजि से काँची, मणिमेखलै का आख़िरी अध्याय है।

वंजि से काँची का स्रोत क्या है?

मणिमेखलै, सर्ग 27–30।