
अध्याय १
यह कथा किसलिए
एक कन्या जो नाचने से इनकार करती है, एक कटोरा जो कभी खाली नहीं होता — सिलप्पदिकारम् के बाद की कथा, एक अनाज-व्यापारी कवि की कलम से
यह कथा किसलिए — मणिमेखलै का अध्याय १। स्रोत: मणिमेखलै, पतिकम् (भूमिका) और सर्ग 1–2। इसमें ६ दृश्य हैं — जो बच्ची पीछे छूट गई; अनाज बेचने वाला कवि; तीस सर्ग, एक कटोरा; प्रेम-कथा का उलटा; कब रचा गया; जो बच गया — और अंत में १० सवाल।
जो बच्ची पीछे छूट गई
सिलप्पदिकारम् की कथा कन्नगी के देवी बनने पर ख़त्म होती है। पर उस कथा के बीच में एक नन्ही बच्ची भी थी, जिसका नाम पाठकों को अक्सर याद नहीं रहता — मणिमेखलै, कोवलन और नर्तकी माधवी की बेटी।
इस महाकाव्य की नायिका वही है। कोवलन मदुरै में मारा जा चुका है; माधवी शोक में बौद्ध भिक्षुणी बन चुकी है; और बेटी बड़ी हो रही है — उस नगर में जहाँ उसकी माँ और नानी की पीढ़ियाँ नाचकर जीती आई हैं।
कथा का पहला दृश्य इसी से शुरू होता है: पूरा पुहार इंद्र का उत्सव मना रहा है, और माधवी की बेटी उसमें नहीं जाती।
अनाज बेचने वाला कवि
परंपरा इस महाकाव्य को कूलवाणिकन् सीतलै सात्तनार की रचना मानती है। 'कूलवाणिकन्' का अर्थ है अनाज का व्यापारी; कहा जाता है कि वे मदुरै में अनाज बेचते थे। परंपरा में उनके नाम से कुल ग्यारह पद जोड़े जाते हैं — दस संगम-काल के संकलनों में और एक तिरुवल्लुवमालै में — और इनमें से एक में वे पांड्य राजा नन्मारन् की प्रशंसा करते हैं।
इस महाकाव्य की भूमिका (पतिकम्) की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं कि राजकुमार-संन्यासी इलंगो अडिगल के कहने पर सात्तनार ने मणिमेखलै के संन्यास की यह कथा तीस गीतों में कही। यह भूमिका बाद में जुड़ी हुई भी हो सकती है, ठीक वैसे जैसे सिलप्पदिकारम् की भूमिका के बारे में विद्वान कहते हैं। इसलिए इसे परंपरा का कथन मानिए, पक्का इतिहास नहीं।
तीस सर्ग, एक कटोरा
पूरा ग्रंथ लगभग 4,861 पंक्तियों का है — तमिल के अकवल छंद में — और 30 सर्गों (कथै) में बँटा है। अंग्रेज़ी अनुवादक कौसल्या हार्ट ने इसे सात भागों में बाँटकर पढ़ाया है, और इस रचना में उन्होंने साफ़ लिखा है कि यह कथा केवल मणिमेखलै की नहीं है; इसमें और भी कई छोटी कथाएँ हैं — आपुत्रन्, आतिरै, कायचंडिका, पुण्यराजन्।
कथा की रीढ़ एक कटोरा है — अमृतसुरभि — जिसमें से भोजन कभी ख़त्म नहीं होता। इस कटोरे के सहारे यह महाकाव्य एक बहुत सीधी बात कहता है: भूख एक रोग है, और भूख मिटाना सबसे बड़ा धर्म है।
इस पूरी गाथा में एक समुद्री-देवी, एक राजकुमार, एक द्वीप, एक पुराना बुद्ध-पीठ, एक श्राप से भूखी अप्सरा, और अंत में तमिल देश के दर्शनों की एक पूरी सभा आती है।
प्रेम-कथा का उलटा
समीक्षक इसे अक्सर 'प्रेम-विरोधी कथा' कहते हैं। सिलप्पदिकारम् एक प्रेम और उसके टूटने की त्रासदी थी; यहाँ नायिका के पीछे एक राजकुमार पड़ा है, और वह उससे भागती है — पर पूरी तरह भाग भी नहीं पाती, क्योंकि उसका मन भी उसकी ओर खिंचता है। ऐसा क्यों, यह इस कथा का एक बड़ा रहस्य है, जिसका उत्तर बहुत बाद में मिलता है।
सब पाठकों को यह ग्रंथ एक-सा नहीं लगा। कामिल ज़्वेलेबिल ने इसे सिलप्पदिकारम् से 'काफ़ी कमज़ोर' माना — कन्नगी जैसी तेज़ नायिका यहाँ नहीं, और चमत्कार तथा उपदेश बहुत हैं। 1906 के एक समीक्षक ने इसे 'महाकाव्य नहीं, दर्शन पर एक गंभीर निबंध' कहा। दूसरे पाठक इसे इसीलिए सराहते हैं कि यह प्राचीन तमिल देश में बौद्ध धर्म और धार्मिक बहसों की ऐसी झलक देता है जो और कहीं नहीं मिलती।
कब रचा गया
रचना-काल पर विद्वान एकमत नहीं हैं। प्रस्तावित तिथियाँ दूसरी सदी से लेकर नौवीं सदी तक फैली हैं। तमिल परंपरा से जुड़े विद्वान प्रायः पुरानी तिथि पसंद करते हैं; भाषा के आधार पर कामिल ज़्वेलेबिल ने छठी सदी के मध्य का समय सबसे विश्वसनीय माना, और कई आधुनिक विद्वान इसी को सबसे ठोस मानते हैं।
यहाँ यही कहना ठीक है: संभवतः छठी सदी के आसपास, पर तिथि विवादित।
जो बच गया
मणिमेखलै तमिल के अत्यंत दुर्लभ, पूर्ण रूप से सुरक्षित बौद्ध साहित्यिक ग्रंथों में से एक है। पुराने विद्वत्-लेखन में इसे अक्सर तमिल का एकमात्र बचा हुआ बौद्ध ग्रंथ कहा गया है; आज की शोध-परियोजनाएँ इसे दो पूर्ण रूप से सुरक्षित तमिल बौद्ध ग्रंथों में से एक बताती हैं। एक समय तमिल भूमि में बौद्ध धर्म की अच्छी उपस्थिति थी, जो लगभग ग्यारहवीं सदी तक फीकी पड़ गई। कई विद्वान मानते हैं कि यह ग्रंथ शायद इसलिए बच गया कि यह सिलप्पदिकारम् की अगली कड़ी था — लोग पहली कथा को बचाते गए, तो दूसरी भी साथ बच गई। यह एक अनुमान है, पक्का तथ्य नहीं।
इसके बौद्ध संप्रदाय पर विद्वानों में मतभेद जारी हैं: कुछ इसे प्रारंभिक हीनयान/स्थविर परंपरा से जोड़ते हैं, कुछ महायान का प्रभाव देखते हैं, और कुछ मानते हैं कि दोनों धाराओं के तत्व साथ-साथ मौजूद हैं।
इस वेबसाइट पर इसे जगह इसीलिए मिली है कि इसके पात्र वही हैं जो सिलप्पदिकारम् के हैं, और इसके पन्नों में वैदिक, शैव, वैष्णव, आजीविक और जैन परंपराएँ सब बोलती हैं। हम इसे हिंदू ग्रंथ नहीं बताएँगे — यह एक बौद्ध तमिल महाकाव्य है — और इसे वैसा ही पढ़ेंगे।
टिप्पणी: यह अध्याय मणिमेखलै के पूरे अंग्रेज़ी अनुवाद (कौसल्या हार्ट, प्रोजेक्ट मदुरै) के पढ़ने पर आधारित है, साथ में विकिपीडिया के *Manimekalai* और *Chithalai Chathanar* लेख। सात्तनार के जीवन के बारे में बहुत कम पक्का है; 'अनाज का व्यापारी' उनकी उपाधि से आता है, और संगम-संकलनों के कुछ पदों में उनका नाम मिलता है (कुल ग्यारह पद परंपरा में उनके नाम से जुड़े हैं)। रचना-काल दूसरी से नौवीं सदी के बीच विवादित है। बौद्ध संप्रदाय पर विद्वानों में मतभेद जारी है (हीनयान/स्थविर, महायान, या दोनों का मिश्रण)। 'तमिल का एकमात्र बचा बौद्ध ग्रंथ' पुराने विद्वत्-लेखन का वाक्य है; आज की शोध-परियोजनाएँ इसे दो पूर्ण रूप से सुरक्षित तमिल बौद्ध ग्रंथों में से एक बताती हैं। नाम का रूप: नायिका मणिमेखलै, समुद्र की देवी मणिमेखला — पाठ में दोनों का नाम एक ही है, और आगे के अध्यायों में हम इन्हें इसी तरह अलग लिखेंगे।
स्रोत: तमिल पंचकाव्य — मणिमेखलै (परंपरा से सीतलै सात्तनार रचित), यह कथा किसलिए