दैव और पुरुषार्थ — मत्स्य पुराण, चित्र

अध्याय १२

दैव और पुरुषार्थ

मनु ने मछली से पूछा कि भाग्य बड़ा है या अपना यत्न — और मछली का उत्तर पूरे पुराण का सार निकला

दैव और पुरुषार्थ — मत्स्य पुराण का अध्याय १२। स्रोत: मत्स्य पुराण, अध्याय १–३, १६४, २२१। इसमें ६ दृश्य हैं — मनु के सवाल; मनु का प्रश्न; तीन चीज़ें साथ-साथ; जो न हुआ तो भी; कथाएँ जो हमने सुनीं; मछली और मनु — और अंत में १० सवाल।

मनु के सवाल

पहले अध्याय में हमने मनु को नाव पर चढ़ते देखा था, मछली के सींग से बँधी नाव पर। मत्स्य पुराण की पूरी कथा उसके बाद एक लंबी बातचीत है, मनु और मछली के बीच। सूत केवल उसे ऋषियों को दोहराते हैं।

मनु सवाल पूछता है, मछली जवाब देती है। यही इस पुराण की बनावट है। पहला सवाल यह था कि सृष्टि और प्रलय कैसे होते हैं, फिर यह कि ब्रह्मा ने संसार कैसे रचा और उनके चार मुख क्यों हैं। जब मछली ने नृसिंह की महिमा सुनाई, तो मनु ने कहा, मेरा मन भरा नहीं, अब बताइए कि विष्णु की नाभि के कमल में सृष्टि कैसे हुई, और विष्णु कब सोए, कब जागे? जब मछली ने राजा के कर्तव्यों की बात की, तो मनु ने पूछा कि शुभ और अशुभ संकेत क्या हैं। हर बार वह मछली को 'प्रभु' कहता है, और हर बार मछली उसे 'राजा' या 'मनु' कहकर जवाब देती है।

इसी लंबी बातचीत के बीच एक सवाल आया, जो शायद सबसे छोटा है, पर सबसे ज़्यादा आम आदमी का है।

मनु का प्रश्न

मनु ने मछली से पूछा — भगवन्, भाग्य श्रेष्ठ है या अपना यत्न और परिश्रम? मुझे इसमें संदेह है। कृपया मेरा संदेह दूर कीजिए।

मछली ने कहा — पिछले जन्म के कर्मों को दैव, यानी भाग्य कहते हैं। इसलिए समझदार लोग हमेशा अपने यत्न और परिश्रम को श्रेष्ठ मानते हैं। जो आदमी रोज़ शुभ और धर्म के काम करता है, वह अपने बुरे भाग्य को भी अच्छा बना लेता है। जिन्होंने अच्छे कर्म किए हैं और सत्त्वगुण से भरे हैं, उन्हें भी बिना अपने प्रयत्न के मनचाहा फल नहीं मिलता।

उन्होंने कहा — रजोगुण वाले लोगों को उनके यत्न के अनुसार फल मिलता है। यत्न करने से आदमी जो चाहता है, वह पा लेता है। जिन्होंने तमोगुण के काम किए हैं, उन्हें अपनी इच्छा पूरी करने में बहुत कठिनाई होती है। और जो यत्न करने में असमर्थ हैं, वे भाग्य को ही सब कुछ मानते हैं। राजा, यह जान लो कि मनुष्य अपने उत्साह और परिश्रम से ही अपने सब मनचाहे लक्ष्य पाते हैं।

तीन चीज़ें साथ-साथ

मछली ने अपनी बात आगे समझाई। भाग्य अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़कर फल देता है, जबकि यत्न ज़्यादातर वर्तमान में फल देता है। भाग्य, यत्न और समय, तीनों साथ मिलकर ही मनुष्य को फल देते हैं।

उन्होंने कहा — खेती वर्षा से फलती है। और वर्षा एक निश्चित समय पर ही आती है, किसी और तरह नहीं।

जो न हुआ तो भी

इसलिए मनुष्य को धर्म से यत्न करना चाहिए। तब उसे संकट के समय भी ऊँचे फल मिलते हैं। और अगर इस जीवन में फल न मिले, तो वह अगले लोक में अवश्य मिलता है।

जो आलसी हैं, और जो केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं, उन्हें अपना लक्ष्य कभी नहीं मिलता। इसलिए सदा धर्म के मार्ग पर यत्न करना चाहिए। लक्ष्मी उन्हें छोड़ देती हैं जो भाग्य का ही सपना देखते रहते हैं, और उन पर कृपा करती हैं जो यत्न करते हैं। इसलिए हमेशा सक्रिय और सजग रहो।

कथाएँ जो हमने सुनीं

अब पीछे मुड़कर देखें, तो इस पुराण की कथाएँ इसी उत्तर को अलग-अलग रंग में कहती हैं।

मनु ने रक्षा का वर माँगा, और उसकी परीक्षा एक छोटी मछली की दया से हुई। हिरण्यकशिपु के पास वर था, पर वर के पुण्य चुक गए। कच के पास कुछ नहीं था, पर उसने सेवा और धैर्य से संजीवनी पाई। ययाति के पास जवानी लौट आई, पर तृष्णा नहीं बुझी, और अभिमान ने स्वर्ग छीन लिया। हरिकेश को घर से निकाला गया, और उसने तप से गणेश्वर का पद पाया। मय के पास वर था, पर उसके लोग धर्म छोड़ बैठे। बलि को शुक्राचार्य ने रोका, और उसने वचन निभाया। यम को शाप मिला, और उसने तप से न्याय का पद पाया। देवताओं के पास अमृत नहीं था, और उन्होंने मथकर पाया।

कहीं भाग्य ने रास्ता दिखाया और कहीं यत्न ने। पर मछली ने कहा था कि भाग्य, पुरुषार्थ और समय तीनों साथ मिलकर फल देते हैं। यह तुलना हमारी अपनी पढ़त है। अध्याय २२१ में भाग्य, पुरुषार्थ और समय के संबंध की बात आती है, लेकिन पहले की सभी कथाओं को एक साथ जोड़कर देखने का विचार हमारा है।

मछली और मनु

पुराण अपने आपको इसी बातचीत का दोहराव कहता है: मनु ने मछली से जो सीखा, सूत वही ऋषियों को सुनाते हैं, और ऋषि आगे के लोगों को।

टिप्पणी: यह अध्याय मत्स्य पुराण के अध्याय २२१ पर है। नाव पर मनु और मछली की बातचीत वाला ढाँचा अध्याय १–३ और १६४ में दिखता है; मत्स्य और मनु का संवाद इस पुराण का मूल कथात्मक ढाँचा है, जिसके भीतर सूत, शौनक और अन्य पात्रों के संवाद भी आते हैं। इस अनुवाद की प्रति में अध्याय २७४ के आगे का अंश नहीं है, इसलिए पुराण का अंतिम अध्याय यहाँ नहीं पढ़ा गया।

स्रोत: मत्स्य पुराण — एक तालुकदार (अवध) का अंग्रेज़ी अनुवाद, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द हिंदूज़, खंड १७ (१९१६–१७), दैव और पुरुषार्थ

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

मत्स्य पुराण के अनुसार 'दैव' का अर्थ क्या है?

  • ईश्वर की इच्छा
  • ग्रहों की चाल
  • पिछले जन्म के कर्म
  • राजा का आदेश
पूरी कथा पढ़िए — दैव की परिभाषा

मछली ने कहा कि इसीलिए समझदार लोग अपने यत्न को श्रेष्ठ मानते हैं।

बुरे भाग्य वाला भी रोज़ शुभ कर्म करके उसे अच्छा बना सकता है।

यह बात मनु के सवाल के जवाब में आई।

क्या हुआ?

मनु ने मछली से क्या पूछा था?

  • कि भाग्य श्रेष्ठ है या अपना यत्न
  • कि प्रलय कब आएगा
  • कि कौन-सा देवता सबसे बड़ा है
  • कि राजा को क्या करना चाहिए
पूरी कथा पढ़िए — मनु का संदेह

उसने कहा कि इसमें मेरा संदेह है, कृपया दूर कीजिए।

मछली ने बात को काफ़ी विस्तार से खोला।

वह जवाब आम आदमी के लिए भी उतना ही काम का है।

ऐसा क्यों?

मछली ने आलसी और केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहने वालों के बारे में क्या कहा?

  • कि वे सबसे सुखी रहते हैं
  • कि भाग्य उन्हें अपने आप फल देगा
  • कि वे अगले जन्म में राजा बनेंगे
  • कि उन्हें अपना लक्ष्य कभी नहीं मिलता
पूरी कथा पढ़िए — आलस का फल

जो भाग्य का सपना देखते रहते हैं, उनसे लक्ष्मी मुँह फेर लेती हैं।

यत्न करने वालों पर उनकी कृपा होती है।

इसीलिए मछली ने कहा कि हमेशा सक्रिय और सजग रहो।

कौन हूँ मैं?

मैं बिना भाग्य और यत्न के कुछ नहीं बनता, पर इनके साथ मिलकर फल देता हूँ। खेती भी मेरे बिना नहीं फलती। मैं कौन हूँ?

  • वर्षा
  • समय
  • आलस्य
  • दान
पूरी कथा पढ़िए — तीसरा साथी

मछली ने कहा कि वर्षा भी निश्चित समय पर ही आती है।

भाग्य अतीत, वर्तमान और भविष्य के साथ फल देता है।

यत्न अधिकतर वर्तमान में फल देता है।

सही क्रम

हमारी चुनी हुई कथा में मनु और मत्स्य के प्रसंग किस क्रम में सामने आए?

  • प्रलय की चेतावनी → नाव पर चढ़ना → सृष्टि का वृत्तांत → नृसिंह की कथा → भाग्य और यत्न का प्रश्न
  • भाग्य और यत्न का प्रश्न → नृसिंह की कथा → प्रलय की चेतावनी → नाव पर चढ़ना → सृष्टि का वृत्तांत
  • नृसिंह की कथा → प्रलय की चेतावनी → भाग्य और यत्न का प्रश्न → सृष्टि का वृत्तांत → नाव पर चढ़ना
  • नाव पर चढ़ना → भाग्य और यत्न का प्रश्न → प्रलय की चेतावनी → नृसिंह की कथा → सृष्टि का वृत्तांत
पूरी कथा पढ़िए — पुराण की बनावट

पुराण पहले अध्यायों में प्रलय और सृष्टि की कथा कहता है।

नृसिंह की कथा मत्स्य पुराण में बहुत आगे, अध्याय १६१ के आसपास आती है।

भाग्य और यत्न का प्रश्न राजा के कर्तव्यों वाले अध्यायों के बीच अध्याय २२१ में है।

किसने कहा?

'भाग्य, यत्न और समय, तीनों मिलकर ही मनुष्य को फल देते हैं।' — किसने कहा?

  • मनु ने
  • सूत ने
  • शौनक ने
  • मछली ने
पूरी कथा पढ़िए — मछली का उत्तर

यह बात उसने खेती और वर्षा के उदाहरण से समझाई।

पूरे पुराण में हर उत्तर मछली देती है और हर प्रश्न मनु पूछता है।

सूत केवल उसे ऋषियों तक पहुँचाते हैं।

तथ्य

तीन गुणों में से किन लोगों को मछली ने कहा कि वे अपने यत्न के अनुसार फल पाते हैं?

  • सत्त्वगुण वाले
  • रजोगुण वाले
  • तमोगुण वाले
  • तीनों को बराबर
पूरी कथा पढ़िए — तीन गुण

सत्त्व, रज और तम तीनों के लिए मछली का उत्तर अलग था।

पर सबके लिए एक बात साझा थी: यत्न के बिना फल नहीं।

यही निष्कर्ष उसने मनु को राजा कहकर सुनाया।

व्याख्या

हमने इस पुराण की कथाओं में से भाग्य और यत्न का संबंध कैसे पढ़ा? (यह हमारा पाठ है, श्लोक का सीधा अर्थ नहीं।)

  • कि भाग्य कहीं भी काम नहीं करता
  • कि केवल वर पाने से सब कुछ सिद्ध हो जाता है
  • कि वर और भाग्य शुरुआत देते हैं, पर अंत इस पर टिकता है कि आदमी उसके बाद क्या करता है
  • कि यत्न सब कुछ बदल देता है, चाहे समय कैसा भी हो
पूरी कथा पढ़िए — वर के बाद

हिरण्यकशिपु ने वर का उपयोग सताने में किया और हारा।

कच ने सेवा और धैर्य से संजीवनी पाई।

इस पाठ को हमारी एक पढ़त की तरह लीजिए; पुराण यह निष्कर्ष नाम लेकर नहीं देता।

क्या हुआ?

मनु जब मछली से सवाल करता है तो उसे किस नाम से बुलाता है?

  • 'गुरु'
  • 'देव'
  • 'मित्र'
  • 'प्रभु' या 'जनार्दन' जैसे विष्णु के नामों से
पूरी कथा पढ़िए — पहचान के बाद

पहले अध्याय में मनु ने मछली को केशव, हृषीकेश और जगन्नाथ कहकर प्रणाम किया था।

तब से वह विष्णु को मछली के रूप में पहचानता है।

मछली उसे हर बार राजा या मनु कहकर जवाब देती है।

पहेली

मैं पूरे पुराण की बातचीत में प्रश्न पूछता हूँ। मैं सूर्य का बेटा हूँ और नाव का रक्षक रहा। मैं कौन हूँ?

  • वैवस्वत मनु
  • शौनक
  • सूत
  • अर्जुन
पूरी कथा पढ़िए — प्रश्न पूछने वाला राजा

नाव पर बैठे मनु के प्रश्नों से पुराण आगे बढ़ता है।

उसने दया से एक मछली बचाई थी, और उसी ने उसे बचाया।

पुराण के कई अध्याय 'मनु ने पूछा' से शुरू होते हैं।

दैव और पुरुषार्थ के बारे में सवाल

दैव और पुरुषार्थ (मत्स्य पुराण) में क्या होता है?

मनु ने मछली से पूछा कि भाग्य बड़ा है या अपना यत्न — और मछली का उत्तर पूरे पुराण का सार निकला। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: मनु के सवाल; मनु का प्रश्न; तीन चीज़ें साथ-साथ; जो न हुआ तो भी; कथाएँ जो हमने सुनीं; मछली और मनु।

मत्स्य पुराण में दैव और पुरुषार्थ के बाद क्या आता है?

दैव और पुरुषार्थ, मत्स्य पुराण का आख़िरी अध्याय है।

दैव और पुरुषार्थ का स्रोत क्या है?

मत्स्य पुराण, अध्याय १–३, १६४, २२१।