
अध्याय ४
देवयानी: कुएँ से राजमहल तक
जिसे एक राजकन्या ने कुएँ में धकेल दिया — और जिसने बदले में उसी राजकन्या को अपनी दासी बनवाया
देवयानी: कुएँ से राजमहल तक — मत्स्य पुराण का अध्याय ४। स्रोत: मत्स्य पुराण, अध्याय २७–३१। इसमें ८ दृश्य हैं — कपड़ों की अदला-बदली; ताने और कुआँ; शिकार पर आया राजा; शुक्र का समझाना; देवयानी का उत्तर; शुक्र और वृषपर्वा; दासी बनी राजकन्या; ययाति से दोबारा — और अंत में १० सवाल।
कपड़ों की अदला-बदली
कच संजीवनी लेकर स्वर्ग लौटा तो देवताओं ने उसका बड़ा स्वागत किया। उससे वह विद्या सीखकर वे बहुत संतुष्ट हुए। फिर वे इंद्र के पास गए और बोले — आज वीरता दिखाने का दिन है। अपने शत्रुओं को मारो।
इंद्र देवताओं के साथ निकले। रास्ते में जंगल में उन्हें कन्याओं का एक झुंड दिखा, जो जल में खेल रही थीं, ठीक वैसे ही जैसे कुबेर के उद्यान में अप्सराएँ खेलती हैं। इंद्र ने हवा का रूप लिया और उनके कपड़े उड़ाकर आपस में मिला दिए।
कन्याएँ जल्दी से बाहर निकलीं और जिसके हाथ जो कपड़ा आया, वही पहन लिया। इस हड़बड़ी में असुरराज वृषपर्वा की बेटी शर्मिष्ठा ने भूल से देवयानी के कपड़े पहन लिए।
और बात बिगड़ गई।
ताने और कुआँ
देवयानी ग़ुस्से से बोली — हे असुर की बेटी, तू मेरे पिता की शिष्या है। तेरी हिम्मत कैसे हुई कि तूने मेरे कपड़े पहन लिए? तेरा भला कभी नहीं होगा, तुझे सदाचार का नियम तक नहीं पता।
शर्मिष्ठा ने जवाब दिया — तेरे पिता तो रोज़ मेरे पिता की स्तुति करते हैं, उनके सामने नीचे बैठते हैं, उनसे माँगते हैं। मेरे पिता सिंहासन पर बैठते हैं और देते हैं, किसी से कुछ लेते नहीं। तू उस आदमी की बेटी है जो हाथ फैलाता है। मैं राजा की बेटी हूँ। तेरी मुझे कौड़ी की परवाह नहीं। तू मेरे हथियार के सामने बोलने की हिम्मत कैसे करती है?
और कहते-कहते शर्मिष्ठा ने चौंकी हुई देवयानी को कुएँ में धकेल दिया। फिर यह सोचकर कि वह मर गई होगी, वह अपने महल लौट गई।
शिकार पर आया राजा
उसी समय राजा ययाति, नहुष का बेटा, शिकार करते-करते उसी जंगल में पहुँचे। उन्हें प्यास लगी थी और वे पानी की खोज में थे। उन्होंने कुएँ में झाँका तो भीतर आग की लौ जैसी कोई कन्या दिखाई दी।
उन्होंने उसे ढाढ़स बँधाया और पूछा — हे सुंदरी, तुम किसकी बेटी हो? तुम घास से ढके इस कुएँ में कैसे गिरीं? सब बताओ।
देवयानी ने कहा — मैं शुक्र की बेटी हूँ, जो अपनी विद्या से देवताओं के हाथों मारे गए दैत्यों को जिला देते हैं। आप मुझे अभी नहीं जानते। लीजिए, मेरा यह दाहिना हाथ, इसकी उँगलियाँ अँगूठियों से सजी हैं। इसे पकड़कर मुझे इस कुएँ से निकालिए। मैं जानती हूँ कि आप संयमी, बलवान और यशस्वी हैं। मुझे इस कुएँ से निकालना आपके योग्य काम है।
ययाति ने जाना कि वह ब्राह्मण की बेटी है, इसलिए उन्होंने उसका दाहिना हाथ पकड़कर उसे कुएँ से बाहर खींचा। फिर देवयानी को प्रणाम करके वे अपनी राजधानी लौट गए।
शुक्र का समझाना
देवयानी रोती हुई जंगल में बैठी रही। उसकी दासी घूर्णिका उसे ढूँढ़ती हुई आई। देवयानी ने उससे कहा, जाकर पिताजी को सब बता दो और कह दो कि मैंने मन बना लिया है, अब मैं वृषपर्वा की नगरी में पाँव नहीं रखूँगी।
घूर्णिका काँपती हुई असुर के महल पहुँची और शुक्र से बोली — महाराज, वृषपर्वा की बेटी शर्मिष्ठा ने देवयानी को चोट पहुँचाई है।
शुक्र बेटी के दुख से भर उठे और उसे ढूँढ़ने जंगल निकल पड़े। उसे देखते ही उन्होंने बाँहें फैलाकर गले लगाया और बोले — हर प्राणी को अपने कर्म का सुख-दुख मिलता है। मुझे लगता है शर्मिष्ठा ने तुझसे अपने किसी पुराने काम का बदला लिया है।
देवयानी ने कहा — बदला हो या न हो, सुनिए शर्मिष्ठा ने क्या कहा। उसने कहा कि मैं दैत्यों के महल की गायिका हूँ। उसने कहा कि तुम स्तुति करने वाले और भीख माँगने वाले की बेटी हो, और मैं उस राजा की बेटी हूँ जिसकी स्तुति तुम्हारे पिता करते हैं और जिससे तुम्हारे पिता दान लेते हैं। उसकी आँखें ग़ुस्से से लाल थीं और चेहरा अहंकार से तमतमाया था। मैंने शर्मिष्ठा से कहा था कि अगर मैं स्तुति करने वाले और भीख माँगने वाले की बेटी हूँ, तो मैं भी वैसे ही उसे प्रसन्न करने की कोशिश करूँगी।
शुक्र ने कहा — बेटी, तू न किसी स्तुति करने वाले की बेटी है, न भिखारी की। तू उसकी बेटी है जिसकी स्तुति सब करते हैं। वृषपर्वा जानता है कि मेरी शक्ति मेरी तपस्या है, और इंद्र और ययाति भी जानते हैं।
फिर उन्होंने समझाया — देवयानी, जो दूसरे की कड़वी बात शांति से सह लेता है, वह सब कुछ जीत लेता है। जो अपने उठते क्रोध को घोड़े की तरह रोक लेता है, उसी को समझदार लोग सच्चा सारथी कहते हैं। जो क्रोध को वैसे ही उतार फेंकता है जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुली, वही सच्चा पुरुष है। जो हर महीने सैकड़ों बरस अश्वमेध करे और जो किसी पर क्रोध न करे, इन दोनों में दूसरा बड़ा है।
देवयानी का उत्तर
देवयानी ने पिता की बात सुनी, पर नहीं मानी। उसने कहा — पिताजी, मैं जानती हूँ कि कारण, परिणाम और बल-निर्बलता पर सोचकर चलना चाहिए। पर मैंने बचपन से यह भी जाना है कि जो लोग चरित्र से ऊँचे हैं, उनके बीच रहना उचित है, और जिनके मन पर पाप का बोझ है, उनके बीच नहीं रहना चाहिए। वृषपर्वा की बेटी की बातें मेरे मन में अरणी की लकड़ी की तरह रगड़ रही हैं। मुझे जीने की कोई इच्छा नहीं। जो भलाई चाहता है, उसे ऐसे नीच लोगों के बीच नहीं रहना चाहिए। दुश्मन चाहे कितना ही वैभवशाली हो, उससे बड़ा नीच कुछ नहीं जो अपने ही शत्रु के सामने गिरा हुआ बैठा है।
शुक्र और वृषपर्वा
तब शुक्र, सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मण, वृषपर्वा के पास गए, जो अपने सिंहासन पर बैठा था। उन्होंने बिना परिणाम की परवाह किए उससे कहा —
राजा, पाप का फल तुरंत नहीं मिलता, जैसे गाय गर्भ धरते ही बछड़ा नहीं देती। पर वह फलता ज़रूर है, जैसे भारी भोजन पेट में कुछ देर बाद दर्द करता है। तुमने अंगिरा के पोते और बृहस्पति के बेटे कच को मारा, उसके अवशेष शराब में मिलाकर मेरे पेट में डलवाए। मेरा शिष्य निर्दोष, पवित्र, विनम्र और वध के अयोग्य था। उसके मारे जाने का और मेरी बेटी को चोट पहुँचाने का, दोनों का फल तुम्हें मिलेगा। मैं आज तुम्हें और तुम्हारे कुटुंब को छोड़ता हूँ। तुम अपनी घमंडी, दुराचारी बेटी को रोकते नहीं हो, इसलिए आज से मैं तुम्हें ऐसा दैत्य मानूँगा जो बातें बहुत करता है पर वचन नहीं निभाता।
वृषपर्वा ने कहा — भार्गव, मैं आपको झूठा नहीं मानता। आपके सत्य और तप को जानता हूँ। प्रसन्न हो जाइए। आपके सिवा मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं। आप आज मुझे छोड़कर गए, तो मैं समुद्र में डूब मरूँगा।
शुक्र ने कहा — डूबो या दुनिया में भटको। मेरी बेटी मुझे बहुत प्यारी है और मैं उसे दुखी नहीं देख सकता। तुम देवयानी को प्रसन्न करो। वह जहाँ जाएगी, मैं वहीं बस जाऊँगा। उसे प्रसन्न करोगे, तो मैं तुम्हारी वैसे ही रक्षा करूँगा जैसे बृहस्पति इंद्र की करते हैं।
वृषपर्वा ने कहा — भार्गव, हाथी, रथ, घोड़े और असुरों का सारा वैभव आपका है। और मेरा सब कुछ भी।
शुक्र ने कहा — तब मैं अपने को दैत्यों का स्वामी मानूँगा, जब देवयानी प्रसन्न हो जाए।
दासी बनी राजकन्या
शुक्र देवयानी के पास वृषपर्वा के साथ गए और बोले — आज तुम्हारी बात सच हुई, मुझे सबका स्वामी माना गया है।
देवयानी ने कहा — पिताजी, अगर आप राजा के धन के स्वामी हैं, तो मैं तब मानूँगी जब राजा ख़ुद मुझसे कहें।
वृषपर्वा ने कहा — देवयानी, तुम जो चाहोगी, चाहे कितना ही कठिन हो, मैं पूरा करूँगा।
देवयानी ने कहा — तब मैं चाहती हूँ कि शर्मिष्ठा हज़ार दासियों के साथ मेरी दासी बने। और जहाँ मेरे पिता मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाए।
वृषपर्वा ने धाय से कहा — जाओ, शर्मिष्ठा को मेरे सामने लाओ। देवयानी जो चाहती है, मैं वही करूँगा।
धाय ने शर्मिष्ठा से जाकर कहा — उठो और अपने स्वजनों को विपत्ति से बचाओ। तुम्हारे कारण शुक्र अपने शिष्यों को छोड़ने जा रहे हैं, और देवयानी की इच्छा पूरी करना तुम्हारे हाथ है। तुम उसकी दासी हो गई हो।
शर्मिष्ठा ने कहा — जो वह चाहती है, मैं करूँगी। शुक्र ग़ुस्से में चले न जाएँ, और देवयानी को मेरे किए का बुरा न लगे।
पिता के आदेश पर शर्मिष्ठा हज़ार दासियों के साथ पालकी में देवयानी के पास पहुँची और बोली — देवयानी, मैं हज़ार दासियों के साथ तुम्हारी सेवा करने आई हूँ। जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हारा विवाह करेंगे, मैं तुम्हारे साथ जाऊँगी।
देवयानी ने कहा — मैं तो स्तुति करने वाले, भीख माँगने वाले की बेटी हूँ। तुम उसकी बेटी होकर, जिसकी स्तुति होती है, मेरी दासी कैसे बन रही हो?
शर्मिष्ठा ने कहा — अपने दुखी स्वजनों को सुख पहुँचाना मेरा कर्तव्य है। इसीलिए मैं तुम्हारी दासी बनूँगी और तुम्हारे साथ जाऊँगी, जहाँ भी तुम्हारे पिता तुम्हें ब्याहें।
तब देवयानी ने पिता से कहा — पिताजी, अब आपकी विद्या सफल और अचूक सिद्ध हुई। मैं नगर में प्रवेश करूँगी। शुक्र उसके साथ प्रसन्न होकर नगर में गए।
ययाति से दोबारा
कुछ दिन बाद देवयानी फिर उसी जंगल में गई, शर्मिष्ठा और दो हज़ार दासियों के साथ। वहाँ ययाति भी शिकार पर आए थे। उन्होंने देखा कि दो सुंदरियों को हज़ारों स्त्रियाँ घेरे हुए हैं। उन्होंने पूछा — आप दोनों कौन हैं?
देवयानी ने कहा — राजा, मैं असुरों के गुरु शुक्र की बेटी हूँ, और यह मेरी मुख्य दासी शर्मिष्ठा है, असुरराज वृषपर्वा की बेटी। जहाँ मैं जाती हूँ, यह मेरे साथ जाती है।
ययाति चकित रह गए कि असुर-राज की बेटी दासी कैसे बनी। देवयानी ने कहा, यह सब ब्रह्मा का विधान है। फिर उसने ययाति से उनका नाम और कुल पूछा।
ययाति ने कहा — मैंने ब्रह्मचर्य में सारे वेद पढ़े हैं। मैं राजा नहुष का बेटा ययाति हूँ। मैं शिकार करता हुआ प्यास बुझाने इधर आया हूँ। आप जो आज्ञा दें, मैं सुनने को तैयार हूँ।
देवयानी ने कहा — मित्र, मैं शर्मिष्ठा और अपनी दासियों समेत आपकी सेवा में हूँ। आप मेरे स्वामी बनिए।
ययाति ने कहा — आप ब्राह्मण शुक्र की बेटी हैं, और मैं क्षत्रिय हूँ। ब्राह्मण का क्रोध साँप के विष और जलती आग से भी ज़्यादा भयंकर होता है। साँप के काटने से या हथियार की चोट से एक का प्राण जाता है, पर ब्राह्मण के क्रोध से पूरा देश उजड़ जाता है। इसलिए मैं आपके पिता की अनुमति के बिना आपको स्वीकार नहीं कर सकता।
देवयानी ने कहा — राजा, जब मेरे पिता मुझे आपको अपनी इच्छा से दे देंगे, तब आप मुझे स्वीकार कर लेंगे। और मैंने आपको अपना पति मान लिया है, क्योंकि आपने कुएँ में मेरा हाथ पकड़ा था। अब माँगने की बात ही नहीं।
धाय ने जाकर शुक्र को सब बता दिया। शुक्र राजा के पास पहुँचे। ययाति ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया, और शुक्र ने उनसे मधुर वाणी में बात की। देवयानी ने पिता से कहा कि इन्हीं राजा ने कुएँ में मेरा हाथ पकड़ा था, और मैं इनके सिवा किसी से विवाह नहीं करूँगी। शुक्र ने ययाति से कहा — मेरी बेटी ने तुम्हें अपना पति चुना है। इसे अपनी पटरानी के रूप में स्वीकार करो। ययाति ने पूछा कि इस विवाह से कहीं उन्हें वर्ण-संबंधी अधर्म का दोष तो नहीं लगेगा। शुक्र ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे उन्हें इस दोष से मुक्त करते हैं। उन्होंने देवयानी को धर्मपूर्वक पत्नी बनाने की अनुमति दी और कहा कि शर्मिष्ठा का सम्मान करना, लेकिन उसे कभी अपनी शय्या पर न बुलाना। इस तरह शुक्र की अनुमति से देवयानी और ययाति का विवाह हुआ।
ययाति देवयानी को लेकर इंद्र की नगरी जैसी अपनी राजधानी पहुँचे और रानी की सलाह से शर्मिष्ठा को हज़ार दासियों के साथ अशोकवन में अलग घर में रखा, कपड़े, भोजन और गहने देकर।
बहुत बरसों तक राजा ययाति ने देवयानी के साथ देवताओं जैसा सुख भोगा। समय आने पर देवयानी ने गर्भ धारण किया, और दस महीने बाद एक पुत्र को जन्म दिया।
टिप्पणी: यह अध्याय मत्स्य पुराण के अध्याय २७ से ३१ के आरंभ तक पर है। शुक्र के ययाति को देवयानी सौंपने का अंश अंग्रेज़ी अनुवाद में अधूरा छपा है; उसे संस्कृत पाठ (३०.३०–३७) से मिलाया गया है। शर्मिष्ठा से जुड़ा आगे का प्रसंग इस महाकथा में नहीं लिया गया।
स्रोत: मत्स्य पुराण — एक तालुकदार (अवध) का अंग्रेज़ी अनुवाद, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द हिंदूज़, खंड १७ (१९१६–१७), देवयानी: कुएँ से राजमहल तक