हरिकेश यक्ष — मत्स्य पुराण, चित्र

अध्याय ७

हरिकेश यक्ष

जिस यक्ष के पिता ने उसे घर से निकाल दिया — और जो काशी में हड्डियों का ढाँचा बनकर शिव के गणों का राजा बना

हरिकेश यक्ष — मत्स्य पुराण का अध्याय ७। स्रोत: मत्स्य पुराण, अध्याय १८०। इसमें ५ दृश्य हैं — शिव का पुजारी यक्ष; पिता की डाँट; काशी में तप; वन में पार्वती और शिव; यक्ष का वरदान — और अंत में १० सवाल।

शिव का पुजारी यक्ष

अब पुराण एक और प्रसंग की ओर मुड़ता है, काशी की ओर।

ऋषियों ने सूत से पूछा — हमने अंधक के वध की कथा सुनी। अब हम काशी की महिमा जानना चाहते हैं। और यह भी कि पिंगल गणेश्वर कैसे बने, काशी में सबको अन्न देने वाले कैसे हुए, क्षेत्रपाल कैसे बने?

सूत ने कहा — पूर्णभद्र नाम का एक यक्ष था। उसका बेटा था हरिकेश। वह धर्मात्मा था और सुंदर था। पर जन्म से ही वह शिव का भक्त था। उठते-बैठते, चलते-सोते, खाते-पीते, हर पल उसका मन शिव में रहता था। वह शिव को प्रणाम करता था और मन में उन्हीं को रखता था।

पिता की डाँट

हरिकेश के पिता पूर्णभद्र को यह बात अच्छी नहीं लगती थी। उन्होंने बेटे से कहा — मैं तुम्हें अपना बेटा नहीं मानता। तुम्हारा जन्म दुर्भाग्य है। यक्ष के कुल में यह जीवन ठीक नहीं। हम गुह्यक हैं, स्वभाव से उग्र और कठोर। हम शिकार करते हैं, मांस खाते हैं। ब्रह्मा ने हमें यह जीवन नहीं सौंपा कि हम तुम्हारी तरह रहें। अपना रास्ता छोड़कर दूसरे का रास्ता पकड़ना ठीक नहीं। तुम यह मनुष्यों वाली भावना छोड़ो और अपने कुल का रास्ता पकड़ो, नहीं तो मैं समझूँगा कि तुम मनुष्यों की संतान हो।

हरिकेश चुप रहा। तब पूर्णभद्र तेज़ी से बाहर गए और बेटे से कहा कि घर छोड़कर जहाँ मन चाहे चला जा।

काशी में तप

पिता के कहने पर हरिकेश ने घर और रिश्तेदार छोड़ दिए और काशी चला गया। वहाँ उसने कठोर तप किया। उसकी पलकें नहीं गिरती थीं, इंद्रियाँ वश में थीं और वह सूखी लकड़ी या पत्थर की तरह निश्चल खड़ा रहा।

एक हज़ार दिव्य वर्ष तक वह ऐसे ही खड़ा रहा। उसके चारों ओर दीमकों की बाँबियाँ उग आईं। चींटियाँ और कीड़े उसे खाने लगे। धीरे-धीरे उसका सारा मांस और ख़ून चला गया। वह शिव का भक्त केवल हड्डियों का ढाँचा बनकर शंख की तरह चमकने लगा।

वन में पार्वती और शिव

उन्हीं दिनों पार्वती ने शिव से कहा — प्रभु, मैं वन, उद्यान और लतामंडप देखना चाहती हूँ, और काशी की महिमा भी सुनना चाहती हूँ। काशी आपको सबसे प्रिय है, उसका फल अवश्य बहुत श्रेष्ठ होगा।

शिव पार्वती को काशी से बाहर घुमाने ले गए। उन्होंने कहा — देखो प्रिये, कितना सुंदर उद्यान है। यह वन फूलों की क्यारियों से मुस्करा रहा है। कहीं कोयलें गा रही हैं, कहीं मोर नाच रहे हैं, कहीं हिरन भाग रहे हैं, कहीं कमल खिले हैं और भौंरे गूँज रहे हैं। कहीं विद्याधर, सिद्ध और चारण गा रहे हैं, कहीं अप्सराएँ नाच रही हैं। कहीं अशोक, आम, पुन्नाग और कदंब के पेड़ फूलों से लदे हैं।

पार्वती ने कहा — देव, आपने वन की शोभा दिखाई। अब मुझे काशी की, इस अविमुक्त क्षेत्र की महिमा सुनाइए। उसे सुनकर भी मेरा मन नहीं भरता।

शिव ने कहा — यह काशी मेरा सबसे प्रिय स्थान है। यह सबको मोक्ष देने वाला है। यह सब रहस्यों में सबसे गुप्त है। यहाँ मेरे भक्त बसते हैं। यहाँ सिद्ध हैं, और भाँति-भाँति के चिह्न धारण करने वाले साधु हैं जो योग साधते हैं। मैं इस सुंदर, कमलों से भरे, गंधर्वों और अप्सराओं से सेवित स्थान में क्यों रहता हूँ, यह मैं तुम्हें बताता हूँ। जो भक्त मुझ पर ध्यान लगाकर अपने सब कर्म मुझे अर्पित करता है, वह यहाँ ऐसा मोक्ष पा जाता है जो और कहीं नहीं मिलता।

उन्होंने कहा — मैं इस क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ता, और कभी नहीं छोड़ूँगा। इसीलिए इसका नाम अविमुक्त क्षेत्र है।

शिव ने कहा कि नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, गंगाद्वार और पुष्कर में स्नान करके भी जो फल नहीं मिलता, वह यहाँ मिल जाता है। प्रयाग में भी मोक्ष है, पर काशी को उससे भी ऊपर माना गया है। उन्होंने जैगीषव्य ऋषि का नाम लिया, जिन्हें यहीं सबसे ऊँची सिद्धि मिली। उन्होंने कहा कि कुबेर मेरे सेवक जैसे हो गए, और आगे संवर्तन, महर्षि वेदव्यास और राजा अलर्क भी यहाँ आएँगे। जो यहाँ मरते हैं, उन्हें इस संसार में फिर नहीं लौटना पड़ता। जो मनुष्य हज़ारों जन्म योग करके पाता है, वह यहाँ केवल मरने से पा जाता है।

यक्ष का वरदान

फिर शिव ने पार्वती से उस यक्ष की बात कही। उन्होंने कहा — यह मेरा भक्त अब पाप-रहित है, इसे मुझसे वर मिलेगा। और वे पार्वती के साथ उस स्थान पर गए जहाँ वह यक्ष तप कर रहा था।

पार्वती ने उसका शरीर देखा, जिसमें केवल सफ़ेद चमकती हड्डियाँ शेष रह गई थीं। उन्होंने शिव से कहा — देवता सच कहते हैं कि आप बड़े कठोर हैं, आप ऐसे भक्त को भी वर नहीं देते। ऐसे पवित्र स्थान में इस यक्ष-पुत्र को यह कष्ट उठाना उचित नहीं। उसे जल्दी वर दीजिए। मनु जैसे ऋषियों ने कहा है कि शिव से कल्याण मिलता है, चाहे वे प्रसन्न हों या अप्रसन्न।

तब शिव उस यक्ष के पास गए। यक्ष ने उन्हें प्रणाम किया। शिव ने उसे दिव्य दृष्टि दी, जिससे उसने शिव और उनके सारे गणों को देखा और बहुत प्रसन्न हुआ। शिव ने कहा — मैं तुम्हें वर देता हूँ। तुम तीनों लोक देखोगे और तुम्हारा शरीर मेरे जैसा हो जाएगा। मुझे देखो और दुख-चिंता से मुक्त हो जाओ।

यक्ष ने शिव के चरणों में सिर रखकर कहा — मुझ पर दया कीजिए। शिव ने कहा — मैंने तुम्हें वर दे दिया।

यक्ष ने फिर कहा — मुझे ऐसा वर दीजिए कि आप में मेरी भक्ति कभी न डिगे, मैं सदा के लिए गणों का स्वामी कहलाऊँ और संसार को अन्न देने वाला बनूँ। और आपका यह अविमुक्त तीर्थ हमेशा मेरी आँखों के सामने रहे।

शिव ने कहा — यक्ष, तुम बुढ़ापे, रोग और मृत्यु के कष्टों से मुक्त हो जाओ। तुम गणपति बनोगे, गणों के स्वामी, धन के दाता, सबके पूजनीय और अजेय। तुम सबको अन्न देने वाले होगे। तुम क्षेत्रपाल होगे और सब योगशक्तियाँ तुम्हें प्राप्त होंगी। तुम बड़े पराक्रमी, धर्मात्मा, ब्रह्म को जानने वाले, मुझे प्रिय, तीन नेत्रों वाले और गदा धारण करने वाले होगे। उद्भ्रम और संभ्रम तुम्हारे सेवक होंगे, और वे तुम्हारी आज्ञा सदा मानेंगे।

इस तरह महादेव ने उस यक्ष को गणेश्वर बनाया और उसके साथ लौट गए।

टिप्पणी: यह अध्याय मत्स्य पुराण के अध्याय १८० पर है। इसी के आगे के अध्यायों में काशी और अविमुक्त की महिमा विस्तार से है, पर वे महिमा के अध्याय हैं, कथा के नहीं, इसलिए यहाँ नहीं लिए गए।

स्रोत: मत्स्य पुराण — एक तालुकदार (अवध) का अंग्रेज़ी अनुवाद, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द हिंदूज़, खंड १७ (१९१६–१७), हरिकेश यक्ष

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

हरिकेश के पिता कौन थे?

  • कुबेर
  • मणिभद्र
  • पूर्णभद्र
  • नंदी
पूरी कथा पढ़िए — यक्ष का बेटा

पूर्णभद्र ने बेटे को घर से निकाल दिया।

पुराण में हरिकेश को धर्मात्मा और सुंदर कहा गया है।

वह जन्म से ही शिव में लीन रहता था।

क्या हुआ?

घर से निकाले जाने के बाद हरिकेश कहाँ गया?

  • काशी
  • कैलास
  • नैमिषारण्य
  • प्रयाग
पूरी कथा पढ़िए — काशी का तप

वह एक हज़ार दिव्य वर्ष तक निश्चल खड़ा रहा।

उसके चारों ओर दीमकों की बाँबियाँ बन गईं।

उसकी हड्डियाँ शंख की तरह चमकने लगीं।

ऐसा क्यों?

पूर्णभद्र ने हरिकेश को क्यों निकाल दिया?

  • क्योंकि हरिकेश ने चोरी की थी
  • क्योंकि वह राजा बनना चाहता था
  • क्योंकि वह अपने भाइयों से झगड़ता था
  • क्योंकि वह यक्षों के उग्र, शिकारी स्वभाव को छोड़कर शिव-भक्ति और कोमलता में डूबा था
पूरी कथा पढ़िए — अलग रास्ता

पिता ने कहा कि अपना रास्ता छोड़कर दूसरे का रास्ता पकड़ना ठीक नहीं।

उन्होंने यहाँ तक कहा कि तुम्हारा स्वभाव मनुष्यों जैसा है।

हरिकेश ने जवाब नहीं दिया, चुपचाप घर छोड़ दिया।

कौन हूँ मैं?

मैं शिव की पत्नी हूँ। मैंने उनसे वन देखने और काशी की महिमा सुनने की इच्छा की, और बाद में कहा कि इस यक्ष को जल्दी वर दीजिए। मैं कौन हूँ?

  • गंगा
  • पार्वती
  • अरुंधती
  • सरस्वती
पूरी कथा पढ़िए — दया की सिफ़ारिश

पार्वती ने यक्ष की हड्डियाँ देखकर शिव से कहा कि ऐसे भक्त को कष्ट नहीं देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आप बड़े कठोर हैं।

यही बात शिव को यक्ष के पास ले गई।

सही क्रम

इस कथा की घटनाओं को सही क्रम में चुनिए।

  • पिता का निकालना → काशी में तप → पार्वती-शिव का उद्यान में आना → काशी की महिमा → यक्ष को दिव्य दृष्टि → गणेश्वर का वर
  • काशी में तप → पिता का निकालना → काशी की महिमा → गणेश्वर का वर → यक्ष को दिव्य दृष्टि → पार्वती-शिव का उद्यान में आना
  • गणेश्वर का वर → काशी में तप → पिता का निकालना → यक्ष को दिव्य दृष्टि → काशी की महिमा
  • काशी की महिमा → पिता का निकालना → यक्ष को दिव्य दृष्टि → काशी में तप → गणेश्वर का वर
पूरी कथा पढ़िए — घर से गणेश्वर तक

घर छूटने के बाद ही तप हुआ।

पार्वती के आग्रह के बाद ही शिव यक्ष के पास गए।

दिव्य दृष्टि के बाद ही हरिकेश ने अपना वर माँगा।

किसने कहा?

'मैं इस क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ता, और कभी नहीं छोड़ूँगा। इसीलिए इसका नाम अविमुक्त है।' — किसने कहा?

  • पार्वती ने
  • पूर्णभद्र ने
  • हरिकेश ने
  • शिव ने
पूरी कथा पढ़िए — अविमुक्त का अर्थ

अविमुक्त यानी जिसे कभी छोड़ा नहीं जाता।

शिव ने कहा कि यहाँ मरने वाला संसार में फिर नहीं लौटता।

उन्होंने प्रयाग से भी काशी को ऊपर माना।

तथ्य

हरिकेश ने काशी में कितने वर्ष तप किया?

  • सौ मानव वर्ष
  • एक हज़ार दिव्य वर्ष
  • दस हज़ार वर्ष
  • सात दिन
पूरी कथा पढ़िए — दिव्य वर्ष

दिव्य वर्ष देवताओं के वर्ष हैं, जो मनुष्यों के वर्षों से बहुत लंबे होते हैं।

तप के दौरान उसके चारों ओर बाँबियाँ उग आईं।

अंत में केवल हड्डियाँ ही बची थीं।

व्याख्या

इस कथा से हम क्या पढ़ सकते हैं? (यह हमारा पाठ है, श्लोक का सीधा अर्थ नहीं।)

  • कि भक्त को अपने कुल की परंपरा हमेशा माननी चाहिए
  • कि शिव केवल यक्षों पर कृपा करते हैं
  • कि जिसे घर से ठुकरा दिया गया, उसने अपने रास्ते पर टिके रहकर वह पद पाया जो घर में कभी नहीं मिलता
  • कि तप का अर्थ केवल शरीर को सुखाना है
पूरी कथा पढ़िए — ठुकराया हुआ, पर टिका हुआ

हरिकेश ने पिता से बहस नहीं की, चुपचाप चला गया।

उसे जो पद मिला, वह यक्षों के कुल से कहीं बड़ा था।

इस पाठ को हमारी एक पढ़त की तरह लीजिए; पुराण यह निष्कर्ष नाम लेकर नहीं देता।

क्या हुआ?

दिव्य दृष्टि पाने के बाद हरिकेश ने शिव से क्या वर माँगा?

  • राजपाट और धन
  • सदा के लिए अमर शरीर
  • अपने पिता का सम्मान
  • कि शिव में उसकी भक्ति कभी न डिगे, वह सदा गणपति और संसार को अन्न देने वाला कहलाए, और अविमुक्त तीर्थ हमेशा उसकी आँखों के सामने रहे
पूरी कथा पढ़िए — तीन माँगें

शिव ने उसे गणपति, धन का दाता, क्षेत्रपाल और अजेय होने का वर दिया।

उसके सेवक उद्भ्रम और संभ्रम बने।

शिव ने कहा कि वह तीन नेत्रों वाला और गदा धारण करने वाला होगा।

पहेली

मैं एक यक्ष का बेटा हूँ। मेरे पिता ने मुझे घर से निकाल दिया था। मैंने काशी में तप किया और शिव ने मुझे गणों का स्वामी बनाया। मैं कौन हूँ?

  • हरिकेश
  • पूर्णभद्र
  • नंदी
  • कुबेर
पूरी कथा पढ़िए — पिंगल

पुराण में उसी को पिंगल भी कहा गया है, जो काशी का क्षेत्रपाल बना।

शिव ने उसे अन्न देने वाला गणेश्वर बनाया।

पूर्णभद्र का वही बेटा अब शिव के गणों का स्वामी था।

हरिकेश यक्ष के बारे में सवाल

हरिकेश यक्ष (मत्स्य पुराण) में क्या होता है?

जिस यक्ष के पिता ने उसे घर से निकाल दिया — और जो काशी में हड्डियों का ढाँचा बनकर शिव के गणों का राजा बना। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: शिव का पुजारी यक्ष; पिता की डाँट; काशी में तप; वन में पार्वती और शिव; यक्ष का वरदान।

मत्स्य पुराण में हरिकेश यक्ष के बाद क्या आता है?

आगे त्रिपुर: तीन नगर और एक बाण: आकाश में तैरते तीन नगर, जिन्हें सिर्फ़ एक बाण गिरा सकता था — और वह बाण छोड़कर शिव रो पड़े।

हरिकेश यक्ष का स्रोत क्या है?

मत्स्य पुराण, अध्याय १८०।