कच और देवयानी — मत्स्य पुराण, चित्र

अध्याय ३

कच और देवयानी

गुरु के पेट के भीतर से जिसने संजीवनी सीखी — और जिससे गुरु की बेटी ने कहा, मुझे छोड़कर मत जाओ

कच और देवयानी — मत्स्य पुराण का अध्याय ३। स्रोत: मत्स्य पुराण, अध्याय २५–२६। इसमें ६ दृश्य हैं — दो गुरु, एक लड़ाई; कच जाता है; दो बार; गुरु का पेट; देवयानी का प्रस्ताव; दो शाप — और अंत में १० सवाल।

दो गुरु, एक लड़ाई

सूत ने ऋषियों से कहा कि यह कथा राजा शतानीक ने शौनक से पूछी थी। शतानीक अपने पूर्वज ययाति के बारे में जानना चाहते थे, कि ययाति ने शुक्र की बेटी से कैसे विवाह किया। शौनक ने कहा, पहले वह बात सुनो जो इससे पहले हुई थी।

एक बार देवताओं और असुरों में तीनों लोकों के राज के लिए ठन गई। देवताओं ने बृहस्पति को अपना पुरोहित बनाया और असुरों ने शुक्र को। बृहस्पति और शुक्र एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं देख सकते थे।

और शुक्र के पास एक विद्या थी जो बृहस्पति के पास नहीं थी: संजीवनी। देवता जिन असुरों को युद्ध में मारते, शुक्र उन्हें फिर जीवित कर देते, और वे लौटकर फिर लड़ने लगते। असुर देवताओं को मारते तो बृहस्पति वैसा नहीं कर पाते। देवता बहुत घबरा गए।

कच जाता है

तब देवता बृहस्पति के बेटे कच के पास गए। उन्होंने कहा — कच, हम तुम्हारी शरण में हैं। किसी तरह शुक्र से संजीवनी विद्या ले आओ। उसके बदले तुम्हें भी यज्ञों में हमारे साथ हिस्सा मिलेगा।

उन्होंने बताया कि शुक्र वृषपर्वा के दरबार में रहते हैं, जो असुरों की रक्षा करता है, देवताओं की नहीं। और यह भी कि शुक्र की बेटी देवयानी है। उसे प्रसन्न करना, चतुराई से और मीठे व्यवहार से, तभी बात बनेगी। कोई और यह नहीं कर सकता।

कच देवताओं से पूजित होकर सीधे शुक्र के पास गया। उसने प्रणाम किया और कहा — गुरुदेव, मैं अंगिरा का पोता और बृहस्पति का बेटा कच हूँ। मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। मैं एक आदर्श शिष्य का जीवन जिऊँगा, हज़ारों बरस आपके पास रहूँगा।

शुक्र ने कहा — कच, स्वागत है। तुम्हारे शब्द भी योग्य हैं और तुम भी, और बृहस्पति भी हमारे लिए आदर के योग्य हैं।

कच ने शुक्र की हर आज्ञा मानी, समय पर व्रत रखे, गुरु और देवयानी की सेवा की। देवयानी तब युवा हो चुकी थी। कच ने गाकर, नाचकर, वाद्य बजाकर, फूल और भेंट देकर उसे प्रसन्न किया। देवयानी भी उस पवित्र ब्राह्मण का पूरा ध्यान रखती थी।

इस तरह पाँच सौ बरस बीत गए।

दो बार

असुर जान गए कि कच कौन है। उन्हें बृहस्पति से द्वेष था। एक दिन जब कच जंगल में गायें चरा रहा था, उन्होंने उसे अकेले में पकड़कर मार डाला और उसके शरीर को जंगली जानवरों को डाल दिया। गायें बिना ग्वाले के घर लौटीं।

देवयानी ने देखा कि गायें अकेली लौटी हैं। उसने पिता से कहा — पिताजी, आपका अग्निहोत्र पूरा हो चुका, सूरज डूब गया, गायें बिना ग्वाले के आ गईं और कच कहीं नहीं दिखता। या तो उसे मार डाला गया है या पकड़ लिया गया है। सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जी नहीं सकती।

शुक्र ने कहा — अभी बुलाता हूँ। और अपनी संजीवनी से उन्होंने कच को जिला दिया। कच दौड़ता हुआ आया, दूर से ही गुरु को प्रणाम किया और सब बता दिया।

एक और दिन कच देवयानी के लिए फूल लाने वेद पढ़ता हुआ जंगल गया। असुरों ने उसे फिर देख लिया। इस बार उन्होंने उसे कूटकर चूर किया और उसके अवशेष शराब में मिलाकर शुक्र को पिला दिए।

देवयानी ने फिर पिता से कहा, मैंने उसे फूल लाने भेजा था, वह लौटा नहीं।

शुक्र ने मन में सोचा, ये असुर मुझसे जलते हैं, इसीलिए मेरे शिष्यों को बार-बार मार डालते हैं। कहीं ये ब्राह्मणों का नाश तो नहीं चाहते? और उन्होंने फिर संजीवनी से कच को पुकारा। इस बार कच की आवाज़ शुक्र के पेट के भीतर से धीरे-धीरे आई।

शुक्र ने पूछा — तुम मेरे पेट में कैसे हो? किसने मारा?

कच ने कहा — असुरों ने मुझे मारकर शराब में मिलाया और आपको पिला दिया। पर आपकी कृपा से मुझे सब याद है, और आपके तप के प्रताप से मुझे कष्ट नहीं हो रहा।

गुरु का पेट

अब शुक्र की मुश्किल सामने थी। देवयानी रोती हुई बोली — मुझे दो दुख आग की तरह जला रहे हैं। कच का मरना, और आपका न रहना। कच के बिना मैं नहीं जी सकती, और आपके बिना भी नहीं।

शुक्र ने कच से कहा — मुझे विश्वास है कि तुम इंद्र नहीं हो, ब्राह्मण हो, क्योंकि मेरे पेट में ब्राह्मण के अलावा कोई टिक नहीं सकता। इंद्र क्षत्रिय होता तो मैं उसे पचा चुका होता। इसलिए मुझसे संजीवनी विद्या सीख लो। फिर मेरा पेट चीरकर बाहर आओ, मुझे जिला दो, और इस बेटी की आशा पूरी करो।

कच ने गुरु के पेट के भीतर ही विद्या सीखी। फिर वह पेट चीरकर ऐसे बाहर निकला जैसे रात के आते ही पूर्व क्षितिज को चीरकर पूर्णिमा का चाँद निकलता है। उसने अपने गुरु को मरा पड़ा देखा, और उसी संजीवनी से उन्हें जिला दिया। फिर प्रणाम करके कहा — जो गुरु समुद्र जैसे गहरे होते हैं, जो वर देने में उदार होते हैं, उनका जो आदर नहीं करता, वह पाप का भागी होता है।

शराब ने शुक्र को भी भ्रम में डाल दिया था। इसलिए उन्होंने यह नियम बनाया — आज से जो मूर्ख ब्राह्मण शराब पिएगा, वह धर्म से गिर जाएगा, ब्राह्मण-हत्या का पाप करेगा, और इस लोक और परलोक में निंदित होगा। उन्होंने कहा कि यह नियम मैं सब ब्राह्मणों के लिए बनाता हूँ, और देवता-दैत्य भी इसे सुन लें।

फिर शुक्र ने असुरों को बुलाकर कहा — मूर्खो, सुन लो। मेरे शिष्य कच ने मुझसे संजीवनी पा ली है। अब वह मेरे जैसा ही सामर्थ्यवान है, सच्चा ब्राह्मण है।

कच एक सौ बरस और गुरु के पास रहा। फिर उसने विदा माँगी, और स्वर्ग जाने को तैयार हुआ।

देवयानी का प्रस्ताव

जब कच चलने लगा, तब देवयानी ने उससे कहा — हे अंगिरा के पोते, तुम अपने धन, कुल, विद्या, आचरण, तप और संयम से चमकते हो। जैसे मेरे पिता अंगिरा का आदर करते हैं, वैसे ही मैं बृहस्पति का आदर करती हूँ। तुम जानते हो कि तुम्हारे व्रत के दिनों में मैंने तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार किया। अब तुम्हारी विद्या पूरी हो गई है। मुझ भक्त को छोड़कर मत जाओ। विधि और मंत्रों से मेरा हाथ पकड़ो।

कच ने कहा — आपके पिता मेरे गुरु हैं, इसलिए मेरे पिता जैसे हैं, और आप गुरु की बेटी हैं, इसलिए मेरे लिए पूज्य हैं। आपको मुझसे यह प्रस्ताव नहीं रखना चाहिए। आप मेरे लिए गुरु जैसी हैं।

देवयानी ने कहा — तुम बृहस्पति के बेटे हो, मेरे पिता के नहीं। तुम्हें मैं आदर के योग्य मानती हूँ। याद करो, जब असुरों ने तुम्हें बार-बार मारा, तब भी मेरा स्नेह नहीं डिगा। क्या यह मेरे प्रेम का प्रमाण नहीं? मुझ भक्त को मत ठुकराओ।

कच ने कहा — आप ऐसी बात माँग रही हैं जो ठीक नहीं है। हे चंद्रमुखी, आप तो गुरु से भी बड़ी हैं। मैं भी आपके पिता के पेट में रहा, जहाँ आप भी कभी रही हैं। इस तरह आप धर्म से मेरी बहन ठहरती हैं। मैंने यहाँ सुख से दिन बिताए, मुझसे कोई दोष नहीं हुआ, और आपकी इस माँग पर मुझे क्रोध भी नहीं। अब मुझे जाने की आज्ञा दीजिए, मंगलकामना कीजिए। और जब कभी कुछ धर्म के अनुसार हो, तब मुझे याद कर लीजिएगा। मेरे गुरु की सेवा सदा ध्यान से कीजिएगा।

दो शाप

देवयानी को कच के इनकार पर क्रोध आ गया। उसने कहा — मैंने तुम्हें बचाने का यत्न इसीलिए किया था कि तुम मेरे पति बनो। जब तुम मेरी विधिपूर्वक माँग ठुकरा रहे हो, तो तुम्हारी यह संजीवनी विद्या तुम्हारे काम नहीं आएगी।

कच ने कहा — आप मुझे शाप क्यों दे रही हैं? मैं अपने गुरु की आज्ञा से जा रहा हूँ। मैंने आपको इसलिए नहीं अपनाया कि आप मेरे गुरु की बेटी हैं, आपमें कोई दोष है ऐसा नहीं है। मैंने तो आपको ऋषियों का नियम बताया था। आपने जो शाप दिया, उसके बदले मैं भी कहता हूँ: आपकी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी, किसी ऋषि का बेटा आपसे विवाह नहीं करेगा। मेरी संजीवनी विद्या मेरे अपने काम भले न आए, पर जिसे मैं सिखाऊँगा, उसके काम आएगी।

इतना कहकर कच तुरंत स्वर्ग चला गया। वहाँ इंद्र और देवताओं ने उसे देखकर कहा — कच, तुमने हमारा बड़ा काम किया है। तुम्हारा यश कभी घटेगा नहीं, चारों ओर फैलेगा।

और इसी देवयानी का विवाह, जिसे किसी ऋषि-पुत्र ने नहीं अपनाया, आगे ययाति से हुआ।

टिप्पणी: यह अध्याय मत्स्य पुराण के अध्याय २५ और २६ पर है। मूल में असुरों द्वारा कच को मारने के ब्योरे और भी हैं; यहाँ उन्हें संक्षेप में रखा गया है। देवयानी का शाप और कच का प्रतिशाप दोनों मूल में हैं।

स्रोत: मत्स्य पुराण — एक तालुकदार (अवध) का अंग्रेज़ी अनुवाद, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द हिंदूज़, खंड १७ (१९१६–१७), कच और देवयानी

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

कच किसका बेटा था?

  • शुक्र का
  • अंगिरा का
  • बृहस्पति का
  • वृषपर्वा का
पूरी कथा पढ़िए — बृहस्पति का बेटा

बृहस्पति देवताओं के पुरोहित थे और शुक्र असुरों के।

कच को भेजने की जड़ यही थी कि शुक्र के पास संजीवनी थी और बृहस्पति के पास नहीं।

कच को पहचान की ज़रूरत नहीं पड़ी, उसने ख़ुद अपनी वंशावली बताई।

क्या हुआ?

देवताओं ने कच को शुक्र के पास क्यों भेजा?

  • ताकि वह मरे हुओं को जिलाने वाली संजीवनी विद्या सीख आए
  • ताकि वह देवयानी से विवाह कर ले
  • ताकि वह शुक्र को देवताओं की तरफ़ कर ले
  • ताकि वह वृषपर्वा का राज्य ले
पूरी कथा पढ़िए — संजीवनी की चाह

असुर मारे जाते तो शुक्र उन्हें फिर जिला देते, देवता मरते तो कोई नहीं जिला पाता।

देवताओं ने कच से कहा कि देवयानी को चतुराई और मीठे व्यवहार से प्रसन्न करना।

बदले में उन्होंने कच को यज्ञ का हिस्सा देने का वचन दिया।

ऐसा क्यों?

कच ने देवयानी का विवाह-प्रस्ताव क्यों ठुकराया?

  • क्योंकि उसे देवयानी से द्वेष था
  • क्योंकि वह स्वर्ग जाकर किसी और से विवाह करना चाहता था
  • क्योंकि देवताओं ने उसे रोका था
  • क्योंकि शुक्र उसके गुरु और पिता-समान थे, और शुक्र के शरीर से दोबारा जन्म लेने के कारण कच देवयानी को धर्म के अनुसार बहन-समान मानता था
पूरी कथा पढ़िए — गुरु की बेटी

कच ने कहा कि वह देवयानी को गुरु जैसा पूज्य मानता है।

पेट वाली बात उसने तर्क के रूप में रखी, कि दोनों एक ही पेट में रह चुके हैं।

कच ने क्रोध नहीं दिखाया, केवल जाने की आज्ञा माँगी।

कौन हूँ मैं?

मैं असुरों का पुरोहित हूँ। मेरे पास मरे हुए को जिलाने की संजीवनी विद्या है। मेरी बेटी देवयानी है। मैं कौन हूँ?

  • बृहस्पति
  • शुक्र
  • वृषपर्वा
  • अंगिरा
पूरी कथा पढ़िए — भार्गव शुक्र

शुक्र ने ही कच को शिष्य के रूप में अपनाया।

अपने पेट में कच की आवाज़ सुनकर उन्होंने उसे संजीवनी सिखाई।

बाद में उनकी बेटी देवयानी की कथा ययाति से जुड़ी।

सही क्रम

इस कथा की घटनाओं को सही क्रम में चुनिए।

  • देवताओं का कच को भेजना → कच की पाँच सौ बरस की सेवा → असुरों का कच को मारना → शुक्र के पेट में विद्या → देवयानी का प्रस्ताव → दोनों के शाप
  • कच की पाँच सौ बरस की सेवा → देवताओं का कच को भेजना → शुक्र के पेट में विद्या → असुरों का कच को मारना → दोनों के शाप
  • देवयानी का प्रस्ताव → असुरों का कच को मारना → देवताओं का कच को भेजना → शुक्र के पेट में विद्या → दोनों के शाप
  • दोनों के शाप → देवयानी का प्रस्ताव → शुक्र के पेट में विद्या → कच की पाँच सौ बरस की सेवा → देवताओं का कच को भेजना
पूरी कथा पढ़िए — जाने से लौटने तक

सबसे पहले देवताओं की चिंता थी, फिर कच का जाना, फिर असुरों का वार।

विद्या मिलने के बाद कच सौ बरस और रहा।

देवयानी ने प्रस्ताव तब रखा जब कच विदा लेने वाला था।

किसने कहा?

'मैं उसके बिना नहीं जी सकती।' — किसने कहा?

  • शुक्र ने
  • कच ने
  • शौनक ने
  • देवयानी ने
पूरी कथा पढ़िए — गायें अकेली आईं

देवयानी ने सूरज डूबने और अग्निहोत्र पूरा होने की याद दिलाई।

दूसरी बार भी उसने पिता से यही चिंता कही।

शुक्र ने तब हर बार संजीवनी से कच को लौटाया।

तथ्य

कच ने शुक्र की सेवा में पहली बार कितने बरस बिताए, इससे पहले कि असुरों ने उसे मारा?

  • पचास बरस
  • पाँच सौ बरस
  • एक सौ बरस
  • हज़ार बरस
पूरी कथा पढ़िए — पाँच सौ और सौ

पहले पाँच सौ बरस सेवा में बीते।

विद्या मिलने के बाद कच एक सौ बरस और गुरु के पास रहा।

कच ने शुरू में कहा था कि वह हज़ारों बरस रहने को तैयार है।

व्याख्या

इस कथा से हम क्या पढ़ सकते हैं? (यह हमारा पाठ है, श्लोक का सीधा अर्थ नहीं।)

  • कि गुरु से विद्या छिपकर ही सीखी जा सकती है
  • कि शाप हमेशा झूठे होते हैं
  • कच ने विद्या का मूल्य भी चुकाया और मर्यादा भी नहीं तोड़ी, इसीलिए देवयानी के शाप के बाद भी उसका यश बना रहा
  • कि असुर हमेशा ग़लत और देवता हमेशा सही होते हैं
पूरी कथा पढ़िए — विद्या और मर्यादा

कच ने जो चाहा था वह सीखा, और जो छोड़ना था, वह प्रेम की माँग भी छोड़ी।

इंद्र और देवताओं ने उसके लौटने पर उसके यश की बात की।

इस पाठ को हमारी एक पढ़त की तरह लीजिए; पुराण यह निष्कर्ष नाम लेकर नहीं देता।

क्या हुआ?

कच के जीवित होकर बाहर आने के बाद शुक्र ने शराब के बारे में क्या नियम बनाया?

  • कि असुर कभी शराब न पिएँ
  • कि राजा केवल त्योहारों पर शराब पी सकें
  • कि शराब केवल यज्ञ में चढ़ाई जाए
  • कि जो ब्राह्मण शराब पिएगा वह धर्म से गिरेगा, ब्राह्मण-हत्या का पाप लगेगा और दोनों लोकों में निंदित होगा
पूरी कथा पढ़िए — शुक्र का नियम

शुक्र ने कहा कि यह नियम सब ब्राह्मणों के लिए है और देवता-दैत्य भी इसे सुन लें।

यह नियम तब आया जब उनकी अपनी शराब में कच के अवशेष मिलाए गए थे।

फिर उन्होंने असुरों को बुलाकर बता दिया कि कच अब उनके जैसा ही सामर्थ्यवान है।

पहेली

मैं देवताओं के पुरोहित का बेटा हूँ। मैं एक असुर-गुरु के पेट के भीतर बैठकर विद्या सीखकर लौटा। मैं कौन हूँ?

  • कच
  • इंद्र
  • ययाति
  • वृषपर्वा
पूरी कथा पढ़िए — कच

वह दो बार मरकर लौटा, और तब विद्या पाई।

देवयानी के शाप के बावजूद उसने जिसे सिखाया, उसके काम संजीवनी आएगी।

आगे के अध्याय में हम वही देवयानी देखेंगे, जिसे किसी ऋषि-पुत्र ने नहीं अपनाया।

कच और देवयानी के बारे में सवाल

कच और देवयानी (मत्स्य पुराण) में क्या होता है?

गुरु के पेट के भीतर से जिसने संजीवनी सीखी — और जिससे गुरु की बेटी ने कहा, मुझे छोड़कर मत जाओ। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: दो गुरु, एक लड़ाई; कच जाता है; दो बार; गुरु का पेट; देवयानी का प्रस्ताव; दो शाप।

मत्स्य पुराण में कच और देवयानी के बाद क्या आता है?

आगे देवयानी: कुएँ से राजमहल तक: जिसे एक राजकन्या ने कुएँ में धकेल दिया — और जिसने बदले में उसी राजकन्या को अपनी दासी बनवाया।

कच और देवयानी का स्रोत क्या है?

मत्स्य पुराण, अध्याय २५–२६।