
अध्याय २
नृसिंह और हिरण्यकशिपु
जिसने वर माँगा कि न दिन में मरूँ, न रात में, न किसी हथियार से — और जिसकी सभा में एक सिंह चला आया
नृसिंह और हिरण्यकशिपु — मत्स्य पुराण का अध्याय २। स्रोत: मत्स्य पुराण, अध्याय १६१–१६३। इसमें ७ दृश्य हैं — ग्यारह हज़ार बरस का तप; देवताओं की फ़रियाद; सिंह का रूप; प्रह्लाद ने पहचान लिया; पहला वार; अपशकुन और अंत; स्तुति और वापसी — और अंत में १० सवाल।
ग्यारह हज़ार बरस का तप
ऋषियों ने सूत से कहा — हमें हिरण्यकशिपु के वध की कथा सुनाइए, और नृसिंह की महिमा भी।
सूत बोले — सत्ययुग में दैत्यों का सबसे पुराना पूर्वज हिरण्यकशिपु था। उसने ग्यारह हज़ार बरस तक कठोर तप किया। वह नियम से स्नान करता, गले तक पानी में खड़ा रहता, मौन रखता और संयम से रहता था। पुराण कहता है कि वह बहुत विनम्र था। ब्रह्मा उससे प्रसन्न हुए।
वे अपने सफ़ेद हंस पर बैठकर आए। उनके साथ बारह आदित्य, वसु, साध्य, सिद्ध, मरुत, रुद्र, यक्ष, राक्षस, नाग, दिशाएँ, नदियाँ, समुद्र, तारे, ग्रह और सातों ऋषि थे। पूरा संसार जैसे उस एक तपस्वी को देखने आया हो।
ब्रह्मा ने कहा — हे सुव्रत, मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ। जो चाहो माँगो।
हिरण्यकशिपु ने अपनी माँग ऐसे बाँधी जैसे कोई चारों ओर की दीवार खड़ी करता है। मुझे देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच कोई न मार सके। ऋषियों के शाप का मुझ पर असर न हो। मैं किसी हथियार से न मरूँ, पत्थर से न मरूँ, पेड़ से न मरूँ, गीली चीज़ से न मरूँ, सूखी चीज़ से न मरूँ। मैं न दिन में मरूँ, न रात में। और उसने यह भी माँगा कि मैं ही सूर्य बनूँ, चंद्रमा बनूँ, हवा, आग, जल, आकाश, तारे, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, इंद्र, वरुण, यम और कुबेर बनूँ।
ब्रह्मा ने कहा, तुम्हें ये सारे वर देता हूँ। और वे अपने लोक लौट गए।
देवताओं की फ़रियाद
जब देवताओं, नागों, गंधर्वों और ऋषियों ने सुना कि कौन-से वर दिए गए हैं, तब वे ब्रह्मा के पास पहुँचे। उन्होंने कहा — आपके वर से यह दैत्य हम सबको मार डालेगा। आप कोई उपाय कीजिए। आप ही सबकी जड़ हैं, आप ही देवताओं और पितरों के रचयिता हैं।
ब्रह्मा ने उन्हें मीठे शब्दों से शांत किया। उन्होंने कहा, तप का फल मिलना ही है। पर जब इसके पुण्य चुक जाएँगे, तब विष्णु इस दैत्य को मारेंगे।
देवता लौट गए। और हिरण्यकशिपु, वर पाकर, घमंड में चूर हो गया।
उसने तपस्या करते मुनियों को सताना शुरू किया, जो अपने आश्रमों में शांति से धर्म पर चल रहे थे। उसने स्वर्ग जीतकर तीनों लोकों को अपने अधीन कर लिया। वह यज्ञ में देवताओं का हिस्सा भी खुद लेने लगा। जिन आश्रमों में सज्जन रहते थे, उन्हीं पर उसने अपनी सारी ताक़त झोंक दी।
तब आदित्य, साध्य, विश्वदेव, वसु, इंद्र, यक्ष, सिद्ध और महर्षि विष्णु के पास गए। उन्होंने कहा — नारायण, हम आपकी शरण में आए हैं। हिरण्यकशिपु को मारिए और हमें बचाइए।
विष्णु ने कहा, डर छोड़ो, स्वर्ग लौट जाओ। मैं इस घमंडी दैत्य को उसके सारे साथियों समेत मारूँगा, और स्वर्ग का राज तुम्हें लौटा दूँगा।
सिंह का रूप
तब विष्णु ने 'ओंकार' का सहारा लिया, और उसी के साथ दैत्य की नगरी की ओर चले। उनका तेज़ सूर्य और चंद्रमा जैसा था। उन्होंने नृसिंह का रूप लिया, यानी नीचे का आधा भाग मनुष्य का और ऊपर का सिंह का।
और उन्होंने सबसे पहले हिरण्यकशिपु की सभा देखी।
सभा सौ योजन लंबी और पचास योजन चौड़ी थी। वह आकाश में चलती थी, जहाँ चाहे वहाँ जा सकती थी। वहाँ बुढ़ापा, शोक और दुख नहीं थे। विश्वकर्मा के बनाए सरोवर थे, सोने के पेड़ थे जिनमें रत्न जड़े थे, नीले, पीले, सफ़ेद और काले रंग की छतरियाँ थीं और फूलों वाली बेलें बादलों की कतार जैसी लहराती थीं। वहाँ न धूप थी, न ठंड, न भूख, न प्यास। हंस, सारस और कोयल गाते थे। वह सभा अपने तेज़ से सूरज और चाँद को मात देती थी।
उसके बीच सोने के सिंहासन पर हिरण्यकशिपु बैठा था। सैकड़ों स्त्रियाँ उसे घेरे थीं। गंधर्व गा रहे थे, विश्वाची, मेनका, रंभा और उर्वशी जैसी अप्सराएँ उसके आगे सेवा में थीं। दिति के हज़ारों बेटे उसके चारों ओर बैठे थे, उनमें बलि, विरोचन, नरकासुर, प्रह्लाद, दशग्रीव और घटोदर जैसे नाम थे। सब वर पाए हुए, बलवान, बिना मृत्यु का भय लिए।
पुराण कहता है कि उस जैसा ऐश्वर्य न किसी ने देखा था, न सुना था।
प्रह्लाद ने पहचान लिया
और उसी सभा में नृसिंह आ पहुँचे।
सब दैत्य उस विचित्र रूप को देखकर हैरान थे। सोने के पहाड़ जैसा शरीर। पर हिरण्यकशिपु के बेटे प्रह्लाद ने अपनी दिव्य दृष्टि से देख लिया कि यह सिंह नहीं है। जैसे राख के भीतर अंगारा छिपा होता है, वैसे ही इस सिंह के भीतर स्वयं विष्णु हैं।
प्रह्लाद ने पिता से कहा — हे राजा, हे दैत्यों के पूर्वज, मैंने यह रूप न पहले कभी सुना था, न देखा था। यह कितना विचित्र है। यह कहाँ से आया? इसका भयानक रूप मुझे बताता है कि यह दानवों का नाश करने वाला है।
फिर उसने कहा, देखिए, इसी रूप के भीतर सब कुछ है। सारे देवता हैं, समुद्र और नदियाँ हैं, हिमालय जैसे पर्वत हैं, चंद्रमा, तारे, सूर्य, वसु, कुबेर, वरुण, यम, इंद्र, मरुत, गंधर्व, ऋषि, नाग, यक्ष, ब्रह्मा और शिव। चर और अचर सब इसके सिर में घूम रहे हैं। आप भी, जंभ और सारे दैत्य भी, मैं भी, आपकी सैकड़ों सभाएँ भी, तीनों लोक भी मुझे इसी रूप में दिखते हैं। पूरा ब्रह्मांड इसी के भीतर है।
पहला वार
हिरण्यकशिपु ने यह सुना, पर समझा नहीं। उसने दानवों से कहा — इस अद्भुत सिंह को पकड़ लो। पकड़ में न आए तो वहीं मार डालो।
दानव टूट पड़े। नृसिंह ने ज़ोर से गर्जना की, मुँह खोला, और सभा तहस-नहस हो गई। हिरण्यकशिपु क्रोध में उबलता हुआ आगे बढ़ा।
उसने नृसिंह पर अस्त्रों की झड़ी लगा दी, ऐसे जैसे कोई आग में घी डालता है: गदा, कालचक्र, विष्णुचक्र, ब्रह्मास्त्र, वज्र, त्रिशूल, शक्ति, पाशुपत, नारायणास्त्र, और पुराण ने जितने नाम गिनाए हैं, उतने। जैसे गर्मी में सूर्य हिमालय को अपनी किरणों से ढक लेता है, वैसे वह नृसिंह को ढकता गया। दानवों ने भाले, फंदे, तलवारें, चट्टानें, जलते हुए पेड़, सब उस पर फेंके। नृसिंह एक कदम नहीं हिले। वे इंद्र के वज्र की तरह अटल रहे।
दानव तरह-तरह के रूप लेकर आए, कोई गधे जैसे, कोई मगर जैसे, कोई साँप जैसे, कोई गिद्ध जैसे। उन्होंने बाणों की बौछार की, पर नृसिंह पर कुछ असर नहीं हुआ। उन्होंने चमकते चक्र फेंके तो नृसिंह ने उन्हें पकड़कर निगल लिया, और उनकी चमक वैसे ही बुझ गई जैसे बादल में छिपकर सूरज बुझ जाता है। हिरण्यकशिपु ने बिजली जैसा चमकता वज्र फेंका, तो नृसिंह की एक हुंकार से वह टूटकर टपकते तारे की तरह नीचे गिर गया।
फिर चट्टानें बरसीं, फिर पानी, फिर वायु के साथ आग। इंद्र ने वह आग बारिश से बुझा दी। तब दैत्य ने गहरा अंधकार रच दिया।
अंधेरे में दानव फिर हथियार सजाने लगे। तभी नृसिंह सूर्य की तरह चमक उठे, और दानवों ने उनके माथे पर तीन सलवटें देखीं, जैसे त्रिशूल का चिह्न, जैसे गंगा तीन धाराओं में बहती हो। दैत्यों की सारी मायाएँ मिट गईं।
अपशकुन और अंत
दानव हिरण्यकशिपु के पास भागे। वह क्रोध से जल रहा था, और सब कुछ नष्ट करने का मन बना चुका था। तभी चारों ओर अंधकार छा गया, और प्रलय जैसी हवाएँ चलने लगीं। सूर्य का रंग उड़ गया। चंद्रमा तारों समेत ग्रहण में आ गया। आकाश से उल्काएँ गिरने लगीं और बादल ख़ून बरसाने लगे। पेड़ों पर बेमौसम फूल और फल आ गए। देवताओं की मूर्तियाँ कभी आँख मारतीं, कभी हँसतीं, कभी रोतीं। नदियों का पानी उलटा बहने लगा। और ये सारे संकेत यही कहते थे कि देवताओं की जीत होने वाली है और दानवों का अंत।
सारा संसार काँप उठा। हज़ार फनों वाले शेष तक सिहर उठे।
तब हिरण्यकशिपु ने होंठ चबाए और खड़ा हुआ। उसने गदा और त्रिशूल उठाए। पुराण कहता है कि उसने गंगा, यमुना, गोदावरी, कावेरी, सिंधु जैसी नदियों को, सुमेरु और मंदार जैसे पर्वतों को, और कितने ही देशों को अपनी चाल से हिला दिया। बादलों की तरह गरजता वह विष्णु पर झपटा।
तभी नृसिंह उछले, और ओंकार का सहारा लेकर उन्होंने उसे अपने तीखे नाखूनों से चीर डाला।
उस क्षण पृथ्वी, काल, चंद्रमा, आकाश, तारे, सूर्य, ग्रह, दिशाएँ, पर्वत, नदियाँ और समुद्र, सब आनंद से भर गए।
स्तुति और वापसी
देवता, ऋषि और गंधर्व एक साथ विष्णु की स्तुति करने लगे। ब्रह्मा बोले — आप ही ब्रह्मा हैं, रुद्र हैं, महेंद्र हैं, आप ही रचयिता हैं और संहारक हैं। ज्ञानी लोग आपको परम देव, परम मंत्र, परम धर्म, परम ब्रह्म, परम पद कहते हैं।
इतना कहकर ब्रह्मा अपने लोक चले गए। चारों ओर वाद्य बजने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। विष्णु क्षीरसागर के उत्तरी किनारे गए, वहाँ अपना नृसिंह रूप स्थापित किया, फिर अपने पुराने रूप में लौटे। वे गरुड़ पर बैठे, आठ पहियों के भव्य रथ में अपने लोक लौट गए।
तब मनु ने मछली से कहा कि मैंने नृसिंह की महिमा सुनी, पर मेरी प्यास नहीं बुझी। विष्णु की नाभि से निकले कमल में सृष्टि कैसे रची गई? मुझे उसकी कथा सुनाइए। और मछली ने कहा, यह तो वही कथा है जो महर्षि वेदव्यास ने तप से देखी थी।
टिप्पणी: यह अध्याय मत्स्य पुराण के अध्याय १६१–१६३ पर है। नृसिंह के इस प्रसंग में प्रह्लाद की भूमिका मुख्यतः विष्णु को पहचानने और उनके विराट स्वरूप का वर्णन करने की है। उनकी भक्ति और पिता द्वारा उन पर अत्याचार की विस्तृत कथा, जो भागवत में है, यहाँ नहीं आती। 'दिन में न रात में' का उत्तर भी, जो दूसरी परंपराओं में संध्या का समय है, यहाँ नहीं दिया गया।
स्रोत: मत्स्य पुराण — एक तालुकदार (अवध) का अंग्रेज़ी अनुवाद, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द हिंदूज़, खंड १७ (१९१६–१७), नृसिंह और हिरण्यकशिपु