
अध्याय ५
पुरु का यौवन-दान
जब चार बेटों ने बाप को अपनी जवानी देने से मना कर दिया — और पाँचवें ने कहा, मेरी जवानी ले लीजिए
पुरु का यौवन-दान — मत्स्य पुराण का अध्याय ५। स्रोत: मत्स्य पुराण, अध्याय ३२–३४। इसमें ४ दृश्य हैं — पाँच बेटे; असमय बुढ़ापा; पुरु; हज़ार बरस बाद — और अंत में १० सवाल।
पाँच बेटे
राजा ययाति और देवयानी के दो बेटे हुए, यदु और तुर्वसु। पुराण कहता है कि वे इंद्र और विष्णु जैसे तेजस्वी थे। शर्मिष्ठा के भी तीन बेटे हुए, द्रुह्यु, अनु और पुरु। यानी ययाति के पाँच बेटे हुए।
एक दिन देवयानी राजा के साथ जंगल गई। वहाँ उसने तीन सुंदर बालक खेलते देखे, देवताओं जैसे तेजस्वी, और राजा से बहुत मिलते-जुलते। उसने राजा से पूछा, ये बालक किसके हैं? फिर उसने बच्चों से ही पूछा, तुम्हारे माँ-बाप कौन हैं?
बच्चों ने उँगली उठाकर ययाति की ओर इशारा किया और बताया कि पिता ये हैं और माता शर्मिष्ठा।
देवयानी तुरंत बच्चों को लेकर राजा के पास लौटी। राजा देवयानी के डर से बच्चों को पहले की तरह दुलार नहीं सके, तो वे रोते हुए शर्मिष्ठा के पास चले गए।
देवयानी शर्मिष्ठा के पास गई और बोली — तू झूठी है। मेरी दासी होकर भी तू मुझे क्रोधित करती है। क्या तुझे डर नहीं लगता? क्या तू अब भी अपनी असुरों वाली चाल चल रही है?
शर्मिष्ठा ने कहा — नहीं, मैं धर्म के अनुसार जी रही हूँ, मुझे डर किस बात का? जिस क्षण तुमने इस राजा को अपना पति बनाया, उसी क्षण वह मेरे साथी का पति होने के कारण मेरा भी स्वामी हो गया। तुम ब्राह्मणी हो और उम्र में बड़ी हो, इसलिए तुम मेरे लिए पूज्य हो। तुम्हारा पति इसलिए मेरे लिए और भी आदर के योग्य है।
देवयानी ने राजा से कहा कि अब मैं तुम्हारे पास नहीं रहूँगी, क्योंकि तुमने मेरे लिए अत्यंत अप्रिय काम किया है। और वह आँखों में आँसू भरे अपने पिता शुक्र के पास चली गई। राजा ने पीछे जाकर उसे मनाने का बहुत यत्न किया। पर देवयानी की आँखें क्रोध से लाल थीं, उसने उसकी एक न सुनी।
असमय बुढ़ापा
देवयानी की शिकायत पर शुक्र ने ययाति को असमय बुढ़ापे का शाप दिया। राजा के शरीर पर झुर्रियाँ पड़ गईं, देह दुबली हो गई और भोग की शक्ति जाती रही। पर भोग की प्यास नहीं गई। उन्होंने कहा, मैंने कितने ही यज्ञ किए, पर मेरी तृष्णा अभी बुझी नहीं।
उन्होंने अपने बेटों को बुलाया। पहले यदु से कहा — मेरी बुढ़ापे की देह ले लो और मुझे अपनी जवानी दे दो। मैं एक हज़ार बरस बाद तुम्हारी जवानी तुम्हें लौटा दूँगा।
यदु ने मना कर दिया। उसने कहा, आपके और भी बेटे हैं जो आपको मुझसे ज़्यादा प्यारे हैं, उनसे माँग लीजिए।
फिर ययाति ने तुर्वसु से माँगा। तुर्वसु ने भी मना किया। उसने कहा कि बुढ़ापा मनुष्य से बल, भोग, रूप, बुद्धि और मान छीन लेता है। मैं उसे नहीं लूँगा।
द्रुह्यु से ययाति ने वही बात कही। द्रुह्यु बोला कि बुढ़ापे में न मैं राज भोग सकूँगा, न रथ चला सकूँगा, न घोड़े पर सवार हो सकूँगा। मैं उसे नहीं लूँगा।
अनु ने भी वही उत्तर दिया। उसने कहा कि बूढ़ा आदमी बच्चे की तरह खाता है, अपवित्र रहता है, और जब चाहे तब यज्ञ नहीं कर सकता।
चारों बेटे मना कर चुके थे। राजा बहुत नाराज़ हुए, और क्रोध में उन्होंने कहा कि इनके वंश में कोई राजा नहीं बनेगा।
पुरु
तब राजा ने सबसे छोटे बेटे पुरु को बुलाया और वही प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा, यह असमय बुढ़ापा मुझ पर आ पड़ा है, और मेरी इच्छाएँ पूरी नहीं हुईं। तुम मेरा यह बुढ़ापा ले लो, तो तुम मेरे सबसे प्यारे बेटे हो जाओगे। एक हज़ार वर्ष बाद मैं तुम्हारा यौवन तुम्हें लौटा दूँगा।
पुरु ने कहा — पिताजी, आप जो चाहते हैं मैं वही करूँगा। आप अपनी सारी इच्छाएँ पूरी कर लीजिए। मैं सहर्ष आपका बुढ़ापा लूँगा, और जो मुझे सबसे उचित लगेगा वही करूँगा।
पुरु की बात सुनकर राजा ययाति ने मन में शुक्र का नाम लिया, और अपना बुढ़ापा बेटे को दे दिया। फिर प्रसन्न होकर वे जवान शरीर में भोग करने लगे।
पर पुराण यह भी कहता है कि राजा ने अपने कर्तव्य नहीं छोड़े। वे समय पर देवताओं और पितरों को जल देते, श्राद्ध और यज्ञ करते, ब्राह्मणों की इच्छाएँ पूरी करते, अतिथियों का सत्कार करते और अपनी प्रजा की रक्षा करते। वे इंद्र की तरह प्रजा की ज़रूरतें पूरी करते थे। वे सिंह जैसे पराक्रमी थे और धर्म के रास्ते से कभी नहीं हटे।
उधर पुरु उसी बूढ़े शरीर में राज चलाता रहा।
हज़ार बरस बाद
जब हज़ार बरस बीत गए, तब ययाति को अपने बीते दिन याद आए। उन्होंने देखा कि उनकी चाही हुई सारी अवधि पूरी हो चुकी है। उन्होंने पुरु से कहा, बेटा, आदमी भोगों से कभी तृप्त नहीं होता। जितना भोगो, तृष्णा और बढ़ती है।
उन्होंने पुरु को उसकी जवानी लौटा दी। और अपना बुढ़ापा वापस लेकर उसका राजतिलक किया।
पुराण में ययाति ने पुरु से कहा कि गंगा और यमुना के बीच का देश तुम्हारा है। तुम्हारे बाक़ी भाई तुम्हारे अधीन रहकर आस-पास के देशों में राज करेंगे। यदु से यादव चले, तुर्वसु के वंशज और द्रुह्यु, अनु के वंश भी आगे चले। और पुरु के नाम से पौरव वंश चला, जो आगे चलकर कुरुवंश कहलाया। पुराण के शब्दों में उस वंश का राज एक हज़ार बरस तक चलना था।
टिप्पणी: यह अध्याय मत्स्य पुराण के अध्याय ३२ से ३४ पर है। शर्मिष्ठा के तीन बेटों के नाम आए हैं, पर उनके जन्म का प्रसंग और ययाति द्वारा बड़े बेटों के वंश के लिए कहे गए कठोर शाप के ब्योरे यहाँ संक्षेप में या छोड़कर रखे गए हैं। अनुवादक ने अध्याय ३३ के बारे में कहा है कि वह शब्दशः अनुवाद नहीं है।
स्रोत: मत्स्य पुराण — एक तालुकदार (अवध) का अंग्रेज़ी अनुवाद, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द हिंदूज़, खंड १७ (१९१६–१७), पुरु का यौवन-दान