
अध्याय ९
सूर्य, संज्ञा और छाया
जो सूर्य की गर्मी नहीं सह सकी, उसने अपनी छाया को पत्नी बनाकर छोड़ दिया — और बेटे ने माँ की एक लात का जवाब पाया
सूर्य, संज्ञा और छाया — मत्स्य पुराण का अध्याय ९। स्रोत: मत्स्य पुराण, अध्याय ११। इसमें ६ दृश्य हैं — सूर्य की तीन पत्नियाँ; छाया; यम और छाया; यम का तप; संज्ञा की खोज; बच्चों का क्या हुआ — और अंत में १० सवाल।
सूर्य की तीन पत्नियाँ
ऋषियों ने सूत से कहा — हमें सूर्यवंश और चंद्रवंश का इतिहास सुनाइए।
सूत बोले — कश्यप और अदिति से सूर्य का जन्म हुआ। सूर्य की तीन पत्नियाँ थीं: संज्ञा, राज्ञी और प्रभा। राज्ञी रैवत की बेटी थी और उसका बेटा रेवत हुआ। प्रभा से प्रभात का जन्म हुआ। और संज्ञा, जो विश्वकर्मा की बेटी थी, वैवस्वत मनु की माँ बनी। संज्ञा ने यम और यमुना को भी जन्म दिया, ये जुड़वाँ थे।
छाया
पर संज्ञा सूर्य का तेज नहीं सह पाती थी। उसके पास जाना कठिन था, और रहना और भी कठिन। तब उसने अपने शरीर से एक स्त्री रची, जिसका नाम छाया पड़ा। छाया उसके सामने खड़ी हुई, तो संज्ञा ने उससे कहा — तुम मेरे स्वामी की सेवा करो। और मेरे बच्चों की माँ की तरह देखभाल करो।
छाया ने कहा, ठीक है। और संज्ञा कहीं चली गई।
सूर्य ने छाया को संज्ञा ही समझा। उसी से उनके बच्चे हुए: सावर्णि मनु, जिन्हें सावर्णि इसलिए कहा जाता है कि वे वैवस्वत मनु के ही वर्ण के थे, शनि, और दो कन्याएँ, तपती और विष्टि।
यम और छाया
अपने बच्चे होने के बाद छाया अपने ही बच्चों पर ज़्यादा ध्यान देने लगी। संज्ञा के बच्चों की वह उतनी चिंता नहीं करती थी। मनु ने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया, पर यम को यह बात चुभ गई। एक दिन उसने ग़ुस्से में अपना दाहिना पाँव उठाया, छाया को लात मारने के लिए।
छाया का क्रोध भड़क उठा। उसने यम को शाप दिया — तेरा यह पाँव कीड़ों से खाया जाएगा, और उससे हमेशा पीप और ख़ून बहेगा।
यम ने पिता से जाकर कहा कि यह माँ का व्यवहार नहीं है। जो अपने बच्चे को शाप दे, वह सगी माँ नहीं हो सकती। और उसने कहा कि मेरे साथ ऐसा हो रहा है।
सूर्य ने कहा — मूर्खता में किए गए काम से संकट में कौन नहीं पड़ता? दूसरों की क्या कहें, स्वयं भगवान शिव ने भी अपने कर्मों का फल भोगा है। मैं शाप वापस नहीं ले सकता, पर तुझे एक पक्षी देता हूँ, जो तेरे पाँव के कीड़े खा जाएगा और घाव से निकलने वाला पीप और रक्त भी दूर कर देगा।
यम का तप
यम को पिता से बस इतना ही मिला। वह गोकर्ण तीर्थ गया और वहाँ कठिन तप करने लगा। वह केवल फल, पत्ते और हवा पर रहा। लाख बरस तक उसने तप किया। तब शिव प्रकट हुए और बोले — वर माँगो।
यम ने तीन चीज़ें माँगीं: संसार की रक्षा करने की शक्ति, पितरों का राज, और पुण्य-पाप में भेद करने का विवेक।
शिव ने कहा, ऐसा ही हो। और अंतर्धान हो गए। इस तरह यम धर्म का न्याय करने वाले और पितरों के स्वामी बने।
संज्ञा की खोज
उधर सूर्य ने छाया को डराया, तो उसने सच बता दिया। सूर्य को पता चला कि संज्ञा उन्हें छोड़कर अपने पिता के घर चली गई है। उन्हें बहुत क्रोध आया। वे अपने ससुर विश्वकर्मा के पास गए और संज्ञा को लौटाने को कहा।
संज्ञा घोड़ी का रूप धरकर अपने पिता विश्वकर्मा के पास गई थी। पर विश्वकर्मा ने उसे वहाँ रहने से मना कर दिया। तब वह उसी रूप में मरुस्थल चली गई। विश्वकर्मा ने एक यंत्र की सहायता से सूर्य का असहनीय तेज कुछ कम किया, ताकि उनका रूप अधिक सौम्य हो जाए। उस अलग किए हुए तेज से देवताओं के हथियार बने, जिनमें विष्णु का चक्र, शिव का त्रिशूल और इंद्र का वज्र गिने गए हैं। सूर्य घोड़े का रूप लेकर संज्ञा के पास पहुँचे। संज्ञा उन्हें पहचान न सकी और भयभीत हो गई। इसी प्रसंग में उसकी नासिका से सूर्य का तेज बाहर निकलने पर अश्विनीकुमारों का जन्म हुआ। दोनों अश्विनीकुमार नासत्य और दस्र नामों से प्रसिद्ध हुए। नासत्य नाम को उनके नासिका से जन्म लेने से जोड़ा गया है और दस्र नाम की व्युत्पत्ति पुत्र के रूप में उनके जन्म से बताई गई है। फिर संज्ञा ने अपने स्वामी को पहचान लिया और प्रसन्न होकर उनके साथ विमान में स्वर्ग चली गई।
बच्चों का क्या हुआ
सावर्णि मनु आज भी मेरु पर्वत पर तप कर रहे हैं, ऐसा पुराण कहता है। शनि ने अपनी तपस्या के बल पर ग्रहों में स्थान पाया। यमुना और तपती नदियाँ बन गईं। विष्टि का रंग गहरा नीला हो गया।
वैवस्वत मनु के दस बलवान पुत्र थे। सबसे बड़ा इला था, जो पुत्रेष्टि यज्ञ से पैदा हुआ। बाक़ी इक्ष्वाकु, कुशनाभ, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करूष, शर्याति, पृषध्र और नाभाग थे। मनु ने इला को राजा बनाया और ख़ुद महेंद्रवन में तप करने चले गए।
टिप्पणी: यह अध्याय मत्स्य पुराण के अध्याय ११ पर है। इसी अध्याय में आगे इला के पुरुष से स्त्री बनने की कथा है, जो इस महाकथा में नहीं ली गई। इस प्रसंग के कुछ अंश पुराने अंग्रेज़ी अनुवाद में अस्पष्ट छपे हैं; संज्ञा की वापसी का क्रम संस्कृत पाठ की एक जाँच (११.२५–३७) से मिलाया गया है।
स्रोत: मत्स्य पुराण — एक तालुकदार (अवध) का अंग्रेज़ी अनुवाद, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द हिंदूज़, खंड १७ (१९१६–१७), सूर्य, संज्ञा और छाया