
अध्याय ५
आधा वस्त्र
भूख से बेसुध एक राजा ने सुनहरे पंछियों को पकड़ने के लिए अपना आख़िरी वस्त्र फेंका — और वे उसे लेकर उड़ गए, क्योंकि वे पंछी नहीं, वही पासे थे
सुनहरे पंछी
तीन रातों की भूख के बाद नल को कुछ सुनहरे पंखों वाले पंछी दिखे। उन्हें लगा कि इन्हें पकड़कर भोजन और कुछ धन दोनों मिल जाएँगे।
नल ने अपना इकलौता वस्त्र उन पर फेंक दिया। पंछी उसी वस्त्र को लेकर उड़ गए — और आकाश से बोले — "हम वही पासे हैं जिन्होंने तुम्हारा राज्य जीता। अब तुम्हारा यह आख़िरी वस्त्र भी ले जा रहे हैं, ताकि तुम पूरी तरह नंगे रहो।"
नल ने दमयंती की ओर देखा। उनके पास अब सचमुच कुछ नहीं बचा था — एक-दूसरे के सिवा।
एक विश्रामगृह में
रास्ते में एक यात्री-विश्रामगृह मिला। नल ने दमयंती को उसके पिता के राज्य या किसी और सुरक्षित जगह लौट जाने का सुझाव दिया — रास्ते भी बता दिए।
दमयंती ने मना कर दिया। "मैं तुम्हारे साथ रहूँगी, चाहे जंगल हो या राजमहल। मुझे छोड़कर मत जाना।"
रात हुई, दमयंती थककर सो गई। नल जागते रहे — कलि के वश में, अपराधबोध से भरे हुए, और इस सोच से भी कि दमयंती शायद अपने परिवार में जाकर बेहतर रहेगी।
आधा वस्त्र
नल को कोई और वस्त्र नहीं मिला। पास में एक तलवार पड़ी थी। उन्होंने दमयंती के सोए हुए वस्त्र को तलवार से आधा काट दिया — आधा अपने लिए रखा, आधा उसके ऊपर छोड़ दिया।
फिर वे उठे, कुछ क़दम चले, लौटे, फिर देखा उसे सोते हुए, फिर चले गए। कई बार यही हुआ। आख़िर में, कलि के स्पर्श से मोहग्रस्त होकर, वे उसे सोता छोड़कर अंधकार में चले गए।
दमयंती अकेली रह गई, बिना यह जाने कि उसका पति उसे छोड़ चुका है।
टिप्पणी: यह प्रसंग नलोपाख्यान में नल के पतन की सबसे निर्णायक रात है। कथा स्वयं इसे नल की कमज़ोरी और कलि के प्रभाव, दोनों की तरह दिखाती है — "मोहित हुआ नल" जैसे शब्द मूल में आते हैं। नल के बार-बार लौटकर देखने और आख़िर चले जाने का ब्योरा ग्रंथ में स्पष्ट है; इस साइट ने उसे वैसे ही रखा है, बिना नरम किए। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।
स्रोत: महाभारत, वनपर्व — नलोपाख्यान, आधा वस्त्र