अध्याय ८

एक दिन में कुंडिन

दमयंती ने एक झूठे स्वयंवर की घोषणा करवाई, यह जानते हुए कि पूरी पृथ्वी पर सिर्फ़ एक सारथी एक दिन में इतनी दूर पहुँच सकता है

खोज पर निकले ब्राह्मण

राजा भीम ने बेटी और दामाद को खोजने के लिए ब्राह्मणों को हर दिशा में भेजा। उनमें से एक, सुदेव, घूमते-घूमते चेदि पहुँचा, और वहाँ सैरंध्री के रूप में छिपी दमयंती को पहचान लिया — उसके शरीर के कुछ विशेष चिह्नों से।

सुदेव उसे वापस कुंडिन ले आया। पर नल का कहीं पता नहीं चला।

पर्णाद का समाचार

राजा भीम ने ब्राह्मणों को फिर अलग-अलग दिशाओं में भेजा। दमयंती ने उन्हें एक संदेश दिया, जिसे वे हर दरबार और सभा में दोहराएँ — उस पुरुष को पुकारते हुए जिसने अपनी सोई हुई पत्नी का आधा वस्त्र काटकर उसे जंगल में छोड़ दिया था।

कुछ समय बाद पर्णाद नाम का एक ब्राह्मण अयोध्या से लौटा। उसने बताया कि राजा ऋतुपर्ण के दरबार में उस संदेश का उत्तर केवल एक विचित्र, कुरूप सारथी बाहुक ने दिया था — और उसके शब्द ऐसे थे जैसे वह नल और दमयंती के बीच की बात भीतर से जानता हो।

दमयंती को अब संदेह हुआ कि बाहुक ही नल हो सकता है।

एक चतुर परीक्षा

उसी संदेह की परीक्षा के लिए दमयंती ने एक तरक़ीब सोची। उसने सुदेव को फिर अयोध्या भेजा, यह ख़बर फैलाने को कि दमयंती का दूसरा स्वयंवर होने जा रहा है — अगली सुबह ही।

यह पूरी तरह झूठ था। पर दमयंती जानती थी कि इतनी कम मोहलत में सिर्फ़ वही सारथी वहाँ पहुँच सकता है जो एक दिन में इतनी दूरी तय कर सके — और ऐसा सारथी दुनिया में एक ही था।

ख़बर सुनकर ऋतुपर्ण ने बाहुक को रथ तैयार करने को कहा — "कुंडिन एक ही दिन में पहुँचना है।"

विभीतक का पेड़

रास्ते में रथ की गति असाधारण थी। साथ बैठे वार्ष्णेय को शक हुआ कि यह सारथी कोई साधारण व्यक्ति नहीं। ऋतुपर्ण का दुपट्टा रास्ते में गिर गया, पर रुकने का समय नहीं था।

तभी एक विभीतक वृक्ष आया। ऋतुपर्ण ने बिना गिने कहा — "इस पेड़ पर इतने पत्ते और इतने फल हैं।" गिनकर देखा गया तो संख्या ठीक निकली।

बाहुक चकित रह गए और उन्होंने इस अद्भुत गणना का रहस्य पूछा। ऋतुपर्ण ने बताया कि वे संख्या और पासों की विद्या जानते हैं, और उसी समय उन्होंने बाहुक को पासों का रहस्य — अक्षहृदय — सिखा दिया। बाहुक ने बदले में अपनी अश्व-विद्या देने का वचन दिया; वह विद्या पूरी तरह आगे, पुनर्मिलन के बाद, सौंपी गई।

पासों की विद्या मिलते ही कलि नल के शरीर से निकल पड़ा — कर्कोटक का विष उगलता हुआ, और दमयंती के शाप से भी पीड़ित। उसने नल से विनती की कि उसे शाप न दें। नल ने उसे छोड़ दिया, और कलि पास ही खड़े उसी विभीतक वृक्ष में जा समाया। तभी से यह वृक्ष अशुभ माना जाता है।

टिप्पणी: यह प्रसंग नलोपाख्यान में नल की मुक्ति की शुरुआत है। ब्राह्मण पर्णाद का समाचार — कि अयोध्या में दमयंती के संदेश का उत्तर केवल बाहुक ने दिया — ग्रंथ में दमयंती के संदेह की नींव है; इसके बिना यह साफ़ नहीं होता कि दमयंती को अयोध्या पर ही शक क्यों हुआ। विभीतक वृक्ष पर ऋतुपर्ण की गिनती ग्रंथ में बड़ी संख्याओं के साथ विस्तार से दी गई है; यहाँ केवल घटना रखी गई है, ठीक-ठीक संख्याएँ नहीं। अक्षहृदय — पासों का रहस्य — कथा के अंत में बृहदश्व स्वयं युधिष्ठिर को सिखाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ऋतुपर्ण ने नल को सिखाया। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: महाभारत, वनपर्व — नलोपाख्यान, एक दिन में कुंडिन

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

चेदि में दमयंती को किसने पहचाना?

  • रानी-माँ ने
  • सुनंदा ने
  • ब्राह्मण सुदेव ने, शरीर के विशेष चिह्नों से
  • नल ने ख़ुद पहचान लिया
पूरी कथा पढ़िए — खोज पर निकला ब्राह्मण

राजा भीम ने बेटी को खोजने के लिए ब्राह्मणों को हर दिशा में भेजा।

सुदेव चेदि पहुँचा और सैरंध्री के रूप में छिपी दमयंती को पहचान लिया।

वह उसे वापस कुंडिन ले आया।

क्या हुआ?

अयोध्या से लौटे ब्राह्मण पर्णाद ने क्या बताया?

  • कि दमयंती के संदेश का उत्तर केवल एक विचित्र सारथी बाहुक ने दिया, जिसकी बातों से लगता था वह भीतर से नल-दमयंती की कथा जानता है
  • कि नल अयोध्या में राजा के पद पर बैठे हैं
  • कि अयोध्या में किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया
  • कि नल किसी और राज्य में देखे गए हैं
पूरी कथा पढ़िए — एक अनजान सारथी का उत्तर

भीम ने ब्राह्मणों को फिर अलग-अलग दिशाओं में भेजा था, दमयंती के दिए संदेश के साथ।

पर्णाद अयोध्या से लौटा और बताया कि केवल बाहुक ने इस संदेश का उत्तर दिया।

बाहुक के शब्दों से दमयंती को संदेह हुआ कि वही नल हो सकता है।

क्या हुआ?

दमयंती ने नल को खोजने के लिए क्या तरक़ीब अपनाई?

  • उसने ख़ुद वेश बदलकर हर राज्य में जाने का फ़ैसला किया
  • उसने अपने भाइयों को हर राज्य भेजा
  • उसने नल के नाम की घोषणा करवाई
  • उसने एक झूठे दूसरे स्वयंवर की ख़बर फैलवाई, जो अगली ही सुबह होना था
पूरी कथा पढ़िए — एक झूठी ख़बर, एक सच्ची चाल

दमयंती ने सुदेव को फिर अयोध्या भेजा।

ख़बर फैलाई गई कि दमयंती का दूसरा स्वयंवर अगली सुबह है।

यह पूरी तरह झूठ था, पर एक उद्देश्य से रचा गया था।

ऐसा क्यों?

दमयंती ने झूठे स्वयंवर की मोहलत इतनी कम — केवल एक दिन — क्यों रखी?

  • क्योंकि वह जल्दी विवाह करना चाहती थी
  • क्योंकि वह पर्णाद के समाचार से बाहुक पर शक कर चुकी थी, और जानती थी कि इतनी कम मोहलत में केवल वही सारथी पहुँच सकता है जो असाधारण गति से रथ चला सके
  • क्योंकि उसके पिता ने ऐसा आदेश दिया
  • क्योंकि वह ऋतुपर्ण से मिलना चाहती थी
पूरी कथा पढ़िए — एक परीक्षा, एक जाल

पर्णाद के समाचार ने दमयंती का संदेह बाहुक की ओर मोड़ दिया था।

वह जानती थी कि इतनी कम मोहलत में सिर्फ़ एक असाधारण सारथी ही पहुँच सकता है।

यही उसकी योजना का आधार था — शक की परीक्षा, स्वयंवर का बहाना।

क्या हुआ?

ख़बर सुनकर ऋतुपर्ण ने बाहुक को क्या आदेश दिया?

  • एक ही दिन में कुंडिन पहुँचने के लिए रथ तैयार करने को कहा
  • कुंडिन जाने से मना किया
  • कुछ दिनों में धीरे-धीरे जाने को कहा
  • वार्ष्णेय को अकेले भेजने को कहा
पूरी कथा पढ़िए — एक दिन की चुनौती

ऋतुपर्ण ने बाहुक को रथ तैयार करने को कहा।

लक्ष्य था — कुंडिन एक ही दिन में पहुँचना।

यह वही चुनौती थी जिस पर दमयंती की पूरी योजना टिकी थी।

क्या हुआ?

रास्ते में विभीतक वृक्ष पर क्या हुआ?

  • बाहुक ने वृक्ष के फल तोड़े
  • रथ का पहिया टूट गया
  • वार्ष्णेय ने वृक्ष के नीचे विश्राम करने को कहा
  • ऋतुपर्ण ने बिना गिने वृक्ष के पत्तों और फलों की सही संख्या बता दी
पूरी कथा पढ़िए — बिना गिने सही संख्या

रास्ते में एक विभीतक वृक्ष आया।

ऋतुपर्ण ने बिना गिने उसके पत्तों और फलों की संख्या बता दी।

गिनकर देखा गया तो संख्या बिल्कुल सही निकली।

क्या हुआ?

बाहुक और ऋतुपर्ण के बीच विद्याओं का आदान-प्रदान कैसे हुआ?

  • दोनों ने रसोई की विद्या बदली
  • ऋतुपर्ण ने उसी समय पासों का रहस्य (अक्षहृदय) बाहुक को सिखा दिया; बाहुक ने बदले में अश्व-विद्या देने का वचन दिया, जो आगे पुनर्मिलन के बाद पूरा हुआ
  • दोनों ने युद्ध-विद्या बदली
  • दोनों ने पासों की विद्या एक-दूसरे को दी
पूरी कथा पढ़िए — एक विद्या तुरंत, दूसरी बाद में

बाहुक ने ऋतुपर्ण से अद्भुत गणना का रहस्य पूछा।

ऋतुपर्ण ने तुरंत उन्हें अक्षहृदय सिखा दिया।

बाहुक ने अश्व-विद्या देने का वचन दिया, पर वह विद्या पूरी तरह आगे, पुनर्मिलन के बाद सौंपी गई।

क्या हुआ?

अक्षहृदय विद्या मिलते ही बाहुक के भीतर क्या हुआ?

  • वे तुरंत अपना असली रूप पा गए
  • उन्हें दमयंती की याद आ गई
  • उनके भीतर बैठा कलि, कर्कोटक का विष उगलता और दमयंती के शाप से पीड़ित, बाहर निकल आया
  • रथ की गति धीमी पड़ गई
पूरी कथा पढ़िए — कलि का निकलना

अक्षहृदय मिलते ही कलि, कर्कोटक का विष उगलते हुए और दमयंती के शाप से पीड़ित होकर, बाहुक के भीतर से बाहर निकल आया।

उसने नल से विनती की कि उसे शाप न दें, और नल ने उसे छोड़ दिया।

कलि पास ही खड़े विभीतक वृक्ष में जा समाया — तभी से यह वृक्ष अशुभ माना जाता है।

ऐसा क्यों?

विभीतक वृक्ष को अशुभ क्यों माना जाता है — कथा इसका क्या कारण देती है?

  • क्योंकि उसके फल विषैले होते हैं
  • क्योंकि उसके नीचे कोई शाप हुआ था
  • क्योंकि ऋतुपर्ण ने उसे शाप दिया
  • क्योंकि कलि, बाहुक से निकलकर उसी वृक्ष में जा घुसा था
पूरी कथा पढ़िए — एक पेड़ की कहानी

कथा इसी प्रसंग से विभीतक वृक्ष की अशुभ छवि जोड़ती है।

कलि के स्पर्श से यह वृक्ष बदनाम हो गया, ऐसा कथा कहती है।

यह उस लंबी रात के अंत का संकेत भी है जो पासों की भूल से शुरू हुई थी।

पहेली

मैं वह वृक्ष हूँ जिस पर एक राजा ने बिना गिने सही संख्या बता दी, और जिसमें बाद में कलि जा छिपा। मैं कौन हूँ?

  • विभीतक वृक्ष
  • अशोक वृक्ष
  • बरगद
  • पीपल
पूरी कथा पढ़िए — गिनती और मुक्ति, दोनों का साक्षी

ऋतुपर्ण ने इसी वृक्ष पर अपनी अद्भुत गणना दिखाई थी।

यही वह विद्या थी जिसे बाहुक ने सीखा।

और यही वह वृक्ष था जिसमें कलि, बाहुक से मुक्त होकर जा घुसा।