
अध्याय ६
जंगल में दमयंती
अकेली जागी एक रानी को एक अजगर ने जकड़ लिया, एक शिकारी ने बचाया और फिर सताया, और एक शाप ने उसी क्षण उसकी रक्षा कर दी
अकेली, बेख़बर
दमयंती जागी तो नल कहीं नहीं थे। वह घबराकर चीख़ी, रोती हुई जंगल में इधर-उधर भागी, उसे पुकारती रही।
"तुमने मुझे छोड़ क्यों दिया, नल? मैंने तो कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ने का वचन दिया था। क्या मैंने कुछ ग़लत किया?" — उसकी पुकार जंगल में गूँजती रही, कोई जवाब नहीं आया।
अजगर की पकड़
भटकते हुए एक विशाल अजगर ने उसे जकड़ लिया। दमयंती चीख़ी। उसकी पुकार सुनकर पास से गुज़रता एक शिकारी दौड़ा आया और अजगर को मार डाला।
दमयंती बच गई — पर शिकारी की नीयत बदल गई। उसने उसे अनुचित ढंग से छूने की कोशिश की।
दमयंती ने क्रोध और दुःख से भरकर शाप दिया — "मैंने अपने पति निषधराज के सिवा कभी किसी और को मन से नहीं सोचा। इसी सत्य के बल पर, यह दुष्ट शिकारी यहीं गिरकर प्राण त्याग दे।" शिकारी उसी क्षण गिरकर मर गया।
आश्रम में भटकाव
दमयंती आगे बढ़ी और एक तपोवन में पहुँची, जहाँ वसिष्ठ, भृगु और अत्रि जैसे महान तपस्वियों के समान दिखने वाले ऋषि थे। उसने रोते हुए अपनी कथा सुनाई।
ऋषियों ने कहा — "शोक मत करो, देवी। तुम फिर से नल को पाओगी — स्वस्थ, अपने शत्रुओं को हराकर, उसी नगर पर राज करता हुआ।" इतना कहकर वह आश्रम और वे ऋषि, दोनों उसकी आँखों के सामने ही अंतर्धान हो गए।
दमयंती अकेली रह गई, चकित, पर उस भविष्यवाणी को हृदय में रखे हुए।
काफ़िले से चेदि तक
आगे उसे एक व्यापारियों का काफ़िला मिला, जिसका मुखिया शुचि था। वह उनके साथ चल पड़ी।
एक रात, कमल से भरी झील के पास, मस्त हाथियों के एक झुंड ने काफ़िले पर हमला कर दिया। कई व्यापारी मारे गए, सामान बिखर गया। बचे हुए लोगों ने दमयंती पर दोष मढ़ा — कहा कि वह कोई राक्षसी है, इसी की वजह से यह विपत्ति आई। वह शर्मिंदा होकर वहाँ से भाग निकली।
भटकते-भटकते वह चेदि देश की राजधानी पहुँची। धूल में सनी, फटे वस्त्रों में, अस्त-व्यस्त — किसी ने उसे रानी-माँ को बता दिया। राजमहल की छत से देखकर रानी-माँ ने उसे बुलवाया।
दमयंती ने ख़ुद अपनी शर्तें रखीं — जूठा भोजन नहीं करूँगी, किसी और के पाँव नहीं धोऊँगी, पुरुषों से बात नहीं करूँगी; और जो पुरुष मुझे पत्नी या संगिनी बनाने के लिए आग्रह करे, उसे दंड दिया जाए, और यदि वह बार-बार ऐसा करे, तो उसे मृत्युदंड मिले। रानी-माँ ने सब स्वीकार किया और उसे अपनी बेटी सुनंदा की सखी बना लिया — नाम रखा सैरंध्री।
टिप्पणी: यह प्रसंग नलोपाख्यान के उस हिस्से का है जहाँ दमयंती अकेली जंगल और फिर मनुष्यों की दुनिया से गुज़रती है। शिकारी वाला प्रसंग ग्रंथ में है; इस साइट ने उसे संक्षेप में, बिना विस्तार के रखा है — शाप का बल दिखाने के लिए, ब्योरे के लिए नहीं। आश्रम और ऋषियों का अचानक अंतर्धान हो जाना ग्रंथ में ही है, और इसे दैवीय संकेत की तरह पढ़ा जाता है। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।
स्रोत: महाभारत, वनपर्व — नलोपाख्यान, जंगल में दमयंती