
अध्याय ४
कलि की प्रतीक्षा
स्वयंवर से लौटते एक देवता ने कलि से कहा — दमयंती ने एक मनुष्य को चुना है — और कलि ने बारह साल इंतज़ार किया, एक भूल के लिए
रास्ते में कलि
स्वयंवर से लौटते हुए इंद्र, अग्नि, वरुण और यम की भेंट कलि और द्वापर से हुई। कलि भी दमयंती को चाहते थे, स्वयंवर में शामिल होने जा रहे थे।
"बहुत देर हो चुकी," इंद्र ने कहा। "दमयंती ने चुनाव कर लिया — नल को चुना, हम चारों के सामने, हमारे रहते हुए।"
कलि क्रोध से भर उठे। "देवताओं के सामने एक मनुष्य को चुना उसने? इसकी सज़ा भारी होनी चाहिए।"
एक भूल का इंतज़ार
देवताओं ने कहा कि नल गुणी है, चुनाव सही हुआ, क्रोध का कोई कारण नहीं। पर कलि नहीं माने। उन्होंने द्वापर से कहा — "मैं नल में प्रवेश करूँगा, उसका राज्य छीनूँगा। तुम पासों में प्रवेश करना, मेरी मदद के लिए।"
कलि निषध पहुँचे, पर बारह साल तक कोई मौक़ा नहीं मिला — नल हर दिन नियम से रहते थे, एक भी चूक नहीं।
बारहवें वर्ष एक दिन शौच से लौटकर नल ने पाँव धोए बिना जल का स्पर्श किया और संध्या-वंदन में बैठ गए। इसी शुचिता-भंग को कलि ने प्रवेश का अवसर बनाया — वे नल में प्रवेश कर गए।
पुष्कर की चुनौती
कलि के प्रवेश करते ही नल का मन बदलने लगा। कलि ख़ुद पुष्कर के पास गए और उन्हें नल को पासों की चुनौती देने के लिए उकसाया; द्वापर पासों में प्रवेश कर गया।
पुष्कर ने नल को पासे के खेल की चुनौती दी। नल, जो पासों के खेल के शौक़ीन थे, अब कलि के वश में लगातार हारने लगे। हर हार पर वे और दाँव पर लगाते गए — सोना, चाँदी, रथ, वस्त्र।
दरबारी और मंत्री बार-बार आकर विनती करते कि रुक जाइए, महाराज। दमयंती ने भी बार-बार कहा कि प्रजा से मिलिए, उनकी सुनिए। नल ने किसी की नहीं सुनी।
जब हार बढ़ती गई, दमयंती ने सारथी वार्ष्णेय को बुलाया। उसे दोनों बच्चों — बेटा इंद्रसेन और बेटी इंद्रसेना — के साथ रथ और घोड़े लेकर अपने पिता भीम के यहाँ कुंडिन भेज दिया, इससे पहले कि सब कुछ हाथ से निकल जाए।
सब कुछ, फिर वस्त्र भी
अंत में पुष्कर ने सब कुछ जीत लिया, और हँसते हुए कहा — "अब दमयंती को दाँव पर लगाओ।"
नल स्तब्ध रह गए, फिर चुप रहकर उठ खड़े हुए, बिना कुछ बोले। उन्होंने अपने सारे आभूषण उतार दिए और एक ही वस्त्र में निकल पड़े। दमयंती भी वैसे ही उनके साथ चल पड़ी।
पुष्कर ने घोषणा करवा दी कि जो कोई नल को शरण दे, उसे प्राणदंड मिलेगा। नल और दमयंती नगर के बाहर तीन रातें बिना भोजन, केवल जल पर रहे।
टिप्पणी: यह प्रसंग नलोपाख्यान का केंद्रीय मोड़ है। कलि और द्वापर — यहाँ युगों के नाम भी हैं और पासे की चालों के नाम भी — दोनों अर्थों में पढ़े जा सकते हैं, पर कथा में वे व्यक्तित्व की तरह बर्ताव करते हैं। गांगुली के अनुवाद में दोनों बच्चे जुड़वाँ हैं — पुत्र इंद्रसेन और पुत्री इंद्रसेना; कुछ अन्य रूपांतरणों में नाम थोड़े अलग मिलते हैं। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।
स्रोत: महाभारत, वनपर्व — नलोपाख्यान, कलि की प्रतीक्षा