अध्याय ७

कर्कोटक का डंक

एक जलते जंगल में फँसे नाग ने नल को डस लिया — और उसी डंक ने राजा का रूप बदल दिया, और भीतर बैठे कलि को जला दिया

आग में एक आवाज़

दमयंती को छोड़ने के बाद नल जंगल में भटक रहे थे। एक जगह उन्हें आग की लपटों के बीच से एक आवाज़ सुनाई दी — "बचाओ, हे धर्मात्मा! मैं नारद के शाप से यहाँ जकड़ा हुआ हूँ।"

नल ने आवाज़ की दिशा में देखा — एक नाग, कर्कोटक, आग की लपटों में फँसा था। नल ने उसे उठाकर बाहर निकालना शुरू किया।

बाहर ले जाते हुए कर्कोटक अचानक छोटा हो गया, अंगूठे के बराबर। उसने कहा — "दस क़दम गिनो।" नल ने गिने। दसवें क़दम पर कर्कोटक ने उन्हें डस लिया।

जो डंक ने बदला

डंक लगते ही नल का रूप बदल गया — साँवला, ठिगना, कुरूप। कर्कोटक ने समझाया — "मैंने तुम्हारा रूप इसलिए बदला है, ताकि कोई तुम्हें न पहचान सके। तुम्हारे भीतर बैठा कलि अब मेरे विष से जलता रहेगा, जब तक तुम उससे मुक्त नहीं होते।"

कर्कोटक ने आगे कहा — "अयोध्या जाओ और राजा ऋतुपर्ण के यहाँ बाहुक नाम से रहो। वे पासों की विद्या जानते हैं। समय आने पर उनसे वह विद्या पाना, और उसके बदले अपनी अश्व-विद्या देना — तब तुम्हारी पत्नी, तुम्हारे बच्चे और तुम्हारा राज्य, सब वापस मिलेगा।" कर्कोटक ने यह भी वचन दिया कि नल विषैले जीवों और शत्रुओं से सुरक्षित रहेंगे। उसने नल को दो दिव्य वस्त्र भी दिए, ताकि सही समय पर वे अपना असली रूप पा सकें।

बाहुक, अयोध्या में

नल दसवें दिन अयोध्या पहुँचे और ऋतुपर्ण के सामने ख़ुद को बाहुक बताया — घोड़ों का और रसोई का जानकार। ऋतुपर्ण ने उन्हें दस हज़ार के वेतन पर अश्वशाला का प्रधान बना दिया। वार्ष्णेय और जीवल उनके सहायक बने।

हर शाम बाहुक एक श्लोक गुनगुनाते — "वह कहाँ है, भूख-प्यास से व्याकुल, थकी हुई, मेरे पीछे भटकती हुई? किसकी बाट जोहती होगी वह?" जीवल के पूछने पर उन्होंने कहा कि यह एक ऐसे पुरुष की कथा है जिसने अपनी पत्नी को धोखा देकर छोड़ दिया, और अब पछता रहा है।

टिप्पणी: यह प्रसंग नलोपाख्यान में नल के पतन के सबसे निचले बिंदु से वापसी की शुरुआत है। कथा के अंत में एक श्लोक आता है जो कर्कोटक, दमयंती, नल और ऋतुपर्ण — इन चारों के नाम की महिमा बताता है; उसकी झलक इसी अध्याय में मिलती है। बाहुक का शाम का श्लोक ग्रंथ में है और आगे के अध्याय में दमयंती तक पहुँचने का सूत्र बनता है। संवादों में दिए गए हिंदी वाक्य मूल संस्कृत श्लोकों के प्रवाहमय भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं।

स्रोत: महाभारत, वनपर्व — नलोपाख्यान, कर्कोटक का डंक

अब बताइए — कितना याद रहा?

क्या हुआ?

नल को जलते जंगल में किसकी आवाज़ सुनाई दी?

  • एक ऋषि की
  • एक पक्षी की
  • नाग कर्कोटक की
  • दमयंती की
पूरी कथा पढ़िए — आग में फँसा नाग

नल जंगल में भटक रहे थे, जब उन्हें आग में से एक आवाज़ सुनाई दी।

यह नाग कर्कोटक था, जो नारद के शाप से वहाँ जकड़ा हुआ था।

नल ने उसे आग से निकालना शुरू किया।

क्या हुआ?

कर्कोटक ने आग से निकलते समय क्या किया?

  • अंगूठे जितना छोटा होकर, दस क़दम गिनने को कहकर, दसवें क़दम पर नल को डस लिया
  • उड़कर भाग गया
  • नल को धन्यवाद देकर चला गया
  • नल को आशीर्वाद देकर उड़ गया
पूरी कथा पढ़िए — दस क़दम, एक डंक

कर्कोटक अंगूठे जितना छोटा हो गया।

उसने नल से दस क़दम गिनने को कहा।

दसवें क़दम पर उसने नल को डस लिया — यह चोट नहीं, एक उद्देश्य था।

ऐसा क्यों?

कर्कोटक ने नल को क्यों डसा?

  • नल को सज़ा देने के लिए
  • अपनी शक्ति दिखाने के लिए
  • ग़लती से
  • नल का रूप बदलने के लिए, ताकि कोई उन्हें न पहचान सके, और भीतर बैठे कलि को जलाने के लिए
पूरी कथा पढ़िए — एक डंक, दो मक़सद

डंक से नल कुरूप और साँवले हो गए, पहचाने न जाने लायक़।

कर्कोटक के विष ने नल के भीतर बैठे कलि को जलाना शुरू कर दिया।

यह डंक चोट नहीं, कर्कोटक की मदद का तरीक़ा था।

क्या हुआ?

कर्कोटक ने नल को कहाँ जाने और क्या करने को कहा?

  • विदर्भ जाकर राजा भीम की सेवा करने को
  • अयोध्या जाकर राजा ऋतुपर्ण के यहाँ बाहुक नाम से सेवा करने को
  • चेदि जाकर सुनंदा से मिलने को
  • सीधे निषध लौटने को
पूरी कथा पढ़िए — एक नया नाम, एक नया नगर

कर्कोटक ने नल को अयोध्या जाकर ऋतुपर्ण की सेवा करने को कहा।

नया नाम — बाहुक।

ऋतुपर्ण से उन्हें पासों का रहस्य सीखने को कहा गया, बदले में अपनी घोड़ों की विद्या देकर।

तथ्य

कर्कोटक ने नल को आगे क्या दिया, ताकि वे सही समय पर अपना असली रूप पा सकें?

  • दो दिव्य वस्त्र
  • एक मंत्र
  • एक अंगूठी
  • एक तलवार
पूरी कथा पढ़िए — रूप लौटाने का साधन

कर्कोटक ने नल को दो दिव्य वस्त्र दिए।

इन्हीं वस्त्रों को पहनकर नल आगे चलकर अपना असली रूप वापस पाएँगे।

तब तक वे बाहुक के रूप में ही रहेंगे।

क्या हुआ?

अयोध्या पहुँचकर नल ने ख़ुद को क्या बताया?

  • एक राजकुमार
  • एक व्यापारी
  • एक भटकता साधु
  • घोड़ों और रसोई का जानकार, नाम बाहुक
पूरी कथा पढ़िए — बाहुक का परिचय

नल ने ऋतुपर्ण को अपना नाम बाहुक बताया।

उन्होंने कहा कि वे घोड़ों और रसोई की विद्या में निपुण हैं।

ऋतुपर्ण ने उन्हें दस हज़ार के वेतन पर अश्वशाला का प्रधान बना दिया।

किसका बेटा?

अयोध्या में बाहुक (नल) के सहायक कौन बने — याद कीजिए?

  • केवल जीवल
  • वार्ष्णेय और जीवल, दोनों
  • केवल वार्ष्णेय
  • ऋतुपर्ण के दोनों पुत्र
पूरी कथा पढ़िए — दो सहायक

वार्ष्णेय, जो पहले नल का ही सारथी था, अब ऋतुपर्ण की सेवा में था।

जीवल भी बाहुक का सहायक बना।

आगे इन्हीं दोनों से जुड़े प्रसंग कथा में आते हैं।

क्या हुआ?

हर शाम बाहुक क्या करते थे?

  • नदी में स्नान करते
  • घोड़ों की देखभाल करते हुए सो जाते
  • एक श्लोक गुनगुनाते, जिसमें एक भूखी-प्यासी, थकी हुई स्त्री का ज़िक्र होता
  • राजा ऋतुपर्ण से मिलने जाते
पूरी कथा पढ़िए — रोज़ की एक पुकार

हर शाम बाहुक एक ही श्लोक दोहराते — कि वह स्त्री कहाँ होगी, किसकी बाट जोहती होगी।

यह श्लोक असल में दमयंती के लिए था, पर बाहुक इसे छिपाकर रखते।

पूछने पर उन्होंने इसे किसी और पुरुष की कथा बताया।

ऐसा क्यों?

बाहुक ने जीवल को अपनी शाम की श्लोक-कथा को किसी और की कथा क्यों बताया?

  • क्योंकि उन्हें दमयंती याद नहीं थी
  • क्योंकि जीवल को यह कथा पसंद नहीं थी
  • क्योंकि यह श्लोक किसी और की रचना थी
  • क्योंकि वे अपनी असली पहचान छिपाकर रखना चाहते थे
पूरी कथा पढ़िए — छिपा हुआ दर्द

बाहुक का असली रूप और नाम, दोनों बदले हुए थे।

अपनी पत्नी का दुःख ज़ाहिर करना उनकी पहचान खोल सकता था।

इसीलिए उन्होंने इसे एक और पुरुष की कथा की तरह सुनाया।

पहेली

मैं एक नाग हूँ, नारद के शाप से आग में जकड़ा हुआ। जिसने मुझे बचाया, उसी को मैंने डसा — पर मेरा डंक चोट नहीं, एक मदद थी। मैं कौन हूँ?

  • कर्कोटक
  • वासुकि
  • शेषनाग
  • तक्षक
पूरी कथा पढ़िए — मदद करने वाला डंक

कर्कोटक आग में फँसा नाग था, नल ने उसे बचाया।

बदले में उसने नल को डसकर उनका रूप बदल दिया और कलि को जलाना शुरू किया।

उसी ने नल को अयोध्या और बाहुक के नाम की राह दिखाई।