
अध्याय ४
अज और इंदुमती
नर्मदा के किनारे एक हाथी तीर खाकर गंधर्व बन गया — और विदर्भ में एक राजकुमारी ने राजाओं की पंक्ति पार करके अज के गले में माला डाली
अज और इंदुमती — रघुवंश का अध्याय ४। स्रोत: रघुवंश, सर्ग ५ (श्लोक ३६–७६), ६ और ७ (कालिदास)। इसमें ५ दृश्य हैं — विदर्भ का न्योता; नर्मदा का हाथी; स्वयंवर; माला; विवाह और घात — और अंत में १० सवाल।
विदर्भ का न्योता
अज जब युवा हुआ तो राजलक्ष्मी उसे चाहती थी, पर पिता की आज्ञा की प्रतीक्षा में थी, जैसे एक शालीन बेटी पिता के कहने की। उसी समय विदर्भ के राजा भोज का दूत रघु के पास आया। भोज की बहन इंदुमती का स्वयंवर था, और उन्हें अज को बुलाना था।
रघु ने सोचा कि यह संबंध ठीक है और बेटा विवाह योग्य हो चुका है। उन्होंने अज को सेना के साथ विदर्भ भेज दिया। रास्ते में शाही तंबू लगे, गाँव वाले भेंट लाए, और यह सब ऐसा था जैसे बग़ीचे में टहलने की यात्रा हो।
नर्मदा का हाथी
एक पड़ाव नर्मदा के किनारे पड़ा। तभी जल से एक जंगली हाथी निकला — भौंरों की गूँज उसके आने की सूचना दे रही थी। उसके मद की गंध इतनी तीखी थी कि सेना के पालतू हाथी रस्सियाँ तोड़कर भागे, रथ टूटे, घोड़े भागे, और योद्धा रानियों और स्त्रियों को सँभालने में उलझ गए।
अज को शास्त्र का नियम पता था कि राजा को जंगली हाथी नहीं मारना चाहिए। इसलिए उसने धनुष को बहुत नहीं खींचा, बस रुकने-हटने की ग़रज़ से हाथी के माथे पर एक तीर मारा।
तीर लगते ही हाथी का रूप चला गया। उसकी जगह एक देवरूप पुरुष खड़ा था, हार पहने, तेज से घिरा। 'मैं गंधर्वराज प्रियदर्शन का बेटा प्रियंवद हूँ,' उसने कहा। 'मतंग ऋषि के शाप से मैं अहंकार के कारण हाथी बना था। ऋषि ने कहा था कि जब इक्ष्वाकु-वंश का अज तेरे मस्तक पर तीर मारेगा, तब तू अपने रूप में लौटेगा। तुमने मुझे शाप से छुड़ाया। बदले में कुछ न दूँ तो मेरा लौटना व्यर्थ है। यह सम्मोहन नाम का अस्त्र ले लो — इसे चलाने वाला शत्रु को मारे बिना जीतता है।'
अज ने नर्मदा का जल आचमन किया, उत्तर की ओर मुँह किया, और मंत्र-सहित वह अस्त्र ले लिया। दोनों की मित्रता एक अनजानी वजह से बनी — एक चैत्ररथ वन की ओर गया, दूसरा विदर्भ की ओर।
स्वयंवर
भोज ने नगर के बाहर आकर अज की अगवानी की, जैसे समुद्र लहरों के साथ चंद्रमा की अगवानी करता है, और इतना सत्कार किया कि लोग अज को मेज़बान और भोज को मेहमान समझने लगे।
भोर में बंदी बेटे अज को जगाते: 'रात बीत गई, राजकुमार। संसार का बोझ विधाता ने दो हिस्सों में बाँटा है: एक सिरा तुम्हारे पिता उठाते हैं और दूसरा तुम्हारा यश।'
स्वयंवर-मंडप में राजा अपने सिंहासनों पर बैठे थे। अज को देखकर दूसरे राजाओं के मन में इंदुमती को पाने की आशा कम होने लगी। अज स्वयं ऐसे लग रहे थे मानो कामदेव ने फिर से शरीर धारण कर लिया हो। जब इंदुमती आई — पालकी में, सखियों के बीच — तो राजाओं ने अपने-अपने ढंग से भाव छिपाने की चेष्टाएँ कीं। कोई कमल घुमाने लगा, कोई गले की माला सुधारने लगा, कोई पैर के अँगूठे से सोने की चौकी पर लकीरें खींचने लगा।
सुनंदा नाम की द्वारपालिका उसे एक-एक राजा के पास ले गई और परिचय देती गई। मगध के राजा परंतप — जिनके यज्ञों से शची के बाल बिखरे रहते हैं। अंग के राजा, जिन पर स्वर्ग की अप्सराएँ मोहित थीं। अवंती के राजा — महाकाल के पड़ोसी, जिनके यहाँ शिप्रा की हवा चलती है। अनूप के राजा प्रतीप — कार्तवीर्य के वंश के, जिनकी जेल में रावण भी रहा था। शूरसेन के सुषेण, जिनके गले में कालिय का दिया मणि था। कलिंग के हेमांगद। पांड्य के राजा, जिनका कुशल अगस्त्य स्वयं पूछते थे।
हर राजा के पास से इंदुमती गुज़री, और जैसे रात में चलते दीये की लौ के पीछे का घर अँधेरा हो जाता है, वैसे ही हर राजा का चेहरा फीका पड़ता गया। इसी प्रसिद्ध उपमा के कारण कालिदास को परंपरा में 'दीपशिखा कालिदास' भी कहा जाता है।
माला
जब वह अज के पास पहुँची, तो उसके मन ने दूसरे राजा की ओर जाना बंद कर दिया — जैसे भौंरे का समूह खिले हुए आम के पेड़ पर पहुँचकर दूसरे पेड़ की ओर नहीं जाता। सुनंदा ने रघुवंश का परिचय दिया — ककुत्स्थ से दिलीप, दिलीप से रघु, रघु से यह अज।
इंदुमती संकोच से कुछ बोल न पाई। पर उसके रोम खड़े हो गए, और उसके मन की बात उसकी देह ने कह दी। सुनंदा ने परिहास में कहा, 'आर्ये, आगे चलें।' इंदुमती ने भौंहें चढ़ाकर उसकी ओर देखा। फिर उसने अपनी धाई के हाथों माला अज के गले में डलवा दी।
अज ने माला इस तरह पहनी मानो इंदुमती की बाहें ही उसके गले में पड़ गई हों। नगर के लोगों ने कहा, 'बादल से मुक्त चाँदनी को चाँद मिला है, और सागर को वह नदी जो उसके योग्य है।'
विवाह और घात
विवाह की विधि हुई। अग्नि के सामने भोज के पुरोहित ने वर-वधू को एक किया, और दोनों ने अग्नि की प्रदक्षिणा की — मानो दिन और रात मेरु की परिक्रमा करते हुए एक-दूसरे का पीछा करते हों। उनके हाथ मिले तो वर के हाथ के रोम खड़े हुए और वधू की उँगलियाँ पसीज गईं।
दूसरे राजा बाहर से हँसते हुए, मन में कुढ़ते हुए विदा हुए, और रास्ते में घात लगाए बैठ गए। तीन रात अज के साथ चलकर भोज लौट गए। कुछ दूरी पर राजाओं ने अज का रास्ता रोका। अज ने इंदुमती को सुरक्षा में रखने का भार अपने पिता के मंत्री को सौंपा, और ख़ुद उन राजाओं की सेना से भिड़ गया।
युद्ध भयंकर हुआ — धूल ऐसी कि सूरज ढक गया, और योद्धा एक-दूसरे को केवल तीरों पर लिखे नामों से पहचान पाए। अज की सेना कभी-कभी पीछे हटी, पर वह नहीं। फिर उसने गंधर्व का दिया सम्मोहन अस्त्र चला दिया।
सारे राजा सो गए — हथियार हाथ से छूट गए, मुकुट कंधे पर लुढ़क गए। तब अज ने शंख फूँका। अपने सैनिक लौटे और अज को सोते शत्रुओं के बीच खड़ा देखा, जैसे बंद कमलों के बीच चंद्रमा की छाया।
उसने उन राजाओं की ध्वजाओं पर तीर की नोक से, रक्त में डुबोकर, लिखा: 'तुम्हारा यश अज ने ले लिया है, तुम्हारे प्राण दया से छोड़ दिए गए हैं।' फिर वह इंदुमती के पास गया, जो डरी हुई थी, और बोला, 'देखो, इन शत्रुओं को अब बच्चा भी निहत्था कर सकता है।' कालिदास कहते हैं कि इंदुमती का मुख आनंद से खिल उठा। वह लज्जा के मारे पति को सीधे बधाई नहीं दे सकी, पर सखियों के शब्दों के रास्ते उसने दी।
रघु ने लौटे हुए विजयी बेटे और बहू का स्वागत किया।
टिप्पणी: सर्ग ५ के श्लोक ३६–७६, फिर सर्ग ६ और ७ इस अध्याय में हैं। 'दीपशिखा कालिदास' नाम परंपरा का है, कालिदास का अपना नहीं, और उसकी ऐतिहासिक उत्पत्ति पक्की नहीं। राजाओं के देश-नाम (अनूप, शूरसेन, पांड्य आदि) कालिदास के हैं।
स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), अज और इंदुमती