अंतिम राजा — रघुवंश, चित्र

अध्याय १२

अंतिम राजा

एक वंश जो राम के बाद भी कई पीढ़ियाँ चला — और जिसके अंतिम राजा की जगह पर कालिदास कथा रोक देते हैं, गर्भवती रानी के सिंहासन पर बैठने से

अंतिम राजा — रघुवंश का अध्याय १२। स्रोत: रघुवंश, सर्ग १८ और १९ (कालिदास)। इसमें ४ दृश्य हैं — नामों की एक सूची; छह बरस का राजा; अग्निवर्ण; वंश का अंत — और अंत में १० सवाल।

नामों की एक सूची

अतिथि का बेटा निषध था, जो निषध पर्वत जितना बलवान था। निषध के बेटे नल हुए, जिनके तेज पर आग का अंश था — यह वह नल नहीं, जिसकी कथा दमयंती के साथ जानी जाती है। नल के बेटे नभ, नभ के पुंडरीक, पुंडरीक के क्षेमधन्वा, उनके देवानीक — जिनका नाम स्वर्ग में भी सुना गया। फिर अहीनगु, पारियात्र, शिल, उन्नाभ, वज्रनाभ, शंखन, व्युषिताश्व। उनके विश्वसह, और विश्वसह के हिरण्यनाभ, जो विष्णु का अंश थे। हिरण्यनाभ के बेटे कौसल्य हुए, कौसल्य के ब्रह्मिष्ठ, ब्रह्मिष्ठ के पुत्र, और पुत्र के बेटे पुष्य।

कालिदास यह सूची जल्दी-जल्दी गिनाते हैं, पर हर नाम के साथ एक पंक्ति जोड़ देते हैं। किसी के बारे में कहते हैं कि वह जवानी में भी बुरी आदतों से दूर था। किसी के लिए कि प्रशंसा सुनते ही शरमा जाता था। किसी के बारे में कि पर्वत पारियात्र जितना ऊँचा था।

पुष्य ने बेटे को राज सौंपकर जैमिनी से योग सीखा, और जन्म के भय से मुक्त हुआ। पुष्य के बाद ध्रुवसंधि हुए, जिन्होंने शिकार के बीच शेर के हाथ मृत्यु पाई।

छह बरस का राजा

ध्रुवसंधि के बाद उनके मंत्रियों ने उनके छोटे बेटे सुदर्शन को राजगद्दी पर बिठाया — वही अकेली शाखा जो कुल की बची हुई थी। वह केवल छह बरस का था। कालिदास कहते हैं कि वंश जैसे नए चाँद वाला आकाश था, या एक कमल वाला सरोवर।

वह हाथी पर महावत के साथ राजमार्ग पर निकलता, तो छह बरस के होने पर भी नगर के लोग उसे पिता जैसा ही आदर देते। एक बादल हाथी के बच्चे जितना हो, पर सामने की हवा से टकराकर दिशाएँ ढक लेता है। जैसे 'महानील' रत्न अपनी चमक से नाम पाता है, वैसे वह छोटा होकर भी 'महाराज' कहलाया।

उसका आदेश समुद्र के किनारों तक कहीं नहीं रुका। उसके कोमल शरीर के लिए गहने भी भारी पड़ते थे, और फिर भी वह पृथ्वी का भारी जुआ उठाता था। उसने पूर्वजन्म की पढ़ी हुई विद्याएँ जैसे याद करके सीख लीं।

वह बड़ा हुआ तो उसकी शाखा से जुड़े मंत्रियों ने राजकुमारियों के चित्र दिखाए और उनके विवाह कराए। कालिदास के अनुसार वे राजकन्याएँ सुदर्शन की रानियाँ बनीं, लक्ष्मी और पृथ्वी की सौतें।

अग्निवर्ण

सुदर्शन ने बुढ़ापे में पुत्र अग्निवर्ण को राज दिया और ख़ुद नैमिष वन में तप करने चले गए। वहाँ उन्होंने तीर्थ-जल से स्नान किया, कुश की चटाई पर सोए, और राजमहल की जगह कुटिया में रहे।

अग्निवर्ण को पिता का बनाया राज बिना प्रयास मिल गया था। कुछ बरस उसने ख़ुद राज देखा, फिर सब कुछ मंत्रियों पर छोड़ दिया, और अपनी जवानी स्त्रियों पर लुटा दी।

कालिदास यहाँ बहुत विस्तार से लिखते हैं, पर मर्यादा से देखें तो बात इतनी है: वह अपने महल के भीतर ही रहने लगा, और प्रजा को उसके दर्शन के लिए तरसना पड़ता। मंत्रियों के आदर में उसने कभी-कभी खिड़की की जाली में से बस अपना एक पैर बाहर दिखा दिया, और सेवक उसे ही प्रणाम करके लौट गए।

उसकी रातें नृत्य, संगीत, मदिरा और बाँटे हुए प्रेम में कटतीं, और दिन भी रात की तरह। कालिदास कहते हैं कि उसे एक क्षण का भी विषयों का अभाव सहन नहीं होता था।

कई बार रानियाँ उससे रूठतीं, वह मनाता, और फिर वही। वह अपने सुख के इतने नए उपाय खोजता कि पहले वाले उत्सव अगले के सामने फीके पड़ जाते।

वंश का अंत

शत्रु राजाओं ने उसके राज पर हमला नहीं किया, क्योंकि उसके पुरखों का प्रताप अब भी बचा था। पर अग्निवर्ण के शरीर में एक रोग घुसा — राजयक्ष्मा, क्षय — वैसा ही जैसे दक्ष के शाप से चंद्रमा को लगा था।

वैद्यों ने उसे संयम की सलाह दी, उसने नहीं मानी। रोग बढ़ता गया। उसका शरीर क्षीण होने लगा, चेहरा पीला पड़ गया और आवाज़ धीमी होती गई। वंश ऐसा हो गया जैसे आकाश में चाँद की अंतिम कला बची हो, या गर्मी में सूखता तालाब, या दीये में बची बाती।

मंत्रियों ने नगर में कहा कि राजा पुत्र-प्राप्ति के लिए अनुष्ठान कर रहे हैं, ताकि प्रजा को पता न चले। राजा का कोई पुत्र नहीं था। फिर रोग ने उसे तेज़ हवा में दीये की तरह बुझा दिया।

मंत्रियों ने पुरोहित के साथ, चुपचाप, महल के बग़ीचे में ही चिता जलाई, इस बहाने से कि रोग की चिकित्सा के लिए कोई अनुष्ठान हो रहा है। फिर उन्होंने प्रमुख प्रजाजनों की सभा बुलाई। राजा की गर्भवती धर्मपत्नी को राज्य की स्वामिनी चुना गया।

और राजा की मृत्यु पर आँसुओं की गरमी से तपा हुआ वह गर्भ, राज्याभिषेक के ठंडे जल से शांत हुआ। रानी सोने के सिंहासन पर बैठी और बूढ़े मंत्रियों की सलाह से पति का राज चलाती रही, उसके आदेश कभी टाले नहीं गए — जैसे बीजों की मुट्ठी को सीप की तरह छिपाए हुए धरती।

यहीं कालिदास रुक जाते हैं।

टिप्पणी: यह अध्याय सर्ग १८ और १९ पर है। सर्ग १८ के राजाओं के नाम दिलचस्प हैं पर कथा-रहित हैं, इसलिए यहाँ एक पंक्ति में रखे गए। सर्ग १९ में अग्निवर्ण के विलास का वर्णन बहुत विस्तृत है; उसका यहाँ केवल सार रखा गया है। रघुवंश यहीं समाप्त होता है। कुछ विद्वानों का मत है कि काव्य अधूरा है; अन्य इसे जान-बूझकर रुका हुआ मानते हैं।

स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), अंतिम राजा

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

सुदर्शन कितने बरस की उम्र में राजा बना?

  • सोलह बरस
  • तीन बरस
  • छह बरस
  • बारह बरस
पूरी कथा पढ़िए — बाल-राजा

मंत्रियों ने कुल की एकमात्र बची हुई शाखा को सिंहासन पर बिठाया।

कालिदास कहते हैं कि छह बरस के राजा को भी लोग पिता जैसा आदर देते थे।

उपमा है: हाथी जितना छोटा बादल भी हवा के साथ दिशाएँ घेर लेता है।

क्या हुआ?

अग्निवर्ण की मृत्यु के बाद क्या हुआ?

  • मंत्रियों ने बग़ीचे में चुपचाप चिता जलाई और गर्भवती रानी को राज सौंप दिया
  • उसका भाई राजा बना
  • राज्य पड़ोसी राजा को मिल गया
  • लव ने अयोध्या ले ली
पूरी कथा पढ़िए — बिना शोर का अंत

मंत्रियों ने रोग की ख़बर छिपाई थी।

इसीलिए अंतिम संस्कार भी महल के बग़ीचे में हुआ।

उसके बाद रानी का राज्याभिषेक हुआ, और कालिदास का काव्य यहीं रुक जाता है।

व्याख्या

कालिदास ने अग्निवर्ण का इतना विस्तार से वर्णन क्यों किया — यह विद्वानों में बहस का प्रश्न है। इसे कैसे पढ़ें? (यह हमारा पाठ है।)

  • कि कवि को विलास पसंद था
  • कि कवि का काव्य यहीं पूरा नहीं हुआ
  • कि अग्निवर्ण कवि का आश्रयदाता था
  • कि कवि बताता है कि जिस वंश के राजा 'वनवास में मोक्ष' चुनते थे, वह आख़िर में विलास में डूबकर ख़त्म होता है
पूरी कथा पढ़िए — आरंभ और अंत

सर्ग १ में कालिदास कहते हैं कि रघुवंशी बुढ़ापे में वन जाते थे और योग से देह छोड़ते थे।

अग्निवर्ण इसके उलटे का उदाहरण है।

इसीलिए कई पाठक इसे वंश के पतन की चेतावनी की तरह पढ़ते हैं।

कौन हूँ मैं?

मैंने बुढ़ापे में बेटे को राज दिया और नैमिष वन में तप करने चला गया। मेरा नाम 'अच्छा दर्शन' है। मैं कौन हूँ?

  • अग्निवर्ण
  • सुदर्शन
  • ध्रुवसंधि
  • पुष्य
पूरी कथा पढ़िए — बाल-राजा का बुढ़ापा

सुदर्शन छह बरस की उम्र में राजा बना।

बुढ़ापे में उसने अपने बेटे अग्निवर्ण को राज दिया।

वह नैमिष वन गया, जहाँ वह तपस्वी की तरह रहा।

सही क्रम

इन राजाओं को पिता से पुत्र के क्रम में रखें।

  • अतिथि → निषध → नल → नभ → पुंडरीक
  • निषध → अतिथि → नल → पुंडरीक → नभ
  • नल → निषध → अतिथि → नभ → पुंडरीक
  • पुंडरीक → नभ → नल → निषध → अतिथि
पूरी कथा पढ़िए — पाँच पीढ़ियाँ

सर्ग १८ का आरंभ अतिथि के बेटे निषध से होता है।

फिर नल, नभ और पुंडरीक आते हैं।

यह वही सूची है जो पुराणों में भी मिलती है, पर नामों के क्रम में कुछ भेद हैं।

किसने कहा?

'राजा पुत्र-प्राप्ति के लिए अनुष्ठान कर रहे हैं' — किसने कहा, और क्यों?

  • रानी ने, ताकि पड़ोसी राजा हमला न करें
  • वैद्यों ने, ताकि राजा आराम करें
  • पुरोहित ने, ताकि यज्ञ चल सके
  • मंत्रियों ने, ताकि प्रजा को राजा की बीमारी का पता न चले
पूरी कथा पढ़िए — बहाना

राजा रोग के कारण दिखाई नहीं देता था।

मंत्रियों ने कहा कि वह अनुष्ठान में है।

उनके कारण ही राज्य बिना भय के चलता रहा।

तथ्य

सर्ग १८ का 'नल' किसका बेटा है, और वह किस नल से अलग है?

  • राम का बेटा, और वही दमयंती वाला नल
  • निषध का बेटा, और वह दमयंती वाले नल से अलग है
  • अतिथि का बेटा, और वही दमयंती वाला नल
  • कुश का भाई, और वही दमयंती वाला नल
पूरी कथा पढ़िए — दो नल

सूर्यवंश के नल निषध के बेटे हैं।

दमयंती वाले नल निषध देश के राजा, वीरसेन के बेटे हैं।

पुराण-परंपरा में नामों की यह समानता कई बार भ्रम पैदा करती है।

व्याख्या

काव्य के अंत में कालिदास गर्भवती रानी के सिंहासन पर बैठने पर रुकते हैं। इसे कैसे पढ़ें? (यह हमारा पाठ है।)

  • कवि का अंतिम उत्तर कि वंश नष्ट हो गया
  • कि बाक़ी सर्ग खो गए
  • एक अधूरेपन की तरह, जिसमें वंश के आगे चलने की आशा भी है और उसकी बड़ी कथा का अंत भी
  • कि रानी की कथा आगे के सर्गों में है
पूरी कथा पढ़िए — अंत की ओर

काव्य राजा की मृत्यु पर नहीं, रानी के राज्याभिषेक पर रुकता है।

इससे बाक़ी कहानी पाठक पर छूट जाती है।

यह पाठ हमारा है; श्लोक कुछ और नहीं कहते।

क्या हुआ?

अग्निवर्ण की बीमारी का कारण कालिदास किसे बताते हैं?

  • किसी ऋषि का शाप
  • एक युद्ध का घाव
  • किसी शत्रु का विष
  • विषयों में अति, जो उसने वैद्यों की सलाह के बावजूद नहीं छोड़ी
पूरी कथा पढ़िए — राजयक्ष्मा

रोग राजयक्ष्मा (क्षय) बताया गया।

कालिदास ने उसकी तुलना दक्ष के शाप से चंद्रमा को लगे क्षय से की।

कालिदास ने रोग को भोग का परिणाम दिखाया है, किसी शाप या युद्ध का नहीं।

पहेली

मैं एक राजा नहीं, एक रानी हूँ। मैंने राज तब पाया जब मेरे पति नहीं रहे और मेरे गर्भ में उत्तराधिकारी था। कालिदास मेरे नाम के बिना मुझ पर काव्य रोक देते हैं। मैं कौन हूँ?

  • अग्निवर्ण की रानी
  • सुदक्षिणा
  • कुमुद्वती
  • इंदुमती
पूरी कथा पढ़िए — बिना नाम की रानी

कालिदास ने रानी को नाम से नहीं, 'धर्म-पत्नी' कहकर पुकारा।

वह गर्भवती थी और मंत्रियों ने उसी को राज सौंपा।

काव्य यहीं रुक जाता है।

अंतिम राजा के बारे में सवाल

अंतिम राजा (रघुवंश) में क्या होता है?

एक वंश जो राम के बाद भी कई पीढ़ियाँ चला — और जिसके अंतिम राजा की जगह पर कालिदास कथा रोक देते हैं, गर्भवती रानी के सिंहासन पर बैठने से। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: नामों की एक सूची; छह बरस का राजा; अग्निवर्ण; वंश का अंत।

रघुवंश में अंतिम राजा के बाद क्या आता है?

अंतिम राजा, रघुवंश का आख़िरी अध्याय है।

अंतिम राजा का स्रोत क्या है?

रघुवंश, सर्ग १८ और १९ (कालिदास)।