दशरथ: शाप और वरदान — रघुवंश, चित्र

अध्याय ६

दशरथ: शाप और वरदान

एक राजा ने अँधेरे में तीर चलाया और एक बूढ़े अंधे दंपति का इकलौता बेटा मर गया — और उसी शाप में उसे वह वरदान मिला जिसके लिए वह बरसों से तरस रहा था

दशरथ: शाप और वरदान — रघुवंश का अध्याय ६। स्रोत: रघुवंश, सर्ग ९ और १० (कालिदास)। इसमें ५ दृश्य हैं — दशरथ; बसंत और शिकार; तमसा के किनारे; शाप, जो वरदान निकला; यज्ञ और खीर — और अंत में १० सवाल।

दशरथ

कालिदास कहते हैं कि संसार में मानो दो ही ऐसे थे जो थके हुओं की थकान उतारते थे — इंद्र, जो समय पर वर्षा देते थे, और दशरथ, जो समय पर धन देते थे। उनके राज में कोई बीमारी नहीं आई, और शत्रु का अपमान तो दूर की बात थी।

दशरथ ने अकेले एक रथ से पूरी पृथ्वी जीती थी। वह यम की तरह निष्पक्ष, कुबेर की तरह दाता और वरुण की तरह दंड देने वाले थे। कभी इंद्र के सामने झुके नहीं, और झूठ बोला नहीं, हँसी में भी नहीं।

उनकी तीन रानियाँ थीं — मगध, कोसल और केकय की राजकन्याएँ। और उन्होंने इंद्र की सहायता से देवताओं की स्त्रियों के भय दूर किए, कालिदास कहते हैं।

बसंत और शिकार

फिर बसंत आया। सूर्य उत्तर की ओर चला, कोयलें बोलीं और अशोक के फूल खिले। कालिदास ने इस ऋतु का वर्णन बहुत विस्तार से किया है — फूल, भौंरे, झूले, कोयल। राजा ने उत्सव मनाया, और फिर उसके मन में शिकार की इच्छा जागी।

वह जंगल में गया — जहाँ हिरनों का झुंड था। एक हिरनी अपने हिरन के आगे आ खड़ी हुई, और दशरथ ने तीर खींचकर भी छोड़ दिया — क्योंकि उसकी आँखों में उसे अपनी रानियों की आँखें दिखीं। उसने मोर पर भी तीर नहीं चलाया, क्योंकि उसके फैले पंख उसे अपनी रानी के गुँथे बालों की याद दिलाते थे।

पर राजा अपने सारे राज-काज भूलकर शिकार में डूब गया। एक रात वह अकेला जंगल में रहा, फूल-पत्तों की शय्या पर, चमकती जड़ी-बूटियों के उजाले में।

तमसा के किनारे

अगले दिन वह एक हिरन के पीछे जाते-जाते अपने साथियों से बिछड़ गया, और घोड़ा झाग फेंकता हुआ तमसा नदी के किनारे पहुँचा, जहाँ तपस्वी रहते थे।

पानी से एक आवाज़ आई — घड़ा भरने की। दशरथ ने उसे हाथी की सूँड़ की आवाज़ समझा और आवाज़ की दिशा में तीर चला दिया।

उसी क्षण जंगल में एक कराह उठी — 'हाय पिता!' राजा के हृदय में जैसे तीर उतर गया। सरकंडों में ढूँढ़ने पर घड़े के पास, ज़मीन पर, एक ऋषिकुमार मिला, तीर से घायल। दशरथ घोड़े से उतरे और उसके पास पहुँचे। उन्होंने पूछा, 'तुम कौन हो?'

ऋषिकुमार ने टूटे शब्दों में बताया कि वह एक तपस्वी का बेटा है, और ब्राह्मण नहीं, किसी और वर्ण से — द्विजातियों से अलग वर्ण का। उसने कहा, 'मेरे माता-पिता अंधे हैं। उन्हें पानी पहुँचा देना।'

दशरथ उसे अपने तीर समेत उसके माता-पिता के पास ले गया। उसने उन्हें सब कुछ बताया, और अपना अपराध कहा। अंधे दंपति ने रो-रोकर बेटे के सीने से तीर निकलवाया। बेटा मर गया।

शाप, जो वरदान निकला

बूढ़े ने अपनी आँखों के पानी को हाथों में लेकर राजा को शाप दिया — 'तू भी बुढ़ापे में मेरी तरह पुत्र के वियोग में मरेगा।'

दशरथ साँप की तरह शांत खड़ा रहा, जिसे पहले ख़ुद किसी ने कुचला हो। उसने कहा, 'मैंने अपराध किया है। आपके शाप में भी एक वरदान छिपा है — मैंने अभी बेटे का मुख देखा ही नहीं। जैसे अग्नि जोतने योग्य भूमि को जलाती है, फिर उसी भूमि में बीज अंकुर देते हैं। मुझ अपराधी के लिए आज्ञा दीजिए।'

तब तपस्वी ने अपनी पत्नी के साथ बेटे के पीछे जाने की ठानी और चिता की लकड़ी माँगी। राजा ने सेवकों के साथ वह आज्ञा पूरी की और लौटा, पाप का बोझ और शाप का बीज हृदय में लिए, जैसे समुद्र बड़वाग्नि को छिपाए रखता है।

यज्ञ और खीर

बरस बीतते गए। राजा को कोई बेटा नहीं हुआ। कालिदास कहते हैं कि वह बिना समुद्र-मंथन के समुद्र जैसा था — जिसके रत्न अभी निकले नहीं।

तब ऋष्यशृंग आदि ऋषियों ने उसके लिए पुत्रेष्टि यज्ञ आरंभ किया।

उसी समय देवता रावण से तंग आकर विष्णु के पास पहुँचे। वे समुद्र के किनारे पहुँचे ही थे कि आदि पुरुष जाग उठे। शेषनाग की शय्या पर, फनों के मणियों की रोशनी में, लक्ष्मी की गोद में पाँव रखे, कौस्तुभ पहने, गरुड़ से सेवित।

देवताओं ने स्तुति की: 'आप सृष्टि, पालन और संहार करने वाले तीन रूपों में हैं। आप इच्छा-रहित होकर भी सब इच्छाएँ पूरी करते हैं। जैसे गंगा की अनेक धाराएँ सागर में मिलती हैं, वैसे सारे मार्ग आप तक पहुँचते हैं।'

विष्णु ने कहा, 'मैं सब जानता हूँ। रावण को ब्रह्मा से वर मिला है कि देवताओं से उसकी मृत्यु नहीं होगी। उसने मनुष्यों को गिना ही नहीं। इसलिए मैं दशरथ का पुत्र बनूँगा, और उसके दस सिरों के कमल यज्ञ में चढ़ा दूँगा।'

उसी समय दशरथ के यज्ञ की अग्नि से एक पुरुष निकला, हाथ में सोने के पात्र में खीर लिए। राजा ने उसे ऐसे लिया जैसे इंद्र ने समुद्र से निकला अमृत लिया हो। उसने खीर दो रानियों में बाँटी — कौसल्या को और कैकेयी को, और दोनों ने अपने भाग में से आधा-आधा सुमित्रा को दे दिया।

तीनों ने उसी समय एक जैसे सपने देखे — हाथ में शंख, तलवार, गदा, शार्ङ्ग धनुष और चक्र लिए बौने उनकी रक्षा कर रहे हैं; गरुड़ उन्हें आकाश में ले जा रहा है; लक्ष्मी कमल का पंखा झल रही हैं; सप्तर्षि गंगा-स्नान के बाद वेद मंत्र पढ़ रहे हैं।

समय आने पर कौसल्या ने राम को जन्म दिया — सुंदर रूप के कारण पिता ने 'राम' नाम रखा, जो संसार का सबसे शुभ नाम है। कैकेयी ने भरत को, और सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को। कालिदास कहते हैं कि राजा चार पुत्रों से ऐसा लगता था जैसे चार दाँतों वाला ऐरावत, चार उपायों वाली राजनीति, या चार भुजाओं वाले विष्णु।

टिप्पणी: यह अध्याय सर्ग ९ और १० पर है (श्लोक ९.१–८२ और १०.१–८६)। सर्ग ९ का बसंत-वर्णन बहुत लंबा है और यहाँ उसका केवल एक संकेत रखा गया है। ऋषिकुमार के वर्ण का वर्णन कालिदास ने केवल 'द्विज से अलग' कहकर किया है; श्रवण कुमार नाम बाद की परंपरा का है।

स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), दशरथ: शाप और वरदान

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

दशरथ की तीन रानियाँ किन राज्यों की थीं?

  • विदर्भ, कलिंग और अवंती
  • मिथिला, अंग और काशी
  • मगध, कोसल और केकय
  • पांड्य, चोल और केरल
पूरी कथा पढ़िए — तीन राजकन्याएँ

कालिदास ने मगध, कोसल और केकय की राजकन्याओं को उनकी रानियाँ कहा।

वाल्मीकि के अनुसार भी नाम सुमित्रा, कौसल्या और कैकेयी हैं।

रघुवंश में यह बात संक्षेप में आती है।

क्या हुआ?

दशरथ ने तमसा के किनारे क्या ग़लती की?

  • पानी में घड़ा भरने की आवाज़ को हाथी की सूँड़ समझकर तीर चला दिया
  • एक हिरन के धोखे में रात को तीर चलाया
  • बिना कारण एक साधु पर तीर चलाया
  • किसी राक्षस की ललकार पर वार किया
पूरी कथा पढ़िए — आवाज़ का धोखा

कालिदास कहते हैं कि वह आवाज़ घड़ा भरने की थी, पर राजा ने उसे हाथी की समझा।

राजा के लिए शब्दभेदी बाण चलाना अपनी कला दिखाना था, पर यह उसका दोष बना।

कवि साफ़ कहते हैं कि राजा ने नियम तोड़ा।

ऐसा क्यों?

बूढ़े तपस्वी के शाप को दशरथ ने 'वरदान' क्यों कहा?

  • क्योंकि वे ऋषि का हर कथन आशीर्वाद मानते थे
  • क्योंकि शाप में मृत्यु का दिन बताया गया था
  • क्योंकि वे मरना चाहते थे
  • क्योंकि उस समय उनके कोई संतान नहीं थी, और शाप का अर्थ था कि उन्हें पुत्र होगा
पूरी कथा पढ़िए — पुत्र के बिना

शाप था कि बुढ़ापे में पुत्र-वियोग में मरोगे, यानी पुत्र होगा।

दशरथ ने कहा कि मैंने अभी तक बेटे का मुख ही नहीं देखा।

कालिदास ने इसे आग और खेत की उपमा दी: जिस खेत को आग जलाती है, उसी में बीज अंकुरित होते हैं।

कौन हूँ मैं?

मैं तमसा के किनारे मारा गया। मेरे माता-पिता अंधे थे और मेरी राह देखते थे। मैं कौन हूँ?

  • ऋष्यशृंग
  • एक तपस्वी का बेटा, जिसे आम कथा में श्रवण कुमार कहा जाता है
  • तृणबिंदु
  • मतंग
पूरी कथा पढ़िए — बिना नाम का बेटा

कालिदास ने उसे केवल 'ऋषिकुमार' कहा है, नाम नहीं दिया।

श्रवण कुमार का नाम बाद की परंपरा में लोकप्रिय हुआ।

इसलिए इसे 'बाद की परंपरा' का नाम मानना चाहिए, कालिदास के पाठ का नहीं।

सही क्रम

घटनाओं को सही क्रम में रखें।

  • बसंत और शिकार → तमसा के किनारे तीर → बूढ़े का शाप → पुत्रेष्टि यज्ञ → चार पुत्रों का जन्म
  • पुत्रेष्टि यज्ञ → बसंत और शिकार → बूढ़े का शाप → तमसा के किनारे तीर → चार पुत्रों का जन्म
  • बूढ़े का शाप → बसंत और शिकार → तमसा के किनारे तीर → चार पुत्रों का जन्म → पुत्रेष्टि यज्ञ
  • तमसा के किनारे तीर → बसंत और शिकार → चार पुत्रों का जन्म → बूढ़े का शाप → पुत्रेष्टि यज्ञ
पूरी कथा पढ़िए — शाप से खीर तक

शिकार बसंत के उत्सव के बाद हुआ।

शाप पहले आया और संतान बाद में।

इसलिए शाप और वरदान एक ही सूत्र में बँधे हैं।

किसने कहा?

'तू भी बुढ़ापे में पुत्र के शोक में मरेगा' — किसने किससे कहा?

  • वसिष्ठ ने दशरथ से
  • नारद ने अज से
  • विष्णु ने रावण से
  • अंधे तपस्वी ने दशरथ से
पूरी कथा पढ़िए — शाप के शब्द

शाप आँखों से टपके जल को हाथ में लेकर दिया गया।

कालिदास कहते हैं कि राजा इस शाप से भागा नहीं, बल्कि उसे स्वीकार कर लिया।

वही शाप आगे चलकर राम के वनवास में पूरा होता है।

तथ्य

रानियों ने खीर का भाग सुमित्रा को कैसे दिया?

  • राजा ने सुमित्रा को अलग से खीर दी
  • कौसल्या और कैकेयी ने अपने-अपने भाग में से आधा-आधा दे दिया
  • सुमित्रा ने यज्ञ-कुंड से अपने हाथ से ली
  • वसिष्ठ ने सुमित्रा को आशीर्वाद के साथ दी
पूरी कथा पढ़िए — बाँटी हुई खीर

दशरथ ने खीर दो रानियों को दी और मन में चाहा कि सुमित्रा का भी आदर हो।

दोनों रानियाँ राजा का मन समझ गईं और अपना आधा भाग उसे दे दिया।

इसीलिए सुमित्रा के दो पुत्र हुए।

व्याख्या

कालिदास ने इस कथा में रावण के वर की बात कही कि उसे 'देवताओं से' मृत्यु नहीं मिलेगी। इसे कैसे पढ़ें? (यह हमारा पाठ है।)

  • कि मनुष्य देवताओं से बड़े हैं
  • कि रावण को वर ब्रह्मा ने ग़लती से दिया
  • कि रावण ने मनुष्य को गिना ही नहीं, इसलिए उसका अंत मनुष्य रूप में विष्णु के हाथ से होगा
  • कि देवता मनुष्यों से डरते हैं
पूरी कथा पढ़िए — वर का छेद

वर में 'देवताओं से' लिखा था, 'मनुष्यों से' नहीं।

कालिदास ने विष्णु के मुँह से कहलाया कि रावण ने मनुष्यों की परवाह नहीं की।

यहीं से विष्णु का राम रूप में जन्म लेने का निश्चय बनता है।

क्या हुआ?

चारों पुत्रों के नाम और उनकी माताएँ क्या थीं?

  • राम और लक्ष्मण (कौसल्या), भरत और शत्रुघ्न (कैकेयी)
  • राम (सुमित्रा), भरत (कौसल्या), लक्ष्मण (कैकेयी)
  • राम और भरत (कैकेयी), लक्ष्मण और शत्रुघ्न (कौसल्या)
  • राम (कौसल्या), भरत (कैकेयी), लक्ष्मण और शत्रुघ्न (सुमित्रा)
पूरी कथा पढ़िए — चार भाई

कालिदास ने राम को 'पहला शुभ नाम' कहा।

लक्ष्मण और शत्रुघ्न सुमित्रा के जुड़वाँ बेटे हैं।

चारों भाई चार पुरुषार्थ जैसे लगते थे।

पहेली

मैं एक यज्ञ के अग्निकुंड से निकला, हाथ में सोने के पात्र में खीर थी। मुझे कुछ कहना नहीं पड़ा, मेरा आना ही पूरा कथन था। मैं क्या हूँ?

  • प्रजापति की ओर से भेजा हुआ पुरुष, जो खीर लेकर निकला
  • वसिष्ठ का शिष्य
  • स्वयं विष्णु
  • इंद्र का दूत
पूरी कथा पढ़िए — अग्नि से निकला

यज्ञ पूरा होने पर अग्नि से एक पुरुष प्रकट हुआ।

उसके हाथ में सोने के पात्र में खीर थी।

कालिदास कहते हैं कि खीर में विष्णु का तेज प्रवेश कर चुका था।

दशरथ: शाप और वरदान के बारे में सवाल

दशरथ: शाप और वरदान (रघुवंश) में क्या होता है?

एक राजा ने अँधेरे में तीर चलाया और एक बूढ़े अंधे दंपति का इकलौता बेटा मर गया — और उसी शाप में उसे वह वरदान मिला जिसके लिए वह बरसों से तरस रहा था। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: दशरथ; बसंत और शिकार; तमसा के किनारे; शाप, जो वरदान निकला; यज्ञ और खीर।

रघुवंश में दशरथ: शाप और वरदान के बाद क्या आता है?

आगे धनुष और परशुराम: जिसने मिथिला में शिव का धनुष तोड़कर विवाह जीता, उसे घर लौटते समय रास्ते में वह मिला जिसने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित किया था।

दशरथ: शाप और वरदान का स्रोत क्या है?

रघुवंश, सर्ग ९ और १० (कालिदास)।