
अध्याय ७
धनुष और परशुराम
जिसने मिथिला में शिव का धनुष तोड़कर विवाह जीता, उसे घर लौटते समय रास्ते में वह मिला जिसने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित किया था
धनुष और परशुराम — रघुवंश का अध्याय ७। स्रोत: रघुवंश, सर्ग ११ (कालिदास)। इसमें ५ दृश्य हैं — विश्वामित्र के साथ; मिथिला का धनुष; लौटते समय; दो धनुष; दिशा बंद, राह खुली — और अंत में १० सवाल।
विश्वामित्र के साथ
कौशिक — विश्वामित्र — दशरथ के पास आए और अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम को माँगा। राम अभी बालक थे, कनपटी के पास बालों की लट उनकी अब भी पहचान थी। पर कालिदास कहते हैं कि वीर का तेज उम्र नहीं गिनता।
दशरथ ने राम और लक्ष्मण को विदा कर दिया — क्योंकि रघुवंश में कभी किसी याचक को ख़ाली नहीं लौटाया गया, चाहे प्राण ही क्यों न माँगे। नगर की गलियाँ झाड़ी गईं, स्त्रियों ने फूलों के साथ पानी छिड़का, और दोनों भाई पिता के चरणों में झुके। पिता के आँसू उनके सिर पर गिरे।
रास्ते में विश्वामित्र ने उन्हें बला और अतिबला नाम की दो विद्याएँ सिखाईं, जिनके बल से राजमहल के जड़ाऊ फ़र्श पर चलने के आदी राजकुमारों को चलने की थकान नहीं हुई। वे ऐसे चल रहे थे मानो माँ के पास हों। झीलें उन्हें मीठा पानी देतीं, हवाएँ फूलों के पराग, बादल छाँव।
विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा में राम ने ताड़का को मारा। कालिदास ने इस प्रसंग को कुछ ही श्लोकों में समेटा है, और ध्यान उसी पर रखा है जो आगे आता है।
मिथिला का धनुष
मिथिला पहुँचकर राम के सामने शिव का वह धनुष लाया गया, जिससे शिव ने कभी यज्ञ-मृग के रूप में भागते यज्ञ का पीछा किया था। राजा जनक ने कहा था कि जो इसे चढ़ाएगा, वही मेरी बेटी का पति होगा — कन्या का शुल्क पराक्रम है।
धनुष सोते हुए साँप जैसा पड़ा था। राम ने उसे उठाया, और कामदेव के फूलों के धनुष की तरह, बिना ख़ास परिश्रम के, उसे चढ़ा दिया। राम ने जैसे ही उसे खींचा, वह बिजली की कड़क जैसी आवाज़ के साथ टूट गया। कालिदास की कल्पना है कि वह आवाज़ परशुराम को यह बताने गई कि क्षत्रियों की जाति फिर जी उठी है।
मिथिला के राजा ने अपनी अयोनिजा कन्या — सीता, जो लक्ष्मी का ही रूप थी — राम को देने का अपना वचन तेजस्वी विश्वामित्र की उपस्थिति में पूरा किया — मानो अग्नि साक्षी हो। फिर दशरथ को संदेश भेजा गया: 'निमि का वंश आपकी बेटी-जैसी बहू को स्वीकार करके पवित्र हो जाए।'
दशरथ तो स्वयं योग्य बहू की खोज में थे, और ठीक उसी समय यह समाचार लेकर ब्राह्मण आए। वह मिथिला पहुँचे, नगर को सेना से घेरकर इस तरह, जैसे प्रेमिका के आलिंगन में नगर बँध जाए।
वहाँ राम ने सीता से विवाह किया, लक्ष्मण ने उनकी छोटी बहन उर्मिला से, और जनक के भाई कुशध्वज की दो कन्याओं से भरत और शत्रुघ्न ने। कालिदास कहते हैं कि चारों पुत्र चारों बहुओं के साथ ऐसे लगते थे जैसे राजा की चार नीतियाँ, अपने-अपने साधनों के साथ।
लौटते समय
दशरथ तीन पड़ाव तक जनक को छोड़ने आए, उन्हें लौटाया, और ख़ुद अयोध्या की ओर चले।
उसी समय आँधी चली, उलटी दिशा से, और सेना के ध्वज उखाड़ दिए। सूर्य के चारों ओर भयानक घेरा बना। दिशाओं में बाज़ों के पंख जैसे मटमैले केश और शाम के बादलों के लाल वस्त्र छा गए। सियारिनें सूर्य की ओर मुँह करके रोईं, मानो परशुराम को उकसा रही हों।
दशरथ ने वसिष्ठ से पूछा। गुरु ने कहा, 'अंत में शुभ होगा।' और तभी सामने तेज का एक पुंज प्रकट हुआ। देखते-देखते वह मनुष्य के रूप में आया — परशुराम।
पिता से यज्ञोपवीत का और माता से धनुष-सा तेज पाया हुआ, जैसे चंदन के पेड़ से साँप लिपटा हो। कालिदास दो बातें कहते हैं जो पाठक को चौंकाती हैं: कि पिता के आदेश पर उन्होंने पहले अपनी माँ का सिर काटा था — दया का वह भाव पहले जीता — और फिर पृथ्वी जीती। और कि दाहिने कान पर रुद्राक्ष की माला पहने वे ऐसे लगते थे जैसे इक्कीस बार क्षत्रियों के संहार की गिनती हो रही हो।
दशरथ का मन बैठ गया। बेटे अभी बच्चे थे, और 'राम' नाम उनके अपने बेटे और इस भयानक शत्रु का एक ही था। वह नाम अब उनके लिए ऐसा रत्न हो गया जो हार में भी है और साँप के फन पर भी।
दो धनुष
परशुराम ने दशरथ की ओर देखा तक नहीं। राजा चिल्लाते रहे, 'अर्घ्य, अर्घ्य!' और ऋषि की आँखें राम पर टिकी थीं, जिनमें क्रोध की आग थी।
उन्होंने कहा, 'क्षत्रियों की जाति मेरी शत्रु है, उसने मुझे चोट पहुँचाई है — उसे कई बार मिटाकर ही मैं शांत हुआ। पर तुम्हारे कर्म की ख़बर पाकर मैं फिर सोए साँप की तरह जगा हूँ। तुमने मिथिला का वह धनुष तोड़ा है जो और किसी राजा के आगे झुका नहीं था। सुनकर मुझे लगा कि मेरी वीरता का अहंकार तुमने तोड़ दिया।
'एक समय 'राम' शब्द कहने पर संसार में केवल मैं समझा जाता था। अब तुम ऊपर उठ रहे हो और यह शब्द बँट गया है — मुझे लज्जा लगती है। जानो कि शिव का धनुष पहले ही विष्णु की शक्ति से निर्बल किया जा चुका था। हवा किनारे के पेड़ को तभी गिराती है, जब धारा उसकी जड़ें पहले काट चुकी हो।
'यह मेरा धनुष है। इस पर तीर चढ़ा। प्रत्यंचा चढ़ा, और द्वंद्व-युद्ध कर। अगर तेरी भुजाओं का बल मेरे बराबर निकला तो मैं हार मान लूँगा। और अगर तुझे मेरे कुल्हाड़े की धार से डर लगता है, तो हाथ जोड़कर अभय माँग ले।'
राम ने मुस्कुराते हुए केवल धनुष ले लिया। जो धनुष परशुराम के हाथ में था, वही हाथ में लेते ही वह इतना सुंदर हो गया जैसे ताज़े बादल पर इंद्रधनुष चढ़ गया हो। प्रत्यंचा चढ़ते ही परशुराम का तेज बुझे अंगारे के धुएँ जैसा रह गया।
लोगों ने दो को आमने-सामने खड़े देखा — एक का तेज बढ़ता, दूसरे का घटता, जैसे सूर्य और चंद्रमा आमने-सामने खड़े हों।
दिशा बंद, राह खुली
राम ने धनुष पर तीर चढ़ाया और दया से कहा, 'आप ब्राह्मण हैं और आपने ही अपराध शुरू किया था, पर फिर भी मैं आपको निर्दयता से नहीं मार सकता। बताइए, यह तीर आपकी गति पर छोड़ूँ या आपके कमाए हुए लोकों पर?'
परशुराम ने कहा, 'मैं तुम्हें पहचानता हूँ — तुम आदि पुरुष हो। मैंने तुम्हारे तेज को देखने के लिए तुम्हें उकसाया था। मैंने पिता के शत्रुओं को मिटाया और पृथ्वी को ब्राह्मण को दे दिया; आज तुम्हारे हाथ मेरी हार भी मेरा मान है। मेरी चलने की शक्ति मत छीनो, मुझे तीर्थ करने हैं। स्वर्ग की राह बंद हो जाए, मुझे दुख नहीं — मैं सुख से निर्लिप्त हूँ।'
राम ने 'ऐसा ही हो' कहा और पूर्व की ओर तीर छोड़ दिया। वह तीर परशुराम के लिए स्वर्ग का रास्ता बंद कर गया। राम ने ऋषि के चरण छुए और क्षमा माँगी।
परशुराम ने कहा, 'मैंने माँ से मिला क्षत्रियों का स्वभाव तुमसे हार में खो दिया, और पिता की शांति पा ली। तुमने मेरी हार को एक उपकार बना दिया। जाओ, तुम्हारी राह में कोई बाधा न हो।' और वह अंतर्धान हो गए।
दशरथ को लगा कि बेटा दोबारा जन्मा है — जैसे दावानल से घिरे पेड़ पर बारिश गिरी हो। कुछ रातें रास्ते में बिताकर वे अयोध्या पहुँचे, जिसकी खिड़कियों में कमलों जैसे, मिथिला की राजकन्या को देखती औरतों के चेहरे लगे थे।
टिप्पणी: यह अध्याय सर्ग ११ पर है। ताड़का-वध वाले श्लोकों का ओसीआर स्रोत में साफ़ नहीं मिला, इसलिए उसे केवल संकेत में रखा गया है। परशुराम का माँ का सिर काटना कालिदास के एक श्लोक में आता है; यहाँ उसे उतने ही में रखा गया है।
स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), धनुष और परशुराम