दिलीप और नंदिनी — रघुवंश, चित्र

अध्याय १

दिलीप और नंदिनी

जिस राजा के पास सब कुछ था, पर बेटा नहीं — और एक गाय, जिसके पीछे उसने इक्कीस दिन बिना रुके चलना सीखा

दिलीप और नंदिनी — रघुवंश का अध्याय १। स्रोत: रघुवंश, सर्ग १–२ (कालिदास)। इसमें ७ दृश्य हैं — सूर्यवंश और एक विनम्र कवि; राजा दिलीप; वसिष्ठ के आश्रम में; सुरभि का शाप; इक्कीस दिन; शेर; उठो, बेटा — और अंत में १० सवाल।

सूर्यवंश और एक विनम्र कवि

कालिदास अपना महाकाव्य एक अजीब ढंग से शुरू करते हैं — अपनी ही सीमाएँ गिनाकर। वे कहते हैं कि सूर्य से निकला यह वंश कहाँ, और मेरी थोड़ी-सी बुद्धि कहाँ। यह तो ऐसा है जैसे कोई बेड़े पर बैठकर समुद्र पार करना चाहे, या कोई नाटा आदमी ऊँचे पेड़ का फल पाने को हाथ उठाए।

फिर भी वे लिखते हैं, क्योंकि इस वंश के राजाओं के गुण उनके कानों तक आ पहुँचे हैं। वे बताते हैं कि रघुवंश के राजा कैसे थे: जन्म से पवित्र, काम को फल तक पहुँचाने वाले, यज्ञ विधि से करने वाले, याचक को उसकी इच्छा के अनुसार देने वाले, अपराध के अनुसार दंड देने वाले। बचपन में पढ़ाई, जवानी में सुख, बुढ़ापे में वनवास — और अंत में योग से देह छोड़ने वाले।

इस वंश का पहला राजा मनु था, और उसी वंश में दिलीप हुए।

राजा दिलीप

कालिदास दिलीप का चित्र कुछ इस तरह खींचते हैं कि पाठक पहले उन्हें देखे, फिर उनके गुण गिने। छाती चौड़ी, कंधे बैल जैसे, शरीर साल के पेड़ जितना ऊँचा। लगता था मानो क्षत्रिय का तेज ही देह धरकर खड़ा हो।

उनकी प्रजा रथ के पहिये की तरह थी — जिधर सारथी ले जाए, उसी लीक पर, उससे एक रेखा-भर इधर-उधर नहीं। और दिलीप प्रजा से जो कर लेते थे, कालिदास के शब्दों में, वह उसी तरह था जैसे सूर्य धरती से पानी खींचता है — हज़ार गुना लौटाने के लिए।

उनकी रानी सुदक्षिणा मगध की राजकुमारी थीं। राजा का महल रानियों से भरा था, पर वे अपने को केवल सुदक्षिणा और राजलक्ष्मी का पति मानते थे।

पर इतने बड़े राजा के घर एक कमी थी। कई बरस बीत गए, और बेटा नहीं हुआ।

वसिष्ठ के आश्रम में

एक दिन राजा ने राज का भार मंत्रियों को सौंपा, और रानी के साथ गुरु वसिष्ठ के आश्रम की ओर निकल पड़े। दोनों एक ही रथ में थे, और बहुत थोड़े सेवक साथ थे, ताकि आश्रम की शांति न टूटे। फिर भी उनके तेज से ऐसा लगता था मानो पूरी सेना साथ चल रही हो।

रास्ते भर हवा उन्हें सुगंध लाती रही। मोर पहिये की घरघराहट सुनकर गर्दन उठाते, हिरन रथ के साथ-साथ दौड़ते, और हिरन-हिरनी के जोड़ों की आँखों में राजा-रानी को एक-दूसरे की आँखों जैसी झलक दिखती। चलते-चलते दिलीप रानी को हर चीज़ दिखाते जाते थे, और उन्हें पता ही नहीं चला कि कितना रास्ता कट गया।

शाम ढले वे आश्रम पहुँचे। तब आश्रम में ऋषि लकड़ी, कुश और फल लेकर जंगल से लौट रहे थे, और हिरन झोंपड़ियों के आँगन में ऐसे बैठे थे जैसे ऋषियों की पत्नियों के बच्चे हों।

दिलीप ने वसिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती के पाँव छुए। गुरु ने कुशल पूछी, तो राजा ने कहा कि राज में सब ठीक है, गुरुदेव — पर मेरे मन में एक काँटा है। वह कहते थे कि उन्हें डर है कि उनके पितर उनके दिए जल को गरम साँसों के साथ पीते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि मेरे बाद यह जल कौन देगा।

सुरभि का शाप

वसिष्ठ कुछ देर आँखें बंद करके ध्यान में बैठे रहे, जैसे मछलियाँ सो जाने पर तालाब थम जाता है। फिर उन्होंने बताया कि बात क्या थी।

पिछली बार जब दिलीप इंद्र के यहाँ से लौट रहे थे, तब रास्ते में कामधेनु सुरभि कल्पवृक्ष की छाँह में बैठी थीं। दिलीप का मन उस समय रानी की ही ओर था, और उन्होंने सुरभि को प्रदक्षिणा नहीं दी। सुरभि ने शाप दे दिया था कि जब तक तुम मेरी बेटी की सेवा नहीं करोगे, तुम्हें संतान नहीं होगी। गंगा में दिशाओं के हाथी खेल रहे थे और उनका शोर इतना था कि न राजा ने और न सारथी ने वह शाप सुना।

उपाय भी वहीं था। सुरभि इस समय पाताल में थीं, वरुण के लंबे यज्ञ के लिए। उनकी बेटी नंदिनी आश्रम में ही थीं। वसिष्ठ ने कहा कि उसकी सेवा वैसे करो, जैसे विद्या की सेवा की जाती है।

और उसी समय जंगल से नंदिनी लौट आईं — कोमल पत्ते-सी लाल, माथे पर चाँद की लकीर जैसा सफ़ेद निशान। अपने बछड़े को देखते ही नंदिनी के थनों से दूध की धार बहने लगी। वसिष्ठ ने राजा से कहा, जो पुकारते ही आ गई, उसी से तुम्हारी इच्छा जल्द पूरी होगी।

नियम सीधा था: जब वह चले, तुम चलो; जब वह रुके, तुम रुको; जब वह बैठे, तुम बैठो; जब वह पानी पिए, तब तुम पिओ। उस रात राजा-रानी ने कुश की चटाई पर विश्राम किया।

इक्कीस दिन

भोर होते ही दिलीप ने बछड़ा बाँधा, नंदिनी को चंदन और फूलों की माला पहनाई, और उसे जंगल में खुला छोड़ा। रानी कुछ दूर तक गाय के पीछे गईं, फिर राजा ने उन्हें लौटा दिया। अब राजा अकेला था, धनुष हाथ में, सेवकों के बिना।

दिलीप ने एक राजा के रूप को छोड़ दिया और गाय का साया बन गए। वे उसे हरी घास के कौर खिलाते, उसकी पीठ खुजलाते, मक्खियाँ उड़ाते और उसे जहाँ मन करे, वहाँ चरने देते। वह रुकती तो वह रुक जाते, वह चलती तो वह चल देते। कालिदास लिखते हैं कि पेड़ मानो चिड़ियों की बोली में कहते थे, 'राजा की जय हो।' हवा ने उन्हें छत्र न होने की धूप में भी नहीं तपने दिया।

शाम को नंदिनी आगे-आगे चलती हुई आश्रम लौटतीं और राजा उनके पीछे-पीछे आते। रानी आश्रम के किनारे उन्हें लेने खड़ी होतीं। गाय दोनों के बीच ऐसे लगती थी जैसे दिन और रात के बीच संध्या।

रात को राजा गाय के पास दीया और पूजा की थाली रखकर बैठते, और जब वह सो जाती तब सोते, जब वह उठती तब उठते। तीन बार सात दिन — इक्कीस दिन — ऐसे ही बीते।

शेर

बाईसवें दिन नंदिनी हिमालय की एक गुफा में चली गईं, जहाँ गंगा के छींटों से नरम घास उगी थी। राजा की आँखें पर्वत की शोभा में लग गई थीं। उसी क्षण एक शेर ने झपटकर गाय को पकड़ लिया।

गाय की चीख गुफा की दीवारों से टकराकर लौटी, और उसने राजा की नज़र को रस्सी की तरह खींच लिया। दिलीप ने देखा कि लाल गाय पर एक शेर बैठा है, जैसे लाल धातुओं वाले पर्वत पर खिला हुआ लोध्र का पेड़। उन्होंने तरकश से तीर निकालना चाहा — पर उनका दाहिना हाथ तीर की मूठ से चिपककर पत्थर-सा रह गया, जैसे चित्र में बना हुआ हो।

तब शेर मनुष्य की बोली में बोला। 'राजन्, मत थको। मैं शिव का सेवक कुम्भोदर हूँ, निकुंभ का मित्र। वह देवदारु का पेड़ देख रहे हो? पार्वती ने उसे बेटे की तरह पाला है। एक बार एक जंगली हाथी ने उसकी छाल रगड़कर छील दी थी, तब पार्वती को ऐसा दुःख हुआ जैसे स्कंद को असुरों का तीर लगा हो। तभी से शिव ने मुझे इस गुफा में बैठाया है — जो जीव यहाँ आए, उसी से मेरा पेट भरे। आज मेरे भोजन का दिन है और यह गाय ऊपर वाले की भेजी हुई है।'

दिलीप ने उत्तर दिया। 'आप शिव के सेवक हैं, और मैं जगत के कर्ता को पूज्य मानता हूँ। पर मेरे गुरु की यह धरोहर मेरी आँखों के आगे नष्ट हो, यह मैं नहीं सह सकता। आप मुझे ही खा लीजिए, और इस गाय को छोड़ दीजिए।'

शेर हँसा। 'तू चक्रवर्ती राज, जवानी और यह रूप एक गाय के लिए छोड़ रहा है? गुरु के क्रोध से बचना है तो उन्हें करोड़ों गायें दे दे। राज का सुख ही स्वर्ग है। तेरे मरने से सिर्फ़ यह एक गाय बचेगी, पर जीते रहे तो तू पूरी प्रजा का पिता है।'

तब दिलीप ने वह बात कही जिसके लिए यह कथा याद की जाती है। 'क्षत्र शब्द का अर्थ ही यह है कि जो संकट से बचाए। जो ऐसा न करे, उसे राज से क्या, और अपयश से मैली ज़िंदगी से क्या? साधारण गायें इस गाय की जगह कैसे ले सकती हैं? यह सुरभि जैसी है। आप भूखे न रहें, मुनि का यज्ञ भी न रुके — इसलिए मैं अपना शरीर देता हूँ।'

शेर ने कहा, 'ठीक।' दिलीप ने हथियार नीचे रख दिए, और सिर झुकाकर शेर के कूदने की राह देखने लगे, जैसे कोई मांस का पिंड पड़ा हो।

उठो, बेटा

तभी उनके ऊपर आकाश से विद्याधरों के हाथों फूलों की बरसात हुई। कानों में अमृत जैसी आवाज़ पड़ी — 'उठो, बेटा।'

दिलीप ने सिर उठाया। सामने शेर नहीं था। वहाँ नंदिनी खड़ी थी, माँ की तरह, उसके थनों से दूध टपक रहा था।

गाय ने कहा, 'बेटा, मैंने ही माया रचकर तुम्हारी परीक्षा ली। मुनि की शक्ति से मुझ पर यमराज भी वार नहीं कर सकता, शेर की तो बात ही क्या। तुम्हारी गुरुभक्ति और मेरे ऊपर दया से मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो। मुझे केवल दूध देने वाली मत समझना — प्रसन्न होने पर मैं इच्छा पूरी करने वाली भी हूँ।'

दिलीप ने हाथ जोड़कर माँगा — एक ऐसा पुत्र जो वंश को चलाए और जिसकी कीर्ति कभी न मिटे। नंदिनी बोली, 'ऐसा ही होगा। पत्ते के दोने में मेरा दूध दुहकर पी लो।'

दिलीप ने कहा, 'माँ, बछड़े के पी लेने के बाद और यज्ञ के काम से बचा हुआ दूध ही मैं पीऊँगा, वह भी गुरु की आज्ञा लेकर — वैसे ही जैसे पृथ्वी की उपज से मैं केवल छठा भाग लेता हूँ।' यह सुनकर नंदिनी और प्रसन्न हुई।

आश्रम लौटकर राजा ने पहले गुरु को और फिर रानी को यह सब बताया। कालिदास कहते हैं कि इन्हें शब्दों की ज़रूरत नहीं थी — राजा के चेहरे की चमक पहले ही सब बता चुकी थी। अगली सुबह वसिष्ठ ने दोनों को विदा किया, अरुंधती और अग्नि की प्रदक्षिणा के बाद। नंदिनी भी बछड़े के साथ उन्हें छोड़ने आईं।

थोड़े दिन बाद रानी सुदक्षिणा ने गर्भ धारण किया।

टिप्पणी: रघुवंश के पहले दो सर्ग (श्लोक १–९५ और १–७५) कालिदास की कथा हैं; इनमें कोई पुराण-स्रोत नहीं बताया गया। श्लोक-संख्याएँ एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद की हैं। मल्लिनाथ की टीका के अनुसार शाप का कारण सुरभि का अनादर है।

स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), दिलीप और नंदिनी

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

दिलीप को संतान क्यों नहीं हो रही थी — कथा के अनुसार?

  • रानी सुदक्षिणा ने कोई व्रत तोड़ा था
  • वरुण ने उन्हें शाप दिया था
  • उन्होंने सुरभि गाय को प्रदक्षिणा नहीं दी थी, इसलिए सुरभि का शाप था
  • गुरु वसिष्ठ ने कभी उन्हें शाप दिया था
पूरी कथा पढ़िए — जिसने सुना ही नहीं, उसका शाप

दिलीप इंद्र के यहाँ से लौट रहे थे और मन में रानी का ध्यान था, इसलिए कल्पवृक्ष की छाँह में बैठी सुरभि को उन्होंने प्रणाम नहीं किया।

गंगा में दिशाओं के हाथी खेल रहे थे, और उनके शोर में राजा और सारथी दोनों ने शाप नहीं सुना।

कालिदास की सीख सीधी है: जो आदर के योग्य है, उसे आदर न देना भी अपना रास्ता रोकना है।

क्या हुआ?

वसिष्ठ ने दिलीप को नंदिनी की सेवा का क्या नियम बताया?

  • वह चले तो चलो, रुके तो रुको, बैठे तो बैठो, पानी पिए तो पिओ
  • उसे रोज़ चंदन से नहलाओ और घी का दीया जलाओ
  • आश्रम में ही उसे बाँधकर रखो
  • उसका दूध सबसे पहले ब्राह्मणों को दो
पूरी कथा पढ़िए — सेवा के चार वाक्य

वसिष्ठ ने कहा कि जैसे विद्या की लगन से ज्ञान मिलता है, वैसे ही गाय की निरंतर सेवा से फल मिलेगा।

रानी को सुबह गाय को आश्रम की सीमा तक पहुँचाना और शाम को उसे लेने जाना था।

इस पूरे प्रसंग में राजा के सारे राजसी चिह्न हट जाते हैं: न छत्र, न सेवक, न रथ।

ऐसा क्यों?

शेर के सामने दिलीप ने ख़ुद को देने का प्रस्ताव क्यों रखा?

  • क्योंकि उन्हें अपना राज्य भारी लगने लगा था
  • क्योंकि वे शिव के सेवक से डर गए थे
  • क्योंकि रानी ने उन्हें यह आज्ञा दी थी
  • क्योंकि क्षत्रिय का अर्थ ही संकट से बचाने वाला है, और उन्होंने गुरु की धरोहर नष्ट होते नहीं देखनी चाही
पूरी कथा पढ़िए — बड़ी बात

दिलीप ने कहा कि क्षत्र शब्द का अर्थ ही है 'संकट से बचाने वाला'; जो ऐसा न करे, उसके लिए राज क्या और यश-रहित जीवन क्या।

शेर ने उन्हें तर्क दिया: जीते रहो, प्रजा के पिता हो, गुरु को करोड़ों गायें दे दो।

दिलीप ने तर्क माना नहीं — उनके लिए यह गाय गुरु की थी, और गुरु का भरोसा सबसे ऊपर था।

कौन हूँ मैं?

मैं शेर के रूप में आया था, पर शिव का सेवक हूँ। देवदारु के पेड़ की रखवाली मेरा काम है। मैं कौन हूँ?

  • नंदी
  • कुम्भोदर
  • निकुंभ
  • वीरभद्र
पूरी कथा पढ़िए — देवदारु का बेटा

शेर ने बताया कि पार्वती ने देवदारु के पेड़ को बेटे की तरह पाला है और उसे स्कंद की माता के सोने के घड़ों से दूध पिलाया है।

एक हाथी ने उसकी छाल छील दी थी, तब पार्वती को ऐसा कष्ट हुआ जैसे स्कंद घायल हों।

तब शिव ने कुम्भोदर को गुफा में बैठाया, कि हाथी न आएँ।

सही क्रम

इस कथा की घटनाओं को सही क्रम में रखें।

  • सुरभि का शाप → वसिष्ठ के आश्रम में आना → नंदिनी का आना → शेर की परीक्षा → पुत्र का वर
  • वसिष्ठ के आश्रम में आना → शेर की परीक्षा → सुरभि का शाप → पुत्र का वर → नंदिनी का आना
  • नंदिनी का आना → सुरभि का शाप → शेर की परीक्षा → वसिष्ठ के आश्रम में आना → पुत्र का वर
  • शेर की परीक्षा → पुत्र का वर → सुरभि का शाप → नंदिनी का आना → वसिष्ठ के आश्रम में आना
पूरी कथा पढ़िए — शाप से वर तक

सुरभि का शाप पहले का है, जो दिलीप को पता भी नहीं था; वसिष्ठ ने उसका कारण बाद में बताया।

नंदिनी तभी जंगल से लौट आईं, जब वसिष्ठ ने उसका नाम लिया।

परीक्षा के बाद ही वर मिला।

किसने कहा?

'उठो, बेटा' — किसने कहा?

  • कुम्भोदर ने
  • वसिष्ठ ने
  • सुदक्षिणा ने
  • नंदिनी ने
पूरी कथा पढ़िए — माया की परीक्षा

नंदिनी ने कहा कि उन्होंने माया रचकर परीक्षा ली और मुनि की शक्ति से उन्हें यमराज भी नहीं छू सकते।

दिलीप ने उन्हें खड़ा देखा, थनों से दूध गिरता हुआ, और शेर कहीं नहीं था।

विद्याधरों ने फूल बरसाए, यह उसी क्षण की सूचना थी।

तथ्य

शेर की परीक्षा से पहले दिलीप ने लगातार कितने दिन नंदिनी की सेवा की थी?

  • सात दिन
  • इक्कीस दिन
  • एक महीना
  • बारह बरस
पूरी कथा पढ़िए — तीन गुना सात

कालिदास 'तीन बार सात दिन' कहकर समय गिनते हैं।

बाईसवें दिन गाय हिमालय की गुफा में गई, जहाँ यह परीक्षा हुई।

यह दिन-गिनती इस कथा को इतना सीधा और ठोस बनाती है।

व्याख्या

इस कथा से कवि का कौन-सा संदेश निकलता है? (यह हमारा पाठ है, श्लोक का सीधा अर्थ नहीं।)

  • कि राजा को हमेशा शेरों से दूर रहना चाहिए
  • कि संतान पाने के लिए सिर्फ़ यज्ञ काफ़ी हैं
  • जो दूसरे की धरोहर की रक्षा का भार उठाता है, उसके लिए अपनी देह से बड़ी उसकी लाज होती है
  • कि गुरु हमेशा शिष्य की परीक्षा लेते हैं
पूरी कथा पढ़िए — कवि क्या दिखा रहा है

कालिदास राजा के गुण पहले गिनाते हैं, फिर एक ऐसी घड़ी रचते हैं जिसमें वे गुण परखे जाएँ।

यह कथा 'राजा' की परिभाषा नहीं, 'क्षत्र' के अर्थ की परीक्षा है।

इस पाठ को हमारी एक पढ़त की तरह लीजिए; मूल श्लोक यही सीधा नहीं कहता।

क्या हुआ?

दिलीप ने नंदिनी का दूध किस तरह पिया?

  • पूरा दूध अकेले, दोने में भरकर
  • रानी के साथ आधा-आधा बाँटकर
  • आश्रम के सब ऋषियों के साथ
  • बछड़े के पीने और यज्ञ-कार्य के बाद बचा हुआ, गुरु की आज्ञा लेकर
पूरी कथा पढ़िए — छठा भाग

दिलीप ने कहा कि जैसे मैं पृथ्वी की उपज का केवल छठा भाग लेता हूँ, वैसे ही गुरु की आज्ञा और बछड़े का हक़ पहले।

नंदिनी इस उत्तर से और प्रसन्न हुईं।

फिर वसिष्ठ ने अगली सुबह उन्हें विदा किया।

पहेली

मैं दिलीप की रानी हूँ, मगध की बेटी। मैं रोज़ गाय को आश्रम के किनारे तक पहुँचाती और शाम को लेने जाती थी। मैं कौन हूँ?

  • सुदक्षिणा
  • अरुंधती
  • इंदुमती
  • कौसल्या
पूरी कथा पढ़िए — सुदक्षिणा

कालिदास कहते हैं कि उनका नाम 'सुदक्षिणा' उनकी उदारता से बना।

वे मगध की राजकुमारी थीं, और दिलीप अपनी अनेक रानियों में केवल उन्हीं को पत्नी मानते थे।

उन्हीं के गर्भ से रघु का जन्म हुआ।

दिलीप और नंदिनी के बारे में सवाल

दिलीप और नंदिनी (रघुवंश) में क्या होता है?

जिस राजा के पास सब कुछ था, पर बेटा नहीं — और एक गाय, जिसके पीछे उसने इक्कीस दिन बिना रुके चलना सीखा। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: सूर्यवंश और एक विनम्र कवि; राजा दिलीप; वसिष्ठ के आश्रम में; सुरभि का शाप; इक्कीस दिन; शेर; उठो, बेटा।

रघुवंश में दिलीप और नंदिनी के बाद क्या आता है?

आगे रघु का जन्म: जिस बेटे का नाम 'जाने वाला' रखा गया — और जिसने इंद्र से लड़ाई करके भी घोड़ा नहीं छीना, पिता का यज्ञ छुड़ाया।

दिलीप और नंदिनी का स्रोत क्या है?

रघुवंश, सर्ग १–२ (कालिदास)।