इंदुमती का वियोग — रघुवंश, चित्र

अध्याय ५

इंदुमती का वियोग

एक माला आकाश से गिरी और रानी चली गई — राजा ने आठ बरस अपना दुख ढोया, और फिर गंगा-सरयू के संगम पर देह छोड़ी

इंदुमती का वियोग — रघुवंश का अध्याय ५। स्रोत: रघुवंश, सर्ग ८ (कालिदास)। इसमें ५ दृश्य हैं — रघु का संन्यास; दशरथ और माला; अज का विलाप; वसिष्ठ का संदेश; आठ बरस — और अंत में १० सवाल।

रघु का संन्यास

रघु ने अज का राज्याभिषेक कर दिया और ख़ुद वन जाने को तैयार हुए। अज ने उनके चरणों में सिर रखकर विनती की कि वे उसे छोड़कर न जाएँ। रघु को बेटे से बहुत प्रेम था, इसलिए उन्होंने उसकी बात मान ली और नगर के बाहर एक आश्रम में रहने लगे। पर जिस राजलक्ष्मी को वे छोड़ चुके थे, उसे उन्होंने फिर कभी नहीं अपनाया — जैसे साँप अपनी छोड़ी हुई केंचुली नहीं पहनता।

अज और रघु एक ही घर में, पर दो तरह जीते थे। अज सिंहासन पर बैठकर प्रजा के मामले देखता, और रघु एकांत में कुश के आसन पर बैठा ध्यान करता। एक राजकाज में नीति के छह उपाय अपनाता, दूसरा प्रकृति के तीन गुणों पर क़ाबू करता। रघु ने कुछ बरस अज की इच्छा से बिताए। और फिर योग से परमात्मा को पाकर देह छोड़ दी।

अज ने पिता का संस्कार बिना अग्नि के किया, योगियों के साथ — क्योंकि जिन्होंने इस तरह देह छोड़ी हो, उन्हें पुत्र के पिंड की ज़रूरत नहीं होती।

दशरथ और माला

समय बीता। पृथ्वी ने अज को रत्न दिए, और इंदुमती ने एक पुत्र — जो आगे 'दशरथ' कहलाया, दस दिशाओं में रथ चलाने वाला, और रावण के शत्रु का पिता।

फिर एक दिन अज बग़ीचे में रानी के साथ घूम रहा था, जैसे इंद्र शची के साथ नंदन-वन में। उसी समय नारद दक्षिण समुद्र के किनारे गोकर्ण के शिव के सामने वीणा बजाने जा रहे थे। हवा चली और उनकी वीणा के सिरे से स्वर्ग के फूलों की माला उड़ गई। वह माला बग़ीचे में इंदुमती की छाती पर आ गिरी।

इंदुमती ने उसे देखा और उसकी आँखें बंद हो गईं। वह उसी क्षण चली गई — जैसे चाँद ग्रहण के साथ चाँदनी भी चली जाए। और उसके साथ राजा भी लड़खड़ाकर गिर गया, जैसे दीये की लौ तेल की बूँद के साथ गिर जाए।

सेवकों की चीख़ों से पक्षी चौंक पड़े। राजा को पंखे से होश आ गया, पर इंदुमती को नहीं। कोई उपाय तभी चलता है जब प्राण का अवशेष हो।

अज का विलाप

अज ने इंदुमती की निश्चेष्ट देह गोद में उठा ली — जैसे वह वीणा, जिसके तार अभी चढ़ाए ही नहीं गए, सुर के बिना मौन पड़ी हो। और रोया। कालिदास लिखते हैं कि लोहा भी गरम होकर नरम हो जाता है, तो देहधारी की क्या बात।

'हाय, फूल भी प्राण ले सकता है, तो विधाता को हथियार क्या चाहिए? या शायद यमराज कोमल से कोमल को ही मारता है — पाले से कमल की नाल मर जाती है। अगर इस माला में प्राण लेने की शक्ति थी, तो मुझे भी क्यों नहीं ली, जो इसे छाती पर पहने हूँ? या शायद विधाता ने ऐसा वज्र बनाया है जो पेड़ को छोड़ दे और उससे लिपटी बेल को तोड़ दे।

'प्रिये, तुमने इतना बड़ा अपराध करने पर भी मुझसे कभी देर तक बात बंद नहीं की। आज एक बार भी मुझसे बिना कहे चली गईं? मेरे प्राण पहले तुम्हारे पीछे गए थे, फिर लौट आए — अब दुख भोगें। तुम्हारे चेहरे पर अब भी सुख की थकान का पसीना बैठा है, और तुम चली गईं। धिक्कार है देहधारियों की इस क्षणभंगुरता को।

'तुम्हारी सखियाँ सुख-दुख में तुम्हारी साथी थीं। यह तुम्हारा बेटा पहले दिन के चाँद जैसा है। और मेरा सारा प्रेम तुम्हारे पास था। फिर भी तुमने यह निष्ठुरता क्यों की? आज मेरा धैर्य गया, सुख गए, संगीत रुका, ऋतु उदास है, गहने बेकार हैं और बिस्तर सूना।

'तुम मेरी पत्नी थीं, मंत्री थीं, सखी थीं और सुंदर कलाओं की प्रिय शिष्या। मृत्यु ने तुम्हारे साथ मुझसे क्या नहीं छीना? तुमने मेरे मुँह से मधु पिया, अब मेरे आँसुओं से मैला जल कैसे पियोगी?'

कालिदास कहते हैं कि राजा के इस विलाप ने पेड़ों से भी आँसू की तरह रस टपका दिया।

बाद में स्वजन बड़ी कठिनाई से इंदुमती का शरीर उसकी गोद से ले जा सके, और उसे अगरु और चंदन की चिता पर रखा। राजा ने रानी के साथ देह नहीं छोड़ी, क्योंकि लोग कहते कि राजा पत्नी के पीछे मरा, इस इच्छा से नहीं कि जीना नहीं चाहता। दसवें दिन तक के कर्म उसी बग़ीचे में पूरे हुए।

वसिष्ठ का संदेश

यज्ञ में दीक्षित वसिष्ठ अपने आश्रम से ध्यान में सब जान गए। उन्होंने अपने शिष्य के हाथ अज को संदेश भेजा।

'महर्षि तुम्हारे दुख का कारण जानते हैं। वे यज्ञ के कारण ख़ुद नहीं आ सके। उन्होंने कहा है: बहुत पहले तृणबिंदु ऋषि तप कर रहे थे। इंद्र ने डरकर उनके पास हरिणी नाम की अप्सरा भेजी। ऋषि ने क्रोध में शाप दिया — तू पृथ्वी की स्त्री बन। अप्सरा ने क्षमा माँगी, तो उन्होंने कहा, जब तक तू स्वर्ग के फूल न देखे, पृथ्वी पर रहेगी। वही हरिणी विदर्भ में जन्मीं और तुम्हारी रानी बनीं। स्वर्ग का फूल देखकर वह शाप से मुक्त होकर चली गई। इसलिए शोक छोड़ो।

'जो जन्मा है, वह मरेगा। पृथ्वी की रक्षा करो — पृथ्वी ही राजा की असली पत्नी है। रोने से तुम उसे नहीं पाओगे, और मरकर भी नहीं, क्योंकि कर्मों के अनुसार हर किसी की राह अलग है। तुम्हारे आँसू जल की जगह उसे जलाते हैं — पानी चढ़ाओ। जो ज्ञानी है, वह प्रिय के वियोग को बाण का निकल जाना समझता है। पेड़ और पर्वत में फ़र्क़ यही है कि हवा चले तो पेड़ हिलता है, पर्वत नहीं।'

अज ने 'ठीक है' कहा और शिष्य को विदा किया। पर कालिदास कहते हैं कि वह संदेश उसके शोक से भरे हृदय में जगह न पाकर मानो लौट गया।

आठ बरस

अज ने बेटे के छोटे होने का ख़याल करके किसी तरह आठ बरस काटे — इंदुमती के चित्र देखकर, उसकी जैसी चीज़ों को देखकर, और सपनों में उसके थोड़ी देर के मिलने से। शोक का काँटा उसके हृदय में ऐसे धँसा रहा जैसे पीपल का अंकुर महल की छत फाड़ देता है।

जब दशरथ अस्त्र और शास्त्र में पारंगत हो गया, तो अज ने उसे प्रजा की रक्षा का भार दिया। और फिर रोग से भरी देह छोड़ने की इच्छा से उसने भोजन छोड़ दिया।

गंगा और सरयू के संगम पर उसने देह छोड़ी। और कालिदास कहते हैं कि वह देवताओं में गिना गया, पुरानी देह से भी सुंदर पत्नी से फिर मिला, और दोनों नंदन-वन के उपवनों में खेलने लगे।

टिप्पणी: यह अध्याय सर्ग ८ (श्लोक १–९५) पर है। विलाप के अंश कालिदास के शब्दों का भावार्थ हैं, शब्दशः अनुवाद नहीं। एक पद, जिसमें कालिदास अज के अपने मरने के विचार को 'लोकापवाद' के भय से रोकते हैं (श्लोक ७२), उसे यहाँ संक्षेप में रखा गया है।

स्रोत: कालिदास का रघुवंश महाकाव्य (मल्लिनाथ की टीका सहित एम. आर. काले के अंग्रेज़ी अनुवाद से), इंदुमती का वियोग

अब बताइए — कितना याद रहा?

तथ्य

अज और इंदुमती के पुत्र का नाम क्या था?

  • राम
  • रघु
  • दशरथ
  • कुश
पूरी कथा पढ़िए — दस रथ

दशरथ नाम का आशय है दसों दिशाओं में रथ चलाने वाला।

कालिदास कहते हैं कि वे रावण के शत्रु के पिता हुए।

आगे के सर्ग उन्हीं की कथा कहते हैं।

क्या हुआ?

इंदुमती की मृत्यु कैसे हुई?

  • आकाश से नारद की वीणा की स्वर्ग के फूलों की माला उनकी छाती पर गिरी और वे उसी क्षण चली गईं
  • एक साँप के काटने से
  • बीमारी से, कई दिन में
  • एक तीर से
पूरी कथा पढ़िए — माला का कारण

नारद दक्षिण समुद्र के गोकर्ण में शिव के सामने वीणा बजाने जा रहे थे।

हवा ने उनकी वीणा से माला उड़ा दी।

वही माला इंदुमती की छाती पर गिरी।

ऐसा क्यों?

इंदुमती इतनी जल्दी क्यों चली गईं — वसिष्ठ के संदेश के अनुसार?

  • क्योंकि अज ने किसी ऋषि का अपमान किया था
  • क्योंकि सुरभि का शाप अब तक चल रहा था
  • क्योंकि नारद क्रोधित थे
  • क्योंकि वे हरिणी अप्सरा थीं, जिन्हें तृणबिंदु का शाप था कि स्वर्ग के फूल देखने तक पृथ्वी पर रहेंगी
पूरी कथा पढ़िए — शाप जो वर बन गया

तृणबिंदु ने अप्सरा को शाप दिया था, और क्षमा माँगने पर उसकी सीमा बता दी।

सीमा थी: स्वर्ग का फूल देखना।

इसलिए माला के गिरते ही शाप ख़त्म हुआ और इंदुमती अपने लोक चली गईं।

कौन हूँ मैं?

मैं देवर्षि हूँ, वीणा बजाता हूँ, और उस दिन गोकर्ण के शिव के सामने जा रहा था। मेरी वीणा की माला से ही यह कथा मोड़ लेती है। मैं कौन हूँ?

  • तृणबिंदु
  • नारद
  • वसिष्ठ
  • अगस्त्य
पूरी कथा पढ़िए — बिना जाने कारण

कालिदास ने नारद को दोषी नहीं बताया।

हवा ने माला उड़ाई — यह एक दैव-योग है।

इस तरह घटना में किसी का अपराध नहीं रहता, केवल नियति है।

सही क्रम

अज के जीवन की घटनाओं को सही क्रम में रखें।

  • रघु का संन्यास → दशरथ का जन्म → माला और इंदुमती की मृत्यु → आठ बरस का शोक → संगम पर देह-त्याग
  • दशरथ का जन्म → रघु का संन्यास → आठ बरस का शोक → माला और इंदुमती की मृत्यु → संगम पर देह-त्याग
  • माला और इंदुमती की मृत्यु → रघु का संन्यास → दशरथ का जन्म → संगम पर देह-त्याग → आठ बरस का शोक
  • रघु का संन्यास → माला और इंदुमती की मृत्यु → दशरथ का जन्म → संगम पर देह-त्याग → आठ बरस का शोक
पूरी कथा पढ़िए — पुत्र के बड़े होने तक

दशरथ का जन्म इंदुमती की मृत्यु से पहले हो चुका था, और वह उस समय बहुत छोटा था।

इसीलिए अज ने आठ बरस प्रतीक्षा की।

तब उसने राज दशरथ को देकर देह छोड़ दी।

किसने कहा?

'पेड़ और पर्वत में क्या फ़र्क़ रहता, अगर हवा चलने पर दोनों हिलते?' — यह संदेश किसका है?

  • नारद का
  • अज का, स्वयं से
  • रघु का, मरने से पहले
  • वसिष्ठ का, उनके शिष्य के मुख से
पूरी कथा पढ़िए — धैर्य की उपमा

संदेश में पेड़ और पर्वत की उपमा है: हवा चले तो पेड़ हिलता है, पर्वत नहीं।

वसिष्ठ ने अज से कहा कि वह जितेंद्रियों में श्रेष्ठ है और उसे साधारण लोगों की तरह दुख में डूबना शोभा नहीं देता।

संदेश शिष्य के हाथ आया, क्योंकि गुरु यज्ञ में थे।

तथ्य

अज ने बेटे के लिए कितने बरस इंतज़ार किया?

  • तीन बरस
  • आठ बरस
  • बारह बरस
  • इक्कीस दिन
पूरी कथा पढ़िए — आठ

कालिदास कहते हैं कि अज ने बेटे के बचपन को देखकर आठ बरस किसी तरह काटे।

इस बीच उसने इंदुमती के चित्र और सपनों से मन बहलाया।

दशरथ के अस्त्र-शास्त्र में सिद्ध होते ही उसने राज उसे सौंप दिया।

व्याख्या

अज के विलाप को हम इस कथा में कैसे पढ़ सकते हैं? (यह हमारा पाठ है।)

  • कवि राजाओं के दुख का मज़ाक़ उड़ाता है
  • कवि चाहता है कि पाठक रानियों को छोड़कर तप करें
  • कवि दिखाता है कि इतना बड़ा राजा भी वही दुख झेलता है जो कोई भी पति झेलता, और इसीलिए कथा करुण होती है
  • कवि बताता है कि शाप से कोई नहीं बच सकता
पूरी कथा पढ़िए — विलाप का वज़न

अज के विलाप में छोटी-छोटी चीज़ें हैं: उसका करघनी, अशोक का पेड़, आम की बेल।

ये सब वे चीज़ें हैं जिन्हें रानी ने बड़े प्रेम से लगाया था।

यही कारण है कि सदियों से यह विलाप कवियों में सबसे प्रसिद्ध माना जाता है।

क्या हुआ?

अज ने देह कैसे छोड़ी?

  • युद्ध में वीरगति से
  • हिमालय में तप करते हुए
  • रानी की चिता में कूदकर
  • गंगा और सरयू के संगम पर भोजन त्यागकर
पूरी कथा पढ़िए — संगम

बेटे को राज सौंपकर अज ने रोग वाली देह को छोड़ने की इच्छा की।

कालिदास कहते हैं कि संगम पर देह छोड़ने के बाद वह स्वर्ग में इंदुमती से फिर मिला।

वे दोनों नंदन-वन के उपवनों में विहार करने लगे।

पहेली

मैं एक बार शाप से अप्सरा से स्त्री बनी। मेरा नाम हरिणी था। मैं पृथ्वी पर किस नाम से जानी गई?

  • इंदुमती
  • सुदक्षिणा
  • सुनंदा
  • अरुंधती
पूरी कथा पढ़िए — पहला नाम

तृणबिंदु का शाप उसे पृथ्वी पर ले आया, और वह विदर्भ में राजकन्या बनकर जन्मी।

इंदुमती का नाम और स्वयंवर कालिदास ने ख़ास तौर पर सजाकर रचा।

फिर उसके जाने के विलाप को उन्होंने उतनी ही गहराई दी।

इंदुमती का वियोग के बारे में सवाल

इंदुमती का वियोग (रघुवंश) में क्या होता है?

एक माला आकाश से गिरी और रानी चली गई — राजा ने आठ बरस अपना दुख ढोया, और फिर गंगा-सरयू के संगम पर देह छोड़ी। कथा इन पड़ावों से गुज़रती है: रघु का संन्यास; दशरथ और माला; अज का विलाप; वसिष्ठ का संदेश; आठ बरस।

रघुवंश में इंदुमती का वियोग के बाद क्या आता है?

आगे दशरथ: शाप और वरदान: एक राजा ने अँधेरे में तीर चलाया और एक बूढ़े अंधे दंपति का इकलौता बेटा मर गया — और उसी शाप में उसे वह वरदान मिला जिसके लिए वह बरसों से तरस रहा था।

इंदुमती का वियोग का स्रोत क्या है?

रघुवंश, सर्ग ८ (कालिदास)।